सुमित्रानंदन पंत-जीवन परिचय

सुमित्रानंदन पंत-जीवन परिचय

 

सुमित्रानंदन पंत-जीवन परिचय




 

सुमित्रानंदन पंत

जन्म: २० मई, १९००

कौसानी, बागेश्वर, उत्तराखंड, भारत

मृत्यु: २८ दिसम्बर, १९७७

इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश, भारत

कार्यक्षेत्र:      अध्यापक, लेखक

राष्ट्रीयता:    भारतीय

भाषा:

हिन्दी

काल:  आधुनिक काल

विधा:

पद्य

विषय:          गीत, कविताएँ

साहित्यिक

आन्दोलन:

छायावाद,

रहस्यवाद प्रगतिवाद

प्रमुख कृति(याँ):     चिदंबरा कविता संग्रह

हस्ताक्षर:    

 

सुमित्रानंदन पंत (२० मई १९०० - २८ दिसम्बर १९७७) हिंदी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। इस युग को जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' और रामकुमार वर्मा जैसे कवियों का युग कहा जाता है। उनका जन्म बागेश्वर में हुआ था। झरना, बर्फ, पुष्प, लता, भंवरा गुंजन, उषा किरण, शीतल पवन, तारों की चुनरी ओढ़े गगन से उतरती संध्या ये सब तो सहज रूप से काव्य का उपादान बने। निसर्ग के उपादानों का प्रतीक बिम्ब के रूप में प्रयोग उनके काव्य की विशेषता रही। उनका व्यक्तित्व भी आकर्षण का केंद्र बिंदु था, गौर वर्ण, सुंदर सौम्य मुखाकृति, लंबे घुंघराले बाल, उंची नाजुक कवि का प्रतीक समा शारीरिक सौष्ठव उन्हें सभी से अलग मुखरित करता था।[1]

अनुक्रम

        1जीवन परिचय

        2साहित्य सृजन

        3विचारधारा

        4पुरस्कार सम्मान

        5स्मृति विशेष

        6इन्हें भी देखें

        7सन्दर्भ

        8बाहरी कड़ियाँ

जीवन परिचय

पंत का जन्म अल्मोड़ा ज़िले के कौसानी नामक ग्राम में २० मई १९०० . को हुआ। जन्म के छह घंटे बाद ही उनकी माँ का निधन हो गया। उनका लालन-पालन उनकी दादी ने किया। उनका प्रारंभिक नाम गुसाई दत्त रखा गया।[2] वे सात भाई बहनों में सबसे छोटे थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा अल्मोड़ा में हुई। १९१८ में वे अपने मँझले भाई के साथ काशी गए और क्वींस कॉलेज में पढ़ने लगे। वहाँ से माध्यमिक परीक्षा उत्तीर्ण कर वे इलाहाबाद चले गए। उन्हें अपना नाम पसंद नहीं था, इसलिए उन्होंने अपना नया नाम सुमित्रानंदन पंत रख लिया। यहाँ म्योर कॉलेज में उन्होंने बारवीं में प्रवेश लिया। १९२१ में असहयोग आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के भारतीयों से अंग्रेजी विद्यालयों, महाविद्यालयों, न्यायालयों एवं अन्य सरकारी कार्यालयों का बहिष्कार करने के आह्वान पर उन्होंने महाविद्यालय छोड़ दिया और घर पर ही हिन्दी, संस्कृत, बँगला और अंग्रेजी भाषा-साहित्य का अध्ययन करने लगे।इलाहाबाद में वे कचहरी के पास प्रकृति सौंदर्य से सजे हुए एक सरकारी बंगले में रहते थे। उन्होंने इलाहाबाद आकाशवाणी के शुरुआती दिनों में सलाहकार के रूप में भी कार्य किया। उन्हें मधुमेह हो गया था। उनकी मृत्यु २८ दिसम्बर १९७७ को हुई।

 

