रेशम
की
खेती
से
ग्रामीणों को मिल रहा है घर बैठे रोजगार
(10 Mar) जगदलपुर, 10 मार्च (हि.स.)। तेलीमारेंगा के पास रेशम का उत्पादन हो रहा है। पहाड़ी पर 32 हेक्टेयर में रेशम पैदा हो रहा है। हर सीजन में 1 हेक्टेयर में रेशम की खेती के 30 से 40 हजार रू. मिल रहे हैं। पथरीली बंजर जमीन जिससे लोगों को 1 पैसे की आमदनी की उम्मीद भी नहीं थी, उसी जमीन पर लोगों ने मिलकर रेशम की खेती कर डाली। उनकी मेहनत रंग लायी और पथरीली जमीन से हर साल लाखों की आमदनी का रास्ता भी खुल गया है। गांव से शहर जाकर दिनभर कड़ी मेहनत करने के बाद चंद रूपये ही हाथ लगते थे। कड़ी मेहनत के बाद भी हाथ में कुछ बचता नहीं था। इन बातों से परेशान होकर महिलाओं ने गांव में ही तरक्की करने की सोच रखने वाले युवाओं को रेशम विभाग का सहारा मिला। शहर से करीब 15 किमी दूर पोटानार व इसके आसपास के इलाके में रहने वाले लोगों ने यहां सडक़ किनारे पहाडऩुमा पथरीली जमीन पर रेशम की खेती कर डाली है। कुछ समय पहले तक यह जमीन बंजर पड़ी हुई थी। आसपास के लोगों ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि इस पथरीली जमीन से अच्छी-खासी कमाई की जा सकती है। इसके बाद इस जमीन पर रेशम विभाग के अधिकारियों की नजर पड़ी और उन्होंने कुछ स्थानीय लोगों के साथ मिलकर सन् 2011-12 में अर्जुन के पौधों का प्लांटेशन करवाया। शुरूआत में गांव वालों को कुछ भी समझ नहीं आया पर जैसे-जैसे पौधे बड़े हुए और इनमें विभाग की सहायता से टसर कोसा उगाने की कवायदें शुरू हुई तो उन्हें भी लगा कि उनकी मेहनत सफल होने जा रही है। करीब दो साल बाद यहां अब टसर से कृमि आकर लेने लगे हैं और जल्द ही यहां से उच्च कोटि का टसर कोसा निकलना शुरू हो जाएगा। इसी तरह तेलीमारेंगा की महिलाओं को भी विभाग ने गांव में ही रेशम उत्पादन का काम दे दिया है। अब ये महिलाएं हर माह आठ से दस हजार रूपये घर बैठे कमा रही हैं। मामले के डायरेक्टर अरूण कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि करंजी, पोटानार, रानसरगीपाल व उसके आसपास सटे इलाके के पहाड़ों पर रेशम की खेती हो भी पायेगी या नहीं इस पर असमंजस था। शुरूआत में विभाग को भी लग रहा था कि कही प्रोजेक्ट फेल न हो जाए, पर विभाग की मदद से पथरीली जमीन पर भी लोगों ने टसर कोसे की पैदावार कर ली। उन्होंने बताया कि यहां बंजर पड़ी 35 हेक्टेयर जमीन पर कोसे की खेती करवाने का निर्णय लिया गया था। इस जमीन पर टसर कोसा पैदा करने की जिम्मेदारी आसपास के गांव में रहने वाले 35 लोगों को दी गयी थी। पिछले तीन साल से गांव वाले यहां कोसा पैदा करने के लिए मशक्कत कर रहे हैं। कोसा उत्पादन से जुड़े सहदेव व बोटी ने बताया कि शुरूआत में उन्हें भी यकीन नहीं हो रहा था कि पथरीली जमीन पर कैसे काम होगा पर तीन साल की मेहनत के बाद अब अर्जुन के पौधों में कृमि आने लगे हैं तो लग रहा है जैसे मेहनत सफल हुई। उन्होंने बताया कि इस काम में आसपास के 35 से ज्यादा लोग लगे हुए है। शुरूआत में उन्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा था। बस विभाग के अधिकारियों व जानकारों के बताये अनुसार वे काम करने लगे। हिन्दुस्थान समाचार, सुधीर जैन, गेवेन्द्र कुमार
रेशम एक मूल्यवान वस्त्र है, जिसका सौन्दर्य पहनने वाला ही महसूस कर सकता है। यह अहसास ही रेशम के मूल्यवान होने का कारण भी है। रेशम और उससे बनने वाले उत्पाद अपने ऊँचे मूल्य के कारण अपने निर्मंताओं के लिए आय के अच्छे स्रोत होते हैं।
भूमिका
एक लाभदायक रोजगार है रेशम उत्पाद के लिए ऐसी सिंचित भूमि होना आवश्यक है जिस पर शहतूत के पौधों को रोपती किया जा सके। एक उद्यमी के लिए लगभग डेढ़ एकड़ रकबा काफी है।
शहतूत के पौधों की खासियत यही है कि इन्हें कहीं भी लगाया जा सकता है। इन पौधों को न तो किसी विशेष किस्म की मिट्टी की जरूरत होती है न ही कुछ विशेष आबोहवा की।
इस पेड़ की पत्तियाँ रेशम के कीड़ों का मुख्य भोजन होती है। शहतूत में यह पत्तियाँ एक निश्चित अनुपात में निरंतर उगती रहती है अत: कीड़ों के लिए भोजन की कोई समस्या नहीं रहती है।
रेशम उत्पादन-औसतन 1000 कि. ग्रा. फ्रेश कोकून सुखाने पर 400 कि. ग्रा. के लगभग रह जाता है जिसमें से 385 कि. ग्रा. में प्यूपा 230 कि. ग्रा. रहता है और शेष 155 कि. ग्रा. शेल रहता है। इस 230 कि.ग्रा. प्यूपा में से लगभग 120 कि. ग्रा. कच्चा रेशम तथा 35 कि.ग्रा. सिल्क वेस्ट प्राप्त होता है।
इस कच्चे रेशम से रेशम को चरखे/तकली द्वारा रोल किया जाता है जिसे रीलिंग कहते हैं।
रेशम तभी बिक्री योग्य होता है, जब उसको कपड़े के रूप में बुन लिया जाए। बुनाई हेतु कई साधन आजकल प्रचलन में है फिर भी हथकरघा पर बने हुए रेशम का अच्छा बाजार मूल्य मिलता है। कुछ हथकरघा जैसे सेवाग्राम करघा, नेपाली करघा, चितरंजन करघा आदि प्रमुखता से उपयोग किये जाते हैं। हथकरघा आदि के लिए उद्यमी अपने क्षेत्र के प्रबंधक खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड से परामर्श ले सकते हैं।
रेशम
उत्पादन हेतु सरकार द्वारा चलायी जा रही योजनायें
इस भाग में सरकार के रेशम उत्पादन विभाग द्वारा चलायी जा रही अनेक योजनाओं का उल्लेख किया गया है।
कल्पवृक्ष सामान्य विस्तार:-
इस योजना का मुख्य उद्देश्य रेशम कृमि पालन कार्य द्वारा सभी वर्गों को स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध करवाना जिसमें कृषकों की स्वयं की एक एकड़/आधा एकड़ सिंचित भूमि में शहतूती पौध रोपण कराया जाता है तथा कृमिपालन के लिए समस्त तकनीकी मार्गदर्शन और प्रशिक्षण दिया जाता है।
वर्तमान में ग्वालियर, भिंड और दतिया को छोड़कर सम्पूर्ण प्रदेश योजना का कार्य क्षेत्र है।
योजनांतर्गत लाभार्थी का चयन रेशम विभाग के अधिकारीयों के सहयोग से स्थानीय पंचायत करती है। चयनित लाभार्थी को ट्रायसेम योजना के कृमिपालन के लिए पूर्ण तकनीकी मार्गदर्शन और रेशम कृमि के अंडे उपलब्ध कराये जाते हैं। साथ ही शहतूत पौधारोपित क्षेत्र के संधारण के लिए नाबार्ड द्वारा स्वीकृत पैकेज की राशि का ऋण बैंकों के माध्यम से उपलब्ध कराये जाने के लिए आवश्यक सहयोग दिया जाता है।
उत्पादित कोकून को गुणवत्ता के आधार पर खरीद लिया जाता है। इस हेतु “ मध्यप्रदेश स्टेट सेरीकल्चर डेवलपमेंट एंड ट्रेडिंग को –ऑपरेटिव फेडरेशन का गठन किया गया है जिसका मुख्य उद्देश्य सहकारिता के माध्यम से रेशम उत्पादकों का आर्थिक उन्नयन करना है। यह संस्था म.प्र. सिल्क फेडरेशन के नाम से भी जानी जाती है। यह कोकून उत्पादन, धागाकरण व वस्त्र निर्माण का मूल्य प्राप्त करने हेतु विपणन आदि की व्यवस्था करती है।
मलबरी
स्वावलंबन योजना:-
इस योजना के अंतर्गत रेशमा संचालनालय द्वारा पूर्व में चलाए जा रहे रेशम केन्द्रों में उपलब्ध शहतूत पौधारोपण में से एक एकड़ क्षेत्र का भागीदारी रेशम कृषकों को दिया जाता है ताकि उनमें स्वरोजगार की भावना जागृत हो। इसके साथ ही इन लाभार्थियों को केंद्र पर उपलब्ध बुनियादी सुविधाओं का उपयोग करने की स्वतंत्रता दी गयी है तथा आवर्ती व्यय की पूर्ति के लिए राशि रू. 6,200 प्रति व्यक्ति/ लाभार्थी प्रति एकड़ की दर से चक्रीय राशि उपलब्ध कराई जाती है ताकि खाद इत्यादि कार्य करने के लिए उन्हें आर्थिक कठिनाइयों का सामना न करना पड़े।
वर्तमान में प्रदेश के 3 जिले –ग्वालियर, भिंड और दतिया को छोड़कर सम्पूर्ण प्रदेश योजन का कार्यक्षेत्र है। योजना के क्रियान्वयन के साथ यह शर्त भी है कि जिन जिलों में शासकीय रेशम केंद्र पर लाभार्थी उत्पादन का काम पूरी रुचि और लगन से नहीं कर रहे हैं, उनके स्थान पर अन्य इच्छुक लोगों को बदला जा सकेगा।
अन्य
योजनाएँ:-
इसके अतिरिक्त अन्य योजनाएँ भी शासन द्वारा चलायी जा रही हैं जैसे –
• मलबरी रेशम विकास एवं विस्तार कार्यक्रम
• रेशम विकास एवं विस्तार कार्यक्रम
• विदिशा इनोवेटिव योजना (सिरोंज/लहेरी)
• राजगढ़ रेशम परियोजना
• विदिशा रेशम परियोजना (नटेरन)
रेशम उत्पाद बिक्री एवं विपणन
रेशम के बेहतर विपणन हेतु आवश्यक है कि रेशम में बेहतरीन चमक, मुलायामपन और लचीलापन हो इसलिए रेशम का धागा बुनने हेतु तकली/चरखा श्रेष्ठ है क्योंकी इनसे बुनाई करने के लिए कोकून केक को नाम करना पड़ता है जिससे रेशम में उपरोक्त गुण उत्पन्न होते हैं। वस्त्र बाजार में रेशम अपनी मांग के अनुरूप उत्पादित नहीं हो पाता है, इसलिए रेशम का बाजार मूल्य काफी ऊँचा रहता है। साथ ही रेशमी उत्पाद का विदेशों में भी अच्छा बाजार होने से निर्यात के संभावनाएं काफी उज्ज्वल है।
कच्चा रेशम बनाने के लिए रेशम के कीटों का पालन सेरीकल्चर या रेशम कीट पालन कहलाता है। रेशम उत्पादन का आशय बड़ी मात्रा में रेशम प्राप्त करने के लिए रेशम उत्पादक जीवों का पालन करना होता है। इसने अब एक उद्योग का रूप ले लिया है। यह कृषि पर आधारित एक कुटीर उद्योग है। इसे बहुत कम कीमत पर ग्रामीण क्षेत्र में ही लगाया जा सकता है। कृषि कार्यों और अन्य घरेलू कार्यों के साथ इसे अपनाया जा सकता है। श्रम जनित होने के कारण इसमें विभिन्न स्तर पर रोजगार का सृजन भी होता है और सबसे बड़ी बात यह है कि यह उद्योग पर्यावरण के लिए मित्रवत है। अगर भारत की बात करें तो रेशम भारत में रचा बसा है। हजारों वर्षों से यह भारतीय संस्कृति और परंपरा का अंग बन चुका है। कोई भी अनुष्ठान किसी न किसी रूप में रेशम के उपयोग के बिना पूरा नहीं माना जाता। रेशम उत्पादन में भारत विश्व में चीन के बाद दूसरे नंबर पर आता है। रेशम के जितने भी प्रकार हैं, उन सभी का उत्पादन किसी न किसी भारतीय इलाके में अवश्य होता है। भारतीय बाजार में इसकी खपत काफी ज्यादा है। विशेषज्ञों के अनुसार रेशम उद्योग के विस्तार को देखते हुए इसमें रोजगार की काफी संभावनाएं हैं। फैशन उद्योग के काफी करीब होने के कारण उम्मीद की जा सकती है कि इसकी डिमांड में कमी नहीं आएगी। पिछले कुछ दशकों में भारत का रेशम उद्योग बढ़ कर जापान और पूर्व सोवियत संघ के देशों से भी ज्यादा हो गया है, जो कभी प्रमुख रेशम उत्पादक देश हुआ करते थे। भारत रेशम का बड़ा उपभोक्ता देश होने के साथ-साथ पांच किस्म के रेशम- मलबरी, टसर, ओक टसर, एरि और मूंगा सिल्क का उत्पादन करने वाला अकेला देश है। मूंगा रेशम के उत्पादन में भारत का एकाधिकार है। यह कृषि क्षेत्र की एकमात्र नकदी फसल है, जो 30 दिन के भीतर प्रतिफल प्रदान करती है। रेशम की इन किस्मों का उत्पादन मध्य और पूर्वोत्तर भारत के जनजातीय लोग करते हैं और यहां चीन से भी ज्यादा मलबरी कच्चा सिल्क और रेशमी वस्त्र बनता है। रेशम का मूल्य बहुत अधिक होता है और इसके उत्पादन की मात्रा बहुत ही कम होती है। विश्व के कुल कपड़ा उत्पादन का यह केवल 0.2 फीसदी ही है। रेशम आर्थिक महत्त्व का मूल्यवर्द्धित उत्पाद प्रदान करता है।
भूमिका:-
व्यक्ति रेशम उत्पादों के प्रति हमेशा जिज्ञासु रहा है । वस्त्रों की रानी के नाम से विख्यात रेशम विलासिता, मनोहरता, विशिष्टता एवं आराम का सूचक है । मानव जाति ने अद्वितीय आभा वाले इस झिलमिलाते वस्त्र को चीनी सम्राज्ञी शीलिंग टी द्वारा अपने चाय के प्याले में इसके पता लगने के काल से ही चाहा है यद्यपि इसे अन्य प्राकृतिक एवं बनावटी वस्त्रों की कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा, फिर भी शताब्दियों से वस्त्रों की रानी के रूप में विख्यात, इसने निर्विवाद रूप से अपना स्थान बनाए रखा है । प्राकृतिक आभा, रंगाई एवं जीवन्त रंगों के प्रति अंतर्निहित आकर्षण, उच्च अवशोषण क्षमता, हल्का, लचकदार एवं उत्कृष्ट वस्त्र-विन्यास जैसे श्रेष्ठ गुणों ने रेशम को विश्व मंर किसी सुअवसर का अत्यंत सम्मोहक एवं अपरिहार्य साथी बना दिया है ।
रेशम, रसायन की भाषा में रेशमकीट के रूप में विख्यात इल्ली द्वारा निकाले जाने वाले एक प्रोटीन से बना होता है । ये रेशमकीट कुछ विशेष खाद्य पौधों पर पलते हैं तथा अपने जीवन को बनाए रखने के लिए ‘सुरक्षा कवच’ के रूप में कोसों का निर्माण करते हैं । रेशमकीट का जीवन-चक्र 4 चरणों का होता है, अण्डा, इल्ली, प्यूपा तथा शलभ । व्यक्ति रेशम प्राप्त करने के लिए इसके जीवन-चक्र में कोसों के चरण पर अवरोध डालता है जिससे व्यावसायिक महत्व का अटूट तन्तु निकाला जाता है तथा इसका इस्तेमाल वस्त्र की बुनाई में किया जाता है ।
रेशम
का
उत्पादन क्यों ?
