तुलसीदास का परिचय
तुलसीदास
काँच मन्दिर, तुलसी पीठ
(चित्रकूट) में प्रतिष्ठित गोस्वामी तुलसीदास की प्रतिमा
जन्म रामबोला
1511 ई० (सम्वत्- 1568
वि०)
सोरों शूकरक्षेत्र, कासगंज
, उत्तर प्रदेश, भारत
मृत्यु 1623 ई० (संवत 1680 वि०)
वाराणसी
गुरु/शिक्षक नरहरिदास
दर्शन वैष्णव
खिताब/सम्मान गोस्वामी, अभिनववाल्मीकि, इत्यादि
साहित्यिक कार्य रामचरितमानस, विनयपत्रिका, दोहावली, कवितावली, हनुमान
चालीसा, वैराग्य सन्दीपनी, जानकी मंगल, पार्वती मंगल, इत्यादि
कथन सीयराममय सब जग जानी।
करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी
॥
(रामचरितमानस १.८.२)
धर्म हिन्दू
दर्शन वैष्णव
गोस्वामी श्री तुलसी दास
जी
गोस्वामी तुलसीदास
(1511 - 1623) हिंदी साहित्य के महान कवि थे। इन्हें आदि काव्य रामायण के रचयिता महर्षि
वाल्मीकि का अवतार भी माना जाता है। श्रीरामचरितमानस का कथानक रामायण से लिया गया है।
रामचरितमानस लोक ग्रन्थ है और इसे उत्तर भारत में बड़े भक्तिभाव से पढ़ा जाता है। इसके
बाद विनय पत्रिका उनका एक अन्य महत्त्वपूर्ण काव्य है। महाकाव्य श्रीरामचरितमानस को
विश्व के १०० सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय काव्यों में ४६वाँ स्थान दिया गया।[2]
जन्म
इनका जन्म स्थान विवादित
है। कुछ लोग मानते हैं की इनका जन्म सोरों शूकरक्षेत्र, वर्तमान में कासगंज (एटा) उत्तर
प्रदेश में हुआ था।[3] कुछ विद्वान् इनका जन्म राजापुर जिला बाँदा (वर्तमान में चित्रकूट)
में हुआ मानते हैं। जबकि कुछ विद्वान तुलसीदास का जन्म स्थान राजापुर को मानने के पक्ष
में हैं।
राजापुर उत्तर प्रदेश के
चित्रकूट जिला के अंतर्गत स्थित एक गाँव है। वहाँ आत्माराम दुबे नाम के एक प्रतिष्ठित
संध्या नंददास भक्तिकाल में पुष्टिमार्गीय अष्टछाप के कवि नंददास जी का जन्म जनपद-
कासगंज के सोरों शूकरक्षेत्र अन्तर्वेदी रामपुर (वर्त्तमान- श्यामपुर) गाँव निवासी
भरद्वाज गोत्रीय सनाढ्य ब्राह्मण पं० सच्चिदानंद शुक्ल के पुत्र पं० जीवाराम शुक्ल
की पत्नी चंपा के गर्भ से सम्वत्- १५७२ विक्रमी में हुआ था। पं० सच्चिदानंद के दो पुत्र
थे, पं० आत्माराम शुक्ल और पं० जीवाराम शुक्ल। पं० आत्माराम शुक्ल एवं हुलसी के पुत्र
का नाम महाकवि गोस्वामी तुलसीदास था, जिन्होंने श्रीरामचरितमानस महाग्रंथ की रचना की
थी। नंददास जी के छोटे भाई का नाम चँदहास था। नंददास जी, तुलसीदास जी के सगे चचेरे
भाई थे। नंददास जी के पुत्र का नाम कृष्णदास था। नंददास ने कई रचनाएँ- रसमंजरी, अनेकार्थमंजरी,
भागवत्-दशम स्कंध, श्याम सगाई, गोवर्द्धन लीला, सुदामा चरित, विरहमंजरी, रूप मंजरी,
रुक्मिणी मंगल, रासपंचाध्यायी, भँवर गीत, सिद्धांत पंचाध्यायी, नंददास पदावली हैं।
ब्राह्मण रहते थे। उनकी धर्मपत्नी का नाम हुलसी था। संवत् १५११ के श्रावण मास के शुक्लपक्ष
की सप्तमी तिथि के दिन अभुक्त मूल नक्षत्र में इन्हीं दम्पति के यहाँ तुलसीदास का जन्म
हुआ। प्रचलित जनश्रुति के अनुसार शिशु बारह महीने तक माँ के गर्भ में रहने के कारण
अत्यधिक हृष्ट पुष्ट था और उसके मुख में दाँत दिखायी दे रहे थे। जन्म लेने के साथ ही
उसने राम नाम का उच्चारण किया जिससे उसका नाम रामबोला पड़ गया। उनके जन्म के दूसरे
ही दिन माँ का निधन हो गया। पिता ने किसी और अनिष्ट से बचने के लिये बालक को चुनियाँ
नाम की एक दासी को सौंप दिया और स्वयं विरक्त हो गये। जब रामबोला साढे पाँच वर्ष का
हुआ तो चुनियाँ भी नहीं रही। वह गली-गली भटकता हुआ अनाथों की तरह जीवन जीने को विवश
हो गया।
बचपन
भगवान शंकरजी की प्रेरणा
से रामशैल पर रहनेवाले श्री अनन्तानन्द जी के प्रिय शिष्य श्रीनरहर्यानन्द जी (नरहरि
बाबा) ने इस रामबोला के नाम से बहुचर्चित हो चुके इस बालक को ढूँढ निकाला और विधिवत
उसका नाम तुलसीराम रखा[4]। तदुपरान्त वे उसे अयोध्या (उत्तर प्रदेश) ले गये और वहाँ
संवत् १५६१ माघ शुक्ला पंचमी (शुक्रवार) को उसका यज्ञोपवीत-संस्कार सम्पन्न कराया।
संस्कार के समय भी बिना सिखाये ही बालक रामबोला ने गायत्री-मन्त्र का स्पष्ठ उच्चारण
किया, जिसे देखकर सब लोग चकित हो गये। इसके बाद नरहरि बाबा ने वैष्णवों के पाँच संस्कार
करके बालक को राम-मन्त्र की दीक्षा दी और अयोध्या में ही रहकर उसे विद्याध्ययन कराया।
बालक रामबोला की बुद्धि बड़ी प्रखर थी। वह एक ही बार में गुरु-मुख से जो सुन लेता,
उसे वह कंठस्थ हो जाता। वहाँ से कुछ काल के बाद गुरु-शिष्य दोनों शूकरक्षेत्र (सोरों)
पहुँचे। वहाँ नरहरि बाबा ने बालक को राम-कथा सुनायी किन्तु वह उसे भली-भाँति समझ न
आयी।
ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी,
गुरुवार, संवत् १५८३ को २९ वर्ष की आयु में राजापुर से थोडी ही दूर यमुना के उस पार
स्थित एक गाँव की अति सुन्दरी भारद्वाज गोत्र की कन्या रत्नावली के साथ उनका विवाह
हुआ। चूँकि गौना नहीं हुआ था अत: कुछ समय के लिये वे काशी चले गये और वहाँ शेषसनातन
जी के पास रहकर वेद-वेदांग के अध्ययन में जुट गये। वहाँ रहते हुए अचानक एक दिन उन्हें
अपनी पत्नी की याद आयी और वे व्याकुल होने लगे। जब नहीं रहा गया तो गुरूजी से आज्ञा
लेकर वे अपनी जन्मभूमि राजापुर लौट आये। पत्नी रत्नावली चूँकि मायके में ही थी क्योंकि
तब तक उनका गौना नहीं हुआ था अत: तुलसीराम ने भयंकर अँधेरी रात में उफनती यमुना नदी
तैरकर पार की और सीधे अपनी पत्नी के शयन-कक्ष में जा पहुँचे। रत्नावली इतनी रात गये
अपने पति को अकेले आया देख कर आश्चर्यचकित हो गयी। उसने लोक-लाज के भय से जब उन्हें
चुपचाप वापस जाने को कहा तो वे उससे उसी समय घर चलने का आग्रह करने लगे। उनकी इस अप्रत्याशित
जिद से खीझकर रत्नावली ने स्वरचित एक दोहे के माध्यम से जो शिक्षा उन्हें दी उसने ही
तुलसीराम को तुलसीदास बना दिया। रत्नावली ने जो दोहा कहा था वह इस प्रकार है:
अस्थि चर्म मय देह यह,
ता सों ऐसी प्रीति !
नेकु जो होती राम से, तो
काहे भव-भीत ?
यह दोहा सुनते ही उन्होंने
उसी समय पत्नी को वहीं उसके पिता के घर छोड़ दिया और वापस अपने गाँव राजापुर लौट गये।
राजापुर में अपने घर जाकर जब उन्हें यह पता चला कि उनकी अनुपस्थिति में उनके पिता भी
नहीं रहे और पूरा घर नष्ट हो चुका है तो उन्हें और भी अधिक कष्ट हुआ। उन्होंने विधि-विधान
पूर्वक अपने पिता जी का श्राद्ध किया और गाँव में ही रहकर लोगों को भगवान राम की कथा
सुनाने लगे।
भगवान श्री राम जी से भेंट
कुछ काल राजापुर रहने के
बाद वे पुन: काशी चले गये और वहाँ की जनता को राम-कथा सुनाने लगे। कथा के दौरान उन्हें
एक दिन मनुष्य के वेष में एक प्रेत मिला, जिसने उन्हें हनुमान जी का पता बतलाया। हनुमान
जी से मिलकर तुलसीदास ने उनसे श्रीरघुनाथजी का दर्शन कराने की प्रार्थना की। हनुमान्जी
ने कहा- "तुम्हें चित्रकूट में रघुनाथजी दर्शन होंगें।" इस पर तुलसीदास जी
चित्रकूट की ओर चल पड़े।
चित्रकूट पहुँच कर उन्होंने
रामघाट पर अपना आसन जमाया। एक दिन वे प्रदक्षिणा करने निकले ही थे कि यकायक मार्ग में
उन्हें श्रीराम के दर्शन हुए। उन्होंने देखा कि दो बड़े ही सुन्दर राजकुमार घोड़ों
पर सवार होकर धनुष-बाण लिये जा रहे हैं। तुलसीदास उन्हें देखकर आकर्षित तो हुए, परन्तु
उन्हें पहचान न सके। तभी पीछे से हनुमान जी ने आकर जब उन्हें सारा भेद बताया तो वे
पश्चाताप करने लगे। इस पर हनुमान जी ने उन्हें सात्वना दी और कहा प्रातःकाल फिर दर्शन
होंगे।
संवत् १६०७ की मौनी अमावस्या
को बुधवार के दिन उनके सामने भगवान श्रीराम|भगवान श्री राम जी पुनः प्रकट हुए। उन्होंने
बालक रूप में आकर तुलसीदास से कहा-"बाबा! हमें चन्दन चाहिये क्या आप हमें चन्दन
दे सकते हैं?" हनुमान जी ने सोचा, कहीं वे इस बार भी धोखा न खा जायें, इसलिये
उन्होंने तोते का रूप धारण करके यह दोहा कहा:
चित्रकूट के घाट पर, भइ सन्तन की भीर।
तुलसिदास चन्दन घिसें, तिलक देत रघुबीर॥
तुलसीदास भगवान श्री राम
जी की उस अद्भुत छवि को निहार कर अपने शरीर की सुध-बुध ही भूल गये। अन्ततोगत्वा भगवान
ने स्वयं अपने हाथ से चन्दन लेकर अपने तथा तुलसीदास जी के मस्तक पर लगाया और अन्तर्ध्यान
हो गये।
संस्कृत में पद्य-रचना
तुलसीदास जी
संवत् १६२८ में वह हनुमान
जी की आज्ञा लेकर अयोध्या की ओर चल पड़े। उन दिनों प्रयाग में माघ मेला लगा हुआ था।
वे वहाँ कुछ दिन के लिये ठहर गये। पर्व के छः दिन बाद एक वटवृक्ष के नीचे उन्हें भारद्वाज
और याज्ञवल्क्य मुनि के दर्शन हुए। वहाँ उस समय वही कथा हो रही थी, जो उन्होने सूकरक्षेत्र
में अपने गुरु से सुनी थी। माघ मेला समाप्त होते ही तुलसीदास जी प्रयाग से पुन: वापस
काशी आ गये और वहाँ के प्रह्लादघाट पर एक ब्राह्मण के घर निवास किया। वहीं रहते हुए
उनके अन्दर कवित्व-शक्ति का प्रस्फुरण हुआ और वे संस्कृत में पद्य-रचना करने लगे। परन्तु
दिन में वे जितने पद्य रचते, रात्रि में वे सब लुप्त हो जाते। यह घटना रोज घटती। आठवें
दिन तुलसीदास जी को स्वप्न हुआ। भगवान शंकर ने उन्हें आदेश दिया कि तुम अपनी भाषा में
काव्य रचना करो। तुलसीदास जी की नींद उचट गयी। वे उठकर बैठ गये। उसी समय भगवान शिव
और पार्वती उनके सामने प्रकट हुए। तुलसीदास जी ने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। इस
पर प्रसन्न होकर शिव जी ने कहा- "तुम अयोध्या में जाकर रहो और हिन्दी में काव्य-रचना
