नियंत्रण और समन्वय ( control and co- ordination )

नियंत्रण और समन्वय ( control and co- ordination )

 

नियंत्रण और समन्वय ( control and co- ordination )



नियंत्रण और समन्वय

( control and co- ordination )

 आज के इस टॉपिक में हम नियंत्रण और समन्वय के बारेे में जानेेगे ।

जंतुओं में नियंत्रण और समन्वय  "

 

=>  जंतुओं में शारीरिक क्रियाओं का नियंत्रण और समन्वय दो प्रकार से होता है

1 तंत्रिकीय नियंत्रण एवमं समन्वय (nervous control and co- ordination )

2  रासायनिक नियंत्रण एवम समन्वय (chemical controland co-ordination )

 

* तंत्रिकीय नियंत्रण और समन्वय  :-

 

=>  उच्च श्रेणी के जंतुओं में तंत्रिकाए मिलकर तंत्रिका तंत्र का निर्माण करती है। जिसके द्वारा शारीरिक क्रियाओं का नियंत्रण और समन्वय किया जाता है।

तंत्रिका तंत्र विभिन्न प्रकार की आंतरिक संवेदनाओं या उद्यिपनो जैसे:- भूख, प्यास, घृणा ,रोग इत्यादि तथा भौतिक , रासायनिक ,यांत्रिक प्रभाओं को ग्रहण करता है एवम शरीर के विभिन्न भागों में इनका संवहन करने तथा सम्वेदनाओं की प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए अंगों को प्रेरित करने का कार्य करता है।

 

 

=> उच्च श्रेणी के जंतुओं में तंत्रिका तंत्र ,मस्तिक (brain) ,मेरुरज्जु (spinal cord ) ,तथा विभिन्न प्रकार की तंत्रिकाओं से बना होता है।

प्रत्येक तंत्रिका कोशिका में एक तारे जैसी रचना होती है ,जिसे साइटोन (cycton) कहते हैं। साइटोन में कोशिका द्रव्य तथा एक बड़ा न्यूक्लियस होता है।

 

=> इससे अनेक पतले तन्तु निकले होते है जो लम्बे होते है उन्हें अक्ष या एक्सान कहते है , जबकि जो तन्तु छोटे होते है ,उन्हें डेन्ड्राइट्स कहते है।

 

 

=> डेंड्राईट्स संवेदनाओ को ग्रहण कर उन्हें साइटोंन में भेजता है।जहाँ ये संवेदनाए विधुत आवेग में परिवर्तित हो कर एक्सोन के द्वारा तंत्रिका आवेग की और चली जाती है।

2--तंत्रिकोशिका या तंत्रिका कोशिका (अंग्रेज़ी:न्यूरॉन) तंत्रिका तंत्र में स्थित एक उत्तेजनीय कोशिका है। इस कोशिका का कार्य मस्तिष्क से सूचना का आदान प्रदान और विश्लेषण करना है।[1] यह कार्य एक विद्युत-रासायनिक संकेत के द्वारा होता है। तंत्रिका कोशिका तंत्रिका तंत्र के प्रमुख भाग होते हैं जिसमें मस्तिष्क, मेरु रज्जु और पेरीफेरल गैंगिला होते हैं। कई तरह के विशिष्ट तंत्रिका कोशिका होते हैं जिसमें सेंसरी तंत्रिका कोशिका, अंतरतंत्रिका कोशिका और गतिजनक तंत्रिका कोशिका होते हैं। किसी चीज के स्पर्श छूने, ध्वनि या प्रकाश के होने पर ये तंत्रिका कोशिका ही प्रतिक्रिया करते हैं और यह अपने संकेत मेरु रज्जु और मस्तिष्क को भेजते हैं। मोटर तंत्रिका कोशिका मस्तिष्क और मेरु रज्जु से संकेत ग्रहण करते हैं। मांसपेशियों की सिकुड़न और ग्रंथियां इससे प्रभावित होती है। एक सामान्य और साधारण तंत्रिका कोशिका में एक कोशिका यानि सोमा, डेंड्राइट और कार्रवाई होते हैं। तंत्रिका कोशिका का मुख्य हिस्सा सोमा होता है।

तंत्रिका कोशिका को उसकी संरचना के आधार पर भी विभाजित किया जाता है। यह एकध्रुवी, द्विध्रुवी और बहुध्रुवी (क्रमशः एकध्रुवीय, द्विध्रुवीय और बहुध्रुवीय) होते हैं।[1] तंत्रिका कोशिका में कोशिकीय विभाजन नहीं होता है जिससे इसके नष्ट होने पर दुबारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। किन्तु इसे स्टेम कोशिका के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। ऐसा भी देखा गया है कि अस्थिकणिका को तंत्रिका कोशिका में बदला जा सकता है।