रेशम ऊंचे दाम किंतु कम मात्रा का एक उत्पाद हे जो विश्व के कुल वस्त्र उत्पा दन का मात्र 0.2% है । चूंकि रेशम उत्पादन एक श्रम आधारित उच्च आय देने वाला उद्योग है तथा इसके उत्पाद के अधिक मूल्य मिलते हैं, अत: इसे देश के आर्थिक विकास में एक महत्वकपूर्ण साधन समझा जाता है । विकासशील देशों में रोजगार सृजन हेतु खासतौर से ग्रामीण क्षेत्र में तथा विदेशी मुद्रा कमाने हेतु लोग इस उद्योग पर विश्वास करते हैं ।
रेशम
उत्पादन में भारत:-
विश्व में भौगोलिक दृष्टि से एशिया में रेशम का सर्वाधिक उत्पादन होता है जो विश्व के कुल उत्पाद का 95% है । यद्यपि विश्व के रेशम मानचित्र में 40 देश आते हैं, किंतु अधिक मात्रा में उत्पादन चीन एवं भारत में होता है तथा इसके उपरांत जापान, ब्राजील एवं कोरिया में । चीन, विश्व को इसकी आपूर्ति करने में अग्रणी रहा है ।
रेशम के सर्वाधिक उत्पादन में भारत द्वितीय स्थान पर है, साथ ही विश्व में भारत रेशम का सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है । यहां घरेलू रेशम बाजार की अपनी सशक्त परम्परा एवं संस्कृति है । भारत में शहतूत रेशम का उत्पादन मुख्यतया कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, जम्मू व कश्मीर तथा पश्चिम बंगाल में किया जाता है जबकि गैर-शहतूत रेशम का उत्पादन झारखण्ड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा तथा उत्तर-पूर्वी राज्यों में होता है ।
रेशम
की
किस्में-:
व्यावसायिक महत्व की कुल 5 रेशम किस्में होती हैं जो रेशमकीट की विभिन्न प्रजातियों से प्राप्त होती हैं तथा जो विभिन्न खाद्य पौधों पर पलते हैं । किस्में निम्न प्रकार की हैं :
रेशम उद्योग / रेशम उद्योग या सेरीकल्चर
रेशम उद्योग या सेरीकल्चर
1. परिचय
2. भूमिका
3. रेशम का उत्पादन क्यों ?
4. रेशम उत्पादन में भारत
5. रेशम की किस्में
6. रेशम उत्पादन क्या है?
7. रेशम उत्पादन के फायदे
8. भारत का रेशम उद्योग
9. बनारस की ज़री
10. बांध कर रंगाई करने की कला
11. उड़ीसा का ईकत
12. गुजरात का पटोला
13. बन्धेज का नृत्य प्रदर्शन
14. गुजरात की तनछुई
15. दक्षिण के मंदिर-क्षेत्र का रेशम
16. केन्द्रीय क्षेत्र योजना
17. झारखण्ड में रेशम उद्योग विभाग
18. छत्तीसगढ़ राज्य की भावी योजनायें
परिचय
कच्चा रेशम बनाने के लिए रेशम के कीटों का पालन सेरीकल्चर या रेशम कीट पालन कहलाता है। रेशम उत्पादन का आशय बड़ी मात्रा में रेशम प्राप्त करने के लिए रेशम उत्पादक जीवों का पालन करना होता है। इसने अब एक उद्योग का रूप ले लिया है। यह कृषि पर आधारित एक कुटीर उद्योग है। इसे बहुत कम कीमत पर ग्रामीण क्षेत्र में ही लगाया जा सकता है। कृषि कार्यों और अन्य घरेलू कार्यों के साथ इसे अपनाया जा सकता है। श्रम जनित होने के कारण इसमें विभिन्न स्तर पर रोजगार का सृजन भी होता है और सबसे बड़ी बात यह है कि यह उद्योग पर्यावरण के लिए मित्रवत है। अगर भारत की बात करें तो रेशम भारत में रचा बसा है। हजारों वर्षों से यह भारतीय संस्कृति और परंपरा का अंग बन चुका है। कोई भी अनुष्ठान किसी न किसी रूप में रेशम के उपयोग के बिना पूरा नहीं माना जाता। रेशम उत्पादन में भारत विश्व में चीन के बाद दूसरे नंबर पर आता है। रेशम के जितने भी प्रकार हैं, उन सभी का उत्पादन किसी न किसी भारतीय इलाके में अवश्य होता है। भारतीय बाजार में इसकी खपत काफी ज्यादा है। विशेषज्ञों के अनुसार रेशम उद्योग के विस्तार को देखते हुए इसमें रोजगार की काफी संभावनाएं हैं। फैशन उद्योग के काफी करीब होने के कारण उम्मीद की जा सकती है कि इसकी डिमांड में कमी नहीं आएगी। पिछले कुछ दशकों में भारत का रेशम उद्योग बढ़ कर जापान और पूर्व सोवियत संघ के देशों से भी ज्यादा हो गया है, जो कभी प्रमुख रेशम उत्पादक देश हुआ करते थे। भारत रेशम का बड़ा उपभोक्ता देश होने के साथ-साथ पांच किस्म के रेशम- मलबरी, टसर, ओक टसर, एरि और मूंगा सिल्क का उत्पादन करने वाला अकेला देश है। मूंगा रेशम के उत्पादन में भारत का एकाधिकार है। यह कृषि क्षेत्र की एकमात्र नकदी फसल है, जो 30 दिन के भीतर प्रतिफल प्रदान करती है। रेशम की इन किस्मों का उत्पादन मध्य और पूर्वोत्तर भारत के जनजातीय लोग करते हैं और यहां चीन से भी ज्यादा मलबरी कच्चा सिल्क और रेशमी वस्त्र बनता है। रेशम का मूल्य बहुत अधिक होता है और इसके उत्पादन की मात्रा बहुत ही कम होती है। विश्व के कुल कपड़ा उत्पादन का यह केवल 0.2 फीसदी ही है। रेशम आर्थिक महत्त्व का मूल्यवर्द्धित उत्पाद प्रदान करता है।
व्यक्ति रेशम उत्पादों के प्रति हमेशा जिज्ञासु रहा है । वस्त्रों की रानी के नाम से विख्यात रेशम विलासिता, मनोहरता, विशिष्टता एवं आराम का सूचक है । मानव जाति ने अद्वितीय आभा वाले इस झिलमिलाते वस्त्र को चीनी सम्राज्ञी शीलिंग टी द्वारा अपने चाय के प्याले में इसके पता लगने के काल से ही चाहा है यद्यपि इसे अन्य प्राकृतिक एवं बनावटी वस्त्रों की कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा, फिर भी शताब्दियों से वस्त्रों की रानी के रूप में विख्यात, इसने निर्विवाद रूप से अपना स्थान बनाए रखा है । प्राकृतिक आभा, रंगाई एवं जीवन्त रंगों के प्रति अंतर्निहित आकर्षण, उच्च अवशोषण क्षमता, हल्का, लचकदार एवं उत्कृष्ट वस्त्र-विन्यास जैसे श्रेष्ठ गुणों ने रेशम को विश्व मंड किसी सुअवसर का अत्यंत सम्मोहक एवं अपरिहार्य साथी बना दिया है ।
रेशम, रसायन की भाषा में रेशमकीट के रूप में विख्यात इल्ली द्वारा निकाले जाने वाले एक प्रोटीन से बना होता है । ये रेशमकीट कुछ विशेष खाद्य पौधों पर पलते हैं तथा अपने जीवन को बनाए रखने के लिए ‘सुरक्षा कवच’ के रूप में कोसों का निर्माण करते हैं । रेशमकीट का जीवन-चक्र 4 चरणों का होता है, अण्डा, इल्ली, प्यूपा तथा शलभ । व्यक्ति रेशम प्राप्त करने के लिए इसके जीवन-चक्र में कोसों के चरण पर अवरोध डालता है जिससे व्यावसायिक महत्व का अटूट तन्तु निकाला जाता है तथा इसका इस्तेमाल वस्त्र की बुनाई में किया जाता है ।
रेशम का उत्पादन क्यों ?
रेशम ऊंचे दाम किंतु कम मात्रा का एक उत्पाद हे जो विश्व के कुल वस्त्र उत्पा दन का मात्र 0.2% है । चूंकि रेशम उत्पादन एक श्रम आधारित उच्च आय देने वाला उद्योग है तथा इसके उत्पाद के अधिक मूल्य मिलते हैं, अत: इसे देश के आर्थिक विकास में एक महत्वकपूर्ण साधन समझा जाता है । विकासशील देशों में रोजगार सृजन हेतु खासतौर से ग्रामीण क्षेत्र में तथा विदेशी मुद्रा कमाने हेतु लोग इस उद्योग पर विश्वास करते हैं ।
रेशम उत्पादन में भारत
विश्व में भौगोलिक दृष्टि से एशिया में रेशम का सर्वाधिक उत्पादन होता है जो विश्व के कुल उत्पाद का 95% है । यद्यपि विश्व के रेशम मानचित्र में 40 देश आते हैं, किंतु अधिक मात्रा में उत्पादन चीन एवं भारत में होता है तथा इसके उपरांत जापान, ब्राजील एवं कोरिया में । चीन, विश्व को इसकी आपूर्ति करने में अग्रणी रहा है ।
रेशम के सर्वाधिक उत्पादन में भारत द्वितीय स्थान पर है, साथ ही विश्व में भारत रेशम का सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है । यहां घरेलू रेशम बाजार की अपनी सशक्त परम्परा एवं संस्कृति है । भारत में शहतूत रेशम का उत्पादन मुख्यतया कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, जम्मू व कश्मीर तथा पश्चिम बंगाल में किया जाता है जबकि गैर-शहतूत रेशम का उत्पादन झारखण्ड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा तथा उत्तर-पूर्वी राज्यों में होता है ।
रेशम की किस्में
व्यावसायिक महत्व की कुल 5 रेशम किस्में होती हैं जो रेशमकीट की विभिन्न प्रजातियों से प्राप्त होती हैं तथा जो विभिन्न खाद्य पौधों पर पलते हैं । किस्में निम्न प्रकार की हैं :
• शहतूत
• ओक तसर एवं उष्णकटिबंधीय तसर
• मूंगा
• एरी
विश्व के वाणिज्यिक रूप में लाभ उठाए जाने सेरिसिजीनस कीट एवं उनके खाद्य पौध
सामान्य नाम वैज्ञानिक नाम मूल स्थान प्राथमिक खाद्य पौध
शहतूत रेशमकीट बोम्बिक्स मोरी चीन मोरस इंडिका
एम.अल्बा
एम.मल्टीकॉलिस
एम.बोम्बिसिस
उष्णकटिबंधीय तसर रेशमकीट एन्थीटरिया माइलिट्टा भारत शोरिया रोबस्टा
टेर्मिनेलिया टोमेन्टोसा
टी.अर्जुन
ओक तसर रेशमकीट एन्थीररिया प्रॉयली भारत क्युरकस इनकाना
क्यू. सेराट्टा
क्यू. हिमालयना
क्यू. ल्यूको ट्राइकोफोरा
क्यू. सेमीकार्पिफोलिया
क्यू. ग्रिफ्ती
ओक तसर रेशमकीट एन्थीररिया फ्रिथी भारत क्यू. डीलाडाटा
ओक तसर रेशमकीट एन्थीररिया कॉम्प्टा भारत क्यू. डीलडाटा
ओक तसर रेशमकीट एन्थीररिया पेर्निल चीन क्यू. डेनडाटा
ओक तसर रेशमकीट एन्थीररिया यमामाई जापान क्यू. एकयूटिसिमा
मूगा रेशमकीट एन्थीररिया असामा भारत लिटसिया पोलियन्ता
एल. सिट्राटा
मेशिलस बोम्बिसाईन
एरी रेशमकीट फिलोसामिया रिसिनी भारत रिसिनस कम्यूनिस
मणिहॉट यूटिलिस्मा
इवोडिया फ्राग्रेन्स
शहतूत के अलावा रेशम के अन्य गैर-शहतूती किस्मों को सामान्य रूप में वन्या कहा जाता है । भारत को इन सभी प्रकार के वाणिज्यिक रेशम का उत्पामदन करने का गौरव प्राप्त है ।
रेशम उत्पादन क्या है?
रेशम उत्पाददन एक कृषि आधारित उद्योग है । इसमें कच्चे रेशम के उत्पादन हेतु रेशमकीट पालन किया जाता है । कच्चा रेशम एक धागा होता है जिसे कुछ विशेष कीटों द्वारा कते कोसों से प्राप्त किया जाता है । रेशम उत्पादन के मुख्य कार्य-कलापों में रेशम कीटों के आहार के लिए खाद्य पौध कृषि तथा कीटों द्वारा बुने हुए कोसों से रेशम तंतु निकालने, इसे संसाधित करने तथा बुनाई आदि की प्रक्रिया सन्निहित है ।
रेशम उत्पादन के फायदे
• रोज़गार की पर्याप्त क्षमता
• ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार
• कम समय में अधिक आय
• महिलाओं के अनुकूल व्यवसाय
• समाज के कमज़ोर वर्ग के लिए आदर्श कार्यक्रम
• पारि – अनुकूल कार्यकलाप
• समानता संबंधी मुद्दों की पूर्ति
भारत का रेशम उद्योग
रेशम, भारतीय जीवन एवं संस्कृति से जुड़ा हुआ है । यद्यपि भारत में सभी प्रकार के रेशम वस्त्र जैसे ड्रेस मैटिरियल, स्कार्फ/स्टोल, बने बनाए वस्त्र आदि तैयार किए जाते हैं किंतु रेशम की साडियां इन सबमें अनोखी है । साड़ी मानो रेशम का पर्याय-सा हो गया है । प्राचीन काल से यह भारतीय नारी का परंपरागत पहनावा है । भारतीय साहित्य में इसके असंख्य उल्लेख हैं और इसे पहनने की शैली में समय, क्षेत्र एवं व्यक्तिगत भिन्नता है । भारत की रेशमी साड़ियां देश के बुनकरों की शिल्पकारिता का ज्वलंत उदाहरण है ।
भारतीय बुनकरों की कलात्मकता एवं सौंदर्यबोध केवल रंगों तक ही सीमित नहीं है अपितु इसमें वनस्पतीय डिजाइन, सुंदर बुनावट, ज्यामिति टिकाऊपन का कार्य भी निहित है । बुनकर न केवल सूत बुनता है बल्कि उसमें उसकी संवेदना तथा भाव भी शामिल होता है । भारत के अनेकों रेशम बुनाई केन्द्र अपनी श्रेष्ठ तथा विशिष्ट शैली एवं उत्पादों के लिए प्रख्यात हैं । भारतीय महिलाओं के लिए तो रेशम जैसे स्पर्श-मणि हो । रेशम बुनाई में क्षेत्र विशेष की जीवन रीतियां तथा संस्कृति अभिव्यक्त होती है । भारतीय महाद्वीप के कारीगर अपने-अपने ढंग से साड़ियों को बुनने में भावपरक डिजाइन, रंग एवं अपनी प्रतिभा को समाहित करते हुए कुशलता प्रदर्शित करने का भरपूर प्रयास करते हैं । बुनकर की रूचि के अनुसार प्रत्येक साड़ियों की डिजाइन अलग-अलग होती है । इस तरह इसमें असंख्य पैटर्न अथवा विविधता होती है । विशिष्ट डिज़ाइन एवं बुनाई के चलते कुछ केन्द्र अपना विशेष स्थान बना लिए हैं । भारत के विख्यात रेशम केन्द्र निम्ना हैं :-
राज्य रेशम केन्द्र