करो। मेरे आशीर्वाद से तुम्हारी कविता सामवेद के समान फलवती होगी।" इतना कहकर
गौरीशंकर अन्तर्धान हो गये। तुलसीदास जी उनकी आज्ञा शिरोधार्य कर काशी से सीधे अयोध्या
चले गये।
रामचरितमानस की रचना
संवत् १६३१ का प्रारम्भ
हुआ। दैवयोग से उस वर्ष रामनवमी के दिन वैसा ही योग आया जैसा त्रेतायुग में राम-जन्म
के दिन था। उस दिन प्रातःकाल तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस की रचना प्रारम्भ की।
दो वर्ष, सात महीने और छ्ब्बीस दिन में यह अद्भुत ग्रन्थ सम्पन्न हुआ। संवत् १६३३ के
मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में राम-विवाह के दिन सातों काण्ड पूर्ण हो गये।
तुलसीदास पर भारत सरकार
द्वारा जारी डाक टिकट
इसके बाद भगवान की आज्ञा
से तुलसीदास जी काशी चले आये। वहाँ उन्होंने भगवान विश्वनाथ और माता अन्नपूर्णा को
श्रीरामचरितमानस सुनाया। रात को पुस्तक विश्वनाथ-मन्दिर में रख दी गयी। प्रात:काल जब
मन्दिर के पट खोले गये तो पुस्तक पर लिखा हुआ पाया गया-सत्यं शिवं सुन्दरम् जिसके नीचे
भगवान शंकर की सही (पुष्टि) थी। उस समय वहाँ उपस्थित लोगों ने "सत्यं शिवं सुन्दरम्"
की आवाज भी कानों से सुनी।
इधर काशी के पण्डितों को
जब यह बात पता चली तो उनके मन में ईर्ष्या उत्पन्न हुई। वे दल बनाकर तुलसीदास जी की
निन्दा और उस पुस्तक को नष्ट करने का प्रयत्न करने लगे। उन्होंने पुस्तक चुराने के
लिये दो चोर भी भेजे। चोरों ने जाकर देखा कि तुलसीदास जी की कुटी के आसपास दो युवक
धनुषबाण लिये पहरा दे रहे हैं। दोनों युवक बड़े ही सुन्दर क्रमश: श्याम और गौर वर्ण
के थे। उनके दर्शन करते ही चोरों की बुद्धि शुद्ध हो गयी। उन्होंने उसी समय से चोरी
करना छोड़ दिया और भगवान के भजन में लग गये। तुलसीदास जी ने अपने लिये भगवान को कष्ट
हुआ जान कुटी का सारा समान लुटा दिया और पुस्तक अपने मित्र टोडरमल (अकबर के नौरत्नों
में एक) के यहाँ रखवा दी। इसके बाद उन्होंने अपनी विलक्षण स्मरण शक्ति से एक दूसरी
प्रति लिखी। उसी के आधार पर दूसरी प्रतिलिपियाँ तैयार की गयीं और पुस्तक का प्रचार
दिनों-दिन बढ़ने लगा।
इधर काशी के पण्डितों ने
और कोई उपाय न देख श्री मधुसूदन सरस्वती नाम के महापण्डित को उस पुस्तक को देखकर अपनी
सम्मति देने की प्रार्थना की। मधुसूदन सरस्वती जी ने उसे देखकर बड़ी प्रसन्नता प्रकट
की और उस पर अपनी ओर से यह टिप्पणी लिख दी-
आनन्दकानने ह्यास्मिंजंगमस्तुलसीतरुः।
कवितामंजरी भाति रामभ्रमरभूषिता॥
इसका हिन्दी में अर्थ इस
प्रकार है-"काशी के आनन्द-वन में तुलसीदास साक्षात तुलसी का पौधा है। उसकी काव्य-मंजरी
बड़ी ही मनोहर है, जिस पर श्रीराम रूपी भँवरा सदा मँडराता रहता है।"
पण्डितों को उनकी इस टिप्पणी
पर भी संतोष नहीं हुआ। तब पुस्तक की परीक्षा का एक अन्य उपाय सोचा गया। काशी के विश्वनाथ-मन्दिर
में भगवान विश्वनाथ के सामने सबसे ऊपर वेद, उनके नीचे शास्त्र, शास्त्रों के नीचे पुराण
और सबके नीचे रामचरितमानस रख दिया गया। प्रातःकाल जब मन्दिर खोला गया तो लोगों ने देखा
कि श्रीरामचरितमानस वेदों के ऊपर रखा हुआ है। अब तो सभी पण्डित बड़े लज्जित हुए। उन्होंने
तुलसीदास जी से क्षमा माँगी और भक्ति-भाव से उनका चरणोदक लिया।
तुलसीदास जी मृत्यु
तुलसीदास जी जब काशी के
विख्यात् घाट असीघाट पर रहने लगे तो एक रात कलियुग मूर्त रूप धारण कर उनके पास आया
और उन्हें पीड़ा पहुँचाने लगा। तुलसीदास जी ने उसी समय हनुमान जी का ध्यान किया। हनुमान
जी ने साक्षात् प्रकट होकर उन्हें प्रार्थना के पद रचने को कहा, इसके पश्चात् उन्होंने
अपनी अन्तिम कृति विनय-पत्रिका लिखी और उसे भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया। श्रीराम
जी ने उस पर स्वयं अपने हस्ताक्षर कर दिये और तुलसीदास जी को निर्भय कर दिया।
संवत् १६८० में श्रावण
कृष्ण तृतीया शनिवार को तुलसीदास जी ने "राम-राम" कहते हुए अपना शरीर परित्याग
किया।
तुलसी-स्तवन
तुलसीदास जी की हस्तलिपि
अत्यधिक सुन्दर थी लगता है जैसे उस युग में उन्होंने कैलोग्राफी की कला आती थी। उनके
जन्म-स्थान राजापुर के एक मन्दिर में श्रीरामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड की एक प्रति
सुरक्षित रखी हुई है।
तुलसीदास जी की रचनाएँ
अपने १२६ वर्ष के दीर्घ
जीवन-काल में तुलसीदास ने कालक्रमानुसार निम्नलिखित कालजयी ग्रन्थों की रचनाएँ कीं
-
रामललानहछू, वैराग्यसंदीपनी,
रामाज्ञाप्रश्न, जानकी-मंगल, रामचरितमानस, सतसई, पार्वती-मंगल, गीतावली, विनय-पत्रिका,
कृष्ण-गीतावली, बरवै रामायण, दोहावली और कवितावली।
इनमें से रामचरितमानस,
विनय-पत्रिका, कवितावली, गीतावली जैसी कृतियों के विषय में किसी कवि की यह आर्षवाणी
सटीक प्रतीत होती है - पश्य देवस्य काव्यं, न मृणोति न जीर्यति। अर्थात देवपुरुषों
का काव्य देखिये जो न मरता न पुराना होता है।
लगभग चार सौ वर्ष पूर्व
तुलसीदास जी ने अपनी कृतियों की रचना की थी। आधुनिक प्रकाशन-सुविधाओं से रहित उस काल
में भी तुलसीदास का काव्य जन-जन तक पहुँच चुका था। यह उनके कवि रूप में लोकप्रिय होने
का प्रत्यक्ष प्रमाण है। मानस जैसे वृहद् ग्रन्थ को कण्ठस्थ करके सामान्य पढ़े लिखे
लोग भी अपनी शुचिता एवं ज्ञान के लिए प्रसिद्ध होने लगे थे।
रामचरितमानस तुलसीदास जी
का सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रन्थ रहा है। उन्होंने अपनी रचनाओं के सम्बन्ध में कहीं कोई
उल्लेख नहीं किया है, इसलिए प्रामाणिक रचनाओं के सम्बन्ध में अन्त:साक्ष्य का अभाव
दिखायी देता है। नागरी प्रचारिणी सभा काशी द्वारा प्रकाशित ग्रन्थ इस प्रकार हैं :
'एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलीजन
एंड एथिक्स'[5] में ग्रियर्सन ने भी उपरोक्त प्रथम बारह ग्रन्थों का उल्लेख किया है।
कुछ ग्रंथों का संक्षिप्त
विवरण
रामललानहछू
यह संस्कार गीत है। इस
गीत में कतिपय उल्लेख राम-विवाह की कथा से भिन्न हैं।
गोद लिहैं कौशल्या बैठि
रामहिं वर हो।
सोभित दूलह राम सीस, पर
आंचर हो।।
वैराग्य संदीपनी
वैराग्य संदीपनी[6] को
माताप्रसाद गुप्त ने अप्रामाणिक माना है, पर आचार्य चंद्रवली पांडे इसे प्रामाणिक और
तुलसी की आरंभिक रचना मानते हैं। कुछ और प्राचीन प्रतियों के उपलब्ध होने से ठोस प्रमाण
मिल सकते हैं। संत महिमा वर्णन का पहला सोरठा पेश है -
को बरनै मुख एक, तुलसी
महिमा संत।
जिन्हके विमल विवेक, सेष
महेस न कहि सकत।।
बरवै रामायण
विद्वानों ने इसे तुलसी
की रचना घोषित किया है। शैली की दृष्टि से यह तुलसीदास की प्रामाणिक रचना है। इसकी
खंडित प्रति ही ग्रंथावली में संपादित है।
पार्वती-मंगल
यह तुलसी की प्रामाणिक
रचना प्रतीत होती है। इसकी काव्यात्मक प्रौढ़ता तुलसी सिद्धांत के अनुकूल है। कविता
सरल, सुबोध रोचक और सरस है। ""जगत मातु पितु संभु भवानी"" की श्रृंगारिक
चेष्टाओं का तनिक भी पुट नहीं है। लोक रीति इतनी यथास्थिति से चित्रित हुई है कि यह
संस्कृत के शिव काव्य से कम प्रभावित है और तुलसी की मति की भक्त्यात्मक भूमिका पर
विरचित कथा काव्य है। व्यवहारों की सुष्ठुता, प्रेम की अनन्यता और वैवाहिक कार्यक्रम
की सरसता को बड़ी सावधानी से कवि ने अंकित किया है। तुलसीदास अपनी इस रचना से अत्यन्त
संतुष्ट थे, इसीलिए इस अनासक्त भक्त ने केवल एक बार अपनी मति की सराहना की है -
प्रेम पाट पटडोरि गौरि-हर-गुन
मनि।
मंगल हार रचेउ कवि मति
मृगलोचनि।।
जानकी-मंगल
विद्वानों ने इसे तुलसीदास
की प्रामाणिक रचनाओं में स्थान दिया है। पर इसमें भी क्षेपक है।
पंथ मिले भृगुनाथ हाथ फरसा
लिए।
डाँटहि आँखि देखाइ कोप
दारुन किए।।
राम कीन्ह परितोष रोस रिस
परिहरि।
चले सौंपि सारंग सुफल लोचन
करि।।
रघुबर भुजबल देख उछाह बरातिन्ह।
मुदित राउ लखि सन्मुख विधि
सब भाँतिन्ह।।
तुलसी के मानस के पूर्व
वाल्मीकीय रामायण की कथा ही लोक प्रचलित थी। काशी के पंडितों से मानस को लेकर तुलसीदास
का मतभेद और मानस की प्रति पर विश्वनाथ का हस्ताक्षर संबंधी जनश्रुति प्रसिद्ध है।
रामाज्ञा प्रश्न
यह ज्योतिष शास्त्रीय पद्धति
का ग्रंथ है। दोहों, सप्तकों और सर्गों में विभक्त यह ग्रंथ रामकथा के विविध मंगल एवं
अमंगलमय प्रसंगों की मिश्रित रचना है। काव्य की दृष्टि से इस ग्रंथ का महत्त्व नगण्य
है। सभी इसे तुलसीकृत मानते हैं। इसमें कथा-श्रृंखला का अभाव है और वाल्मीकीय रामायण
के प्रसंगों का अनुवाद अनेक दोहों में है।
दोहावली
दोहावली में अधिकांश दोहे
मानस के हैं। कवि ने चातक के व्याज से दोहों की एक लंबी श्रृंखला लिखकर भक्ति और प्रेम
की व्याख्या की है। दोहावली दोहा संकलन है। मानस के भी कुछ कथा निरपेक्ष दोहों को इसमें
स्थान है। संभव है कुछ दोहे इसमें भी प्रक्षिप्त हों, पर रचना की अप्रामाणिकता असंदिग्ध
है।
कवितावली
कवितावली तुलसीदास की रचना
है, पर सभा संस्करण अथवा अन्य संस्करणों में प्रकाशित यह रचना पूरी नहीं प्रतीत होती
है। कवितावली एक प्रबंध रचना है। कथानक में अप्रासंगिकता एवं शिथिलता तुलसी की कला
का कलंक कहा जायेगा।
गीतावली
गीतावली में गीतों का आधार
विविध कांड का रामचरित ही रहा है[8]। यह ग्रंथ रामचरितमानस की तरह व्यापक जनसम्पर्क
में कम गया प्रतीत होता है। इसलिए इन गीतों में परिवर्तन-परिवर्द्धन दृष्टिगत नहीं
होता है। गीतावली में गीतों के कथा - संदर्भ तुलसी की मति के अनुरूप हैं। इस दृष्टि
से गीतावली का एक गीत लिया जा सकता है -