तंत्रिका कोशिका शब्द का पहली बार प्रयोग जर्मन शरीर विज्ञानशास्त्री हेनरिक विलहेल्म वॉल्डेयर ने किया था। २०वीं शताब्दी में पहली बार तंत्रिका कोशिका प्रकाश में आई जब सेंटिगयो रेमन केजल ने बताया कि यह तंत्रिका तंत्र की प्राथमिक प्रकार्य इकाई होती है। केजल ने प्रस्ताव दिया था कि तंत्रिका कोशिका अलग कोशिकाएं होती हैं जो कि विशिष्ट जंक्शन के द्वारा एक दूसरे से संचार करती है।[1] तंत्रिका कोशिका की संरचना का अध्ययन करने के लिए केजल ने कैमिलो गोल्गी द्वारा बनाए गए सिल्वर स्टेनिंग तरीके का प्रयोग किया। मस्तिष्क में तंत्रिका कोशिका की संख्या प्रजातियों के आधार पर अलग होती है। एक आकलन के मुताबिक मानव मस्तिष्क में १०० अरब तंत्रिका कोशिका होते हैं। टोरंटो विश्वविद्यालय में हुए अनुसंधान में एक ऐसे प्रोभूजिन की पहचान हुई है जिसकी मस्तिष्क में तंत्रिकाओं के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इस प्रोभूजिन की सहायता से मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को और समझना भी सरल होगा व अल्जामरर्स जैसे रोगों के कारण भी खोजे जा सकेंगे। एसआर-१०० नामक यह प्रोभूजिन केशरूकीय क्षेत्र में पाया जाता है साथ ही यह तंत्रिका तंत्र का निर्माण करने वाले जीन को नियंत्रित करता है। एक अमरीकी जरनल सैल (कोशिका) में प्रकाशित बयान के अनुसार स्तनधारियों के मस्तिष्क में विभिन्न जीनों द्वारा तैयार किए गए आनुवांशिक संदेशों के वाहन को नियंत्रित करता है। इस अध्ययन का उद्देश्य ऐसे जीन की खोज करना था जो मस्तिष्क में तंत्रिका कोशिका के निर्माण को नियंत्रित करते हैं। ऎसे में तंत्रिका कोशिका के निर्माण में इस प्रोभूजिन की महत्त्वपूर्ण भूमिका की खोज तंत्रिका कोशिका के विकास में होने वाली कई अपसामान्यताओं से बचा सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार मस्तिष्क में तंत्रिका कोशिका निर्माण के समय कुछ गलत संदेशों वाहन से तंत्रिका कोशिका का निर्माण प्रभावित होता है।[2] तंत्रिका कोशिका का विकृत होना अल्जाइमर्स जैसी बीमारियों के कारण भी होता है। इस प्रोभूजिन की खोज के बाद इस दिशा में निदान की संभावनाएं उत्पन्न हो गई हैं।

3--केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र

 

 

केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र, तंत्रिका तंत्र का भाग है, जो बहुकोशिकीय जन्तुओं की सभी क्रियायों पर नियंत्रण और नियमन करता है। हड्डीवाले जीवों में तंत्रिका तंत्र मिनिन्जीज़ में संलग्न होता है। इसमें तंत्रिका तंत्र का अधिकांश भाग और मस्तिष्क और सुषुम्ना या मेरूरज्जु आते हैं। तंत्रिका तंत्र पृष्ठीय गुहा में स्थित होता है, जिसमे मस्तिष्क कपालीय गुहा में और मेरुरज्जु, मेरुरज्जु गुहा में होता है। मस्तिष्क खोपड़ी द्वारा सुरक्षित रहता है और मेरुरज्जु हड्डियों द्वारा। .

3 संबंधों: तन्त्रिका तन्त्र, मस्तिष्क, मेरूरज्जु।

तन्त्रिका तन्त्र

मानव का '''तंत्रिकातंत्र''' जिस तन्त्र के द्वारा विभिन्न अंगों का नियंत्रण और अंगों और वातावरण में सामंजस्य स्थापित होता है उसे तन्त्रिका तन्त्र (Nervous System) कहते हैं। तंत्रिकातंत्र में मस्तिष्क, मेरुरज्जु और इनसे निकलनेवाली तंत्रिकाओं की गणना की जाती है। तन्त्रिका कोशिका, तन्त्रिका तन्त्र की रचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई है। तंत्रिका कोशिका एवं इसकी सहायक अन्य कोशिकाएँ मिलकर तन्त्रिका तन्त्र के कार्यों को सम्पन्न करती हैं। इससे प्राणी को वातावरण में होने वाले परिवर्तनों की जानकारी प्राप्त होती तथा एककोशिकीय प्राणियों जैसे अमीबा इत्यादि में तन्त्रिका तन्त्र नहीं पाया जाता है। हाइड्रा, प्लेनेरिया, तिलचट्टा आदि बहुकोशिकीय प्राणियों में तन्त्रिका तन्त्र पाया जाता है। मनुष्य में सुविकसित तन्त्रिका तन्त्र पाया जाता है। .