1 आंध्र प्रदेश धरमावरम्, पोचमपल्ली, वेंकटगिरि, नारायण पेट
2 असम सुआलकुची
3 बिहार भागलपुर
4 गुजरात सूरत, कामबे
5 जम्मू व कश्मीर श्रीनगर
6 कर्नाटक बेंगलूर, आनेकल, इलकल, मोलकालपुरु,मेलकोटे,कोल्लेगाल
7 छत्तीसगढ़ चम्पा, चंदेरी, रायगढ़
8 महाराष्ट्र पैथान
9 तमिलनाडु कांचीपुरम, अरनी, सेलम, कुंबकोणम, तंजाउर
10 उत्तर प्रदेश वाराणसी
11 पश्चिम बंगाल बिष्णुपुर, मुर्शिदाबाद, बीरभूम
बनारस की ज़री
पवित्र गंगा नदी के किनारे स्थित वाराणसी, अपनी सुंदर रेशम साड़ियों एवं ज़री के लिए प्रख्यात है । ये साड़ियां हल्के रंग पर पत्ती, फूल, फल, पक्षी आदि की घनी बुनाई वाली डिज़ाइन के लिए प्रसिद्ध हैं । इन साड़ियों में क्लिष्ट बार्डर तथा अच्छी तरह का सजा पल्लू होता है । यह स्थान गाँज़ी चांदी तथा सोने के तारों से बुनी हल्की साड़ियों के लिए भी विख्यात है । बनारस का कमखाब एक पौराणिक परिधान है । इसमें सोने तथा चांदी के धागों की सुनहरी बुनावट होती है । शुद्ध रेशम में सोने की कारीगरी को बाफ्ता कहते हैं और रंग-बिरंगे रेशम में महीन ज़री को आमरु।
बांध कर रंगाई करने की कला
भारत में अवरोध रंगाई की तकनीकी सदियों से चली आ रही है । इस तकनीक की मुख्य दो परंपराएं है । पटोला अथवा ईकत तकनीक में धागों को बांधकर अवरोध-रंगाई की जाती है । बंधेज अथवा बंधिनी में वस्त्रों की रंगाई की जाती है ।
उड़ीसा का ईकत
उड़ीसा में बांधकर रंगाई करने एवं बुनने को ईकत के नाम से जाना जाता है जिसमें ताने एवं बाने को बांधकर अवरोध करते हुए रंगों को विकीर्ण किया जाता है । इस पद्धति की समग्र प्रस्तुति ब्रश की रंगाई जैसी प्रतीत होती है । ईकत की इस बुनाई में शहतूत एवं तसर दोनों इस्तेमाल में लाया जाता है ।
गुजरात का पटोला
पटोला अपनी सूक्ष्मता, बारीकी एवं सौंन्दर्य के लिए प्रसिद्ध है । इसमें पांच या छह पारम्परिक रंगों जैसे लाल, जामुनी, नीला, हरा, काला या पीला के साथ अवरोध विधि से ताने एवं बाने को रंगा जाता है तथा बेहतरीन रंग एवं आकृति के धरातल पर ज्यामिति शैली की पूर्णता के साथ पक्षी, पुष्प, पशु, नर्तक-नर्तकी आदि का सौन्दर्य उभारा जाता है ।
तनछुई ज़री का नामकरण 3 पारसी भाइयों जिन्हें छुई के नाम से जाना जाता है, के नाम पर हुआ जिन्होंने इस कला को चीन में सीखा तथा सूरत में इसे प्रदर्शित किया । तनछुई ज़री में सामान्यतया गाढ़ी साटिन बुनाई, धरातल में बैंगनी या गाढ़ा रंग तथा पूरी डिज़ाइन में पुष्प, लता, पक्षी आदि का मूल भाव होता है ।
दक्षिण के मंदिर-क्षेत्र का रेशम
दक्षिण भारत, देश में रेशम उत्पादन के क्षेत्र में अग्रणी है तथा कांचीपुरम, धर्मावरम, आर्नी आदि की बुनाई के लिए प्रसिद्ध है । कांचीपुरम मंदिर-नगर के रूप में विख्यात है तथा यहां चाँदी अथवा सोने की ज़री के साथ चमकीले रंग की भारी साड़ियां महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं, बेंगलूर तथा मैसूर उत्कृष्ट प्रिन्टेड रेशम के केन्द्र के रूप में जाने जाते हैं ।
हथकरघे पर बुनी हुई पारंपरिक साड़ियां बुनावट एवं डिज़ाइन की समृद्धि के लिए अलग ही स्थान रखती हैं जो सौन्दर्य एवं गुण में हमारे पुरातन गौरव को प्रतिष्ठित करती हैं । हथकरघे की बुनाई जीवन्त कला का बहुमुखी एवं सृजनात्मक प्रतीक है । आज, भारतीय रेशम खास तौर से हथकरघा उत्पादों के क्षेत्र में उत्कृष्ट तो है ही, साथ ही विश्वसनीय भी ।
केन्द्रीय क्षेत्र योजना
केन्द्रीय रेशम बोर्ड देश में रेशम उत्पादन एवं रेशम उद्योग के विकास के लिए 1948 के दौरान गठित एक सांविधिक निकाय है । केरेबो के अधिदेशित क्रियाकलाप हैं :
अनुसंधान व विकास, एवं अनुसंधान विस्तार,चार स्तरीय रेशमकीट बीज उत्पादन नेटवर्क का रखरखाव,वाणिज्यिक रेशमकीट बीज उत्पादन में नेतृत्व की भूमिका निभाना,विभिन्न उत्पादन प्रक्रियाओं का मानकीकरण एवं गुणवत्ता प्राचलों की शिक्षा,घरेलू एवं अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में भारतीय रेशम का उन्नयन तथा रेशम उत्पादन एवं रेशम उद्योग से संबंधित सभी नीतिगत मामलों पर संघ सरकार को सलाह देना ।
केन्द्रीय रेशम बोर्ड की ये अधिदेशित गतिविधियाँ 3 केन्द्रीय क्षेत्र योजनाओं के अंतर्गत विभिन्न राज्यों में स्थित केरेबो की 300 इकाइयों द्वारा की जा रही हैं । नौवीं योजना तक इन गतिविधियों को केरेबो के नियमित "कार्यक्रम" के रूप में की गई थी । दसवीं योजना के दौरान, केरेबो के इन नियमित कार्यक्रमों को अधिदेशित कार्य जिसके लिए वित्त व्यय समिति का अनुमोदन प्राप्त है, की प्रकृति एवं लक्ष्य पर आधारित तीन "केन्द्र क्षेत्र योजना" के रूप में समूहित किया गया ।
नौवीं योजना से आगे, केरेबो ने प्रौद्योगिकी, अपने अनुसंधान एवं विकास इकाइयों द्वारा विकसित अभिनव परिवर्तन में ताल-मेल बैठाने एवं प्रचार-प्रसार तथा उत्पादन, उत्पादकता एवं रेशम की गुणवत्ता में वृद्धि के लक्ष्य के साथ केन्द्र प्रत्योजित योजना [उविका] का कार्यान्वयन किया । उविका, क्षेत्र में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण का प्रभावी साधन रहा है । यद्यपि, यह योजना राज्यों के माध्यम से कार्यान्वित की जाती है, इसके कार्यान्वयन के लिए तकनीकी निवेश प्रदान करने के अतिरिक्त केरेबो की श्रमशक्ति बृहत् रूप में कार्यक्रम की तैयारी, मूल्यांकन, प्रचलन एवं अनुश्रवण में तैनात की जाती है ।
वर्ष 2015-16 के दौरान 14वीं वित्तीय आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर भारत सरकार ने संघ कर राजस्व की निवल प्राप्ति में राज्य के हिस्से को 32 से 42% तक बढ़ाई है । राज्य सरकार के लिए अधिक निधि के बहाव के कारण संघ सरकार ने अधिकतम केन्द्र प्रायोजित योजनाओं को बंद करने का निर्णय लिया है । तदनुसार, भारत सरकार ने वर्ष 2015-16 से केन्द्र प्रायोजित योजना के रूप में उत्प्रेरक विकास कार्यक्रम का कार्यान्वयन बंद करने का निर्णय लिया है ।
उपरोक्त सभी केन्द्र क्षेत्र योजनाएँ संगठित रूप में एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और इसका लक्ष्य देश में रेशम की गुणवत्ता एवं उत्पादकता बढाना है, इससे पणधारियों की आय में वृद्धि लाना है । अत: नस्ल, बीज, कोसोत्तर प्रौद्योगिकी एवं क्षमता विकास जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में हस्तक्षेप पर ध्यान केन्द्रित करते हुए इन सभी योजनाओं को एक योजना नामत: “रेशम उद्योग के विकास के लिए समग्र योजना” के अंतर्गत लाने का प्रस्ताव है । गुणवत्ता एवं उत्पादकता में सुधार पर स्पष्ट प्रभाव के लिए कुछ उविका घटकों को चालू अनुसंधान व विकास एवं केन्द्र क्षेत्र के बीज योजनाओं में मिलाया गया है ।
झारखण्ड में रेशम उद्योग विभाग
केंद्रीय तसर अनुसंधान व प्रशिक्षण संस्थान राँची, तसर रेशम उद्योग में बुनियादी एवं व्यावहारिक अनुसंधान, प्रसार एवं प्रौद्योगिकी स्थानांतरण एवं प्रशिक्षित श्रमशक्ति के सृजन के माध्यम से तसर उद्योग को संगठित एवं विकसित करने हेतु इस संस्थान को राष्ट्रीय संस्थान के रूप में सेवारत् रहने का दायित्व दिया गया है। इसे पूरा करने हेतु संस्थान में निम्नलिखित गतिविधियां संचालित की जाती हैं।
प्रमुख गतिविधियाँ
तसर भोज्य पौधों एवं रेशमकीट के उत्पादन में सुधार व वृद्धि हेतु मौलिक एवं व्यावहारिक अनुसंधान करना तथा उत्तम धागा तथा वस्त्रों के संसाधन प्रक्रिया में गुणवत्ता लाने तथा उत्पादन दर बढ़ाने हेतु कोसोत्तर पहलुओं पर कार्य करना।
उन्नत रेशम कीटपालन, कोसा परिरक्षण एवं बीज उत्पादन हेतु नवीन तकनीकों का विकास।
भोज्य़ पौधों एवं रेशमकीट के पीड़कों तथा रोगों के नियंत्रण के लिए प्रौद्योगिकियों का विकास।
प्रजनक स्टॉक का विकास, रखरखाव एवं आपूर्ति।
विभिन्न प्रसार कार्यक्रमों के आयोजन एवं वाणिज्यीकरण के माध्यम से विकसित प्रौद्योगिकियों का प्रदर्शन एवं प्रसार।
छत्तीसगढ़ राज्य की भावी योजनायें
जिले में तसर रेशम विकास में नई गति देने के लिए निरंतर प्रयास किया जा रहा है। वर्तमान में जशपुर जिले का तसर का सकल ककून उत्पादन लगभग 1|30 करोड़ है इससे लगभग 13 मेट्रिक टन यार्न की आपूर्ति प्रदेश के बुनकरों को होती है। इसे विजन 2020 के तहत इस साल 2 करोड़ करने का लक्ष्य रखा गया है। रेशम विभाग इस साल 350 हेक्टेयर में रेशम पालन के लिए पौधों का रोपण करेगा। जिले के 20 स्थानों पर 14 लाख पौधे नर्सरी में तैयार हो गए हैं। वृक्षारोपण का कार्य 1 अगस्त से वृहद रूप से शुरू होगा।
तसर रेशम को बढ़ावा देने के लिये जिले में विजन-2020 के तहत आगामी 5 वर्षों में 80 मेट्रिक टन यार्न की आपूर्ति प्रदेश में किया जाना है । इसके लिए विस्तृत कार्ययोजना तैयार कर लिया गया है। इस वर्ष फरसाबहार, दुलदुला, बगीचा, कुनकुरी, कांसाबेल विकास खण्ड में 20 क्लस्टर में नर्सरी में 14 लाख पौधे तैयार किए गए हैं। 2020 तक 10 करोड़ ककून उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। कार्ययोजना के तहत मौजूदा 1393 हेक्टेयर उपलब्ध पौधारोपण को बढ़ाकर 2600 हेक्टेयर तक बढ़ाया जाएगा ।
विजन 2020 के अंतर्गत इस वर्ष 350 हेक्टेयर राजस्व एवं वन क्षेत्र में तसर वृक्ष साजा एवं अर्जुन का रोपण किया जाएगा तथा जिले में विपुल पैमाने पर उपलब्ध 400 हेक्टेयर नैसर्गिक साल वनों में 20 क्लस्टरों में तसर रेशम कीट के अंडे छोड़े जाएंगे जहां इन कीटों से प्राकृतिक रूप से बिना किसी मानव हस्तक्षेप से तसर के ककून तैयार होगे । इन कोसा का संग्रहण स्थानीय जनजाति परिवार रेशम एवं वन विभाग के सहयोग से करेंगे। आगामी 5 वर्षों में एवं उसके बाद लगभग 15000 परिवार प्रति वर्ष लाभान्वित होंगे।वर्तमान में फरसाबहार विकासखंड के सिंगी बहार, केरसई, कुनकुरी विकासखंड के कुंजारा, कांसाबेल विकासखंड के डूंगरगांव और बगीचा विकासखंड के भितघरा में मोटोराईज्ड कम आपरेटिंग तसर धागाकरण इकाई स्थापित है। वर्तमान में छत्तीसगढ़ देश के झारखण्ड राज्य के बाद सर्वाधिक तसर उत्पादक राज्य है । विजन-2020 में झारखण्ड राज्य में अपनाई जा रहे कार्यक्रमों एवं उनके अनुभवों का भी क्रियान्वयन में समावेश किया जाएगा ।
रेशम की खेती
रेशम कैसे तैयार किया जाता है?
रेशमी धागा बनाने के लिए सबसे पहले रेशम के कीड़ों के लार्वा को एक ख़ास ट्रे में नियंत्रित तापमान और नमी वाले कमरे में रखा जाता है.
उन्हें नियमित रूप से मल्बेरी के पत्ते खिलाये जाते हैं.
एक ख़ास वक्त पर ये लार्वा कोकून कही जानेवाली परत (यानी खोल) धारण कर लेते हैं.
मल्बेरी की 1 एकड़ की खेती से एक साल में औसतन 240 किलोग्राम कोकून तैयार होते हैं.
चरखे या मशीन का इस्तेमाल कर कोकून से धागा बनाया जाता है और फिर आगे की प्रोसेसिंग के साथ इन्हें कपड़ों में ढाला जाता है.
ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ावा दिया जाए तो देश में रेशम की खेती का धंधा काफी फल फूल सकता है.
वैसे तो रेशम पैदा करने वाले कीड़ों की और भी किस्में हैं लेकिन दुनिया में रेशम का करीब 95 फीसदी उत्पादन मल्बेरी सिल्कवर्म से होता है.
पश्चिम बंगाल के मालदा और मुर्शिदाबाद और बिहार का भागलपुर देश में सिल्क के उत्पादन के लिए मशहूर हैं.
रेशम उद्योग में रोज़गार
देश में सालाना हज़ार करोड़ रूपए से ज्यादा के सिल्क यानी रेशम का उत्पादन होता है. इस कारोबार में करीब 27 लाख लोग लगे हैं जिनमें से आधी से ज्यादा तादाद महिलाओं की है.
रेशम के कपड़ो के निर्यात का कारोबार भी बहुत बड़ा है. बेहद महंगे माने जाने वाले रेशम का उत्पादन देश में आज भी ज़्यादातर पारम्परिक तरीके से ही होता है.