साहित्य सृजन

सात वर्ष की उम्र में, जब वे चौथी कक्षा में ही पढ़ रहे थे, उन्होंने कविता लिखना शुरु कर दिया था। १९१८ के आसपास तक वे हिंदी के नवीन धारा के प्रवर्तक कवि के रूप में पहचाने जाने लगे थे। इस दौर की उनकी कविताएं वीणा में संकलित हैं। १९२६-२७ में उनका प्रसिद्ध काव्य संकलनपल्लवप्रकाशित हुआ। कुछ समय पश्चात वे अपने भाई देवीदत्त के साथ अल्मोडा गये। इसी दौरान वे मार्क्स फ्रायड की विचारधारा के प्रभाव में आये। १९३८ में उन्होंनेरूपाभनामक प्रगतिशील मासिक पत्र निकाला। शमशेर, रघुपति सहाय आदि के साथ वे प्रगतिशील लेखक संघ से भी जुडे रहे। वे १९५५ से १९६२ तक आकाशवाणी से जुडे रहे और मुख्य-निर्माता के पद पर कार्य किया। उनकी विचारधारा योगी अरविन्द से प्रभावित भी हुई जो बाद की उनकी रचनाओं में देखी जा सकती है।वीणातथापल्लवमें संकलित उनके छोटे गीत विराट व्यापक सौंदर्य तथा पवित्रता से साक्षात्कार कराते हैं।युगांतकी रचनाओं के लेखन तक वे प्रगतिशील विचारधारा से जुडे प्रतीत होते हैं।युगांतसेग्राम्यातक उनकी काव्ययात्रा प्रगतिवाद के निश्चित प्रखरस्वरोंकी उदघोषणा करती है। उनकी साहित्यिक यात्रा के तीन प्रमुख पडाव हैंप्रथम में वे छायावादी हैं, दूसरे में समाजवादी आदर्शों से प्रेरित प्रगतिवादी तथा तीसरे में अरविन्द दर्शन से प्रभावित अध्यात्मवादी। १९०७ से १९१८ के काल को स्वयं उन्होंने अपने कवि-जीवन का प्रथम चरण माना है। इस काल की कविताएँ वीणा में संकलित हैं। सन् १९२२ में उच्छवास और १९२८ में पल्लव का प्रकाशन हुआ। सुमित्रानंदन पंत की कुछ अन्य काव्य कृतियाँ हैं - ग्रन्थि, गुंजन, ग्राम्या, युगांत, स्वर्णकिरण, स्वर्णधूलि, कला और बूढ़ा चाँद, लोकायतन, चिदंबरा, सत्यकाम आदि। उनके जीवनकाल में उनकी २८ पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जिनमें कविताएं, पद्य-नाटक और निबंध शामिल हैं। पंत अपने विस्तृत वाङमय में एक विचारक, दार्शनिक और मानवतावादी के रूप में सामने आते हैं किंतु उनकी सबसे कलात्मक कविताएं 'पल्लव' में संकलित हैं, जो १९१८ से १९२५ तक लिखी गई ३२ कविताओं का संग्रह है।[3]

विचारधारा

उनका संपूर्ण साहित्य 'सत्यम शिवम सुंदरम' के आदर्शों से प्रभावित होते हुए भी समय के साथ निरंतर बदलता रहा है। जहां प्रारंभिक कविताओं में प्रकृति और सौंदर्य के रमणीय चित्र मिलते हैं वहीं दूसरे चरण की कविताओं में छायावाद की सूक्ष्म कल्पनाओं कोमल भावनाओं के और अंतिम चरण की कविताओं में प्रगतिवाद और विचारशीलता के। उनकी सबसे बाद की कविताएं अरविंद दर्शन और मानव कल्याण की भावनाओं से ओतप्रोत हैं।[4] पंत परंपरावादी आलोचकों और प्रगतिवादी प्रयोगवादी आलोचकों के सामने कभी नहीं झुके। उन्होंने अपनी कविताओं में पूर्व मान्यताओं को नकारा नहीं। उन्होंने अपने ऊपर लगने वाले आरोपों को 'नम्र अवज्ञा' कविता के माध्यम से खारिज किया। वह कहते थे 'गा कोकिला संदेश सनातन, मानव का परिचय मानवपन।'

पुरस्कार सम्मान

हिंदी साहित्य सेवा के लिए उन्हें पद्मभूषण(1961), ज्ञानपीठ(1968)[5], साहित्य अकादमी[6], तथा सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार[7] जैसे उच्च श्रेणी के सम्मानों से अलंकृत किया गया। सुमित्रानंदन पंत के नाम पर कौशानी में उनके पुराने घर को जिसमें वे बचपन में रहा करते थे, सुमित्रानंदन पंत वीथिका के नाम से एक संग्रहालय के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है। इसमें उनके व्यक्तिगत प्रयोग की वस्तुओं जैसे कपड़ों, कविताओं की मूल पांडुलिपियों, छायाचित्रों, पत्रों और पुरस्कारों को प्रदर्शित किया गया है।[8] इसमें एक पुस्तकालय भी है, जिसमें उनकी व्यक्तिगत तथा उनसे संबंधित पुस्तकों का संग्रह है।[9][10] उनका देहांत १९७७ में हुआ।