मस्तिष्क

मानव मस्तिष्क मस्तिष्क जन्तुओं के केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र का नियंत्रण केन्द्र है। यह उनके आचरणों का नियमन एंव नियंत्रण करता है। स्तनधारी प्राणियों में मस्तिष्क सिर में स्थित होता है तथा खोपड़ी द्वारा सुरक्षित रहता है। यह मुख्य ज्ञानेन्द्रियों, आँख, नाक, जीभ और कान से जुड़ा हुआ, उनके करीब ही स्थित होता है। मस्तिष्क सभी रीढ़धारी प्राणियों में होता है परंतु अमेरूदण्डी प्राणियों में यह केन्द्रीय मस्तिष्क या स्वतंत्र गैंगलिया के रूप में होता है। कुछ जीवों जैसे निडारिया एंव तारा मछली में यह केन्द्रीभूत न होकर शरीर में यत्र तत्र फैला रहता है, जबकि कुछ प्राणियों जैसे स्पंज में तो मस्तिष्क होता ही नही है। उच्च श्रेणी के प्राणियों जैसे मानव में मस्तिष्क अत्यंत जटिल होते हैं। मानव मस्तिष्क में लगभग १ अरब (१,००,००,००,०००) तंत्रिका कोशिकाएं होती है, जिनमें से प्रत्येक अन्य तंत्रिका कोशिकाओं से १० हजार (१०,०००) से भी अधिक संयोग स्थापित करती हैं। मस्तिष्क सबसे जटिल अंग है। मस्तिष्क के द्वारा शरीर के विभिन्न अंगो के कार्यों का नियंत्रण एवं नियमन होता है। अतः मस्तिष्क को शरीर का मालिक अंग कहते हैं। इसका मुख्य कार्य ज्ञान, बुद्धि, तर्कशक्ति, स्मरण, विचार निर्णय, व्यक्तित्व आदि का नियंत्रण एवं नियमन करना है। तंत्रिका विज्ञान का क्षेत्र पूरे विश्व में बहुत तेजी से विकसित हो रहा है। बडे-बड़े तंत्रिकीय रोगों से निपटने के लिए आण्विक, कोशिकीय, आनुवंशिक एवं व्यवहारिक स्तरों पर मस्तिष्क की क्रिया के संदर्भ में समग्र क्षेत्र पर विचार करने की आवश्यकता को पूरी तरह महसूस किया गया है। एक नये अध्ययन में निष्कर्ष निकाला गया है कि मस्तिष्क के आकार से व्यक्तित्व की झलक मिल सकती है। वास्तव में बच्चों का जन्म एक अलग व्यक्तित्व के रूप में होता है और जैसे जैसे उनके मस्तिष्क का विकास होता है उसके अनुरुप उनका व्यक्तित्व भी तैयार होता है। मस्तिष्क (Brain), खोपड़ी (Skull) में स्थित है। यह चेतना (consciousness) और स्मृति (memory) का स्थान है। सभी ज्ञानेंद्रियों - नेत्र, कर्ण, नासा, जिह्रा तथा त्वचा - से आवेग यहीं पर आते हैं, जिनको समझना अर्थात् ज्ञान प्राप्त करना मस्तिष्क का काम्र है। पेशियों के संकुचन से गति करवाने के लिये आवेगों को तंत्रिकासूत्रों द्वारा भेजने तथा उन क्रियाओं का नियमन करने के मुख्य केंद्र मस्तिष्क में हैं, यद्यपि ये क्रियाएँ मेरूरज्जु में स्थित भिन्न केन्द्रो से होती रहती हैं। अनुभव से प्राप्त हुए ज्ञान को सग्रह करने, विचारने तथा विचार करके निष्कर्ष निकालने का काम भी इसी अंग का है। .