रेशम कीट पालन
भारतीय रेशम कीट पालन फार्म चार प्रकार के रेशम मलबरी (शहतूश), टसर, इरी और मूगा का उत्पाीदन करते हैं जिसमें से शहतूश रेशम देश के कुल रेशम उत्पा दन का 90 प्रतिशत होता है। वर्षा वाले क्षेत्रों में शहतूश 160-130 डिग्री सेल्सियस के तापमान वाले स्थािनों पर 7.6 X 7.6 सेमी. की दूरी पर लगाए जाते हैं। बाम्बेिक्स मोरी नामक रेशम के कीड़े को वर्षभर पाला जाता है। रेशम के कीड़े का कुल जीवन काल 50 दिन का होता है। लार्वा अवधि के पश्चा त् रेशम का कीड़ा मुंह से रेशम निकालता है और पाड़ बांधने पर कूकून बनाता हैं। वर्षा की दशाओं में भारत में कूकून का औसत वार्षिक उत्पा दन कम से कम 150 किग्रा. और सिंचित परिस्थितियों में 400 किग्रा. हैं। कूकून को गर्म पानी में पकाकर कूकून से रेशम को अलग किया जाता हैं।
देश में 60 लाख से भी अधिक लोग विभिन्नथ रेशम कीट पालन कार्यकलापों(बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं) में लगे हुए हैं। कर्नाटक उन अग्रणी राज्योंर में से है जहां पर रेशम कीट पालन का कार्य होता है। धारवाड़ और टुमकुर जिले सर्वाधिक प्रसिद्ध रेशम उत्पाशदक जिले हैं क्योंहकि वहां की जलवायु एकदम उपार्द्र से लेकर सूखा अर्द्धशुष्क है। यहां रेशम कीट पालन के दो चरण हैं। पहले चरण में शहतूश के बाग लगाए जाते हैं क्यों कि रेशम के कीड़ों के लिए शहतूश की पत्तियां एकमात्र भोजन होता है। दूसरा चरण होता है 70-80 प्रतिशत की आर्द्रता और 27 डिग्री सेल्सियस तापमान वाली विशिष्टह जलवायु दशाओं को सुनिश्चित करने के लिए शेड का निर्माण करना। अंडे से कूकून बनाने की प्रक्रिया में एक माह का समय लगता है। कर्नाटक में रेशम कीट पालन में नर्सरी बनाना, वर्षा जल संचयन, निषेचन (इन्यूरेश बेशन), ब्लैषक बाक्सिंग, बायोमास ट्रेंच सिस्टथम और वर्मिकंपोस्टिंग (कृमि खाद तैयार करना) की महत्त्व पूर्ण भूमिका हैं।
केन्द्रीय रेशम कीट पालन अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थाहन(Eबाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं), कर्नाटक के मैसूर शहर में स्थित है। यह रेशम कीट पालन के क्षेत्र में अग्रणी अनुसंधान संस्था न है। यह नई प्रौद्योगिकियों का विकास करने, अनुसंधान करने, कार्मिकों को प्रशिक्षण देने और रेशम तंत्र की जांच करने के लिए उत्तरदायी है। केन्द्री य रेशम बोर्ड(बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं) भी कर्नाटक राज्य में स्थित हैं।
भारत में असम(पीडीएफ फाइल जो नई विंडों में खुलती है) दूसरा प्रमुख रेशम उत्पाेदक है। राज्यड में सुआलकुची रेशम उत्पाोदन और बुनाई का सबसे बड़ा केन्द्रस है। मूगा और इरी रेशम उत्पासदित किए जाने वाले रेशम की प्रमुख किस्मेंन हैं। शहतूश और ओक टसर का भी सीमित मात्रा में उत्पाकदन होता है। देश में अन्य् रेशम उत्पा दक राज्या आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु हैं।
देश में रेशम कीट पालकों द्वारा उपयोग की जा रही कुछ प्रमुख रेशम कीटपालन प्रौद्योगिकियां(बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं) निम्नग हैं:
1. शहतूश सुधार
i. सिंचित दशाओं के लिए किस्मेंइ
i. एस-36 - यह किस्मन 1986 में आई थी। इससे 45 एमटी/एचए/प्रति वर्ष उत्पा्दन होता हैं।
ii. वी-1 - यह किस्मन 1997 में जारी की गई थी। यह लगभग 60 एमटी/एचए/प्रतिवर्ष उत्पाकदन करती है।
iii. जीनोटाइप सं. 2 - जीनोटाइप युवा रेशम कीटों के पालन हेतु विशिष्ट बाग तैयार करने के लिए उचित है। इससे एस-36 की तुलना में 35 प्रतिशत अधिक चौकी पत्ती का उत्पासदन होता है।
iv. जीनोटाइप सं. 4 - सिंचित वातावरण में पैदावार हेतु विकसित किया गया है। यह विकसित हो चुके रेशम के कीड़ों के पालन के लिए सर्वाधिक उपयुक्तत है।
ii. वर्षा वाली दशाओ हेतु किस्में
i. एस-13 और एस-34 - यह 1990 में जारी की गई थी और इससे 10-12 एमटी/एसए/ प्रति वर्ष का उत्पाादन होता है।
ii. एआर-10 - यह 2001 में विकसित किया गया था और 9.28 एमटी/एचए/ प्रति वर्ष का उत्पा1दन करता है।
iii. क्षारीय दशाओं हेतु किस्मेंव
i. एआर-12 - यह किस्म् 2001 में क्षारीय मिट्टी (पीएच 8.5-9.2 और 0.32 से 0.84 एमएमएचओ/सेमी. की विद्युत संचालकता) में पैदावार हेतु विकसित किया गया था और यह 16.29 एमटी/एचए/ प्रतिवर्ष पत्ती का उत्पायदन करता है।
iv. नारियल के साथ मिश्रित खेती के लिए छाया सहिष्णुद किस्म/
i. कण्वय-2 x कोसेन - 2001 में विकसित किया गया, यह कण्वै-2 जिससे 28.5 एमटी/एचए/ वर्ष पत्ती का उत्पा1दन होता है, की तुलना में लगभग 44 एमटी/एचए/वर्ष का उत्पापदन होता है।
शहतूश की खेती
. ड्रिप सिंचाई प्रणाली - इस प्रणाली से पत्ती उत्पाादन को नकारात्मकक रूप से प्रभावित किए बगैर सतह सिंचाई की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत अधिक पानी की बचत होती है।
i. शहतूश की खेती में पीएसबी का उपयोग - फास्फेिट विलेयक जीवणु यह सुनिश्चित करता है कि किसानों द्वारा शहतूश की खेती में मंहगे एसएसपी की बजाय रॉक फास्फेकट का उपयोग किया जाए। इसमें लगभग 1745/एचए/वर्ष फास्फेउटिक उर्वरक की निवल बचत होती है।
ii. वर्मीकम्पोकस्टिंग (कृमि खाद तैयार करना) - इसके परिणाम स्विरूप जैव खाद में आत्मवनिर्भरता बढती है और रसायनिक उर्वरकों पर कम निर्भरता रहती है।
iii. चावकी बाग प्रौद्योगिकी - चार-प्लानट माड्यूल के अंतर्गत एक वर्ष में 32 बैचों में चौकी पालन किया जा सकता है। इससे 500 डीएफएलएस प्रति बैच के आधे एकड़ के प्रत्येकक प्ला-ट से वर्ष में आठ फसलों की बुवाई संभव है।
iv. पौधे रोपने की युग्मह पंक्ति प्रणाली - इससे अंतर-सांस्कृ्तिक प्रचालनों में कम जनशक्ति का उपयोग होता है। कीटाणुओं और रोगों में कमी से पत्ती की गुणवत्ता बढती है।
v. शहतूश की अंतर खेती - इससे किसान की आय बढती है। लघु अवधि की मौसमी फसलों विशेष रूप से पत्तेदार सब्जियों की संस्तुीति की जाती है।
शहतूश संरक्षा
. बायोनेमा - रूटनॉट रोग के नियंत्रण हेतु बायोनेमेटिसाइड।
i. रक्षा - रूटरॉट रोग के नियंत्रण हेतु उपयोग किए जाने वाला जैव फफूंदीनाशक (बयोफगीसाइड)
ii. नर्सरी गार्ड - नर्सरी में होने वाले अन्यप रोगों से बचाव हेतु जैव फफूंदीनाशक (बायोफंगीसाइड)
iii. शहतूश के पत्ते संबंधी रोगों का प्रबंधन
i. लीफ स्पॉ ट (सर्कोस्पोनरा मोरीकोला) - 0.2 प्रतिशत बैविस्टिन (कार्वेनडैजिम 50 प्रतिशत डब्यूने पी) का फोलियर स्प्रे ।
ii. पाउडरी माईल्ड0यू (फाइलैक्टीानिया कोरिल्या ) - 0.2 प्रतिशत बैविस्टिन/कराथेन (डाइनोकैप 30 पतिशत ईसी) का फोलियर स्प्रे ।
iii. लीफ रस्टक (सेरोटीलियम फिकी) - पत्तों की लवनी में अधिक अंतर रखना और देर न करना। साथ ही, 0.2 प्रतिशत कवच (क्लो रोथेलेब्लि 75 प्रतिशत डब्ल्ीयूपी) का फोलियर स्प्रे ।
iv. बैक्टीररियल ब्ला इट (स्यू)डोमोनस सिरिन्गेो पीवी मोरी/जैन्थो मोनस कम्पेऔस्ट्री स पीवी मोरी) - अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में वर्षा के मौसम के दौरान छटाई (जमीन से 30 सेमी ऊपर) छंटाई को बढाता है। 2-3 दिन की सुरक्षित अवधि के भीतर 0.2 प्रतिशत स्ट्रे प्टो मायसिन अथवा डाइथेन एम-45 (मैंकोजब 75 प्रतिश डब्यूधिकपी) भी स्प्रे करें।
iv. शहतूश में टुकरा के कारक मीली बग के लिए आईपीएम - आईपीएम टुकरा होने को 70 प्रतिशत तक रोकता है।
रेशम की कीड़े में सुधार
. बाइवोल्टा इन संकर
i. सीएसआर2 x सीएसआर4 - यह एक उत्पाेदक संकर है। एक संकर की प्रमुख विशेषताएं होती हैं - उच्च- कूकून शैल की सामग्री (24-25 प्रतिशत), कच्चे रेशम की प्राप्ति (19-20 प्रतिशत) और अंतराष्ट्री य ग्रेड (3ए-4ए) सहित 74.6 किग्रा./100 डीएफटीएस का औसत उत्पा9दन।
ii. सीएसआर18 x सीएसआर19 - यह बड़ा संकर है। 3 लाख डीएफएलएस की जांच की गई। इनसे आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु राज्यह में गर्मी में भी 65-70 किग्रा. का औसत उत्पाकदन हुआ। 5.5 से 6.0 का औसत रेंडिटा और 2ए-3ए ग्रेड का रेशम खेत से प्राप्त हुआ है।
iii. दोहरे संकर - यह संकर उच्चक उर्वरता दशाते हैं और इसमें उत्तरजीविता 95 प्रतिशत से अधिक होती है और कच्चाक रेशम 20 प्रतिशत से अधिक होता है। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु के किसानों ने इसे व्यादपक रूप से स्वीसकार किया है। इनका औसत उत्पारदन लगभग 65-70 किग्र./100 डीएफएलएस है।
iv. जेन 3 x जेन 2 - यह संकर आण्विक चिहनक (मालीक्यू लर मार्कर) सहायित चयन की नई रणनीति के माध्याम से बनाया गया है जिसमें पोलीवाल्टािइन्सल से उच्चू कार्यशील एमायलेज जीन को उपजाऊ बाइवोल्टा इन प्रजनिक की जेनेटिक पृष्ठहभूमि में अंतरित किया जाता है। इस संकर ने 70,000 डीएफएलएस से अधिक के वितरण के माध्यंम से 64 कि.ग्रा/डीएफएलएस का औसत उत्पाधदन दर्ज किया है।
v. नंदी (एसएल) - सीएसआर2, सीएसआर8 - इन संकरों में लिंग सीमित नर अभिभावक शामिल होते हैं। इससे पी1 किसान केवल सफेद कूकून (नर) को ग्रेनेज को बेच सकते हैं और पीले कूकून (मादा) को रीलरों को बेचा जाता है।
i. मल्टीऔवोल्टा इन संकर
i. कावेरी: बीएल 67 x सीएसआर 101 - यह बहु द्वि (मल्टीर बाई) संकर है जो सिंचित क्षेत्रों के लिए हैं। यह 65-70 कि.ग्रा ।00 डीएफएलएस के औसत उत्पा दन सहित 6-6.5 चील्डै के रेडिंटा के साथ ए-2ए ग्रेड के रेशम का उत्पा(दन करता है।
रेशम कीट उत्पाचदन
. खुला (लूज) अंडा निषेचन फ्रेम - खुले अंडों के निषेचन के दौरान इष्टरतम पर्यावरणीय दशाएं उलब्धज कराना, इससे 90 प्रतिशत से अधिक निषेचन हो जाता है।
i. रोटरी माउन्टेधज - यह खराब कूकून और लोमक के प्रतिशत को कम करता है और कूकून की गुणवत्ता को सुधारता है। इसके परिणामस्वऔरूप रील बनाने की अधिक क्षमता और अच्छे ग्रेड (2 ए - 3 ए) का रेशम प्राप्तत होता है। रोटरी माउंटेज से प्राप्तछ कूकून से 20 -30 प्रति कि.ग्रा रेशम प्राप्तत होता है।
ii. कूकून हार्वेस्ट र - लकड़ी के इस हार्वेस्टरर से समय और श्रम की बचत होती है क्योंेकि रोटरी माउन्टे ज से कूकून को अलग-अलग नहीं निकालना पड़ता।
iii. आदर्श पालन घर - ये पालन घर विभिन्नग कृषि जलवायु दशाओं और पालन विधियों के लिए तैयार किए गए हैं।
iv. संपूर्ण (फाइटोएकडाई स्टीपरायड जो कि कीटों की समाकलित परिपक्वरता के लिए संस्थापन द्वारा विकसित) - 5 वीं विकासावस्थार के रेशमकीट में उत्पातद की सक्रिय मात्रा डालने से माउंटिंग की अवधि 18-24 घंटे कम हो जाती है।
v. न्यूतट्रीड (संस्था न द्वारा तैयार की गई सेमी सिंथेटिक डाइट) - यह डाइट युवा रेशमकीटों को संतुलिक पोषण प्रदान करती है, पालन के दौरान स्वईच्छेता बनाए रखती है और बड़े कीटों के विकास में सहायक होता है।
रेशमकीट संरक्षा
. अमृत - ग्रासरी और फ्लेचरी को दबाने हेतु पर्यावरणानुकूल वनस्पचति आधारित संरचना।
i. अंकुश - यह एक पर्यावरणानुकूल क्याेरी कीटाणुनाशक है जो सामान्यध रेशमकीट संबंधी रोगों को फैलने से रोकता है।
ii. विजेता-क्या री कीटाणुनाशक - एक प्रभावी क्याारी कीटाणुनाशक विजेता विभिन्न रेशमकीट रोगों को फैलने से रोकता है।
iii. रेशमकीट औषध - क्याैरी कीटाणुनाशक - यह एक अन्या क्याीरी कीटाणुनाशक है जो विभिन्नी रेशमकीट रोगों को फैलने से रोकता है।
iv. सैनीटेक - यह एक सक्षम और असंक्षरक कीटाणुनाशक है। यह खुले पालन गृहों में अधिक उपयोगी होता है जहां वरत नियंत्रित दशाएं संभव नहीं हैं।
v. यूजी कीट के प्रबंधन हेतु यूजीट्रैप - यूजी संक्रमण का 84 प्रतिशत तक प्रबंधन किया जा सकता है। इससे उत्पाजदन/100 डीएफएलएस में 8 कि. ग्रा. की वृद्धि होती है।
vi. रक्षा रेखा - यह एक कीटणुनाशक चॉक है जिससे रेशमकीट पालन के दौरान चीटीयों और काक्रोचों पर नियंत्रण किया जा सकता है।
रेशम कीट पालन तंत्र
. शहतूश छटाई मशीन - यह मशीन 5 घंटे में एक एकड़ शहतूश के बाग की छंटाई कर सकती हैं।
i. कटिंग की तैयारी हेतु मशीन - इससे कटिंग को तीव्रता से करने में सहायता है 1 घंटे में लगभग 2000 कटिंग।
ii. कूकून को लोमकरहित करने की मशीन - यह मशीन एक घंटे में 50-60 कि.ग्रा कूकून को लोमक रहित कर सकती है।
iii. तना पेराई मशीन - यह यंत्र एक घंटे में 250-300 कि.ग्रा. तनों की कटाई और पेराई में सक्षम है।
iv. पाउडर डस्ट र - इससे बहाव में नुकसान किए बगैर आरकेओ और विजेता जैसे रासायनिक डस्ट को रेशमकीट के ऊपर लगाने में सहायता मिलती है।
v. कूड़ा अलग करने वाला यंत्र (लिटर सेपरेटर) - यह मशीन बची हुई पत्तियों और कूड़े को अलग करने में प्रभावी है ताकि बायोगैस बनाने के लिए बायोगैस संयंत्र में इनका उपयोग किया जा सके। बायोगैस का उपयोग रीलिंग तथा घरेलू उपयोग के लिए किया जाता है।
vi. शहतूश की पत्तियों को बारीक काटने हेतु मशीन - यह मोटर से चलने वाली मशीन लगभग 40 कि.ग्रा पत्तियां प्रति घंटे काटती हैं।
vii. इलेक्ट्रिक स्प्रे यर - स्टीरल पंप और 15 मीटर लंबी होज वाला यह स्प्रे यर एक घंटे में लगभग 250 लीटर कीटाणुनाशक का स्प्रे करता है।
viii. लोमक हटाने हेतु हाथ की मशीन (हैंड डिफ्लासिंग मशीन) - यह 15 किग्रा. कूकून प्रति घंटे की दर से लोमक हटाती है।
ix. परिपक्वे रेशमकीट अलग करने वाली मशीन - इस मोटर युक्ती मशीन द्वारा दो घंटे में लगभग 35000 परिपक्वल रेशम कीटों को अलग किया जा सकता है।
x. प्लालस्टिक माउंटेज हेतु फ्रेम - इसे त्व रित माउंटिंग में सहायता मिलती है। यह यंत्र प्लालस्टिक माउंटेज की आकृति और आकार को बनाए रखने में उपयोगी है। इससे किसानों को माउंटेज को उचित हवा के लिए टांगने में मदद मिलती है।
xi. प्लाास्टिक माउंटेज को पकड़ने और पैक करने के लिए यंत्र - कूकूनीकरण के पश्चासत प्लालस्टिक माउंटेज की आकृति और आकार को बनाए रखने में सहायता मिलती है।
xii. कूकून कटिंग मशीन - इस मोटर युक्तृ मशीन से ग्रेनेजों में नर-मादा अलग करने में सहायता मिलती है। यह एक घंटे में 6000 कूकून से अधिक काट सकती है।
कठुआ । बारीश के मौसम में उचित कृषि उद्योग को चुनने से किसानों को फायदा हो सकता है, इसकी जानकारी के लिए जम्मू कश्मीर के अनुसंधान प्रसार केंद्र बरनोटी की ओर से जागरूकता शिविर लगाया गया। जिसमें रेशम कीट पालन उद्योग को बढ़ावा देने के विषय में चर्चा की गई। शिविर में कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ.एपी सिंह मुख्य अतिथि के तौर पर उपस्थित रहे।
इस मौके पर अनुसंधान प्रसार केंद्र के उपनिदेशक डॉ.रमाकांत उपाध्याय ने केंद्र की ओर से दी जा रही सुविधाओं की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा कीट पालन उद्योग को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। विभाग इन योजनाओं से कीट पालकों को अवगत करवाने के लिए जागरूकता शिविर लगा रहा है।
इस शिबिर में सरकार की ओर से दी जा रही योजनाओ के साथ साथ , कीटपालन उद्योग से सम्बन्धित समस्याओ पर भी चर्चा की गई । अंत में मुख्य अतिथि नेप्रसार केंद्र द्वारा कीट पालन को बढ़ावा देने के लिए किए जा रहे प्रयासोंकी सराहना की। उन्होंने किसानों से कहा कि पारंपरिक खेती के साथ आधुनिक तकनीकी से कीट पालन कर वह अपनी आमदनी को बढ़ा सकते हैं।
रेशम के लीजेंड
सिल्क - एक मजबूत, मुलायम धागे सब्जी और जानवर मूल नहीं है। यह धागा बस प्यूपीकरण पहले रेशम के कीड़ों पैदा करता है।
यह बताता है एक प्राचीन चीनी कथा, बनाने की कला रेशम चीन पत्नी करेगा पीला सम्राट, चीनी राज्य के पौराणिक संस्थापक, क्योंकि यह कैटरपिलर संयंत्र और कपड़ा बुनाई के लिए अपने लोगों को जो पढ़ाया जाता है वह था। वास्तव में सबसे पुराना रेशमकीट कोकून उत्तरी के नवपाषाण बस्तियों में पाया गया था शांक्सी (लगभग 2200-1700 ई.पू.।), और रेशम के पहले टुकड़े दक्षिणी चीन, दृढ़ राज्यों के समय (475-221 सीजी के कब्रिस्तान में से एक में ऊतक। के लिए ईसा पूर्व)। कई सदियों से चीन का कोई एक बाहर मास्टर करने में विफल रहा है रेशम उत्पादन की तकनीक, प्रकट करने के लिए के रूप में मौत भरोसा किया। भारी प्रयासों के रहस्य का पता लगाने के लिए कुछ पर खर्च किया गया है। ओके यू तब रेशम उत्पादन के रूप में जाना जाता परंपरा Khotan में आया था। स्थानीय शासक कच्चे डेटा और प्रतिष्ठित निर्माण की एक विधि नहीं मिल सकता है सामग्री। फिर, अपने मंत्री Yuchi म्यू की सलाह पर वह धोखा करने का फैसला किया और चीनी राजकुमारी को लुभाने। प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया है, दूत शासक राजकुमारी फुसफुसाए कि घर पर उसके पति एक बहुत उत्कृष्ट जेड, लेकिन वहाँ एक अति सुंदर रेशम है, और वह एक पहनने के लिए चाहता है एक ही अच्छे कपड़े शादी से पहले के रूप में, वह अंडे लाना चाहिए रेशम के कीड़ों और शहतूत बीज। यह सब ले लिया एक लड़की थी बैग के बीच जटिल केश में अंडे और बीज छुपा के लिए लाया जड़ी बूटियों और दवाओं के साथ। साहसिक राजकुमारी बहुत बड़ा सोचा उसकी मंगेतर और घरेलू विशेषज्ञों की आड़ में के तहत खुद को साथ लिया रेशमकीट पालन, शहतूत के पेड़ और बुनाई की खेती।
एक और के अनुसार कथा, 550 में, बीजान्टिन सम्राट मैं दो फारसी के लिए राजी चीन से भिक्षुओं उसे कीमती रेशमकीट अंडे लाने के लिए। भिक्षुओं में उन्हें छिपा दिया खोखले बांस की छड़ी। यह सब वैसे भी हुआ - हम शुरू नहीं करते जोर। एक बात तय है - निकट सुरक्षित रहस्य पता चला था सदियों के लिए
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सिल्क का इतिहास
प्राकृतिक होमलैंड रेशम, साथ ही कई अन्य ठीक बातें - चीनी मिट्टी के बरतन, चाय समारोह और सुलेख, प्राचीन चीन है। और दो हजार साल पहले, जब गोरों, फिर भी, सनी कपड़े किसी न किसी और सख़्त कटोरा थे चीनी नाजुक रेशम से बने कपड़े रखा है।
पहली बार रेशम छपी लिए वी शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास प्राचीन चीन में ग्रेट पीली नदी के तट पर। रेशमकीट पालन का राज पीला का उसके साथ पहली पत्नी लाया सम्राट लेई जेड यू। यह पौराणिक कथा के अनुसार, संयंत्र के लिए लोगों को सिखाया वह था जो रेशमकीट कोकून और सुलझाना और इस तरह उसके कपड़े सुनिश्चित करते हैं। लेई जेड रेशम उत्पादन के संस्थापक माना जाता है।
2500-2800
साल पहले के लिए रेशम उत्पादन बहुत विकसित किया गया था। और साल में 475-221 ईसा पूर्व रेशम बन गया व्यापक सार्वजनिक उपयोग, इसके उत्पादन के प्रसार की तकनीक हर जगह, गुणवत्ता के रूप में के रूप में अच्छी तर�...