कैकेयी जौ लौं जियत रही।
तौ लौं बात मातु सों मुह
भरि भरत न भूलि कही।।
मानी राम अधिक जननी ते
जननिहु गँसन गही।
सीय लखन रिपुदवन राम-रुख
लखि सबकी निबही।।
लोक-बेद-मरजाद दोष गुन
गति चित चखन चही।
तुलसी भरत समुझि सुनि राखी
राम सनेह सही।।
इसमें भरत और राम के शील
का उत्कर्ष तुलसीदास ने व्यक्त किया है। गीतावली के उत्तरकांड में मानस की कथा से अधिक
विस्तार है। इसमें सीता का वाल्मीकि आश्रम में भेजा जाना वर्णित है। इस परित्याग का
औचित्य निर्देश इन पंक्तियों में मिलता है -
भोग पुनि पितु-आयु को,
सोउ किए बनै बनाउ।
परिहरे बिनु जानकी नहीं
और अनघ उपाउ।।
पालिबे असिधार-ब्रत प्रिय
प्रेम-पाल सुभाउ।
होइ हित केहि भांति, नित
सुविचारु नहिं चित चाउ।।
तुलसीदास जी निधन
तुलसीदास के सम्मान में
जारी डाक टिकट
तुलसीदास जी जब काशी के
विख्यात् घाट असीघाट पर रहने लगे तो एक रात कलियुग मूर्त रूप धारण कर उनके पास आया
और उन्हें पीड़ा पहुँचाने लगा। तुलसीदास जी ने उसी समय हनुमान जी का ध्यान किया। हनुमान
जी ने साक्षात् प्रकट होकर उन्हें प्रार्थना के पद रचने को कहा, इसके पश्चात् उन्होंने
अपनी अन्तिम कृति विनय-पत्रिका लिखी और उसे भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया। श्रीराम
जी ने उस पर स्वयं अपने हस्ताक्षर कर दिये और तुलसीदास जी को निर्भय कर दिया। संवत्
1680 में श्रावण कृष्ण सप्तमी शनिवार को तुलसीदास जी ने "राम-राम" कहते हुए
अपना शरीर परित्याग किया। तुलसीदास के निधन के संबंध में निम्नलिखित दोहा बहुत प्रचलित
है-
संवत सोलह सौ असी ,असी
गंग के तीर ।
श्रावण शुक्ला सप्तमी
,तुलसी तज्यो शरीर ।।[1
जीवन परिचय
तुलसीदासजी का जन्म संवत
1589 को उत्तर प्रदेश (वर्तमान बाँदा ज़िला) के राजापुर नामक ग्राम में हुआ था। इनके
पिता का नाम आत्माराम दुबे तथा माता का नाम हुलसी था। इनका विवाह दीनबंधु पाठक की पुत्री
रत्नावली से हुआ था। अपनी पत्नी रत्नावली से अत्याधिक प्रेम के कारण तुलसी को रत्नावली
की फटकार "लाज न आई आपको दौरे आएहु नाथ" सुननी पड़ी जिससे इनका जीवन ही परिवर्तित
हो गया। पत्नी के उपदेश से तुलसी के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया। इनके गुरु बाबा
नरहरिदास थे, जिन्होंने इन्हें दीक्षा दी। इनका अधिकाँश जीवन चित्रकूट, काशी तथा अयोध्या
में बीता।[1]
तुलसीदास
तुलसी का बचपन बड़े कष्टों
में बीता। माता-पिता दोनों चल बसे और इन्हें भीख मांगकर अपना पेट पालना पड़ा था। इसी
बीच इनका परिचय राम-भक्त साधुओं से हुआ और इन्हें ज्ञानार्जन का अनुपम अवसर मिल गया।
पत्नी के व्यंग्यबाणों से विरक्त होने की लोकप्रचलित कथा को कोई प्रमाण नहीं मिलता।
तुलसी भ्रमण करते रहे और इस प्रकार समाज की तत्कालीन स्थिति से इनका सीधा संपर्क हुआ।
इसी दीर्घकालीन अनुभव और अध्ययन का परिणाम तुलसी की अमूल्य कृतियां हैं, जो उस समय
के भारतीय समाज के लिए तो उन्नायक सिद्ध हुई ही, आज भी जीवन को मर्यादित करने के लिए
उतनी ही उपयोगी हैं। तुलसीदास द्वारा रचित ग्रंथों की संख्या 39 बताई जाती है। इनमें
रामचरित मानस, कवितावली, विनयपत्रिका, दोहावली, गीतावली, जानकीमंगल, हनुमान चालीसा,
बरवै रामायण आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
शिष्य परम्परा
गोस्वामीजी श्रीसम्प्रदाय
के आचार्य रामानन्द की शिष्यपरम्परा में थे। इन्होंने समय को देखते हुए लोकभाषा में
'रामायण' लिखा। इसमें ब्याज से वर्णाश्रमधर्म, अवतारवाद, साकार उपासना, सगुणवाद, गो-ब्राह्मण
रक्षा, देवादि विविध योनियों का यथोचित सम्मान एवं प्राचीन संस्कृति और वेदमार्ग का
मण्डन और साथ ही उस समय के विधर्मी अत्याचारों और सामाजिक दोषों की एवं पन्थवाद की
आलोचना की गयी है। गोस्वामीजी पन्थ व सम्प्रदाय चलाने के विरोधी थे। उन्होंने व्याज
से भ्रातृप्रेम, स्वराज्य के सिद्धान्त , रामराज्य का आदर्श, अत्याचारों से बचने और
शत्रु पर विजयी होने के उपाय; सभी राजनीतिक बातें खुले शब्दों में उस कड़ी जासूसी के
जमाने में भी बतलायीं, परन्तु उन्हें राज्याश्रय प्राप्त न था। लोगों ने उनको समझा
नहीं। रामचरितमानस का राजनीतिक उद्देश्य सिद्ध नहीं हो पाया। इसीलिए उन्होंने झुँझलाकर
कहा:
गोस्वामी तुलसीदास
"रामायण अनुहरत सिख,
जग भई भारत रीति।
तुलसी काठहि को सुनै, कलि
कुचालि पर प्रीति।"
आदर्श सन्त कवि
उनकी यह अद्भुत पोथी इतनी
लोकप्रिय है कि मूर्ख से लेकर महापण्डित तक के हाथों में आदर से स्थान पाती है। उस
समय की सारी शंक्काओं का रामचरितमानस में उत्तर है। अकेले इस ग्रन्थ को लेकर यदि गोस्वामी
तुलसीदास चाहते तो अपना अत्यन्त विशाल और शक्तिशाली सम्प्रदाय चला सकते थे। यह एक सौभाग्य
की बात है कि आज यही एक ग्रन्थ है, जो साम्प्रदायिकता की सीमाओं को लाँघकर सारे देश
में व्यापक और सभी मत-मतान्तरों को पूर्णतया मान्य है। सबको एक सूत्र में ग्रंथित करने
का जो काम पहले शंकराचार्य स्वामी ने किया, वही अपने युग में और उसके पीछे आज भी गोस्वामी
तुलसीदास ने किया। रामचरितमानस की कथा का आरम्भ ही उन शंकाओं से होता है जो कबीरदास
की साखी पर पुराने विचार वालों के मन में उठती हैं। तुलसीदासजी स्वामी रामानन्द की
शिष्यपरम्परा में थे, जो रामानुजाचार्य के विशिष्टद्वैत सम्प्रदाय के अन्तर्भुक्त है।
परन्तु गोस्वामीजी की प्रवृत्ति साम्प्रदायिक न थी। उनके ग्रन्थों में अद्वैत और विशिष्टाद्वैत
का सुन्दर समन्वय पाया जाता है। इसी प्रकार वैष्णव, शैव, शाक्त आदि साम्प्रदायिक भावनाओं
और पूजापद्धतियों का समन्वय भी उनकी रचनाओं में पाया जाता है। वे आदर्श समुच्चयवादी
सन्त कवि थे।
प्रखर बुद्धि के स्वामी
रामचरितमानस
भगवान शंकरजी की प्रेरणा
से रामशैल पर रहने वाले श्री अनन्तानन्द जी के प्रिय शिष्य श्रीनरहर्यानन्द जी (नरहरि
बाबा) ने इस बालक को ढूँढ़ निकाला और उसका नाम रामबोला रखा। उसे वे अयोध्या ले गये
और वहाँ संवत् 1561 माघ शुक्ल पंचमी शुक्रवार को उसका यज्ञोपवीत-संस्कार कराया। बिना
सिखाये ही बालक रामबोला ने गायत्री-मन्त्र का उच्चारण किया, जिसे देखकर सब लोग चकित
हो गये। इसके बाद नरहरि स्वामी ने वैष्णवों के पाँच संस्कार करके रामबोला को राममन्त्र
की दीक्षा दी और अयोध्या ही में रहकर उन्हें विद्याध्ययन कराने लगे। बालक रामबोला की
बुद्धि बड़ी प्रखर थी। एक बार गुरुमुख से जो सुन लेते थे, उन्हें वह कंठस्थ हो जाता
था। वहाँ से कुछ दिन बाद गुरु-शिष्य दोनों शूकरक्षेत्र (सोरों) पहुँचे। वहाँ श्री नरहरि
जी ने तुलसीदास को रामचरित सुनाया। कुछ दिन बाद वह काशी चले आये। काशी में शेषसनातन
जी के पास रहकर तुलसीदास ने पन्द्रह वर्ष तक वेद-वेदांग का अध्ययन किया। इधर उनकी लोकवासना
कुछ जाग्रत् हो उठी और अपने विद्यागुरु से आज्ञा लेकर वे अपनी जन्मभूमि को लौट आये।
वहाँ आकर उन्होंने देखा कि उनका परिवार सब नष्ट हो चुका है। उन्होंने विधिपूर्वक अपने
पिता आदि का श्राद्ध किया और वहीं रहकर लोगों को भगवान राम की कथा सुनाने लगे।
मुख्य रचनाएँ
अपने 126 वर्ष के दीर्घ
जीवन-काल में तुलसीदास जी ने कुल 22 कृतियों की रचना की है जिनमें से पाँच बड़ी एवं
छः मध्यम श्रेणी में आती हैं। इन्हें संस्कृत विद्वान् होने के साथ ही हिन्दी भाषा
के प्रसिद्ध और सर्वश्रेष्ठ कवियों में एक माना जाता है। तुलसीदास जी को महर्षि वाल्मीकि
का भी अवतार माना जाता है जो मूल आदिकाव्य रामायण के रचयिता थे।
रचना सामान्य परिचय
रामचरितमानस
“रामचरित” (राम का चरित्र)
तथा “मानस” (सरोवर) शब्दों के मेल से “रामचरितमानस” शब्द बना है। अतः रामचरितमानस का
अर्थ है “राम के चरित्र का सरोवर”। सर्वसाधारण में यह “तुलसीकृत रामायण” के नाम से
जाना जाता है तथा यह हिन्दू धर्म की महान् काव्य रचना है।
दोहावली
दोहावली में दोहा और सोरठा
की कुल संख्या 573 है। इन दोहों में से अनेक दोहे तुलसीदास के अन्य ग्रंथों में भी
मिलते हैं और उनसे लिये गये है।
कवितावली
सोलहवीं शताब्दी में रची
गयी कवितावली में श्री रामचन्द्र जी के इतिहास का वर्णन कवित्त, चौपाई, सवैया आदि छंदों
में की गई है। रामचरितमानस के जैसे ही कवितावली में सात काण्ड हैं।
गीतावली
गीतावली, जो कि सात काण्डों
वाली एक और रचना है, में श्री रामचन्द्र जी की कृपालुता का वर्णन है। सम्पूर्ण पदावली
राम-कथा तथा रामचरित से सम्बन्धित है। मुद्रित संग्रह में 328 पद हैं।
विनय पत्रिका
विनय पत्रिका में 279 स्तुति
गान हैं जिनमें से प्रथम 43 स्तुतियाँ विविध देवताओं की हैं और शेष रामचन्द्र जी की।
कृष्ण गीतावली
कृष्ण गीतावली में श्रीकृष्ण
जी 61 स्तुतियाँ है। कृष्ण की बाल्यावस्था और 'गोपी - उद्धव संवाद' के प्रसंग कवित्व
व शैली की दृष्टि से अत्यधिक सुंदर हैं।
रामलला नहछू
यह रचना सोहर छ्न्दों में
है और राम के विवाह के अवसर के नहछू का वर्णन करती है। नहछू नख काटने एक रीति है, जो
अवधी क्षेत्रों में विवाह और यज्ञोपवीत के पूर्व की जाती है।
वैराग्य संदीपनी
यह चौपाई - दोहों में रची
हुई है। दोहे और सोरठे 48 तथा चौपाई की चतुष्पदियाँ 14 हैं। इसका विषय नाम के अनुसार
वैराग्योपदेश है।
रामाज्ञा प्रश्न
रचना अवधी में है और तुलसीदास
की प्रारम्भिक कृतियों में है। यह एक ऐसी रचना है, जो शुभाशुभ फल विचार के लिए रची
गयी है किंतु यह फल-विचार तुलसीदास ने राम-कथा की सहायता से प्रस्तुत किया है।
जानकी मंगल
इसमें गोस्वामी तुलसीदास