4--प्रतिवर्ती चाप और प्रतिवर्ती क्रिया में अंतर

    प्रतिवर्ती क्रिया यह स्वतः होने वाली क्रिया हैं  अर्थात यह मनुष्य के बिना अच्छा किए हुए  हैं  अपने आप होती है  |

उदाहरण : जब हम किसी गर्म वस्तु को छूते हैं तो हमारा हाथ अपने आप हट जाता है इसे प्रतिवर्ती क्रिया कहते हैं | 

    यह अचानक होने वाली क्रिया है  |

    प्रतिवर्ती क्रियाओं का नियंत्रण मेरुरज्जु के द्वारा होता है  |

    प्रतिवर्ती चाप एक मार्ग है जो हमारी तंत्रिका कोशिका और मेरुरज्जु के मध्य होता है

    प्रतिवर्ती चाप के द्वारा हमें प्रतिवर्ती क्रियाओं का पता लगता है |

 

5-मधुमेह एक पुरानी स्थिति है जो शरीर में रक्त शर्करा को ग्लूकोज के रूप में संसाधित करने के तरीके को प्रभावित करती है। आपके शरीर को ठीक से काम करने के लिए, आपको अपने रक्त में ग्लूकोज का एक स्वस्थ स्तर बनाए रखने की आवश्यकता है।

ग्लूकोज आपके शरीर का ऊर्जा का मुख्य स्रोत है। यह आपके द्वारा खाए जाने वाले कार्बोहाइड्रेट खाद्य पदार्थों से आता है, जैसे कि रोटी, पास्ता, चावल, अनाज, फल, स्टार्च वाली सब्जियां, दूध और दही। जब आप इन खाद्य पदार्थों को खाते हैं, तो आपकी रक्त धारा आपके शरीर के चारों ओर ग्लूकोज को पहुंचाती है, जहां आपकी कोशिकाएं इसे ऊर्जा में बदल देती हैं।

ग्लूकोज को तोड़ने के लिए इसलिए यह आपकी कोशिकाओं में प्रवेश कर सकता है, आपके शरीर को इंसुलिन, आपके अग्न्याशय में निर्मित हार्मोन की आवश्यकता होती है। यदि आपको मधुमेह है, तो इसका मतलब है कि आपका अग्न्याशय बहुत कम इंसुलिन बनाता है, या कोई भी नहीं। आपके द्वारा खाया जाने वाला ग्लूकोज ऊर्जा में बदल जाने के बजाय आपके रक्त में रहेगा।

आपके रक्त में ग्लूकोज के उच्च स्तर का आपके शरीर पर अल्पकालिक और दीर्घकालिक प्रभाव हो सकता है, जो संभवतः आपके दिल, मस्तिष्क, गुर्दे, आंखों और पैरों को नुकसान पहुंचा सकता है।

मधुमेह के प्रकार

मधुमेह के तीन मुख्य प्रकार हैं: टाइप 1, टाइप 2 और गर्भावधि मधुमेह।

टाइप करें 1 मधुमेह एक स्व-प्रतिरक्षित रोग है। अगर आपको टाइप 1 डायबिटीज है तो इसका मतलब है कि आपका अग्न्याशय अब आपकी ज़रूरत के इंसुलिन का उत्पादन नहीं करता है। इसका मतलब है कि आपको नियमित रूप से अपने रक्त शर्करा के स्तर की निगरानी करने की आवश्यकता होगी और या तो इंसुलिन को इंजेक्ट करें या एक स्वस्थ सीमा के भीतर उन स्तरों को रखने के लिए एक इंसुलिन पंप का उपयोग करें।

टाइप 1 मधुमेह ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित राष्ट्रों में बचपन की सबसे आम स्थितियों में से एक है। यह अक्सर बचपन में निदान किया जाता है, लेकिन किसी भी उम्र में विकसित हो सकता है।

यदि आपके पास 2 मधुमेह टाइप, इसका मतलब है कि आपका अग्न्याशय पर्याप्त इंसुलिन का उत्पादन नहीं कर रहा है या आप जो इंसुलिन पैदा कर रहे हैं वह प्रभावी रूप से काम नहीं कर रहा है। नियमित शारीरिक गतिविधि, एक स्वस्थ खाने की योजना और नियमित स्वास्थ्य जांच के साथ, आप अपने मधुमेह को अच्छी तरह से जीने के लिए प्रबंधित कर सकते हैं।

टाइप 2 मधुमेह एक प्रगतिशील स्थिति है। समय के साथ आपको अपने रक्त शर्करा के स्तर को प्रबंधित करने के लिए दवा, और कुछ मामलों में इंसुलिन की आवश्यकता हो सकती है।