रेशम
रेशम के नाम से हम सब भली-भांति परिचित हैं l इससे बने मुलायम और पतले कपड़ों को पहन कर मन प्रसन्न हो जाता है l रेशम से इतना अधिक पतला कपडा बनाया जा सकता है कि इसका एक थान एक छोटी सी अंगूठी में से निकाला जा सकता है l क्या आप जानते है कि रेशम किस प्रकार बनाया जाता है ?
आपकों यह जानकर आश्चर्य होगा कि रेशम में धागे को एक छोटा सा कीड़ा तैयार करता है, जिसे रेशम का कीड़ा (Silk Worm) कहते हैं l यह कीड़ा अपने रहने के लिए अपने ही शरीर पर गोले के आकार का घर बनाना शुरू करता है l जब गोला बड़ा हो जाता है, तो उससे रेशम प्राप्त करने के लिए उसे गर्म पानी में डाल दिया जाता है, जिसमें कीड़ा तो मर जाता है और उसके गोले से रेशम बनाया जाता है l यदि इस कीड़े को और भी बढ़ने दिया जाए तो यही कीड़ा तितली के रूप में बादल जाता है l
लगभग चार हज़ार साल पहले रेशम बनाने कि काला चीन के लोगों को पता थी l इसके विषय में एक दिलचस्प कहानी प्रचलित है l कहा जाता है कि चीन की रानी ‘ सी लिंग शी ’ ने एक बार गलती से रेशम के एक कीड़े को हाथ धोने वाले बर्तन में डाल दिया l अगले दिन उसने देखा कि वर्तन में से रेशम के रेशे निकल रहे हैं l इससे प्रभावित होकर उसने रेशम के कीड़ों को पालना आरम्भ कर दिया और उनके द्धारा तैयार रेशम को बुनाई के काम में लाना शुरू कर दिया l कई साल तक चीन के लोगों ने रेशम के कीड़ो का रहस्य छुपाए रखा l दुनिया भर के व्यापारियों को रेशम खरीदने के लिए चीन जाना पड़ता था l रेशम के कीड़ों का रहस्य सबसे पहले तीसरी शताव्दी में जापानी लोगों को पता लगा l 550 ईव के आसपास बायजैन्टियम के राजा जुस्टीनियन ने अपने दो जासूसों को चीन भेजा l ये जासूस लौटते समय एक बांस की नली में रेशम के कीड़ों के अंडे छुपाकर ले आए l इसके बाद रेशम के कीड़े पालने और उनसे रेशम प्राप्त करने कि कला सारे संसार में धीरे-धीरे फैल गई l
आज चीन, जापान, भारत, फ्रांस, स्पेन और इटली जैसे देशों में रेशम के कीड़े पाले जाते हैं और उनसे रेशम प्राप्त किया जाता है l गर्मी की शुरुआत में मादा शहतूत के पत्तों पर पांच सौ के लगभग अंडे देती है, जो पत्तियों से चिपक जाते हैं l दस दिन के अंदर इन अंडों से लार्वा निकल आता है l इनकी सावधानी से जांच कि जाती है और रोगी कीड़ों को अलग करके नष्ट कर दिया जाता है l स्वस्थ कीड़ों को शहतूत कि पत्तियों पर पाला जाता है l इनके मुंह के एक छोटे से छिद्र द्धारा एक रस निकलता है, जिससे रेशम का धागा बनता है l 25 दिन के अन्दर-अन्दर ये कीड़े रेशम का गोला दे देते हैं l इनके वज़न का पांचवां हिस्सा रेशम होता है l इन कीड़ों को गर्म पानी में डालकर मार दिया जाता है और गोले से रेशम काट लिया जाता है l एक गोले में रेशम का एक लम्बा धागा होता है l जिसकी लम्बाई 500 से 1300 मीटर तक होती है l
आज सारे संसार में खुबसूरती व बारीकी के लिए इटली का रेशम सर्वश्रेष्ठ माना जाता है l
क्ति रेशम उत्पादों के प्रति हमेशा जिज्ञासु रहा है । वस्त्रों की रानी के नाम से विख्यात रेशम विलासिता, मनोहरता, विशिष्टता एवं आराम का सूचक है । मानव जाति ने अद्वितीय आभा वाले इस झिलमिलाते वस्त्र को चीनी सम्राज्ञी शीलिंग टी द्वारा अपने चाय के प्याले में इसके पता लगने के काल से ही चाहा है यद्यपि इसे अन्य प्राकृतिक एवं बनावटी वस्त्रों की कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा, फिर भी शताब्दियों से वस्त्रों की रानी के रूप में विख्यात, इसने निर्विवाद रूप से अपना स्थान बनाए रखा है । प्राकृतिक आभा, रंगाई एवं जीवन्त रंगों के प्रति अंतर्निहित आकर्षण, उच्च अवशोषण क्षमता, हल्का, लचकदार एवं उत्कृष्ट वस्त्र-विन्यास जैसे श्रेष्ठ गुणों ने रेशम को विश्व में किसी सुअवसर का अत्यंत सम्मोहक एवं अपरिहार्य साथी बना दिया है ।
रेशम, रसायन की भाषा में रेशमकीट के रूप में विख्यात इल्ली द्वारा निकाले जाने वाले एक प्रोटीन से बना होता है । ये रेशमकीट कुछ विशेष खाद्य पौधों पर पलते हैं तथा अपने जीवन को बनाए रखने के लिए ‘सुरक्षा कवच’ के रूप में कोसों का निर्माण करते हैं । रेशमकीट का जीवन-चक्र 4 चरणों का होता है, अण्डा, इल्ली, प्यूपा तथा शलभ । व्यक्ति रेशम प्राप्त करने के लिए इसके जीवन-चक्र में कोसों के चरण पर अवरोध डालता है जिससे व्यावसायिक महत्व का अटूट तन्तु निकाला जाता है तथा इसका इस्तेमाल वस्त्र की बुनाई में किया जाता है ।
रेशम क्यों ?
रेशम ऊंचे दाम किंतु कम मात्रा का एक उत्पाद हे जो विश्व के कुल वस्त्र उत्पासदन का मात्र 0.2% है । चूंकि रेशम उत्पादन एक श्रम आधारित उच्च आय देने वाला उद्योग है तथा इसके उत्पाद के अधिक मूल्य मिलते हैं, अत: इसे देश के आर्थिक विकास में एक महत्वसपूर्ण साधन समझा जाता है । विकासशील देशों में रोजगार सृजन हेतु खासतौर से ग्रामीण क्षेत्र में तथा विदेशी मुद्रा कमाने हेतु लोग इस उद्योग पर विश्वास करते हैं ।
रेशम कहां ?
विश्व में भौगोलिक दृष्टि से एशिया में रेशम का सर्वाधिक उत्पादन होता है जो विश्व के कुल उत्पाद का 95% है । यद्यपि विश्व के रेशम मानचित्र में 40 देश आते हैं, किंतु अधिक मात्रा में उत्पादन चीन एवं भारत में होता है तथा इसके उपरांत जापान, ब्राजील एवं कोरिया में । चीन, विश्व को इसकी आपूर्ति करने में अग्रणी रहा है ।
रेशम के सर्वाधिक उत्पादन में भारत द्वितीय स्थान पर है, साथ ही विश्व में भारत रेशम का सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है । यहां घरेलू रेशम बाजार की अपनी सशक्त परम्परा एवं संस्कृति है । भारत में शहतूत रेशम का उत्पादन मुख्यतया कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, जम्मू व कश्मीर तथा पश्चिम बंगाल में किया जाता है जबकि गैर-शहतूत रेशम का उत्पादन झारखण्ड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा तथा उत्तर-पूर्वी राज्यों में होता है ।
रेशम किस्में
व्यावसायिक महत्व की कुल 5 रेशम किस्में होती हैं जो रेशमकीट की विभिन्न प्रजातियों से प्राप्त होती हैं तथा जो विभिन्न खाद्य पौधों पर पलते हैं । किस्में निम्न हैं :
• शहतूत
1. कीटपालन गृह
रेशम कीटपालन हेतु एक अलग गृह की आवश्यकता होती है। कीटपालन गृह में समुचित स्थानों पर खिड़कियाँ भी आवश्यक हैं, जिससे कक्ष में पर्याप्त मात्रा में हवा का आवागमन हो सके। साथ ही यह भी आवश्यक है कि कीटपालन गृह को विशुद्धीकरण हेतु एयरटाइट किया जा सके।
2. फसल चक्र
प्रथम वर्ष में स्थापित शहतूत वृक्षारोपण में समुचित देखभाल में द्वितीय वर्ष में शहतूत पत्ती का उत्पादन समुचित मात्रा में हो जाता है। प्रदेश में विभिन्न स्थानों/प्रक्षेत्रों में तापमान आद्रता को ध्यान में रखते हुए रेशम कीटपालन वर्ष में चार - पाँच बार ही किया जा सकता है। एक बार का कीटपालन एक फसल कहलाता है। पूर्ण वर्ष में कीटपालन फसल हेतु निम्न फसल चक्र निर्धारित किया गया है।
क्र०स० फसल का नाम कीटपालन फसल अवधि कीट प्रजाति
1 20 फरवरी से 20 मार्च तक बसन्त फसल बाईबोल्टीन X बाईबोल्टीन
2 01 अप्रैल से 25 अप्रैल तक ग्रीष्म फसल मल्टी X बाई
3 20 अगस्त से 15 सितम्बर तक मानसून फसल मल्टी X बाई
4 01 अक्टूबर से 30 अक्टूबर तक पतझड़ फसल मल्टी X बाई
नोट - शहतूत की पत्तीि की उपलब्धता एवं तापक्रम तथा आद्रता के अनुरूप उपरोक्त फसल चक्र में परिवर्तन सम्भव है।
3. कीटपालन की तैयारी (विशुद्धीकरण)
प्रत्येक कीटपालन फसल से पूर्व सभी कीटपलन उपकरण एवं कीटपालन गृह की अच्छी तरह सफाई धुलाई करते हुए फार्मलीन से विशुद्धीकरण किया जाता है। फर्मलीन के 2% अथवा 3% घोल का उपकरणों/गृह के दीवाल, छत, फर्श आदि में छिड़काव किया जाना चाहिए, जिससे बीमारियों के जीवाणु नष्ट हो जायें। कीटपालन गृह को फार्मलीन छिड़काव के उपरान्त 24 घण्टे तक हवारोक (एयरटाइट) बन्द किया जाना चाहिए। लगभग 7 से 8 लीटर 2% फार्मलीन घोल से लगभग 100 वर्गमीटर क्षेत्र में विशुद्धीकरण किया जाता है। इसके अतिरिक्त कीटपालन उपकरणों को ब्लीचिंग पाउडर का प्रयोग कीटपालन गृह के आस-पास शहतूत वृक्षारोपण में विशुद्धीकरण के रूप में भी किया जाता है।
4. रेशम कीटाण्डों का सेवन (इन्क्यूबेशन)
रोगरहित रेशम कीटाण्डों को कीटपालन गृह में ट्रे में एक पतली तह के रूप में रखा जाता है। गृह में तापमान 25 डिग्री सेण्टीग्रेट एवं आर्द्रता लगभग 80-90 सुनिश्चित की जाती है। आर्द्रता सुनिश्चित करते हुए पैराफिन पेपर एवं फोम पैड का प्रयोग किया जाता है। कीटाण्डों में जब 'पिन हेड स्टेज' आती है, तो कीटाण्डों को अंधेरे में रखा जाता है। प्रस्फुटन की सम्भावित तिथि को प्रात: काल में कीटाण्डों को प्रकाश में रखा जाता है। जिसमें लगभग 90-95 % कीटाण्डों में प्रस्फुटन हो जाता है।
5. ब्रशिंग
कीटाण्डों में प्रस्फुटित लार्वों को अधिक समय तक भूखा नहीं रखा जाना चाहिए। लार्वा को शहतूत की मुलायम पत्तियाँ छोटे आकार (0.5 सेंटीमीटर से लेकर 1 सेंटीमीटर तक) की काटकर डाली जाती है। सभी लार्वा पत्तियों पर चढ़ जाते हैं। 10-15 मिनट के पश्चात रेशम कीटों को एक मुलायम पंख से धीरे-धीरे कीटपालन ट्रे में पत्तियों के साथ झाड़ देते हैं एवं कीटपालन बेड तैयार कर लेते हैं। पत्तियों को सूखने से बचाने के लिए एवं कीटपालन बेड में आवश्यक आर्द्रता सुनिश्चित करने हेतु फोम पैड लगाते हुए कीटपालन ट्रे को पैराफीन पेपर से ढ़क दिया जाता है।
•
• रेशम कीटपालन शैशव अवस्था
रेशम कीटों की प्रथम एवं द्वितीय अवस्था को शैशव अवस्था कहा जाता है। शैशव अवस्था में तापक्रम, आर्द्रता एवं कीटों के फैलाव हेतु निम्न मापदण्ड होते है:-
वेट अवस्था दिवस तापक्रम आर्द्रता (प्रतिशत) कीटपालन बेड का आकार फीडिंग बेड की सफाई
प्रथम अवस्था 1 9"
x12" 4 --------
3 18"
x 12" 4 --------
3 8"
x 16" 4 -------
4 27 डिग्री से० ग्रे० 90 9"
x 12" 4 01 मोल्ट
द्वितीय अवस्था 1 उपर्युक्तानुसार 24" x
24" 4 01
2 उपर्युक्तानुसार 30" x
24" 4
• शहतूत की पत्तियों का चुनाव एवं गुणवत्ता
ब्रशिंग (प्रस्फुटन) से द्वितीय अवस्था की समाप्ति तक रेशम कीटों को मुलायम पत्तियाँ खिलाई जाती हैं। ऊपर की प्रथम चमकदार बड़ी पत्ती से नीचे तीसरे अथवा चौथी पत्ती का चुनाव करते हुए तोड़ना चाहिए। उनके नीचे की 5 से 7 पत्तियों को द्वितीय अवस्था तक दिया जाता है। प्रथम अवस्था में पत्ती का आकार 0.5 से 1 से० मी० वर्ग आकार की काटकर खिलाई जाती है।
• शहतूत की पत्ती का रख-रखाव
पौष्टिकता एवं नमी से भरपूर उच्च गुणवत्ता की पत्तियों के भोजन से रेशम कीटों में सर्वोत्तम विकास होता है। शहतूत पत्तियों से जो रेशम कीटों का एकमात्र भोज है, को सही ढंग से सुरक्षित रखा जाना आवश्यक है, जिससे इसकी नमी में गिरावट न आये। शहतूत पत्तियों को भीगे गनी क्लाथ में ढक कर रखा जाता है। उक्त हेतु लीफ चैम्बर का भी प्रयोग किया जाता है।
• सफाई
रेशम कीटपालन के समय कीटपालन बेड की सफाई आवश्यक है, क्योंकि उसमें रेशम, कीटों का मल एवं पुरानी बची हुई पत्तियाँ होती हैं। प्रथम अवस्था में मोल्ट से एक दिन पूर्व मात्र एक सफाई की जाती है। द्वितीय अवस्था में दो सफाई की जाती हैं। पहली मोल्ट खुलने के बाद फीडिंग देने के बाद एवं दूसरी द्वितीय मोल्ट से एक दिन पूर्व सफाई की जाती है। द्वितीय अवस्था में दो सफाई की जाती हैं। 0.5 x 0.5 आकार वाली नेट को कीटपालन बेड के ऊपर डालते हुए ताजी शहतूत की पत्तियाँ नेट के ऊपर डाली जाती हैं। रेशम कीट नेट के छिद्रों से रेंगकर ताजी पत्तियों के ऊपर चढ़ जाते हैं। करीब आधा घण्टे बाद नेट को कीटों सहित दूसरे कीटपालन ट्रे में स्थानांतरित कर दिया जाता है एवं बची हुई पत्तियों एवं रेशम कीट के मल (एक्सक्रीटा) को खेत मे गड्ढा बनाकर दबा दिया जाता है।
• मोल्ट