जी ने आद्याशक्ति भगवती श्री जानकी जी तथा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के मंगलमय विवाहोत्सव
का बहुत ही मधुर शब्दों में वर्णन किया है।
सतसई
दोहों का एक संग्रह ग्रंथ
है। इन दोहों में से अनेक दोहे 'दोहावली' की विभिन्न प्रतियों में तुलसीदास के अन्य
ग्रंथों में भी मिलते हैं और उनसे लिये गये है।
पार्वती मंगल
इसका विषय शिव - पार्वती
विवाह है। 'जानकी मंगल' की भाँति यह भी सोहर और हरिगीतिका छन्दों में रची गयी है। इसमें
सोहर की 148 द्विपदियाँ तथा 16 हरिगीतिकाएँ हैं। इसकी भाषा भी 'जानकी मंगल की भाँति
अवधी है।
बरवै रामायण
बरवै रामायण रचना के मुद्रित
पाठ में स्फुट 69 बरवै हैं, जो 'कवितावली' की ही भांति सात काण्डों में विभाजित है।
हनुमान चालीसा
इसमें प्रभु राम के महान्
भक्त हनुमान के गुणों एवं कार्यों का चालीस (40) चौपाइयों में वर्णन है। यह अत्यन्त
लघु रचना है जिसमें पवनपुत्र श्री हनुमान जी की सुन्दर स्तुति की गई है।
तुलसीदास के सम्मान में
जारी डाक टिकट
तुलसीदास जी जब काशी के
विख्यात् घाट असीघाट पर रहने लगे तो एक रात कलियुग मूर्त रूप धारण कर उनके पास आया
और उन्हें पीड़ा पहुँचाने लगा। तुलसीदास जी ने उसी समय हनुमान जी का ध्यान किया। हनुमान
जी ने साक्षात् प्रकट होकर उन्हें प्रार्थना के पद रचने को कहा, इसके पश्चात् उन्होंने
अपनी अन्तिम कृति विनय-पत्रिका लिखी और उसे भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया। श्रीराम
जी ने उस पर स्वयं अपने हस्ताक्षर कर दिये और तुलसीदास जी को निर्भय कर दिया। संवत्
1680 में श्रावण कृष्ण सप्तमी शनिवार को तुलसीदास जी ने "राम-राम" कहते हुए
अपना शरीर परित्याग किया। तुलसीदास के निधन के संबंध में निम्नलिखित दोहा बहुत प्रचलित
है-
संवत सोलह सौ असी ,असी
गंग के तीर ।
श्रावण शुक्ला सप्तमी
,तुलसी तज्यो शरीर ।।[1]
तूँ तूँ करता तूँ भया,
मुझ मैं रही न हूँ।
वारी फेरी बलि गई, जित
देखौं तित तूँ ॥
जीवात्मा कह रही है कि
‘तू है’ ‘तू है’ कहते−कहते मेरा अहंकार समाप्त हो गया। इस तरह भगवान पर न्यौछावर होते−होते
मैं पूर्णतया समर्पित हो गई। अब तो जिधर देखती हूँ उधर तू ही दिखाई देता है।
कबीर माया पापणीं, हरि
सूँ करे हराम।
मुखि कड़ियाली कुमति की,
कहण न देई राम॥
यह माया बड़ी पापिन है।
यह प्राणियों को परमात्मा से विमुख कर देती है तथा
उनके मुख पर दुर्बुद्धि
की कुंडी लगा देती है और राम-नाम का जप नहीं करने देती।
काबा फिर कासी भया, राम
भया रहीम।
मोट चून मैदा भया, बैठ
कबीर जीम॥
सांप्रदायिक सद्भावना के
कारण कबीर के लिए काबा काशी में परिणत हो गया। भेद का मोटा चून या मोठ का चून अभेद
का मैदा बन गया, कबीर उसी को जीम रहा है।
साधो, सो सतगुरु मोंहि
भावै।
सत्त प्रेम का भर भर प्याला,
आप पिवै मोंहि प्यावै।
परदा दूर करै आँखिन का,
ब्रह्म दरस दिखलावै।
जिस दरसन में सब लोक दरसै,
अनहद सबद सुनावै।
एकहि सब सुख-दु:ख दिखलावै,
सबद में सुरत समावै।
कहैं कबीर ताको भय नाहीं,
निर्भय पद परसावै।
तुलसीदास जी के प्रसिद्द
दोहे हिंदी अर्थ सहित
राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार |
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं
चाहसि उजिआर ||
अर्थ: तुलसीदासजी कहते
हैं कि हे मनुष्य ,यदि तुम भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहते हो तो मुखरूपी द्वार
की जीभरुपी देहलीज़ पर राम-नामरूपी मणिदीप को रखो |
—2—
नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु |
जो सिमरत भयो भाँग ते तुलसी तुलसीदास ||
अर्थ: राम का नाम कल्पतरु
(मनचाहा पदार्थ देनेवाला )और कल्याण का निवास (मुक्ति का घर ) है,जिसको स्मरण करने
से भाँग सा (निकृष्ट) तुलसीदास भी तुलसी के समान पवित्र हो गया |
—3—
तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं
मूढ़ न चतुर नर |
सुंदर केकिहि पेखु बचन
सुधा सम असन अहि ||
अर्थ: गोस्वामीजी कहते
हैं कि सुंदर वेष देखकर न केवल मूर्ख अपितु चतुर मनुष्य भी धोखा खा जाते हैं |सुंदर
मोर को ही देख लो उसका वचन तो अमृत के समान है लेकिन आहार साँप का है |
—4—
सूर समर करनी करहिं कहि
न जनावहिं आपु |
बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु ||
अर्थ: शूरवीर तो युद्ध
में शूरवीरता का कार्य करते हैं ,कहकर अपने को नहीं जनाते |शत्रु को युद्ध में उपस्थित
पा कर कायर ही अपने प्रताप की डींग मारा करते हैं |
—5—
सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि |
सो पछिताइ
अघाइ उर अवसि होइ हित हानि ||
अर्थ: स्वाभाविक ही हित
चाहने वाले गुरु और स्वामी की सीख को जो सिर चढ़ाकर नहीं मानता ,वह हृदय में खूब पछताता
है और उसके हित की हानि अवश्य होती है |
—6—
मुखिया मुखु सो चाहिऐ खान
पान कहुँ एक |
पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी
सहित बिबेक ||
अर्थ: तुलसीदास जी कहते
हैं कि मुखिया मुख के समान होना चाहिए जो खाने-पीने को तो अकेला है, लेकिन विवेकपूर्वक
सब अंगों का पालन-पोषण करता है |
—7—
सचिव बैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस |
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास ||
अर्थ: गोस्वामीजी कहते हैं कि मंत्री, वैद्य और गुरु
—ये तीन यदि भय या लाभ की आशा से (हित की बात न कहकर ) प्रिय बोलते हैं तो (क्रमशः
) राज्य,शरीर एवं धर्म – इन तीन का शीघ्र ही नाश हो जाता है |
—8—
तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुँ ओर |
बसीकरन इक मंत्र है परिहरू
बचन कठोर ||
अर्थ: तुलसीदासजी कहते
हैं कि मीठे वचन सब ओर सुख फैलाते हैं |किसी को भी वश में करने का ये एक मन्त्र होते हैं इसलिए मानव
को चाहिए कि कठोर वचन छोडकर मीठा बोलने का प्रयास करे |
—9—
सरनागत कहुँ जे तजहिं निज
अनहित अनुमानि |
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि
बिलोकति हानि ||
अर्थ: जो मनुष्य अपने अहित
का अनुमान करके शरण में आये हुए का त्याग कर देते हैं वे क्षुद्र और पापमय होते हैं
|दरअसल ,उनका तो दर्शन भी उचित नहीं होता |
—10—
दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान |
तुलसी दया न छांड़िए ,जब
लग घट में प्राण ||
अर्थ: गोस्वामी तुलसीदासजी
कहते हैं कि मनुष्य को दया कभी नहीं छोड़नी चाहिए क्योंकि दया ही धर्म का मूल है और
इसके विपरीत अहंकार समस्त पापों की जड़ होता है|
—11—
आवत ही हरषै नहीं नैनन
नहीं सनेह|
तुलसी तहां न जाइये कंचन
बरसे मेह||
अर्थ: जिस जगह आपके जाने
से लोग प्रसन्न नहीं होते हों, जहाँ लोगों की आँखों में आपके लिए प्रेम या स्नेह ना
हो, वहाँ हमें कभी नहीं जाना चाहिए, चाहे वहाँ
धन की बारिश ही क्यों न हो रही हो|
—12—
तुलसी साथी विपत्ति के,
विद्या विनय विवेक|
साहस सुकृति सुसत्यव्रत,
राम भरोसे एक||
अर्थ: तुलसीदास जी कहते
हैं, किसी विपत्ति यानि किसी बड़ी परेशानी के समय आपको ये सात गुण बचायेंगे: आपका ज्ञान
या शिक्षा, आपकी विनम्रता, आपकी बुद्धि, आपके भीतर का साहस, आपके अच्छे कर्म, सच बोलने
की आदत और ईश्वर में विश्वास|
—13—
तुलसी नर का क्या बड़ा,
समय बड़ा बलवान|
भीलां लूटी गोपियाँ, वही
अर्जुन वही बाण||
अर्थ: गोस्वामी तुलसीदास
जी कहते हैं, समय बड़ा बलवान होता है, वो समय ही है जो व्यक्ति को छोटा या बड़ा बनाता
है| जैसे एक बार जब महान धनुर्धर अर्जुन का समय ख़राब हुआ तो वह भीलों के हमले से गोपियों
की रक्षा नहीं कर पाए
—14—
तुलसी भरोसे राम के, निर्भय
हो के सोए|
अनहोनी होनी नही, होनी
हो सो होए||
अर्थ: तुलसीदास जी कहते
हैं, ईश्वर पर भरोसा करिए और बिना किसी भय के चैन की नींद सोइए| कोई अनहोनी नहीं होने
वाली और यदि कुछ अनिष्ट होना ही है तो वो हो के रहेगा इसलिए व्यर्थ की चिंता छोड़ अपना
काम करिए|
—15—
तुलसी इस संसार में, भांति
भांति के लोग|
सबसे हस मिल बोलिए, नदी
नाव संजोग||
अर्थ: तुलसीदास जी कहते
हैं, इस दुनिय में तरह-तरह के लोग रहते हैं, यानी हर तरह के स्वभाव और व्यवहार वाले
लोग रहते हैं, आप हर किसी से अच्छे से मिलिए और बात करिए| जिस प्रकार नाव नदी से मित्रता
कर आसानी से उसे पार कर लेती है वैसे ही अपने अच्छे व्यवहार से आप भी इस भव सागर को
पार कर लेंगे|
—16—
लसी पावस के समय, धरी कोकिलन
मौन|
अब तो दादुर बोलिहं, हमें
पूछिह कौन||
अर्थ: बारिश के मौसम में
मेंढकों के टर्राने की आवाज इतनी अधिक हो जाती है कि कोयल की मीठी बोली उस कोलाहल में
दब जाती है| इसलिए कोयल मौन धारण कर लेती है| यानि जब मेंढक रुपी धूर्त व कपटपूर्ण
लोगों का बोलबाला हो जाता है तब समझदार व्यक्ति चुप ही रहता है और व्यर्थ ही अपनी उर्जा
नष्ट नहीं करता|
—17—
काम क्रोध मद लोभ की, जौ
लौं मन में खान|
तौ लौं पण्डित मूरखौं,
तुलसी एक समान||
अर्थ: तुलसीदास जी कहते
हैं, जब तक व्यक्ति के मन में काम, गुस्सा, अहंकार, और लालच भरे हुए होते हैं तब तक
एक ज्ञानी और मूर्ख व्यक्ति में कोई भेद नहीं रहता, दोनों एक जैसे ही हो जाते हैं|
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तुलसीदास के दोहे हिंदी
अर्थ सहित (1-10)
बिना तेज के पुरुष की,…
अवशि अवज्ञा होय ।
आगि बुझे ज्यों राख की,…
आप छुवै सब कोय ।।
अर्थात – तेजहीन व्यक्ति
की बात को कोई भी व्यक्ति महत्व नहीं देता है, उसकी आज्ञा का पालन कोई नहीं करता है.