गर्भावधि मधुमेहएक ऐसी स्थिति है जो आप गर्भावस्था के दौरान विकसित हो सकती है। जब आप 24 से 28 सप्ताह की गर्भवती होती हैं, तो यह एक रक्त परीक्षण और एक मौखिक ग्लूकोज सहिष्णुता परीक्षण के साथ निदान किया जाएगा। गर्भावधि मधुमेह को आहार और व्यायाम के साथ प्रबंधित किया जा सकता है, हालांकि कुछ महिलाओं को बच्चे के जन्म तक दवा या इंसुलिन की आवश्यकता हो सकती है।

गर्भकालीन मधुमेह आमतौर पर जन्म के बाद गायब हो जाता है, हालांकि यह इस संभावना को बढ़ा सकता है कि आप जीवन में बाद में टाइप 2 मधुमेह विकसित करेंगे।

आपने भी सुना होगा पूर्व मधुमेह। यदि आपको पूर्व-मधुमेह का निदान किया गया है, तो इसका मतलब है कि आपके रक्त शर्करा का स्तर और इंसुलिन का स्तर सामान्य से अधिक है - लेकिन अभी तक टाइप 2 मधुमेह के निदान के लिए पर्याप्त उच्च नहीं है। जीवनशैली में बदलाव करने से प्री-डायबिटीज को टाइप 2 डायबिटीज की प्रगति को धीमा करने में मदद मिल सकती है।

6--मैं कैसे जानूं कि मेरी जीवन शैली स्वास्थ्यप्रद है? मैं कैसे स्वास्थ्यप्रद जीवन शैली (Healthy lifestyle) के स्तर को माप सकता हूँ? मैं कैसे इस में सुधार ला सकता हूँ?

 जीवन में हम सभी, कभी ना कभी इस विषय में जानने के लिए उत्सुक हुए हैं l जिस तरह का आप जीवन जीते हैं, आपकी जीवन शैली वैसी ही बन जाती है। ध्यान एक ऐसा मार्ग है, जो स्वास्थ्यप्रद जीवन शैली के स्तर को सुधारने में मदद करता है, जैसा कि हज़ारों लोगों का अनुभव है। आइए जानें, स्वास्थ्यप्रद जीवन शैली के कुछ पहलुओं को और किस तरह ध्यान इन पहलुओं में  मदद करता है।

 

#1 स्वास्थ्यप्रद भोजन | Healthy Food

विचार करें

कितनी बार मेरे खाने में स्वास्थ्यप्रद चीज़ें होती हैं? क्या मैं अपने शरीर की आवश्यकता के अनुसार अधिक या कम तो नहीं खा रहा हूँ?

भोजन ऊर्जा का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। इसलिए सही मात्रा व सही प्रकार का भोजन, सही समय पर खाने से आपका जीवन पूर्ण रूप से स्वास्थ्यपूर्ण बन सकता है। ज़्यादातर हम अपनी रसना के वेग को शांत करने के लिए ऐसी चीज़ें खा जाते हैं जो कि स्वास्थ्यप्रद नहीं होती हैं। कई लोगों ने यह बताया है कि ध्यान ( Meditation) के नियमित अभ्यास से स्वास्थ्यप्रद भोजन खाना उनके लिए आसान हो गया है।

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ग्लाइकोलिसिस

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ग्लाइकोसिस की समग्र अभिक्रिया

      + 

α-D-ग्लूकोज + 2NAD+ + 2ADP + 2Pi 2 (पाइरुवेट) + 2NADH + 2ATP + 2H+ + 2H2O

ग्लाइकोलिसिस (Glycolysis) या ग्लाइको अपघटन, श्वसन की प्रथम अवस्था है जो कोशिका द्रव में होती है। इस क्रिया में ग्लूकोज का आंशिक आक्सीकरण होता है, फलस्वरूप ग्लूकोज के एक अणु से पाइरूविक अम्ल के 2 अणु बनते हैं तथा कुछ ऊर्जा मुक्त होती है। यह क्रिया कई चरणों में होती है एवं प्रत्येक चरण में एक विशिष्ठ इन्जाइम उत्प्रेरक का कार्य करता है। इस क्रिया को EMP पाथवे भी कहा जाता है। इसमें ग्लूकोज में संचित ऊर्जा का 4 प्रतिशत भाग मुक्त होकर एनएडीएच (NADH2) में चली जाती है तथा शेष 96 प्रतिशत ऊर्जा पाइरूविक अम्ल में संचित हो जाती है। ग्लाइकोलिसिस की अभिक्रिया कोशिका द्रव्य में संपन्न होती है।जबकि क्रेब्स चक्र या साइट्रिक एसिड चक्र माइटोकॉन्ड्रिया के मैट्रिक्स में सम्पन्न होती है। ग्लाइकोसिस की प्रक्रिया ग्लूकोकोज से आरम्भ होकर विभिन्न मध्यवर्ती उपापचयजों (metabolites) से होते हुए पाइरुवेट तक जाती है। हर रासायनिक परिवर्तन (लाल बक्सा) एक अलग एंजाइम द्वारा सम्पन्न होता है। चरण 1 तथा 3 में ATP (नीला) का उपभोग होता है और चरण 7 तथा 10 में ATP (पीला) बनता है। चूँकि चरण 6-10 प्रत्येक ग्लूकोज अणु के लिये दो बार होती है, इस कारण नेट ATP उत्पादन होता है।