मोल्ट एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें रेशम कीट अपने शरीर की त्वचा को बदलते हैं। इस प्रक्रिया में रेशम कीट पत्ती नहीं खाते हैं। रेशम कीटों में लार्वा की 5 अवस्था में 4 मोल्ट होते हैं। जब रेशम कीट मोल्ट में जाने की तैयारी करते हैं, तो कीटपालन बेड से फोम पेड एवं पैराफिन पेपर हटा दिया जाता है। इस अवस्था में कीटों को छोटी आकार की पत्तियां दी जाती हैं। मोल्ट के प्रारम्भ से लेकर मोल्ट की समाप्ति तक सावधानी से सभी रेशमकीटों में समान विकास होता है। मोल्ट के समय कीटपालन बेड पतला एवं सूखा होना चाहिए एवं गृह में हवा का आवागमन सुचारू होना चाहिए। मोल्ट की अवस्था में अधिक आर्द्रता रेशम कीट हेतु नुक्सानदायक होती है।
• उत्तरावस्था रेशम कीटपालन
रेशम कीटों की तृतीय, चतुर्थ एवं पंचम अवस्था को उत्तरावस्था कीटपालन कहा जाता है। तापक्रम एवं आर्द्रता की आवश्यकता बढ़ती अवस्था के साथ होती जाती है। तृतीय एवं चतुर्थ अवस्था में कुछ बड़ी पत्तियां एवं पंचम अवस्था में पूर्ण पत्तियां रेशमकीट को दी जानी चाहिए। अधिक पुरानी एवं पीली पत्तियां रेशम कीटों को नहीं खिलाई जानी चाहिए। उत्तरावस्था के विभिन्न अवस्थाओं में तापक्रम एवं आर्द्रता की आवश्यकता निम्नवत् है:-
तृतीय अवस्था चतुर्थ अवस्था पंचम अवस्था
तापक्रम ( 0 सें० ग्रे०) 26 25 24
आर्द्रता (प्रतिशत) 80 70-75 70
• माउण्टिंग
अन्तिम अवस्था में जब रेशम कीट पूर्ण रूप से विकसित हो जाते हैं, तो वे पत्ती खाना बन्द कर देते हैं। ये कीट रेशम कोया निर्माण हेतु तैयार होते हैं। इस अवस्था में रेशम कीटों का शरीर थोड़ा पारदर्शी हो जाता है एवं कीट अपने सिर को ऊपर कर स्थान की तलाश करता है। इस अवस्था में रेशम कीटों को चुनकर माउण्टेज(चन्द्राकी) में रखा जाता है। परिपक्व रेशम कीटों को माउण्टेज में स्थानांतरित करने में विलम्ब से रेशम कीट रेशम की क्षति कर देते हैं। माउण्टेज में कीटों को 40-45 कीट प्रति वर्गफुट की दर से रखा जाना चाहिए। इस प्रकार 6x4 के आकार की चन्द्राकी में लगभग 1000 कीट माउण्ट किये जा सकते हैं।
• रेशम कोयें को तोड़ना(हार्वेस्टिंग)
माउण्टेज में कीट रखने के पश्चात 48 से 72 घण्टे में रेशमकीट कोया निर्माण कर लेते हैं, परन्तु इस अवस्था में कोयों को नहीं तोड़ना चाहिए, क्योंकि कीट अत्यन्त नाजुक एवं मुलायम होते हैं। कोयों को माउण्ट करने की तिथि से पाँचवे/छठवें दिन तोड़ा जाना चाहिए, जब रेशम कोयों के अन्दर प्यूपा का निर्माण हो जाये। माउण्टेज (चन्द्राकी) में रेशम कोयों को तोड़ने से पूर्व मरे हुए कीटों, खराब कोयों को पहले निकाल देते हैं एवं अच्छे कोयों को ग्रेड कर छांट लेते हैं।
• रेशम कोयों की ग्रेडिंग
कोयों को तोड़ने के उपरान्त कोयों में ग्रेड के अनुसार छटाई आवश्यक है। फ्लिमजी/डेमेज्ड/एवं डबर कोयों को छांटकर अलग किया जाता है। जिससे अवशेष मात्र रीलिंग योग्य कोये रख कर रीलिंग योग्य कोयों को 'अ','ब','स' श्रेणी में बॉट लिया जाता है तत्पश्चात श्रेणीवार कोयों का विपणन किया जाता है। कोयों की ग्रेडिंग किया जाना इसलिए भी आवश्यक है कि कृषक को उचित मूल्य प्राप्त हो सके। उदाहरण के लिए यदि कोई कृषक उत्पादित 10 कि० ग्रा० कोया की ग्रेडिंग नहीं करता है, तो उसे मात्र 'स' श्रेणी की दर ही प्राप्ता हो पाती है। यदि उसी कोये को श्रेणीवार विपणन किया जाए, तो कृषक को श्रेणीवार कोया मूल्य प्राप्त होता है, जो पहले से ज्यादा मूल्य का होता है
• रेशम कोयों का विपणन
कोया तोड़ने (हार्वेस्टिंग) के उपरान्त रेशम कोया विपणन हेतु रेशम विभाग के विभिन्न केन्द्रों पर एकत्र किया जाता है, जहाँ से कोये को कोया बाजारों में प्रेषित किया जाता है। बाजार में प्रतिस्पर्धा के आधार पर अधिकतम दर पर कोया का विक्रय किया जाता है एवं रेशम कोयों का भुगतान कृषक को उपलब्ध कराया जाता है
टसर रेशम कीट एन्थिरिया माइलिटा प्रमुख रूप से आसन/अर्जुन की पत्तियां खाद्य के रूप में प्रयुक्त करता है। इसके अतिरिक्त कुछ प्राकृतिक टसर कीट प्रजातियां साल, सिद्ध, जामुन, बेर इत्यादि वृक्षों की पत्तियों को खाद्य के रूप में प्रयुक्त कर कोया निर्माण करते हैं। परन्तु मुख्य रूप से व्यवहारिक कीटपालन की द़ष्टि से आसन (Terminalia Tomentosa) व अर्जुन (T.Arjuna) वृक्ष टसर कीट का मुख्य आहार वृक्ष हैं। यह वृक्ष प्राकृतिक रूप से उष्ण कटिबन्धीय जंगलों में पाये जाते हैं। आसन एवं अर्जुन वृक्षों का वृक्षारोपण सघन रूप से भी विकसित किया जा सकता है, जो कि कीट पालन की द़ष्टि से आर्थिक रूप से लाभकारी हैं तथा प्रति इकाई क्षेत्रफल में सुगमता से देखभाल कर एक व्यक्ति अधिक आर्थिक लाभ अर्जित कर सकता है। टसर कीट प्राकृतिक रूप से जंगलों में पाया जाता रहा है। वैज्ञानिक प्रयास एवं अनुसंधान के द्वारा इस कीट को अर्द्ध-प्राकृतिक(Semi
domesticated) अवस्था के अनुकूल बनाकर इसका व्यवसायिक उत्पादन प्रारम्भ किया गया है।
सघन अर्जुन वृक्षारोपण -
सघन अर्जुन वृक्षारोपण जुलाई-अगस्त माह में 4 x 4 फीट की दूरी पर करने से प्रति हेक्टेयर लगभग 7000 पौधों की आवश्यकता होती है। यह वृक्षारोपण उचित रख-रखाव एवं देख-रेख की दशा में तीन वर्ष पश्चात कीटपालन योग्य हो जाता है। सघन वृक्षारोपण आर्थिक रूप से लाभप्रद होने से टसर रेशम उद्योग के विकास की एक प्रमुख उपलब्धि है। ऐसी भूमि जिस पर सिंचन क्षमता का अभाव हो तथा तथा कृषि हेतु अनुपयुक्त हो, का उपयोग सघन अर्जुन वृक्षारोपण में किया जा सकता है। इससे दोहरा लाभ होगा, एक तो वानिकी पर्यावरण का विकास होगा तथा दूसरा कीटपालन कर आर्थिक लाभ उठाया जा सकता है। एक हेक्टेयर सघन अर्जुन वृक्षारोपण से कम से कम औसतन 12000-14000 रूपये तक कीटपालन द्वारा आय अर्जित की जा सकती है। तुलनात्मक रूप से जंगल में कीटपालन करने से यह आर्थिक लाभ लगभग उपरोक्त का आधा रह जाता है। यदि लाभार्थी धागाकरण कार्य भी अपनाता है तो आय बढकर रूपये 18000/- वार्षिक तक पहुंच सकती है।
कीटपालन एवं कोया उत्पादन -
टसर कीटपालन कार्य जून/जुलाई माह में मानसून वर्षा प्रारम्भ होते ही शुरू हो जाता है। पहली फसल बीजू फसल कहलाती है जिसमें 35-40 दिन में कोया तैयार हो जाता है तथा द्वितीय फसल सितम्बर/अक्टूबर माह में प्रारम्भ हो जाती है। यह व्यावसायिक फसल कहलाती है तथा इसमें 55-60 दिन का समय लगता है। विभागीय स्थापित बीजागारों से उपरोक्त फसलों के कीटाण्ड प्राप्त कर प्रस्फुटित कीटों को खाद्य वृक्षों की मुलायम पत्तियों पर चढा दिया जाता है। कीट की देख-रेख एवं सुरक्षा नियमित रूप से करने पर पेडों पर ही कोया तैयार हो जाने के पश्चात जब कीट प्यूपा में परिवर्तित हो जाये अर्थात कोया निर्माण के एक सप्ताह पश्चात कोयों को खाद्य वृक्षों की पतली टहनियों सहित वृक्ष से काटकर अलग कर लेना चाहिए। इनमें से कोया को अलग कर ग्रेड के अनुसार छांटकर कोया बाजार में नीलामी कर नगद भुगतान एवं तुरन्त भुगतान के आधार पर विक्रय कर दिया जाता है।
कीटपालन एवं आवश्यक सुझाव -
1. खाद्य वृक्षों का चुनाव, सफाई एवं छंटाई कीटपालन से लगभग 10 दिन पूर्व कर लेनी चाहिए।
2. जल जमाव वाले स्थलों का चुनाव कीटपालन हेतु न किया जाये।
3. बीजागार से प्रस्फुटन से पूर्व कीटाण्ड प्राप्त कर नमी वाले साफ व स्वच्छ स्थान पर घरों में रखना चाहिए। जिससे अण्डे के अन्दर विकसित होने वाले भ्रूण का उचित विकास होता रहे। प्राय: कीटपालन के दौरान उचित आद्रता एवं तापक्रम युक्त वातावरण रहता है। यदि इसमें कमी या अधिकता महसूस हो तो प्रयास कर अपेक्षित स्थान पर रखा जाये।
4. कीटाण्ड प्रस्फुटन के पश्चात कीटपालन, घर/झोपडी के अन्दर (इनडोर) घड़े अथवा बोतल में खाद्य वृक्षों की टहनियां लगाकर 72 घण्टे तक किये जाने से प्ररम्भिक क्षति को रोका जा सकता है। इससे औसत उत्पादन में बढ़ोत्तरी होती है।
5. शिशु कीटों का आहार वृक्ष पर मौसम की अनुकूलता को देखते हुए स्थानान्तरित किया जाये अन्यथा तेज वर्षा, कड़ी धूप, तेज हवा/आंधी द्वारा कीट फसल को व्यापक क्षति हो सकती है।
6. कीट की प्रथम अवस्था से तृतीय अवस्था तक विभिन्न कीड़े-मकोड़ों जैसे चिपरी (कैन्थीकोना), बर्रे (वास्प) चीटियों आदि के द्वारा अधिक हानि होती है, जिसे रोकने के लिए उपयुक्त उँचाई के वृक्षों का चुनाव तथा कीटपालन से पूर्व ऐसे कीटों के स्थानों को नष्ट करना आवश्यक होता है।
7. स्वस्थ कीट के विकास हेतु आवश्यक है कि शिशु कीटपालन स्थल के वृक्षों पर कीटपालन से पूर्व 2 प्रतिशत फार्मलीन घोल का छिड़काव किया जाये तथा वृक्षों के तनों के चारो ओर गर्म राख तथा बी०एच०सी० चारों ओर डाली जाये।
8. यथासम्भ व प्रथम एवं द्वितीय अवस्था में शिशु कीटों का स्थानान्तरण एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष के ऊपर न किया जाय। स्थानान्तरण करने के लिए प्रूनिंग सीजर्स अथवा हंसुए से पतली टहनियों को पत्ती सहित काटकर स्थानान्तरित किया जाये। कीटों को हाथ से कम से कम छुआ जाये।
9. कीटपालन में स्वस्थ वातावरण एवं सफाई का विशेष महत्व है। कीटपालन स्थल साफ एवं स्वच्छ रखा जाये व कीट स्थानान्तरण से पूर्व एवं पश्चात 2 प्रतिशत फार्मलीन घोल से हाथ अवश्य धोया जाय तथा इस घोल से भरे मिट्टी के पात्र को प्रत्येक कीटपालन स्थल के पास रहना आवश्यक है।
10. टसर कीट अपनी पांच अवस्थाओं तथा चार मोल्ट के द्वारा अपना कृमिकाल (लारवल पीरिएड) पूर्ण करता है। इस दौरान निर्मोचन (मोल्ट) के कीट स्थानान्तरण वर्जित है।
11. मृत/रोगग्रस्त कीट को पेड़ से उतार कर कीटपालन स्थल से बाहर लगभग एक फुट गहरे गड्डे में दबाया जाना नितान्त आवश्यक है। इससे अन्य कीटों में बीमारी फैलने से रोका जा सकता है।
12. कीट पालन क्षेत्र में चूना तथा ब्लीचिंग पाउडर का उपयोग समय-समय पर किया जाना लाभप्रद होता है।
13. तृतीय से पंचम अवस्था के दौरान पक्षियों, नेवलों, सर्प आदि से सुरक्षा हेतु कीटपालक को कड़ी चौकसी रखनी आवश्यक होती है।
14. खाद्य वृक्ष पर 10 प्रतिशत पत्ती अवशेष रहते ही दूसरे खाद्य वृक्ष पर स्थानान्तरण कर देना चाहिए जिससे कीटों के भूखे रहने की सम्भा वना न रहे।
15. कोया निर्माण के लिए कीट दो-तीन पत्तियां इकट्ठा कर हैमक (आधार) को निर्माण करता है। अत: यह आवश्यक है कि अन्तिम अवस्था में कीटों को पर्याप्त पत्ती वाले पेड़ों पर रखा जाये।
16. टसर कीट लगभग 80 प्रतिशत पत्ती का उपयोग पांचवी एवं अन्तिम अवस्था में करता है। अत: यह आवश्यक है कि एक वृक्ष पर कम कीड़े रखे जायें जिससे उनका बार-बार स्थानान्तरण न करना पड़े एवं इससे होने वाली क्षति को रोका जा सके।
17. कोया निर्माण प्रारम्भ होते ही एक सप्ताह बाद उसे खाद्य वृक्षों की पतली टहनियों सहित काटकर अलग करना चाहिए। कच्चे एवं अविकसित कोयों को तोड़ने से कीटपालक को ही क्षति होती है। अत: प्यूपा निर्माण होने के पश्चात कोयों को खाद्य की टहनी से अलग किया जाये।
18. कटे हुए कोयों को डाली से अलग कर ग्रेड के अनुसार छांट कर रीलिंग/बीजू, कट एवं फिल्मजी श्रेणी में अलग-अलग रखना चाहिए।
रेशम उद्योग में समिति/स्वैच्छिक संगठनों का योगदान -
कोई भी उद्योग बिना व्यक्तिगत क्षेत्र में कार्यक्रम को फैलाये विकसित नही हो सकता है तथा इसे जन आन्दोलन का रूप देने के लिए रेशम उद्योग में समितियों एवं स्वैच्छिक संगठनों की महत्वपूर्ण भमिका है। रेशम निदेशालय द्वारा कीटपालकों व धागाकरण करने वाली समितियों का गठन किया गया है। जिनको पंजीकृत कर प्रबन्धकीय सहायता आदि की सुविधा है तथा ये समितियां रेशम उद्योग के विभिन्न कार्यो को स्वतंत्र रूप से सम्पादित कर सकती हैं। इसी प्रकार स्वैच्छिक संगठन रेशम उद्योग के प्रचार-प्रसार, प्रशिक्षण, वृक्षारोपण, कीटपालन, धागाकरण एवं बुनाई कार्यो को अपनाकर रेशम उद्योग के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भमिका निभा सकते हैं। इस दिशा में विभिन्न स्वैच्छिक संगठनों का सहयोग प्राप्त किया जा रहा है।
विभागीय प्रदत्त सुविधायें -
रेशम कीट परिचय
अरण्डी रेशम कीट-फाइलोसेमिया रिसिनी बाइसोड एवं फाइलोसेमिया सिन्थिया।
भोज्य वृक्ष परिचय
अरण्डी रेशम कीट मुख्य रूप से रिसिनस कम्यूनिस अरण्डी अथवा हेटरोपेनेक्स फ्रेग्रेन्स कसेरू की पत्तियां खाता है।
अरण्डी बागान तैयार करने की विधि एवं रख-रखाव
• ऊँची, समतल अथवा ढलान भूमि, जहाँ जल का रूकाव न हो, का चयन।