ठीक वैसे हीं जैसे, जब राख की आग बुझ जाती है, तो उसे हर कोई छूने लगता है.
तुलसी साथी विपत्ति के,…
विद्या विनय विवेक ।
साहस सुकृति सुसत्यव्रत,…
राम भरोसे एक ।।
अर्थात – तुलसीदास जी कहते
हैं कि विपत्ति में अर्थात मुश्किल वक्त में ये चीजें मनुष्य का साथ देती है. ज्ञान,
विनम्रता पूर्वक व्यवहार, विवेक, साहस, अच्छे कर्म, आपका सत्य और राम (भगवान) का नाम.
काम क्रोध मद लोभ की जौ
लौं मन में खान ।
तौ लौं पण्डित मूरखौं तुलसी
एक समान ।।
अर्थात – जब तक व्यक्ति
के मन में काम की भावना, गुस्सा, अहंकार, और लालच भरे हुए होते हैं.
तबतक एक ज्ञानी व्यक्ति
और मूर्ख व्यक्ति में कोई अंतर नहीं होता है, दोनों एक हीं जैसे होते हैं.
आवत ही हरषै नहीं नैनन
नहीं सनेह ।
तुलसी तहां न जाइये कंचन
बरसे मेह ।।
अर्थात – जिस स्थान या
जिस घर में आपके जाने से लोग खुश नहीं होते हों और उन लोगों की आँखों में आपके लिए
न तो प्रेम और न हीं स्नेह हो. वहाँ हमें कभी नहीं जाना चाहिए, चाहे वहाँ धन की हीं
वर्षा क्यों न होती हो.
मो सम दीन न दीन हित तुम्ह
समान रघुबीर
अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु
बिषम भव भीर ॥
अर्थात – हे रघुवीर, मेरे
जैसा कोई दीनहीन नहीं है और तुम्हारे जैसा कोई दीनहीनों का भला करने वाला नहीं है.
ऐसा विचार करके, हे रघुवंश मणि.. मेरे जन्म-मृत्यु के भयानक दुःख को दूर कर दीजिए.
कामिहि नारि पिआरि जिमि
लोभिहि प्रिय जिमि दाम ।
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय
लागहु मोहि राम ॥
अर्थात – जैसे काम के अधीन
व्यक्ति को नारी प्यारी लगती है और लालची व्यक्ति को जैसे धन प्यारा लगता है. वैसे
हीं हे रघुनाथ, हे राम, आप मुझे हमेशा प्यारे लगिए.
सो कुल धन्य उमा सुनु जगत
पूज्य सुपुनीत ।
श्रीरघुबीर परायन जेहिं
नर उपज बिनीत ।।
अर्थात – हे उमा, सुनो
वह कुल धन्य है, दुनिया के लिए पूज्य है और बहुत पावन (पवित्र) है, जिसमें श्री राम
(रघुवीर) की मन से भक्ति करने वाले विनम्र लोग जन्म लेते हैं.
मसकहि करइ बिरंचि प्रभु
अजहि मसक ते हीन ।
अस बिचारि तजि संसय रामहि
भजहिं प्रबीन ॥
अर्थात – राम मच्छर को
भी ब्रह्मा बना सकते हैं और ब्रह्मा को मच्छर से भी छोटा बना सकते हैं.
ऐसा जानकर बुद्धिमान लोग
सारे संदेहों को त्यागकर राम को ही भजते हैं.
तुलसी किएं कुंसग थिति,
होहिं दाहिने बाम ।
कहि सुनि सुकुचिअ सूम खल,
रत हरि संकंर नाम ।।
बसि कुसंग चाह सुजनता,
ताकी आस निरास ।
तीरथहू को नाम भो, गया
मगह के पास ।।
अर्थात – बुरे लोगों की
संगती में रहने से अच्छे लोग भी बदनाम हो जाते हैं. वे अपनी प्रतिष्ठा गँवाकर छोटे
हो जाते हैं. ठीक उसी तरह जैसे, किसी व्यक्ति का नाम भले हीं देवी-देवता के नाम पर
रखा जाए, लेकिन बुरी संगती के कारण उन्हें मान-सम्मान नहीं मिलता है. जब कोई व्यक्ति
बुरी संगती में रहने के बावजूद अपनी काम में सफलता पाना चाहता है और मान-सम्मान पाने
की इच्छा करता है, तो उसकी इच्छा कभी पूरी नहीं होती है. ठीक वैसे हीं जैसे मगध के
पास होने के कारण विष्णुपद तीर्थ का नाम “गया” पड़ गया.
सो तनु धरि हरि भजहिं न
जे नर । होहिं बिषय रत मंद मंद तर ॥
काँच किरिच बदलें ते लेहीं
। कर ते डारि परस मनि देहीं ॥
अर्थात – जो लोग मनुष्य
का शरीर पाकर भी राम का भजन नहीं करते हैं और बुरे विषयों में खोए रहते हैं. वे लोग
उसी व्यक्ति की तरह मूर्खतापूर्ण आचरण करते हैं, जो पारस मणि को हाथ से फेंक देता है
और काँच के टुकड़े हाथ में उठा लेता है.
गोस्वामी तुलसीदास जी के
दोहे (11-20)
मुखिया मुखु सो चाहिऐ खान
पान कहुँ एक ।
पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी
सहित विवेक ।।
अर्थात – परिवार के मुखिया
को मुँह के जैसा होना चाहिए, जो खाता-पीता मुख से है और शरीर के सभी अंगों का अपनी
बुद्धि से पालन-पोषण करता है.
तुलसी जे कीरति चहहिं,
पर की कीरति खोइ।
तिनके मुंह मसि लागहैं,
मिटिहि न मरिहै धोइ।।
अर्थात – जो लोग दूसरों
की निन्दा करके खुद सम्मान पाना चाहते हैं. ऐसे लोगों के मुँह पर ऐसी कालिख लग जाती
है, जो लाखों बार धोने से भी नहीं हटती है.
बचन बेष क्या जानिए, मनमलीन
नर नारि।
सूपनखा मृग पूतना, दस मुख
प्रमुख विचारि।।
अर्थात – किसी की मीठी
बातों और किसी के सुंदर कपड़ों से, किसी पुरुष या स्त्री के मन की भावना कैसी है यह
नहीं जाना जा सकता है. क्योंकि मन से मैले सूर्पनखा, मारीच, पूतना और रावण के कपड़े
बहुत सुन्दर थे.
तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं
मूढ़ न चतुर नर
सुंदर केकिहि पेखु बचन
सुधा सम असन अहि
अर्थात – किसी व्यक्ति
के सुंदर कपड़े देखकर केवल मूर्ख व्यक्ति हीं नहीं बल्कि बुद्धिमान लोग भी धोखा खा जाते
हैं . ठीक उसी प्रकार जैसे मोर के पंख और उसकी वाणी अमृत के जैसी लगती है, लेकिन उसका
भोजन सांप होता है.
सचिव बैद गुरु तीनि जौं
प्रिय बोलहिं भय आस
राज धर्म तन तीनि कर होइ
बेगिहीं नास
अर्थात – मंत्री ( सलाहकार
), चिकित्सक और शिक्षक यदि ये तीनों किसी डर या लालच से झूठ बोलते हैं, तो राज्य,शरीर
और धर्म का जल्दी हीं नाश हो जाता है.
एक अनीह अरूप अनामा । अज
सच्चिदानन्द पर धामा ।
ब्यापक विश्वरूप भगवाना
। तेहिं धरि देह चरित कृत नाना ।
भगवान एक हैं, उन्हें कोई
इच्छा नहीं है. उनका कोई रूप या नाम नहीं है. वे अजन्मा औेर परमानंद के परमधाम हैं.
वे सर्वव्यापी विश्वरूप हैं. उन्होंने अनेक रूप, अनेक शरीर धारण कर अनेक लीलायें की
हैं.
सो केवल भगतन हित लागी
। परम कृपाल प्रनत अनुरागी ।
जेहि जन पर ममता अति छोहू
। जेहि करूना करि कीन्ह न कोहू ।
प्रभु भक्तों के लिये हीं
सब लीला करते हैं. वे परम कृपालु और भक्त के प्रेमी हैं. भक्त पर उनकी ममता रहती है.
वे केवल करूणा करते हैं. वे किसी पर क्रोध नही करते हैं.
जपहिं नामु जन आरत भारी
। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी ।
राम भगत जग चारि प्रकारा
। सुकृति चारिउ अनघ उदारा ।
संकट में पड़े भक्त नाम
जपते हैं तो उनके समस्त संकट दूर हो जाते हैं और वे सुखी हो जाते हैं. संसार में चार
तरह के अर्थाथ; आर्त; जिज्ञासु और ज्ञानी भक्त हैं और वे सभी भक्त पुण्य के भागी होते
हैं.