8-- ग्लाइकोलाइसिस क्या है

Glycolisis Kya Hai

ग्लाइकोलिसिस (Glycolysis) या ग्लाइको अपघटन, श्वसन की प्रथम अवस्था है जो कोशिका द्रव में होती है। इस क्रिया में ग्लूकोज का आंशिक आक्सीकरण होता है, फलस्वरूप ग्लूकोज के एक अणु से पाइरूविक अम्ल के 2 अणु बनते हैं तथा कुछ ऊर्जा मुक्त होती है। यह क्रिया कई चरणों में होती है एवं प्रत्येक चरण में एक विशिष्ठ इन्जाइम उत्प्रेरक का कार्य करता है। इस क्रिया को इएणपी पाथवे भी कहा जाता है। इसमें ग्लूकोज में संचित ऊर्जा का 4 प्रतिशत भाग मुक्त होकर एनएडीएच (NADH2) में चली जाती है तथा शेष 96 प्रतिशत ऊर्जा पाइरूविक अम्ल में संचित हो जाती है। ग्लाइकोलिसिस की अभिक्रिया माइट्रोकांड्रिया के मैट्रिक्स में संपन्न होती है

9-- ऑक्सीजन या प्राणवायु या जारक (Oxygen) रंगहीन, स्वादहीन तथा गंधरहित गैस है। इसकी खोज, प्राप्ति अथवा प्रारंभिक अध्ययन में जे॰ प्रीस्टले और सी॰डब्ल्यू॰ शेले ने महत्वपूर्ण कार्य किया है। यह एक रासायनिक तत्त्व है। सन् १७७२ ई॰ में कार्ल शीले ने पोटैशियम नाइट्रेट को गर्म करके आक्सीजन गैस तैयार किया, लेकिन उनका यह कार्य सन् १७७७ ई॰ में प्रकाशित हुआ। सन् १७७४ ई॰ में जोसेफ प्रिस्टले ने मर्क्युरिक-आक्साइड को गर्म करके ऑक्सीजन गैस तैयार किया। एन्टोनी लैवोइजियर ने इस गैस के गुणों का वर्णन किया तथा इसका नाम आक्सीजन रखा, जिसका अर्थ है - 'अम्ल उत्पादक'।

 

अनुक्रम

    1उपस्थिति

    2गुणधर्म

    3उपयोग

    4पहचान

    5ऑक्सीजन का चिकित्सा में उपयोग

o    5.1सन्दर्भ

o    5.2बाहरी कड़ियाँ

उपस्थिति[संपादित करें]

ऑक्सीजन पृथ्वी के अनेक पदार्थों में रहता है जैसे पानी और वास्तव में अन्य तत्वों की तुलना में इसकी मात्रा सबसे अधिक है। ऑक्सीजन, वायुमंडल में स्वतंत्र रूप में मिलता है आयतन के अनुसार उसका लगभग पाँचवाँ भाग है। यौगिक रूप में पानी, खनिज तथा चट्टानों का यह महत्वपूर्ण अंश है। वनस्पति तथा प्राणियों के प्राय: सब शारीरिक पदार्थों का ऑक्सीजन एक आवश्यक तत्व है। वायुमंडल में इसकी मात्रा लगभग 20.95% होती है। ऑक्सीज़न भूपर्पटी पर सर्वाधिक मात्रा (लगभग 46.6%)में पाया जाने वाला तत्त्व है।

निर्माण

 

हॉफमान के वोल्टामीटर में जल के विद्युत अपघटन से हाइद्रोजन और आक्सीजन उत्पन्न होतीं हैं।