• बुआई, पौध लगाने हेतु उपयुक्त समय है।
• भूमि को 2-3 बार 20-25 सेन्टीमीटर गहराई तक जुताई करना चाहिए।
• 20x25x25 सेमी का 1-1 मीटर के अन्तराल पर गडढे खोदना चाहिए।
• एक एकड़ भूमि में अरण्डी के 10,000 पौधे रोपित किये जा सकते है, जिनसे वर्ष में 10 मीट्रिक टन पत्ती प्राप्त की जा सकती है।
• गड्ढों में 1 ग्राम एण्डोफिलएम-45 का मिश्रण 10 ग्राम लिन्डेन पाउडर तथा 3-4 किग्रा सूखी सडी गोबर की खाद प्रति गड्ढ़े की दर से प्रयोग कर मिट्टी के साथ अच्छी तरह मिला देना चाहिए।
• वर्षा वाले दिन 20-25 सेमी के अन्तराल पर गड्ढों में स्वस्थ तरूणा पौधे/ अंकुरित बीज रोपित करने चाहिए।
• आवश्यकतानुसार निराई/गुड़ाई करनी चाहिए।
• प्रत्येक वर्ष, मानसून पूर्व 10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से सड़ी खाद एक बार चार किलो (0.5 घनफुट) प्रति पौधा प्रयोग करना चाहिए।
• 125:75:25 के अनुपात में नाइट्रोजन, फासफोरस व पोटाश दो खुराकों में प्रयोग करना चाहिए।
• कवक व फफूंदी जनित बीमारियों को रोकने के लिये 10 ग्राम लिन्डेन पाउडर रासायनिक खाद/ गोबर खाद के प्रयोग के समय प्रति पौध करना चाहिए।
• "रोगर'' 0.2 प्रतिशत/0.05 ''डेमीक्रान'' /0.07 प्रतिशत ''नुवान'' तथा 0.01 प्रतिशत एण्डोफिलएम-45 (1000-1200 लीटर) प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 2-3 बार 10-15 दिन के अन्तराल पर पीड़क व बीमारियों से बचने के लिये छिड़काव करना चाहिए।
कीटपालन
• कीटपालन प्रारम्भ करने के पूर्व 3 दिन पूर्व 2 प्रतिशत फार्मलीन घोल से कीटपालन कक्ष का विशुद्धीकरण करना चाहिए।
• कीटपालन उपकरण जैसे लकड़ी की ट्रे, पत्ती संग्रह करने की डोलची, टोकरी का 2 प्रतिशत फार्मलीन घोल से विशुद्धीकरण करना चाहिए।
• कीटपालन के अन्य उपकरणों को 5 प्रतिशत क्लोरीनेटेड चूने में 10 मिनट डुबाकर विशद्धीकरण करना चाहिए।
• कीटपालन कक्ष में सभी दरारों व सुराखों को बन्द करना चाहिए ताकि पीड़ृक जन्तुओं के आगमन को रोका जा सके। खिड़की दरवाजों व रोशनदानों को वायु के खुले आवागमन के लिये खुला रखना चाहिए।
• कीटपालन कक्ष में आवश्यक उचित तापमान, आर्द्रता व स्वस्थ वातावरण बनाये रखना चाहिए।
• रेशम कीट के अण्डों को 26 डिग्री सेन्टीग्रेड तापमान व 80 प्रतिशत आर्द्रता पर निषेचन हेतु रखना चाहिए।
• प्रस्फुटन के 48 घण्टे पूर्व अण्डों को काले कपड़े से ढक कर रखना चाहिए और प्रस्फुटन तिथि वाले दिन सुबह अण्डों पर प्रकाश डालना चाहिए।
• अण्डे प्राय: ग्रीष्म काल में 8-10 दिन में तथा शरद काल में 12-15 दिन में प्रस्फुटित होते है।
• कीड़ों को मुलायम सरस पत्ती पर ब्रश करना चाहिए।
• केवल दो दिन में प्रस्फुटित हुये कीड़ों को ही कीटपालन हेतु रखना चाहिए। ब्रशिंग के समय मुलायम पंख का प्रयोग करना चाहिए ताकि कीड़ो को कोई हानि न हो।
• प्रथम से तृतीय अवस्था तक के कीड़ों को ही कीटपालन हेतु सेन्टीग्रेड तथा आद्रता 80-90 प्रतिशत होनी चाहिए।
• कीड़ों को ताजी पत्ती दिन में चार बार खिलानी चाहिए।
• प्रत्येक अवस्था के मोल्ट के पूर्व एक बार शैयया की सफाई करनी चाहिए तथा मोल्ट के समय पत्ती नहीं देनी चाहिए।
• अधिक गर्म व शीत से कीड़ों को बचाना चाहिए।
• चतुर्थ व पंचम अवस्था के दौरान तापमान 25-26 डिग्री सेन्टीग्रेट व आद्रता 70-80 प्रतिशत होनी चाहिए।
• अर्द्धपक्व व पूर्ण परिपक्व पत्ति याँ क्रमश: चतुर्थ व पंचम अवस्था के कीड़ों को खिलानी चाहिए तथा पाँच बार दिन में पत्तियाँ देनी चाहिए तथा प्रत्येक दिन शैयया की सफाई करनी चाहिए। पंचम अवस्था में 80-82 प्रतिशत पत्ती कीड़ों द्वारा खाई जाती हैं। अत: पत्ती की कमी नहीं पड़नी चाहिए।
• अरण्डी रेशम कीटपालन के दौरान शैयया में क्षमता से अधिक कीड़े नहीं रखने चाहिए।
• कमजोर, जख्मी, रोग ग्रस्त, असमान वृद्धि वाले कीड़ों को छाँट कर दो प्रतिशत फार्मलीन के घोल में डालकर जमीन में दबा देना चाहिए अथवा जला देना चाहिए।
• कीड़ों की स्पिनिंग प्रारम्भम होने के पूर्व जाली, स्टैण्ड, पुराना अखबार इत्यादि को माउण्टिंग हेतु तैयार रखना चाहिए। 150 कीड़े प्रति जाली (माउन्टेज) के हिसाब से माउन्ट कराना चाहिए।
• माउन्टिंग के बाद ग्रीष्म में 5-6 दिन के बाद व शरद में 8-9 दिन बाद कोयों की तुड़ाई करनी। चाहिए। खराब व अच्छे कोये को अलग-अलग रखना चाहिए।
अरण्डी कीटपालन का आर्थिक विश्लेेषण
• प्रति एकड़ 8x3 फिट के अन्तराल हेतु 2 किग्रा अरण्डी बीज आवश्यक होता है।
• एक एकड़ में 2000 अण्डी के पौधे मिर्च की अन्तरफसल लगा सकते है।
• 2000 अरण्डी पौधो से 5000 किग्रा० पत्तियाँ प्राप्त होती है।
• 5000 किग्रा० पत्ती का 20 प्रतिशत अर्थात 1000 किग्रा० का उपयोग रेशम कीटपालन में किया जा सकता है, जिससे अरण्डी बीज उत्पादन प्रभावित नहीं होगा।
• वर्ष में अरण्डी रेशम कीटपालन की 3-4 फसलें आसानी से ली जा सकती हैं।
• अरण्डी रेशम कीटपालन कार्य 25 दिन में सामान्यत: पूर्ण हो जाता है।
• अरण्डी के एक डी०एफ०एल० में प्राय: 300 अण्डे होते है जिनसे लगभग 240 कीड़े प्रस्फुटित होकर सामान्य स्थिति में 200 कोया तक बनाते हैं।
• एक डी०एफ०एल० के कीटपालन में 10 किग्रा० लगभग अण्डी पत्ती की खपन होती है। 1000 किग्रा अरण्डी के पत्तों से 100 डी०एफ०एल० कीड़े पाले जा सकते हैं।
• 100 डी०एफ०एल० से लगभग 60 किग्रा० अरण्डी कोया प्राप्त होगा।
• 60 किग्रा० रेशम में से, 10 कि०ग्रा० प्यूपा रहित कोया तथा 50 किग्रा० प्यूपा सामान्यत: प्राप्त होता है।
• 10 किग्रा० कोये का मूल्य रू० 600.00 प्रति कि०ग्रा० की दर से रू० 6000.00 प्राप्त होगा।
• 50 किग्रा० प्यूपा का मूल्य रू० 50.00 प्रति कि०ग्रा० की दर से रू० 2500.00 प्राप्त होगा।
• 10 किग्रा० प्यूपा रहित कोया (शैल) से 8 किग्रा० रेशम धागा प्राप्त होगा।
• 8 किग्रा० रेशम धागे का मूल्य रू० 1000.00 प्रति किग्रा० की दर से रू० 8000.00 प्राप्त होगा।
• एक एकड़ से लगभग 5 कुन्तल अरण्डी बीज प्राप्त होगा, जिसका मूल्य रू० 1500.00 प्रति कुन्तल की दर से रू० 7500.00 प्राप्त होगा।
• मिर्च की अर्न्तफसल से एक एकड़ में लगभग 10 कुन्ट0ल मिर्च का उत्पादन होगा। जिसका मूल्य रू० 1000.00 प्रति कुन्तल की दर से रू० 10,000.00 प्राप्त होगा।
इस प्रकार एक एकड़ अरण्डी की खेती से सकल आय का आगणन निम्नवत है:-
(अ) अण्डी रेशम कोया से रू० 6,000.00
(ब) प्यूपा बिक्री से रू० 2,500.00
(स) अण्डी के बीज से रू० 7,500.00
(ग) मिर्च उत्पादन से रू० 10,000.00
कुल रू० 26,000.00
यह बीमारी पूरे साल में कभी भी हो सकती है, लेकिन गर्मी और बरसात के मौसम में इसका प्रकोप बढ़ जाता है। उत्पादक (कारक) एजेंट है बॉम्बिक्स मोरी न्यूक्लियर पॉलीहेड्रोसिस वायरस | संक्रमण का स्रोत शहतूत के दूषित पत्तों को खाने की वजह से रेशम का कीट संक्रमित हो जाता है। ग्रासेरी लार्वा द्वारा छोड़ा गया दूधिया सफेद तरल पदार्थ, रेशमकीट के दूषित पालन घर और उपकरण संक्रमण का स्रोत हैं। पहले से ज्ञात कारण है उच्च तापमान, कम नमी और कम गुणवत्ता वाली शहतूत की पत्तियां।
रोग का कारक
बोरोलिना वायरस
रोग फैलने का कारण
• प्रदूषित वातावरण
• अनुपयुक्त शहतूत पत्ती
• कीटों का उचित फैलाव न होना
• कीटपालन कक्ष का तापक्रम एवं अपेक्षित आर्द्रता का अधिक होना।
रोग के लक्षण
• रेशम कीट का शरीर फूलना
• त्वचा का मुलायम होना
• दूधिया शरीर एवं फोड़ने से दूधिया द्रव का निकलना
• रेशम कीटों का कीटपालन बेड से निकलकर घूमना
• कीटों की मृत्यु।
रोग का प्रबंधन
• किसी भी अनुमोदित कीटाणुनाशक से पालन घर उसके आसपास की जगह और उपकरणों का पूरी तरह से कीटाणुरहित करें।
• पिछली फसल में रोग की उच्च दर देखी गई हो तो 0.3 प्रतिशत शमित चूने के घोल के साथ एक वैकल्पिक कीटाणुशोधन करें।
• व्यक्तिगत और पालन में स्वच्छता का अभ्यास करें।
• रोगग्रस्त लार्वा एकत्र करें और इसके उचित निपटान को सुनिश्चित करें।
• पालन घर में इष्टतम तापमान और नमी बनाए रखें।
• गुणवत्ता युक्त शहतूत की पत्ती खिलाएं और अत्यधिक भीड़ से बचने की कोशिश करें।
• समय और मात्रा के अनुसार अनुमोदित बिस्तर कीटाणुनाशक का प्रयोग करें।
• ग्रासेरी रोग के नियंत्रण कार्यक्रम के अनुसार एमर्थ खिलाएं।
फ्लेचरी
गर्मी और बरसात के मौसम के दौरान बीमारी का होना आम है। संक्रमण के स्रोत हैं रेशम के कीट शहतूत की दूषित पत्ती खाने से संक्रमित हो जाते हैं। मृत रोगग्रस्त रेशमकीट, इसके मल पदार्थ, आंत का रस, शरीर के तरल पदार्थ रोगज़नक़ संदूषण के स्रोत हैं। चोट/कटने/घाव के माध्यम से भी संक्रमण भी हो सकता है।पहले से ज्ञात कारक है तापमान में अस्थिरता, उच्च आर्द्रता और पत्तियों की खराब गुणवत्ता।
उत्पादक (कारक) एजेंट है बॉम्बिक्स मोरी संक्रामक फ्लेचरी वायरस/बॉम्बिक्स मोरी डेन्सोन्यूक्लियोसिस वायरस या विभिन्न रोगजनक बैक्टीरिया अर्थात्, स्ट्रैपटोकोकस एसपी./ स्टाफीलोकोकस एसपी./ बेसिलस थुरिनजिनेसिस/सेराटिया मार्सेनसी अलग-अलग या बैक्टीरिया और वायरसों के संयोजन में।
रोग का कारक
स्मिथिया एवं अन्य वायरस
डिप्लोकोकस एवं अन्य बैक्टीरिया
रोग फैलने का कारण
• वायु जनित
• प्रदूषित कीटाण्ड
• प्रदूषित शहतूत की पत्ती
• कीटपालन कक्ष एवं कीटपालन उपकरणों का विशुद्धीकरण विधिवत न होना एवं अनियमित तापक्रम।
रोग के लक्षण
• कीट की शिथिलता
• भूख कम लगना
• वृद्धि दर कम होना
• कीट की मृत्यु के बाद भूरे या काले रंग का द्रव निकलना।
रोग का प्रबंधन
• ऊपर उल्लिखित अनुमोदित कीटाणुनाशक से पालन घर, उसके आसपास की जगह और उपकरणों को कीटाणुरहित करें।
• रोगग्रस्त लार्वा को उठाएं और जला कर उन्हें समाप्त करें।
• धूप और बताए गए आदानों के तहत उगाई गई अच्छी गुणवत्ता की पत्ती प्रदान करें। रेशम के कीड़ों को अधिक परिपक्व/अधिक समय से संग्रहित/ गंदी पत्ती न दें।
• पालन बिस्तर में भुखमरी, भीड़भाड़ और मल के संचय से बचें।
• रेशम के कीड़ों को इष्टतम तापमान और आर्द्रता के तहत पालें।
• लार्वा को चोट से बचाएं।
• निर्धारित समय और मात्रा के अनुसार अनुमोदित बिस्तर कीटाणुनाशक का प्रयोग करें।
• फ्लैचिरी रोग के नियंत्रण के लिए कार्यक्रम के अनुसार एमर्थ खिलाएं।
मैटिन
रोग का कारक
स्ट्रेप्टोकाकस बैक्टीरिया एवं अन्य वायरस।
रोग फैलने का कारण
• प्रदूषित पत्ती
• कीटपालन कक्ष एवं उपकरणों का विशुद्धीकरण विधिवत न होना
• कीटपालन कक्ष का अनियंत्रित तापमान एवं वायु संचरण की समुचित व्यवस्था न होगा।
रोग के लक्षण
सिर का फूलना एवं द्रव ओमिट करना।
मसकार्डिन
बरसात और सर्दियों के मौसम में इस बीमारी का होना आम है।उत्पादक (कारक) एजेंट है फफूंद की बीमारियों में, व्हाइट मस्करडाइन आम है। यह बीमारी ब्यूवेरिया बासियाना की वजह से होती है। संक्रमण के स्रोत हैं कोनिडिया के रेशमकीट के शरीर के संपर्क में आने पर यह संक्रमण शुरू होता है। परिरक्षित रेशम के कीड़े/वैकल्पिक मेजबान (अधिकतर लेपीडोप्टेरॉन कीट होते हैं), दूषित पालन घर और उपकरण संक्रमण के स्रोत हैं।पहले से ज्ञात कारक है उच्च नमी के साथ कम तापमान।
रोग का कारक
• फंगस(बीनबेरिया, बेसियाना)
• रोग फैलने का कारण
• प्रदूषित पत्ती एवं उपकरण।
रोग के लक्षण
• कीटों का शरीर कड़ा होना तथा सूखना
• पैथोजन के रंग के अनुसार शरीर का रंग सफेद, हरा, पीला या लाल होना।
रोग का प्रबंधन
• ऊपर उल्लिखित अनुमोदित कीटाणुनाशक से पालन घर, उसके आसपास की जगह और उपकरणों को कीटाणुरहित करें।
• शहतूत के बगीचे में शहतूत कीट को नियंत्रित करें।
• परीरक्षित होने से पहले रोगग्रस्त लार्वा को उठाएं और उन्हें जला कर समाप्त कर दें।
• पालन घर में कम तापमान और उच्च आर्द्रता से बचें। यदि आवश्यक हो तापमान बढ़ाने के लिए हीटर/स्टोव का उपयोग करें।
• त्वचा गिरने के समय शमित चूना पाउडर से झाड़ कर बरसात के मौसम के दौरान बिस्तर की नमी को विनियमित करें।
• निर्धारित समय और मात्रा के अनुसार बिस्तर कीटाणुनाशक, विजेथा और विजेथा पूरक/अंकुश/किसी भी अनुमोदित बिस्तर कीटाणुनाशक का प्रयोग करें।
पेब्रीन