सकल कामना हीन जे राम भगति
रस लीन
नाम सुप्रेम पियुश हृद
तिन्हहुॅ किए मन मीन।
जो सभी इच्छाओं को छोड़कर
राम भक्ति के रस में लीन होकर राम नाम प्रेम के सरोवर में अपने मन को मछली के रूप में
रहते हैं और एक क्षण भी अलग नही रहना चाहते वही सच्चा भक्त है.
भगति निरुपन बिबिध बिधाना,…क्षमा
दया दम लता विताना ।
सम जम नियम फूल फल ग्याना,…
हरि पद रति रस बेद बखाना ।
अनेक तरह से भक्ति करना
एवं क्षमा, दया, इन्द्रियों का नियंत्रण, लताओं के मंडप समान हैं. मन का नियमन अहिंसा,
सत्य, अस्तेय ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्राणधन, भक्ति
के फूल और ज्ञान फल है. भगवान के चरणों में प्रेम भक्ति का रस है. वेदों ने इसका वर्णन
किया है.
झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें
। जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचाने ।
जेहि जाने जग जाई हेराई
। जागें जथा सपन भ्रम जाई ।
ईश्वर को नही जानने से
झूठ सत्य प्रतीत होता है. बिना पहचाने रस्सी से सांप का भ्रम होता है. लेकिन ईश्वर
को जान लेने पर संसार का उसी प्रकार लोप हो जाता है जैसे जागने पर स्वप्न का भ्रम मिट
जाता है.
जिन्ह हरि कथा सुनी नहि
काना । श्रवण रंध्र अहि भवन समाना ।
जिसने अपने कानों से प्रभु
की कथा नही सुनी उसके कानों के छेद सांप के बिल के समान हैं.
जिन्ह हरि भगति हृदय नहि
आनी । जीवत सब समान तेइ प्राणी ।
जो नहि करई राम गुण गाना
। जीह सो दादुर जीह समाना ।
जिसने भगवान की भक्ति को
हृदय में नही लाया वह प्राणी जीवित मूर्दा के समान है. जिसने प्रभु के गुण नही गाया
उसकी जीभ मेंढ़क की जीभ के समान है.
कुलिस कठोर निठुर सोई छाती
। सुनि हरि चरित न जो हरसाती
तुलसीदास जी कहते हैं
– उसका हृदय बज्र की तरह कठोर और निश्ठुर है जो ईश्वर का चरित्र सुनकर प्रसन्न नही
होता है.
सगुनहि अगुनहि नहि कछु
भेदा । गाबहि मुनि पुराण बुध भेदा।
अगुन अरूप अलख अज जोई।
भगत प्रेम बश सगुन सो होई।
तुलसीदास जी कहते हैं
– सगुण और निर्गुण में कोई अंतर नही है. मुनि पुराण पन्डित बेद सब ऐसा कहते. जेा निर्गुण
निराकार अलख और अजन्मा है वही भक्तों के प्रेम के कारण सगुण हो जाता है.
हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता।
कहहि सुनहि बहु बिधि सब संता।
रामचंन्द्र के चरित सुहाए।कलप
कोटि लगि जाहि न गाए।
भगवान अनन्त है, उनकी कथा
भी अनन्त है. संत लोग उसे अनेक प्रकार से वर्णन करते हैं. श्रीराम के सुन्दर चरित्र
करोड़ों युगों मे भी नही गाये जा सकते हैं.
प्रभु जानत सब बिनहि जनाएँ
।कहहुॅ कवनि सिधि लोक रिझाए।
तुलसीदास जी कहते हैं
– प्रभु तो बिना बताये हीं सब जानते हैं. अतः संसार को प्रसन्न करने से कभी भी सिद्धि
प्राप्त नही हो सकती.
तपबल तें जग सुजई बिधाता।
तपबल बिश्णु भए परित्राता।
तपबल शंभु करहि संघारा।
तप तें अगम न कछु संसारा।
– तपस्या से कुछ भी प्राप्ति
दुर्लभ नही है. इसमें शंका आश्चर्य करने की कोई जरूरत नही है. तपस्या की शक्ति से हीं
ब्रह्मा ने संसार की रचना की है और तपस्या की शक्ति से ही विष्णु इस संसार का पालन
करते हैं. तपस्या द्वारा हीं शिव संसार का संहार करते हैं. दुनिया में ऐसी कोई चीज
नही जो तपस्या द्वारा प्राप्त नही किया जा सकता है.
हरि ब्यापक सर्वत्र समाना।प्रेम
ते प्रगट होहिं मै जाना।
देस काल दिशि बिदि सिहु
मांही। कहहुॅ सो कहाॅ जहाॅ प्रभु नाहीं।
तुलसीदास जी कहते हैं
– भगवान सब जगह हमेशा समान रूप से रहते हैं और प्रेम से बुलाने पर प्रगट हो जाते हैं.
वे सभी देश विदेश एव दिशाओं में ब्याप्त हैं. कहा नही जा सकता कि प्रभु कहाँ नही है.
तुम्ह परिपूरन काम जान
सिरोमनि भावप्रिय
जन गुन गाहक राम दोस दलन
करूनायतन।
तुलसीदास जी कहते हैं
– प्रभु पूर्णकाम सज्जनों के शिरोमणि और प्रेम के प्यारे हैं. प्रभु भक्तों के गुणग्राहक
बुराईयों का नाश करने वाले और दया के धाम हैं.
करहिं जोग जोगी जेहि लागी।
कोहु मोहु ममता मदु त्यागी।
व्यापकु ब्रह्मु अलखु अविनासी।
चिदानंदु निरगुन गुनरासी।
योगी जिस प्रभु के लिये
क्रोध मोह ममता और अहंकार को त्यागकर योग साधना करते हैं – वे सर्वव्यापक ब्रह्म अब्यक्त
अविनासी चिदानंद निर्गुण और गुणों के खान हैं.
मन समेत जेहि जान न वानी।
तरकि न सकहिं सकल अनुमानी।
महिमा निगमु नेति कहि कहई।
जो तिहुॅ काल एकरस रहई।
जिन्हें पूरे मन से शब्दों
द्वारा ब्यक्त नहीं किया जा सकता-जिनके बारे में कोई अनुमान नही लगा सकता – जिनकी महिमा
बेदों में नेति कहकर वर्णित है और जो हमेशा एकरस निर्विकार रहते हैं.
मित्रता पर तुलसीदास के
दोहे
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी।
तिन्हहि विलोकत पातक भारी।
निज दुख गिरि सम रज करि
जाना। मित्रक दुख रज मेरू समाना।
तुलसीदास जी कहते हैं
– जो मित्र के दुख से दुखी नहीं होता है उसे देखने से भी भारी पाप लगता है. अपने पहाड़
समान दुख को धूल के बराबर और मित्र के साधारण धूल समान दुख को सुमेरू पर्वत के समान
समझना चाहिए.
जिन्ह कें अति मति सहज
न आई। ते सठ कत हठि करत मिताई।
कुपथ निवारि सुपंथ चलावा
। गुन प्रगटै अबगुनन्हि दुरावा।
जिनके स्वभाव में इस प्रकार
की बुद्धि न हो वे मूर्ख केवल जिद करके हीं किसी से मित्रता करते हैं. सच्चा मित्र
गलत रास्ते पर जाने से रोककर सही रास्ते पर चलाता है और अवगुण छिपाकर केवल गुणों को
प्रकट करता है.
देत लेत मन संक न धरई।
बल अनुमान सदा हित करई।
विपति काल कर सतगुन नेहा।
श्रुति कह संत मित्र गुन एहा।
मित्र से लेन देन करने
में शंका न करे. अपनी शक्ति अनुसार हमेशा मित्र की भलाई करे. वेद के अनुसार संकट के
समय वह सौ गुणा स्नेह-प्रेम करता है. अच्छे मित्र के यही गुण हैं.
आगें कह मृदु वचन बनाई।
पाछे अनहित मन कुटिलाई।
जाकर चित अहिगत सम भाई।
अस कुमित्र परिहरेहि भलाई।
जो सामने बना-बनाकर मीठा
बोलता है और पीछे मन में बुरी भावना रखता है तथा जिसका मन सांप की चाल के जैसा टेढा
है ऐसे खराब मित्र को त्यागने में हीं भलाई है.
सत्रु मित्र सुख दुख जग
माहीं। माया कृत परमारथ नाहीं।
इस संसार में सभी शत्रु
और मित्र तथा सुख और दुख, माया झूठे हैं और वस्तुतः वे सब बिलकुल नहीं हैं.
सुर नर मुनि सब कै यह रीती।
स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।
तुलसीदास जी कहते हैं
– देवता, आदमी, मुनि – सबकी यही रीति है कि सब अपने स्वार्थपूर्ति हेतु हीं प्रेम करते
हैं.
कठिन कुसंग कुपंथ कराला।
तिन्ह के वचन बाघ हरि ब्याला।
गृह कारज नाना जंजाला।
ते अति दुर्गम सैल विसाला।
खराब संगति अत्यंत बुरा
रास्ता है. उन कुसंगियों के बोल बाघ, सिंह और सांप की भांति हैं. घर के कामकाज में
अनेक झंझट ही बड़े बीहड़ विशाल पहाड़ की तरह हैं.
सुभ अरू असुभ सलिल सब बहई।
सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई।
समरथ कहुॅ नहि दोश् गोसाईं।
रवि पावक सुरसरि की नाई।
तुलसीदास जी कहते हैं
– गंगा में पवित्र और अपवित्र सब प्रकार का जल बहता है परन्तु कोई भी गंगाजी को अपवित्र
नही कहता. सूर्य, आग और गंगा की तरह समर्थ व्यक्ति को कोई दोष नही लगाता है.
तुलसी देखि सुवेसु भूलहिं
मूढ न चतुर नर
सुंदर के किहि पेखु बचन
सुधा सम असन अहि।
हिंदी अर्थ – सुंदर वेशभूशा
देखकर मूर्ख हीं नही चतुर लोग भी धोखा में पर जाते हैं. मोर की बोली बहुत प्यारी अमृत
जैसा है परन्तु वह भोजन सांप का खाता है.
बडे सनेह लघुन्ह पर करहीं।
गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं।
जलधि अगाध मौलि बह फेन।
संतत धरनि धरत सिर रेनू।
तुलसीदास जी कहते हैं
– बडे लोग छोटों पर प्रेम करते हैं. पहाड के सिर में हमेशा घास रहता है. अथाह समुद्र
में फेन जमा रहता है एवं धरती के मस्तक पर हमेशा धूल रहता है.
बैनतेय बलि जिमि चह कागू।
जिमि ससु चाहै नाग अरि भागू।
जिमि चह कुसल अकारन कोही।
सब संपदा चहै शिव द्रोही।
लोभी लोलुप कल कीरति चहई।
अकलंकता कि कामी लहई।
हिंदी अर्थ – यदि गरूड
का हिस्सा कौआ और सिंह का हिस्सा खरगोश चाहे – अकारण क्रोध करने वाला अपनी कुशलता और
शिव से विरोध करने वाला सब तरह की संपत्ति चाहे – लोभी अच्छी कीर्ति और कामी पुरूष
बदनामी और कलंक नही चाहे तो उन सभी की इच्छाएं व्यर्थ हैं.
ग्रह भेसज जल पवन पट पाई
कुजोग सुजोग।
होहिं कुवस्तु सुवस्तु
जग लखहिं सुलक्षन लोग।
हिंदी अर्थ – ग्रह दवाई
पानी हवा वस्त्र -ये सब कुसंगति और सुसंगति पाकर संसार में बुरे और अच्छे वस्तु हो
जाते हैं. ज्ञानी और समझदार लोग ही इसे जान पाते हैं.
को न कुसंगति पाइ नसाई।
रहइ न नीच मतें चतुराई।
तुलसीदास जी कहते हैं
– खराब संगति से सभी नष्ट हो जाते हैं. नीच लोगों के विचार के अनुसार चलने से चतुराई,
बुद्धि भ्रष्ट हो जाती हैं .
तात स्वर्ग अपवर्ग सुख
धरिअ तुला एक अंग
तूल न ताहि सकल मिलि जो
सुख लव सतसंग।
हिंदी अर्थ – यदि तराजू
के एक पलड़े पर स्वर्ग के सभी सुखों को रखा जाये तब भी वह एक क्षण के सतसंग से मिलने
बाले सुख के बराबर नहीं हो सकता.