कई प्रकार के आक्साइडों (जैसे पारा, चाँदी इत्यादि के) अथवा डाइआक्साइडों (लेड, मैंगनीज़, बेरियम के) तथा ऑक्सीजन वाले बहुत से लवणों (जैसे पोटैशियम नाइट्रेट, क्लोरेट, परमैंगनेट तथा डाइक्रोमेट) को गरम करने से ऑक्सीजन प्राप्त हो सकता है। जब कुछ पराक्साइड पानी के साथ प्रक्रिया करते हैं तब भी ऑक्सीजन उत्पन्न होता है। अत: सोडियम पराक्साइड तथा मैंगनीज़ डाइआक्साइड या चूने के क्लोराइड का चूर्णित मिश्रण (अथवा इसी प्रकार के अन्य मिश्रण भी) ऑक्सीजन उत्पादन के लिए प्रयुक्त होते हैं। हाइपोक्लोराइड अथवा हाइपोब्रोमाइट (जैसे चूर्ण विरंजन) के विघटन से या गंधक के अम्ल तथा मैंगनीज़ डाइआक्साइड या पोटैशियम परमैंगनेट की क्रिया से भी ऑक्सीजन मिलता है। गैसे की थोड़ी मात्रा तैयार करने के लिए हाइड्रोजन पराक्साइड अकेले अथवा उत्प्रेरक के साथ अधिक उपयुक्त है।

जब बेरियम आक्साइड को तप्त किया जाता है (लगभग 500 डिग्री सें॰ तक) तब वह हवा से ऑक्सीजन लेकर पराक्साइड बनाता है। अधिक तापक्रम (लगभग 800 डिग्री सें॰) पर इसके विघटन से ऑक्सीजन प्राप्त होता है तथा पुन: उपयोग के लिए बेरियम आक्साइड बच रहता है। औद्योगिक उत्पादन के लिए ब्रिन विधि इसी क्रिया पर आधारित थी। ऑक्सीजन प्राप्त करने के विचार से कुछ अन्य आक्साइड भी (जैसे ताँबा, पारा आदि के आक्साइड) इसी प्रकार उपयोगी हैं। हवा से ऑक्सीजन अलग करने के लिए अब द्रव हवा का अत्यधिक उपयोग होता है, जिसके प्रभाजित आसवन से ऑक्सीजन प्राप्त किया जाता है, पानी के विद्युत्श्लेषण से जलजनके उत्पादन में ऑक्सीजन भी उपजात के रूप में मिलता है।

गुणधर्म[संपादित करें]

ऑक्सीजन का घनत्व 1.4290 ग्राम प्रति लीटर है (0 डिग्री सें॰, 750 मिलीमीटर दाब पर) और वायु की अपेक्षा यह गैस 1.10527 गुना भारी है। इसका विशिष्टताप (स्थिर दाब पर) 0.2178 कैलोरी प्रति ग्राम, 15 डिग्री सें॰ पर, है तथा स्थिर आयतन के विशिष्ट ताप से इसका अनुपात (15 डिग्री सें॰ पर) 1.401 है। ऑक्सीजन के द्रवीकरण में विशेषज्ञों को विशेष कठिनाई हुई थी, क्योंकि इसका क्रांतिक ताप-118.8 डिग्री सें॰, दाब 49.7 वायुमंडल तथा घनत्व 0.430 ग्राम/सेंटीमीटर 3 है। द्रव ऑक्सीजन हल्के नीले रंग का होता है। इसका क्वथनांक-183 डिग्री सें॰ तथा ठोस ऑक्सीजन का द्रवणांक-218.4 डिग्री सें॰ है। 15 डिग्री सें॰ पर संगलन तथा वाष्पायन उष्माएँ क्रमानुसार 3.30 तथा 50.9 कैलोरी प्रति ग्राम है।

ऑक्सीजन पानी में थोड़ा घुलनशील है, जो जलीय प्राणियों के श्वसन के लिए उपयोगी है। कुछ धातुएँ (जैसे पिघली हुई चाँदी) अथवा दूसरी वस्तुएँ (जैसे कोयला) ऑक्सीजन का शोषण बड़ी मात्रा में कर लेती हैं।

बहुत से तत्व ऑक्सीजन से सीधा संयोग करते हैं। इनमें कुछ (जैसे फॉस्फोरस, सोडियम इत्यादि) तो साधारण ताप पर ही धीरे-धीरे क्रिया करते हैं, परंतु अधिकतर, जैसे कार्बन, गंधक, लोहा, मैग्नीशियम इत्यादि, गरम करने पर। ऑक्सीजन से भरे बर्तन में ये वस्तुएँ दहकती हुई अवस्था में डालते ही जल उठती हैं और जलने से आक्साइड बनता है। ऑक्सीजन में हाइड्रोजन गैस जलती है तथा पानी बनता है। यह क्रिया इन दोनों के गैसीय मिश्रण में विद्युत् चिनगारी से अथवा उत्प्रेरक की उपस्थिति में भी होती है।