यह गैर मौसमी है| उत्पादक (कारक) एजेंट है नोसेमा बॉम्बिक्स / माइक्रोस्पोरिडिया के विभिन्न प्रकार। संक्रमण के स्रोत है रेशमकीट अंडे (ट्रांसोवेरियम /ट्रांसोवम ट्रांसमिशन) के माध्यम से या दूषित शहतूत की पत्ती खाने से संक्रमित हो जाता है। रेशम के संक्रमित कीड़े, मल, संदूषित पालन घर और उपकरण एवं वैकल्पिक मेजबान (शहतूत कीट) संक्रमण के स्रोत हैं।
रोग का कारक
नोसेमा बोम्बाईसिस एक बिजाणु
रोग फैलने का कारण
• बीमारी युक्त रेशम कीटाण्ड
• प्रदूषित शहतूत पत्ती एवं प्रदूषित कीटपालन, उपकरण।
रोग के लक्षण
• असामान्य मोल्टिंग
• कीटपालन बेड में विभिन्न आकार के रेशम कीट
• कीटों में भूख का अभाव
• बीमारी की विभिन्न अवस्था में रेशम कीटों के शरीर पर काले रंग के धब्बे।
रेशम कीटाण्डों का सघन माइक्रोस्कोपिक परीक्षण, रेशम कीटपालन गृह एवं उपकरणों का सघन विशुद्धीकरण, बीमार रेशम कीट पाये जाने की दशा में बीमार कीटों को गहरे गड्ढे में दबाना। असामान्य मोल्टिंग अवस्था अथवा असामान्य रेशम कीट विकास की दशा में तुरन्त माइक्रोस्कोपिक परीक्षण कर आवश्यक निदान किया जाना।
रोग का प्रबंधन
ऊपर उल्लिखित अनुमोदित कीटाणुनाशक से पालन घर, उसके आसपास की जगह और उपकरणों को कीटाणुरहित करें।
रोगमुक्त अंडों के उत्पादन और पालन के लिए माँ कीट की सख्ती से जाँच करें और रेशमकीट अंडे की सतह को कीटाणुरहित करें।
पालन के दौरान कठोर स्वच्छता रखरखाव का पालन करें।
शहतूत के बगीचे में और आसपास शहतूत कीटों का नियंत्रण करें।
समय और मात्रा के अनुसार अनुमोदित बिस्तर कीटाणुनाशक, विजेथा/अंकुश का प्रयोग करें।
माइक्रोस्पोडियन संक्रमण को खत्म करने के लिए लगातार बीज फसलों की निगरानी करें।
रेशम में कीटाणु
उजी (यूजेडआई) मक्खी
उजी (यूजेडआई) मक्खी, एक्सोरिस्ता बॉम्बिसिस रेशमकीट, बॉम्बिक्स मोरी की एक गंभीर एंडो लार्वा परजीवी है, जो रेशम उत्पादन में प्रमुख कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु राज्यों के रेशमकीट कोकून की फसल को 10-15%उजी (यूजेडआई) मक्खी साल भर होती है, लेकिन बरसात के मौसम के दौरान इसकी उग्रता बढ़ जाती है। अंडे या रेशमकीट के शरीर पर काले निशान की मौजूदगी और कोकून की नोक पर भुनगा उद्भव छेद उजी मक्खी के हमले के विशिष्ट लक्षण हैं।
उजी (यूजेडआई) मक्खी जैसे ही पालन घर में प्रवेश करती है, यह प्रत्येक रेशमकीट लार्वा पर एक या दो अंडे देती है। 2-3 दिन में, अंडे से निकले बच्चे लार्वा के अंदर प्रवेश करते हैं और 5-7 दिनों के लिए उसके अंदर की सामग्री को खाते
नियंत्रण के उपाय
बहिष्करण विधि
• सभी खिड़कियों/दरवाजों पर तार के जाल/ नायलॉन की जाली लगाएं।
• स्वत: बंद होने वाले तंत्र युक्त दरवाजे लगाएं।
• पालन घर के प्रवेश द्वार पर उप-कक्ष बनाएं
• पत्तों को पालन घर के बरामदे में रखें और पत्तों को पालन घर में स्थानांतरित करने से पहले उजी मक्खी का पता लगाने के लिए निगरानी रखें।
• भौतिक (उजी जाल का उपयोग करना)
• एक मेज को 1 लीटर पानी में डुबोएं और तीसरे इनस्टार से कताई के स्थान की तरफ घोल को सफेद ट्रे में डालकर पालन घर में खिड़की के आधार पर अंदर और बाहर दोनों तरफ रखें।
• अंदर से उभरने वाली उजी मक्खियों को पकड़ने के लिए पालन घर/ऊपरी हॉल के अंदर उजी जाल लगाएं, कताई के बाद 20 दिनों तक बंद दरवाजे की स्थिति के तहत रखें ।
जैविक
• पाँचवें इनस्टार से दूसरे दिन पालन घर के अंदर नेसोलिन्क्स थाईमस को मुक्त करें (उजी मक्खी का एक प्यूपा परजीवी।
• कताई के सभी कीड़ों को चढ़ाने के बाद उन थैलियों को चान्ड्राइकों के पास स्थानांतरित कर दें।
• कोकूनों की कटाई के बाद उन थैलियों को खाद के गड्ढे के पास ही रखें।
• 100डीएफएलएस के लिए दो थैलियों की आवश्यकता होती है।
कोकून की फसल समेटने के बाद रेशमकीट के कचरे का उचित निपटान
• शहतूत की टहनियों से रेशमकीट के कचरे को अलग करें।
• रेशमकीट के कचरे को खुली जगह/कूड़े के गड्ढे में न फेंकें क्योंकि इसमें उजी मक्खी के सैकड़ों भुनगे शामिल होते हैं।
• इसके बजाय इसे 15 से 20 दिन के लिए प्लास्टिक की थैलियों में पैक करके रखें और कूड़े से उजी मक्खी के उद्भव को रोकें। वैकल्पिक रूप से इसे मिट्टी में दफनाया या तुरंत जलाया जा सकता है।
नेसोलिनक्स थाइमस की उपलब्धता
कीट प्रबंधन प्रयोगशाला, सीएसआरटीआई, मैसूर में उपलब्ध है। आवश्यक पाउच की संख्या और रेशम के कीड़ों की ब्रशिंग की तारीख का संकेत करते हुए ब्रशिंग की तारीख के दिन के लिए मांग रखें। 25 रुपये प्रति थैली (पाउच) के अग्रिम भुगतान की रसीद पर कूरियर द्वारा आपूर्ति की जाती है।
डर्मेस्टिड भृंग
डर्मेस्टिड भृंग, डरमिस्टिस अटर को कोकून भंडारण कमरे में छेद वाले कोकूनों पर हमला करने के लिए जाना जाता है। मादा भृंग कोकूनों के कोये में लगभग 150-250 अंडे देती है। भृंग कोकून भंडारण कमरे से ग्रेनेज की ओर जाते हैं और हरे कोकून के साथ ही रेशम के कीटों पर भी हमला करते हैं। आम तौर पर वे कीट के पेट के क्षेत्र पर हमला करते हैं। कोकूनों को 16.62% और रेशम के कीटों को 3.57% क्षति होने का अनुमान है।
डर्मेस्टिड भृंग का प्रबंधन
रोकथाम के उपाय
• अस्वीकृत कोकूनों और नष्ट अंडों के लंबी अवधि के लिए संग्रहण से बचें।
• पालन घर और कोकून भंडारण कमरे को समय-समय पर साफ करें।
• रेशम के कीट के उद्भव से पहले और बाद में ग्रेनेज परिसर को साफ किया जाना चाहिए।
• छेद वाले कोकून (पीसी) के भंडारण कमरे में दरवाजे और खिड़कियों पर तार के जाल लगाएं
• भंडारण कमरे और ग्रेनेज के लकड़ी के सामानों को 2-3 मिनट के लिए 0.2% मेलाथियान घोल में डूबाना चाहिए। दुबारा उपयोग से पहले ट्रे आदि को अच्छी तरह से धोना और धूप में 2-3 दिनों के लिए सुखाना चाहिए।
यांत्रिक नियंत्रण
झाड़ू लगाने द्वारा या एक वैक्यूम क्लीनर का उपयोग करके घुनों (ग्रब्स) और वयस्कों को इकठ्ठा करें, जला कर या साबुन पानी में डुबाकर नष्ट कर दें।
रासायनिक नियंत्रण
• छेद वाले कोकूनों को डेल्टामेथ्रिन से उपचारित थैलों में रखें यानी, थैलों को 0.028% डेल्टामेथ्रिन घोल में भिगाएं (1 लीटर: 100 लीटर पानी) छाया में सुखाएं ।
• 3 महीने में एक बार पीसी कमरे की दीवारों और फर्श पर 0.028% डेल्टामेथ्रिन घोल का छिड़काव करें।
• पीसी कमरे से घुनों (ग्रब्स) के रेंगने को रोकने के लिए पीसी कक्ष की सभी भीतरी दीवारों के चारों ओर ब्लीचिंग पाउडर (200 ग्राम/वर्गमीटर) का छिड़काव करें।
विभिन्न मौसमों के रेशम कीटपाल में पायी जाने वाली बीमारियां एवं रोकथाम के उपाय
बसन्त फसल (फरवरी/मार्च)
वातावरण 23-30 डिग्री सें. तापक्रम
60-70 प्रतिशत आपेक्षित आर्द्रता।
सम्भावित बीमारी ग्रसरी, मसकार्डिन
रोकथाम का उपाय
1. कीटपालन गृह का तापक्रम एवं अपेक्षित आर्द्रता अवस्थानुसार बनाये रखना चाहिए।
2. बीमारीयुक्त कीट को कीटपालन बेड से निकाल देना चाहिए। मसकार्डिन से ग्रसित कीटों को जला देना चाहिये।
3. विजेता, आर.के.ओ. या लेबेक्स पाउडर का छिड़काव करना चाहिये।
4. कीटपालन समाप्त होने के उपरान्त कीटपालन उपकरणों को 5 प्रतिशत ब्लीचिंग पाउडर घोल में न्यूनतम 5 मिनट डुबोते हुए सफाई करनी चाहिये।
ग्रीष्म फसल (अप्रैल/मई)
वातावरण 28-35 डिग्री सें. तापक्रम
55-65 प्रतिशत आपेक्षित आर्द्रता।
सम्भावित बीमारी फ्लेचरी, गैटीग
रोकथाम का उपाय
1. कीटपालन कक्ष का तापक्रम कम किया जाए तथा आपेक्षित आर्द्रता में वृद्धि की जाए।
2. रोगग्रस्त कीट को बेड से निकालकर गड्ढे में डाल कर मिट्टी से दबा दिया जाए।
3. रेशम कीटों को दी जानी वाली पत्ती पौष्टिक हो तथा नमीयुक्त हो।
4. पत्ती संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाए।
5. रेशम कीट औषधियों, विजेता अथवा आर.के.ओ. का नियमित प्रयोग किया जाए।
6. कीटपालन गृह में हवा के आवगमन की व्यवस्था की जाए।
मानसून फसल (अगस्त/सितम्बर)
वातावरण 30-35 डिग्री सं. तापक्रम
90-95 प्रतिशत आपेक्षित आर्द्रता।
सम्भावित बीमारी ग्रेसरी एवं फ्लेचरी
रोकथाम का उपाय
1. कीटपालन कक्ष का तापक्रम एवं आपेक्षित आर्द्रता को नियंत्रित करने हेतु कक्ष की खिड़की एवं रोशनदान को आवश्यकतानुसार खुला रखा जाए।
2. अपेक्षित आर्द्रता को कम करने हेतु कीटपालन कक्ष की फर्श पर बुझे हुये चूने का छिड़काव किया जाए।
3. कीटों को खाने हेतु पत्तीक आवश्यकतानुसार ही दी जानी चाहिये तथा प्रयास किया जाना चाहिये कि बेड मोटा न हो।
4. अपेक्षाकृत कम नमी युक्त पत्तीह कीटों को खाने हेतु देना चाहिये।
5. रेशम कीट औषधियों, विजेता अथवा आर.के.ओ. का उपयोग मोल्ट के अतिरिक्त सभी अवस्थाओं में नियमित रूप से प्रयोग किया जाना चाहिये।
6. रोग ग्रसित कीटों को तुरन्त कीटपालन बेड से निकालकर गड्ढे में दबा देना चाहिये।
7. कीटपालन कक्ष एवं उसके आस पास के स्थानों में स्वच्छता का वातावरण रखना चाहियें।
पतझड़ आटम फसल (अक्टूबर/नवम्बर)
वातावरण 25-30 डिग्री सं. तापक्रम
60-80 प्रतिशत आपेक्षित आर्द्रता।
सम्भावित बीमारी मसकार्डिन, ग्रेसरी
रोकथाम का उपाय
1. कीटपालन गृह का तापक्रम एवं अपेक्षित आर्द्रता अवस्थानुसार बनाये रखना चाहिए।
2. बीमारीयुक्त कीट को कीटपालन बेड से निकाल देना चाहिए। मसकार्डिन से ग्रसित कीटों को जला देना चाहिये।
3. विजेता, आर.के.ओ. या लेबेक्स पाउडर का छिड़काव करना चाहिये।
4. कीटपालन समाप्त होने के उपरान्त कीटपालन उपकरणों को 5 प्रतिशत ब्लीचिंग पाउडर घोल में न्यूनतम 5 मिनट डुबोते हुए सफाई करनी चाहिये।
विशेष: यदि कीटपालन गृह का तापमान अपेक्षित तापमान से काफी कम हो जाए तो कीटपालन गृह को तापमान को वैकल्पिक साधनों से अपेक्षित स्तर तक लाने का प्रयास किया जाना चाहिये।
शहतूत संरक्षा
बायोनेमा - रूटनॉट रोग के नियंत्रण हेतु बायोनेमेटिसाइड।
रक्षा - रूटरॉट रोग के नियंत्रण हेतु उपयोग किए जाने वाला जैव फफूंदीनाशक (बयोफगीसाइड)
नर्सरी गार्ड - नर्सरी में होने वाले अन्यप रोगों से बचाव हेतु जैव फफूंदीनाशक (बायोफंगीसाइड)
शहतूत के पत्ते संबंधी रोगों का प्रबंधन
लीफ स्पॉफट (सर्कोस्पो रा मोरीकोला) - 0.2 प्रतिशत बैविस्टिन (कार्वेनडैजिम 50 प्रतिशत डब्यू्पॉ पी) का फोलियर स्प्रे ।
पाउडरी माईल्ड्यू (फाइलैक्टीानिया कोरिल्याे) - 0.2 प्रतिशत बैविस्टिन/कराथेन (डाइनोकैप 30 पतिशत ईसी) का फोलियर स्प्रे ।
लीफ रस्ट (सेरोटीलियम फिकी) - पत्तों की लवनी में अधिक अंतर रखना और देर न करना। साथ ही, 0.2 प्रतिशत कवच (क्लोपरोथेलेब्लि 75 प्रतिशत डब्यूदेर पी) का फोलियर स्प्रेस।
बैक्टीसरियल ब्ला इट (स्यू(डोमोनस सिरिन्गे् पीवी मोरी/जैन्थोेमोनस कम्पेयस्ट्री स पीवी मोरी) - अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में वर्षा के मौसम के दौरान छटाई (जमीन से 30 सेमी ऊपर) छंटाई को बढाता है। 2-3 दिन की सुरक्षित अवधि के भीतर 0.2 प्रतिशत स्ट्रेेप्टोईमायसिन अथवा डाइथेन एम-45 (मैंकोजब 75 प्रतिश डब्यूभीतरपी) भी स्प्रे करें।
शहतूत में टुकरा के कारक मीली बग के लिए आईपीएम - आईपीएम टुकरा होने को 70 प्रतिशत तक रोकता है।
रेशमकीट संरक्षा
अमृत - ग्रासरी और फ्लेचरी को दबाने हेतु पर्यावरणानुकूल वनस्पईति आधारित संरचना।
अंकुश - यह एक पर्यावरणानुकूल क्याेरी कीटाणुनाशक है जो सामान्यध रेशमकीट संबंधी रोगों को फैलने से रोकता है।
विजेता-क्याकरी कीटाणुनाशक - एक प्रभावी क्याजरी कीटाणुनाशक विजेता विभिन्नो रेशमकीट रोगों को फैलने से रोकता है।
रेशमकीट औषध - क्यायरी कीटाणुनाशक - यह एक अन्यस क्याुरी कीटाणुनाशक है जो विभिन्न रेशमकीट रोगों को फैलने से रोकता है।
सैनीटेक - यह एक सक्षम और असंक्षरक कीटाणुनाशक है। यह खुले पालन गृहों में अधिक उपयोगी होता है जहां वरत नियंत्रित दशाएं संभव नहीं हैं।
यूजी कीट के प्रबंधन हेतु यूजीट्रैप - यूजी संक्रमण का 84 प्रतिशत तक प्रबंधन किया जा सकता है। इससे उत्पा दन/100 डीएफएलएस में 8 कि. ग्रा. की वृद्धि होती है।
रक्षा रेखा - यह एक कीटणुनाशक चॉक है जिससे रेशमकीट पालन के दौरान चीटीयों और काक्रोचों पर नियंत्रण किया जा सकता है।

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