सुनहु असंतन्ह केर सुभाउ।
भूलेहु संगति करिअ न काउ।
तिन्ह कर संग सदा दुखदाई।
जिमि कपिलहि घालइ हरहाई।
हिंदी अर्थ – अब असंतों
का गुण सुनें। कभी भूलवश भी उनका साथ न करें। उनकी संगति हमेशा कश्टकारक होता है। खराब
जाति की गाय अच्छी दुधारू गाय को अपने साथ रखकर खराब कर देती है।
खलन्ह हृदयॅ अति ताप विसेसी
। जरहिं सदा पर संपत देखी।
जहॅ कहॅु निंदासुनहि पराई।
हरसहिं मनहुॅ परी निधि पाई।
हिंदी अर्थ – दुर्जन के
हृदय में अत्यधिक संताप रहता है। वे दुसरों को सुखी देखकर जलन अनुभव करते हैं. दुसरों
की बुराई सुनकर खुश होते हैं जैसे कि रास्ते में गिरा खजाना उन्हें मिल गया हो।
काम क्रोध मद लोभ परायन।
निर्दय कपटी कुटिल मलायन।
वयरू अकारन सब काहू सों।
जो कर हित अनहित ताहू सों।
वे काम, क्रोध, अहंकार,
लोभ के अधीन होते हैं। वे निर्दयी, छली, कपटी एवं पापों के भंडार होते हैं। वे बिना
कारण सबसे दुशमनी रखते हैं। जो भलाई करता है वे उसके साथ भी बुराई ही करते हैं।
झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ
भोजन झूठ चवेना।
बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा।
खाइ महा अति हृदय कठोरा।
दुष्ट का लेनादेना सब झूठा
होता है। उसका नाश्ता भोजन सब झूठ ही होता है जैसे मोर बहुत मीठा बोलता है. पर उसका
दिल इतना कठोर होता है कि वह बहुत विषधर सांप को भी खा जाता है। इसी तरह उपर से मीठा
बोलने बाले अधिक निर्दयी होते हैं।
पर द्रोही पर दार पर धन
पर अपवाद
तें नर पाॅवर पापमय देह
धरें मनुजाद।
हिंदी अर्थ – वे दुसरों
के द्रोही परायी स्त्री और पराये धन तथा पर निंदा में लीन रहते हैं। वे पामर और पापयुक्त
मनुष्य शरीर में राक्षस होते हैं।
लोभन ओढ़न लोभइ डासन। सिस्नोदर
नर जमपुर त्रास ना।
काहू की जौं सुनहि बड़ाई।
स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई।
हिंदी अर्थ – लोभ लालच
हीं उनका ओढ़ना और विछावन होता है।वे जानवर की तरह भोजन और मैथुन करते हैं। उन्हें यमलोक
का डर नहीं होता।किसी की प्रशंसा सुनकर उन्हें मानो बुखार चढ़ जाता है।
जब काहू कै देखहिं बिपती।
सुखी भए मानहुॅ जग नृपति।
स्वारथ रत परिवार विरोधी।
लंपट काम लोभ अति क्रोधी।
वे जब दूसरों को विपत्ति
में देखते हैं तो इस तरह सुखी होते हैं जैसे वे हीं दुनिया के राजा हों। वे अपने स्वार्थ
में लीन परिवार के सभी लोगों के विरोधी, काम वासना और लोभ में लम्पट एवं अति क्रोधी
होते हैं।
मातु पिता गुर विप्र न
मानहिं। आपु गए अरू घालहिं आनहि।
करहिं मोहवस द्रोह परावा।
संत संग हरि कथा न भावा।
वे माता पिता गुरू ब्राम्हण
किसी को नही मानते। खुद तो नष्ट रहते ही हैं. दूसरों को भी अपनी संगति से बर्बाद करते
हैं। मोह में दूसरों से द्रोह करते हैं। उन्हें संत की संगति और ईश्वर की कथा अच्छी
नहीं लगती है।
अवगुन सिधुं मंदमति कामी।
वेद विदूसक परधन स्वामी।
विप्र द्रोह पर द्रोह बिसेसा।
दंभ कपट जिए धरें सुवेसा।
वे दुर्गुणों के सागर,
मंदबुद्धि, कामवासना में रत वेदों की निंदा करने बाला जबरदस्ती दूसरों का धन लूटने
वाला, द्रोही विशेषत: ब्राह्मनों के शत्रु होते हैं। उनके दिल में घमंड और छल भरा रहता
है पर उनका लिबास बहुत सुन्दर रहता है।
भक्ति सुतंत्र सकल सुख
खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी।
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं
न संता। सत संगति संसृति कर अंता।
हिंदी अर्थ – भक्ति स्वतंत्र
रूप से समस्त सुखों की खान है। लेकिन बिना संतों की संगति के भक्ति नही मिल सकती है।
पुनः बिना पुण्य अर्जित किये संतों की संगति नहीं मिलती है। संतों की संगति हीं जन्म
मरण के चक्र से छुटकारा देता है।
जेहि ते नीच बड़ाई पावा।सो
प्रथमहिं हति ताहि नसाबा।
धूम अनल संभव सुनु भाई।तेहि
बुझाव घन पदवी पाई।
हिंदी अर्थ – नीच आदमी
जिससे बड़प्पन पाता है वह सबसे पहले उसी को मारकर नाश करता है। आग से पैदा धुंआ मेघ
बनकर सबसे पहले आग को बुझा देता है।
रज मग परी निरादर रहई।
सब कर पद प्रहार नित सहई।
मरूत उड़ाव प्रथम तेहि भरई।
पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई।
हिंदी अर्थ – धूल रास्ते
पर निरादर पड़ी रहती है और सभी के पैर की चोट सहती रहती है। लेकिन हवा के उड़ाने पर वह
पहले उसी हवा को धूल से भर देती है। बाद में वह राजाओं के आँखों और मुकुटों पर पड़ती
है।
सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा।
बुध नहिं करहिं अधम कर संगा।
कवि कोविद गावहिं असि नीति।
खल सन कलह न भल नहि प्रीती।
हिंदी अर्थ – बुद्धिमान
मनुष्य नीच की संगति नही करते हैं। कवि एवं पंडित नीति कहते हैं कि दुष्ट से न झगड़ा
अच्छा है न हीं प्रेम।
उदासीन नित रहिअ गोसांई।
खल परिहरिअ स्वान की नाई।
हिंदी अर्थ – दुष्ट से
सर्वदा उदासीन रहना चाहिये। दुष्ट को कुत्ते की तरह दूर से ही त्याग देना चाहिये।
सन इब खल पर बंधन करई ।
खाल कढ़ाइ बिपति सहि मरई।
खल बिनु स्वारथ पर अपकारी।
अहि मूशक इब सुनु उरगारी।
हिंदी अर्थ – कुछ लोग जूट
की तरह दूसरों को बाॅधते हैं। जूट बाॅधने के लिये अपनी खाल तक खिंचवाता है। वह दुख
सहकर मर जाता है। दुष्ट बिना स्वार्थ के साॅप और चूहा के समान बिना कारण दूसरों का
अपकार करते हैं।
पर संपदा बिनासि नसाहीं।
जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं।
दुश्ट उदय जग आरति हेतू।जथा
प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू।
तुलसी जी कहते हैं कि
– वे दूसरों का धन बर्बाद करके खुद भी नष्ट हो जाते हैं जैसे खेती का नाश करके ओला
भी नाश हो जाता है। दुष्ट का जन्म प्रसिद्ध नीच ग्रह केतु के उदय की तरह संसार के दुख
के लिये होता है।
जद्यपि जग दारून दुख नाना।
सब तें कठिन जाति अवमाना।
हिंदी अर्थ – इस संसार
में अनेक भयानक दुख हैं किन्तु सब से कठिन दुख जाति अपमान है।
रिपु तेजसी अकेल अपि लघु
करि गनिअ न ताहु
अजहुॅ देत दुख रवि ससिहि
सिर अवसेशित राहु।
तुलसी जी कहते हैं कि
– बुद्धिमान शत्रु अकेला रहने पर भी उसे छोटा नही मानना चाहिये। राहु का केवल सिर बच
गया था परन्तु वह आजतक सूर्य एवं चन्द्रमा को ग्रसित कर दुख देता है।
भरद्वाज सुनु जाहि जब होइ
विधाता वाम
धूरि मेरूसम जनक जम ताहि
ब्यालसम दाम।
तुलसी जी कहते हैं कि
– जब ईश्वर विपरीत हो जाते हैं तब उसके लिये धूल पर्वत के समान पिता काल के समान और
रस्सी सांप के समान हो जाती है।
सासति करि पुनि करहि पसाउ।
नाथ प्रभुन्ह कर सहज सुभाउ।
तुलसी जी कहते हैं कि
– अच्छे स्वामी का यह सहज स्वभाव है कि पहले दण्ड देकर पुनः बाद में सेवक पर कृपा करते
हैं।
सुख संपति सुत सेन सहाई।जय
प्रताप बल बुद्धि बडाई।
नित नूतन सब बाढत जाई।जिमि
प्रति लाभ लोभ अधिकाई।
तुलसी जी कहते हैं कि
– सुख, धन, संपत्ति, संतान, सेना, मददगार, विजय, प्रताप, बुद्धि, शक्ति और प्रशंसा
जैसे जैसे नित्य बढते हैं, वैसे वैसे प्रत्येक लाभ पर लोभ बढता हैै।
जिन्ह कै लहहिं न रिपु
रन पीढी। नहि पावहिं परतिय मनु डीठी।
मंगन लहहिं न जिन्ह कै
नाहीं। ते नरवर थोरे जग माहीं।
गोस्वामी जी कहते हैं कि
– ऐसे वीर जो रणक्षेत्र से कभी नहीं भागते, दूसरों की स्त्रियों पर जिनका मन और दृष्टि
कभी नहीं जाता और भिखारी कभी जिनके यहाँ से खाली हाथ नहीं लौटते. ऐसे उत्तम लोग संसार
में बहुत कम हैं।
टेढ जानि सब बंदइ काहू।वक्र्र
चंद्रमहि ग्रसई न राहू।
गोस्वामी जी कहते हैं कि
– टेढा जानकर लोग किसी भी व्यक्ति की बंदना प्रार्थना करते हैं। टेढे चन्द्रमा को राहु
भी नहीं ग्रसता है।
सेवक सदन स्वामि आगमनु।मंगल
मूल अमंगल दमनू।
गोस्वामी जी कहते हैं कि
– सेवक के घर स्वामी का आगमन सभी मंगलों की जड और अमंगलों का नाश करने वाला होता है।
काने खोरे कूबरे कुटिल
कुचाली जानि
तिय विसेश पुनि चेरि कहि
भरत मातु मुसकानि।
गोस्वामी जी कहते हैं कि
– भरत की मां हंसकर कहती है – कानों, लंगरों और कुवरों को कुटिल और खराब चालचलन वाला
जानना चाहिये।
कोउ नृप होउ हमहिं का हानि।चेरी
छाडि अब होब की रानी।
महाकवि कहते हैं कि – कोई
भी राजा हो जाये – हमारी क्या हानि है।
दासी छोड क्या मैं अब रानी
हो जाउॅगा।
तसि मति फिरी अहई जसि भावी।
महाकवि कहते हैं कि – जैसी
भावी होनहार होती है – वैसी हीं बुद्धि भी फिर बदल जाती है।
रहा प्रथम अब ते दिन बीते।
समउ फिरें रिपु होहिं पिरीते।
पहले वाली बात बीत चुकी
है. समय बदलने पर मित्र भी शत्रु हो जाते हैं।
अरि बस दैउ जियावत जाही,…मरनु
नीक तेहि जीवन चाही
ईश्वर जिसे शत्रु के अधीन
रखकर जिन्दा रखें, उसके लिये जीने की अपेक्षा मरना अच्छा है।
सूल कुलिस असि अंगवनिहारे।
ते रतिनाथ सुमन सर मारे।
जो व्यक्ति त्रिशूल, बज्र
और तलवार आदि की मार अपने अंगों पर सह लेते हैं वे भी कामदेव के पुष्प बाण से मारे
जाते हैं।
कवने अवसर का भयउॅ नारि
विस्वास
जोग सिद्धि फल समय जिमि
जतिहि अविद्या नास।
किस मौके पर क्या हो जाये-स्त्री
पर विश्वास करके कोई उसी प्रकार मारा जा सकता है जैसे योग की सिद्धि का फल मिलने के
समय योगी को अविद्या नष्ट कर देती है।
दुइ कि होइ एक समय भुआला।हॅसब
ठइाइ फुलाउब गाला।
दानि कहाउब अरू कृपनाई।होइ
कि खेम कुसल रीताई।
ठहाका मारकर हँसना और क्रोध
से गाल फुलाना एक साथ एक ही समय में सम्भव नहीं है। दानी और कृपण बनना तथा युद्ध में
बहादुरी और चोट भी नहीं लगना कदापि सम्भव नही है।
सत्य कहहिं कवि नारि सुभाउ।सब
बिधि अगहु अगाध दुराउ।
निज प्रतिबिंबु बरूकु गहि
जाई।जानि न जाइ नारि गति भाई।
स्त्री का स्वभाव समझ से
परे, अथाह और रहस्यपूर्ण होता है। कोई अपनी परछाई भले पकड ले पर वह नारी की चाल नहीं
जान सकता है।
काह न पावकु जारि सक का
न समुद्र समाइ
का न करै अवला प्रवल केहि
जग कालु न खाइ।
अग्नि किसे नही जला सकती
है? समुद्र में क्या नही समा सकता है? अबला नारी बहुत प्रबल होती है और वह कुछ भी कर
सकने में समर्थ होती है। संसार में काल किसे नही खा सकता है?