ऑक्सीजन बहुत से यौगिकों से भी क्रिया करता है। नाइट्रिक आक्साइड, फेरस तथा मैंगनस हाइड्राक्साइड का आक्सीकरण साधारण ताप पर ही होता है। हाइड्रोजन फास्फाइड, सिलिकन हाइड्राइड तथा जस्ता एथिल से तो क्रिया में इतना ताप उत्पन्न होता है कि संपूर्ण वस्तुएँ ही प्रज्वलित हो उठती हैं। लोहा, निकल इत्यादि महीन रूप में रहने पर और लेड सल्फाइड तथा कार्बन क्लोराइड सूर्य के प्रकाश में क्रिया करते हैं। इन क्रियाओं में पानी की उपस्थिति, चाहे यह सूक्ष्म मात्रा में ही क्यों न रहे, बहुत महत्वपूर्ण है।किसी भी धातु से ऑक्सीजन की क्रिया कराने पर धातु का दहन होता है।

उपयोग[संपादित करें]

जीवित प्राणियों के लिए आक्सीजन अति आवश्यक है।मनुष्य में भोजन से ऊर्जा प्राप्त करने में ऑक्सीज़न सहायक होती है, इसे वे श्वसन द्वारा ग्रहण करते हैं। द्रव ऑक्सीजन तथा कार्बन, पेट्रोलियम, इत्यादि का मिश्रण अति विस्फोटक है। इसलिए इनका उपयोग कड़ी वस्तुओं (चट्टान इत्यादि) के तोड़ने में होता है। लोहे की मोटी चद्दर काटने अथवा मशीन के टूटे भागों को जोड़ने के लिए ऑक्सीजन तथा दहनशील गैस को ब्लो पाइप में जलाया जाता है। इस प्रकार उत्पन्न ज्वाला का ताप बहुत अधिक होता है। साधारण ऑक्सीजन के साथ [gsghhhgg[हाइड्रोजन]] या एसिटिलीन जलाई जाती है। इसके लिए ये गैसें इस्पात के बेलनों में अति संपीडित अवस्था में बिकती हैं। ऑक्सीजन सिरका, वार्निश इत्यादि बनाने तथा असाध्य रोगियों के साँस लेने के लिए भी उपयोगी है। इसका उपयोग अधिकतर श्वसन व अनेक क्रियाविधियों मे होता है जिससे कार्बनडाइऑक्साइड निर्मुक्त होती है। कार्बनिक योगिकों के दहन से इसके साथ जल भी निर्मुक्त होता है। जैसे -

C6H12O6+ 6O26CO2+6H2O

CH4+2O2CO2+2H2O

पहचान[संपादित करें]

दहकते हुए तिनके के प्रज्वलित होने से आक्सीजन की पहचान होती है (नाइट्रस आक्साइड से इसको भिन्नता नाइट्रिक आक्साइड के उपयोग से जानी जा सकती है)। ऑक्सीजन की मात्रा क्यूप्रस क्लोराइड, क्षारीय पायरोगैलोल के घोल, ताँबा अथवा इसी प्रकार की दूसरी उपयुक्त वस्तुओं द्वारा शोषित कराने से ज्ञात की जाती है।

ऑक्सीजन का चिकित्सा में उपयोग[संपादित करें]

चिकित्सा में आक्सीजन कई तरह से उपयोगी है। उपचार न केवल मरीज के रक्त में ऑक्सीजन के स्तर को बढ़ाता है, लेकिन कई तरह के रोगग्रस्त फेफड़ों में रक्त के प्रवाह के प्रतिरोध को कम करने का माध्यमिक प्रभाव होता है, हृदय पर काम का बोझ कम करना। ऑक्सीजन थेरेपी का उपयोग वातस्फीति, निमोनिया, कुछ हृदय विकारों (कंजेस्टेय ह्रदय विफलता), कुछ विकारों के कारण होता है जिससे फुफ्फुसीय धमनी के दबाव में वृद्धि हो जाती है, और किसी भी बीमारी से शरीर को गैसीय ऑक्सीजन लेने और उपयोग करने की क्षमता को कम करता है। उपचार अस्पतालों, मरीज के घर में या पोर्टेबल डिवाइसेज द्वारा तेजी से इस्तेमाल करने के लिए पर्याप्त लचीले होते हैं। ऑक्सीजन टेंट एक बार आमतौर पर ऑक्सीजन पूरक में उपयोग किया जाता था, लेकिन बाद में इसे ऑक्सीजन मास्क या नाक कैनुलास के उपयोग से ज्यादातर जगह ले लिया गया था।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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