जहॅ लगि नाथ नेह अरू नाते।पिय
बिनु तियहि तरनिहु ते ताते।
तनु धनु धामु धरनि पुर
राजू।पति विहीन सबु सोक समाजू।
पति बिना लोगों का स्नेह
और नाते रिश्ते सभी स्त्री को सूर्य से भी अधिक ताप देने बाले होते हैं. शरीर धन घर
धरती नगर और राज्य यह सब स्त्री के लिये पति के बिना शोक दुख के कारण होते हैं।
तुलसी दास जी के हिंदी
दोहे (81-100)
सुभ अरू असुभ करम अनुहारी।ईसु
देइ फल हृदय बिचारी।
करइ जो करम पाव फल सोई।निगम
नीति असि कह सबु कोई।
ईश्वर शुभ और अशुभ कर्मों
के मुताबिक हृदय में विचार कर फल देता है। ऐसा ही वेद नीति और सब लोग कहते हैं।
काहु न कोउ सुख दुख कर
दाता।निज कृत करम भोग सबु भ्राता।
कोई भी किसी को दुख-सुख
नही दे सकता है. सभी को अपने हीं कर्मों का फल भेागना पड़ता है।
जोग वियोग भोग भल मंदा।हित
अनहित मध्यम भ्रम फंदा।
जनमु मरनु जहॅ लगि जग जालू।संपति
बिपति करमु अरू कालू।
मिलाप और बिछुड़न, अच्छे
बुरे भोग ,शत्रु मित्र और तटस्थ -ये सभी भ्रम के फांस हैं। जन्म, मृत्यु संपत्ति, विपत्ति
कर्म और काल- ये सभी इसी संसार के जंजाल हैं।
बिधिहुॅ न नारि हृदय गति
जानी।सकल कपट अघ अवगुन खानी।
स्त्री के हृदय की चाल
ईश्वर भी नहीं जान सकते हैं। वह छल, कपट, पाप और अवगुणों की खान है।
Tulsidas ke Dohe on
self experience
सुनहुॅ भरत भावी प्रवल
विलखि कहेउ मुनिनाथ
हानि लाभ जीवनु मरनु जसु
अपजसु विधि हाथ।
मुनिनाथ ने अत्यंत दुख
से भरत से कहा कि जीवन में लाभ नुकसान जिंदगी मौत प्रतिष्ठा या अपयश सभी ईश्वर के हाथों
में है।
विशय जीव पाइ प्रभुताई।मूढ़
मोह बस होहिं जनाई।
मूर्ख सांसारिक जीव प्रभुता
पा कर मोह में पड़कर अपने असली स्वभाव को प्रकट कर देते हैं।
रिपु रिन रंच न राखब काउ।
शत्रु और ऋण को कभी भी
शेष नही रखना चाहिये। अल्प मात्रा में भी छोड़ना नही चाहिये।
लातहुॅ मोर चढ़ति सिर नीच
को धूरि समान।
धूल जैसा नीच भी पैर मारने
पर सिर चढ़ जाता है।
अनुचित उचित काजु किछु
होउ।समुझि करिअ भल कह सब कोउ।
सहसा करि पाछें पछिताहीं।कहहिं
बेद बुध ते बुध नाहीं।
किसी भी काम में उचित अनुचित
विचार कर किया जाये तो सब लोग उसे अच्छा कहते हैं। बेद और विद्वान कहते हैं कि जो काम
बिना विचारे जल्दी में करके पछताते हैं – वे बुद्धिमान नहीं हैं।
विशई साधक सिद्ध सयाने।त्रिविध
जीव जग बेद बखाने।
संसारी, साधक और ज्ञानी
सिद्ध पुरुष – इस दुनिया में इसी तीन प्रकार के लोग बेदों ने बताये हैं।
सुनिअ सुधा देखिअहि गरल
सब करतूति कराल
जहॅ तहॅ काक उलूक बक मानस
सकृत मराल।
अमृत मात्र सुनने की बात
है किन्तु जहर तो सब जगह प्रत्यक्षतः देखे जा सकते हैं। कौआ, उल्लू और बगुला तो जहां
तहां दिखते हैं परन्तु हंस तो केवल मानसरोवर में ही रहते हैं।
सुनि ससोच कह देवि सुमित्रा
।बिधि गति बड़ि विपरीत विचित्रा।
तो सृजि पालई हरइ बहोरी।बालकेलि
सम बिधि मति भोरी।
ईश्वर की चाल अत्यंत विपरीत
एवं विचित्र है। वह संसार की सृश्टि उत्पन्न करता और पालन और फिर संहार भी कर देता
है। ईश्वर की बुद्धि बच्चों जैसी भोली विवेक रहित है।
कसे कनकु मनि पारिखि पायें।
पुरूश परिखिअहिं समयॅ सुभाए।
सोना कसौटी पर कसने और
रत्न जौहरी के द्वारा ही पहचाना जाता है। पुरूष की परीक्षा समय आने पर उसके स्वभाव
और चरित्र से होती है।
सुहृद सुजान सुसाहिबहि
बहुत कहब बड़ि खोरि।
बिना कारण हीं दूसरों की
भलाई करने बाले बुद्धिमान और श्रेष्ठ मालिक से बहुत कहना गलत होता है।
धीरज धर्म मित्र अरू नारी।
आपद काल परिखिअहिं चारी।
बृद्ध रोगबश जड़ धनहीना।
अंध बधिर क्रोधी अतिदीना।
धैर्य, धर्म, मित्र और
स्त्री की परीक्षा आपद या दुख के समय होती हैै। बूढ़ा, रोगी, मूर्ख, गरीब, अन्धा, बहरा,
क्रोधी और अत्यधिक गरीब सभी की परीक्षा इसी समय होती है।
कठिन काल मल कोस धर्म न
ग्यान न जोग जप।
कलियुग अनेक कठिन पापों
का भंडार है जिसमें धर्म ज्ञान योग जप तपस्या आदि कुछ भी नहीं है।
मैं अरू मोर तोर तैं माया।
जेहिं बस कहन्हें जीव निकाया।
में और मेरा तू और तेरा-यही
माया है जिाने सम्पूर्ण जीवों को बस में कर रखा है।
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रिपु रूज पावक पाप प्रभु
अहि गनिअ न छोट करि।
महाकवि कहते हैं कि – शत्रु
रोग अग्नि पाप स्वामी एवं साॅप को कभी भी छोटा मानकर नहीं समझना चाहिये।
नवनि नीच कै अति दुखदाई।जिमि
अंकुस धनु उरग बिलाई।
भयदायक खल कै प्रिय वानी
।जिमि अकाल के कुसुम भवानी।
नीच ब्यक्ति की नम्रता
बहुत दुखदायी होती हैजैसे अंकुश धनुस सांप और बिल्ली का झुकना।दुष्ट की मीठी बोली उसी
तरह डरावनी होती है जैसे बिना ऋतु के फूल।
कबहुॅ दिवस महॅ निविड़ तम
कबहुॅक प्रगट पतंग
बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि
पाइ कुसंग सुसंग।
बादलों के कारण कभी दिन
में घोर अंधकार छा जाता है और कभी सूर्य प्रगट हो जाते हैं। जैसे कुसंग पाकर ज्ञान
नष्ट हो जाता है और सुसंग पाकर उत्पन्न हो जाता है।
तुलसीदास जी के दोहे अर्थ
सहित (101-121)
भानु पीठि सेअइ उर आगी।स्वामिहि
सर्व भाव छल त्यागी।
सूर्य का सेवन पीठ की ओर
से और आग का सेवन सामने छाती की ओर से करना चाहिये। किंतु स्वामी की सेवा छल कपट छोड़कर
समस्त भाव मन वचन कर्म से करनी चाहिये।
भानु पीठि सेअइ उर आगी।स्वामिहि
सर्व भाव छल त्यागी।
तुलसीदास जी कहते हैं कि
– सूर्य का सेवन पीठ की ओर से और आग का सेवन सामने छाती की ओर से करना चाहिये। किंतु
स्वामी की सेवा छल कपट छोड़कर समस्त भाव मन वचन कर्म से करनी चाहिये।
उमा संत कइ इहइ बड़ाई।मंद
करत जो करइ भलाई।
तुलसीदास जी कहते हैं कि
– संत की यही महानता है कि वे बुराई करने वाले पर भी उसकी भलाई ही करते हैं।
साधु अवग्या तुरत भवानी।कर
कल्यान अखिल कै हानी।
साधु संतों का अपमान तुरंत
संपूर्ण भलाई का अंत नाश कर देता है।
कादर मन कहुॅ एक अधारा।दैव
दैव आलसी पुकारा।
ईश्वर का क्या भरोसा।देवता
तो कायर मन का आधार है।
आलसी लोग ही भगवान भगवान
पुकारा करते हैं।
सठ सन विनय कुटिल सन प्रीती।सहज
कृपन सन सुंदर नीती।
तुलसीदास जी कहते हैं कि
– मूर्ख से नम्रता दुष्ट से प्रेम कंजूस से उदारता के सुंदर नीति विचार व्यर्थ होते
हैं।
ममता रत सन ग्यान कहानी।अति
लोभी सन विरति बखानी।
क्रोधिहि सभ कर मिहि हरि
कथा।उसर बीज बए फल जथा।
मोह माया में फॅसे ब्यक्ति
से ज्ञान की कहानी अधिक लोभी से वैराग्य का वर्णन क्रोधी से शान्ति की बातें और कामुक
से ईश्वर की बात कहने का वैसा हीं फल होता है जैसा उसर खेत में बीज बोने से होता है।
काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि
जतन कोउ सींच
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं
पइ नव नीच।
करोड़ों उपाय करने पर भी
केला काटने पर ही फलता है। नीच आदमी विनती करने से नहीं मानता है – वह डांटने पर ही
झुकता – रास्ते पर आता है।
पर उपदेश कुशल बहुतेरे।जे
आचरहिं ते नर न घनेरे।
दूसरों को उपदेश शिक्षा
देने में बहुत लोग निपुण कुशल होते हैं परन्तु उस शिक्षा का आचरण पालन करने बाले बहुत
कम हीं होते हैं।
संसार महॅ त्रिविध पुरूश
पाटल रसाल पनस समा
एक सुमन प्रद एक सुमन फल
एक फलइ केवल लागहिं।
संसार में तीन तरह के लोग
होते हैं-गुलाब आम और कटहल के जैसा। एक फूल देता है-एक फूल और फल दोनों देता है और
एक केवल फल देता है। लोगों मे एक केवल कहते हैं-करते नहीं। दूसरे जो कहते हैं वे करते
भी हैं और तीसरे कहते नही केवल करते हैं।
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