स्मृति विशेष

उत्तराखंड में कुमायुं की पहाड़ियों पर बसे कउसानी गांव में, जहाँ उनका बचपन बीता था, वहां का उनका घर आज 'सुमित्रा नंदन पंत साहित्यिक वीथिका' नामक संग्रहालय बन चुका है। इस में उनके कपड़े, चश्मा, कलम आदि व्यक्तिगत वस्तुएं सुरक्षित रखी गई हैं। संग्रहालय में उनको मिले ज्ञानपीठ पुरस्कार का प्रशस्तिपत्र, हिंदी साहित्य संस्थान द्वारा मिला साहित्य वाचस्पति का प्रशस्तिपत्र भी मौजूद है। साथ ही उनकी रचनाएं लोकायतन, आस्था, रूपम आदि कविता संग्रह की पांडुलिपियां भी सुरक्षित रखी हैं। कालाकांकर के कुंवर सुरेश सिंह और हरिवंश राय बच्चन से किये गये उनके पत्र व्यवहार की प्रतिलिपियां भी यहां मौजूद हैं।

संग्रहालय में उनकी स्मृति में प्रत्येक वर्ष पंत व्याख्यान माला का आयोजन होता है। यहाँ से 'सुमित्रानंदन पंत व्यक्तित्व और कृतित्व' नामक पुस्तक भी प्रकाशित की गई है। उनके नाम पर इलाहाबाद शहर में स्थित हाथी पार्क का नाम सुमित्रा नंदन पंत उद्यान कर दिया गया है।

सुमित्रानंदन पंत (२० मई १९०० - २८ दिसम्बर १९७७) हिंदी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। इस युग को जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' और रामकुमार वर्मा जैसे कवियों का युग कहा जाता है। उनका जन्म बागेश्वर में हुआ था। झरना, बर्फ, पुष्प, लता, भंवरा गुंजन, उषा किरण, शीतल पवन, तारों की चुनरी ओढ़े गगन से उतरती संध्या ये सब तो सहज रूप से काव्य का उपादान बने। निसर्ग के उपादानों का प्रतीक बिम्ब के रूप में प्रयोग उनके काव्य की विशेषता रही। उनका व्यक्तित्व भी आकर्षण का केंद्र बिंदु था, गौर वर्ण, सुंदर सौम्य मुखाकृति, लंबे घुंघराले बाल, उंची नाजुक कवि का प्रतीक समा शारीरिक सौष्ठव उन्हें सभी से अलग मुखरित करता था।[1]

पंत का जन्म अल्मोड़ा ज़िले के कौसानी नामक ग्राम में २० मई १९०० . को हुआ। जन्म के छह घंटे बाद ही उनकी माँ का निधन हो गया। उनका लालन-पालन उनकी दादी ने किया। उनका प्रारंभिक नाम गुसाई दत्त रखा गया।[2] वे सात भाई बहनों में सबसे छोटे थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा अल्मोड़ा में हुई। १९१८ में वे अपने मँझले भाई के साथ काशी गए और क्वींस कॉलेज में पढ़ने लगे। वहाँ से माध्यमिक परीक्षा उत्तीर्ण कर वे इलाहाबाद चले गए। उन्हें अपना नाम पसंद नहीं था, इसलिए उन्होंने अपना नया नाम सुमित्रानंदन पंत रख लिया। यहाँ म्योर कॉलेज में उन्होंने बारवीं में प्रवेश लिया। १९२१ में असहयोग आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के भारतीयों से अंग्रेजी विद्यालयों, महाविद्यालयों, न्यायालयों एवं अन्य सरकारी कार्यालयों का बहिष्कार करने के आह्वान पर उन्होंने महाविद्यालय छोड़ दिया और घर पर ही हिन्दी, संस्कृत, बँगला और अंग्रेजी भाषा-साहित्य का अध्ययन करने लगे।इलाहाबाद में वे कचहरी के पास प्रकृति सौंदर्य से सजे हुए एक सरकारी बंगले में रहते थे। उन्होंने इलाहाबाद आकाशवाणी के शुरुआती दिनों में सलाहकार के रूप में भी कार्य किया। उन्हें मधुमेह हो गया था। उनकी मृत्यु २८ दिसम्बर १९७७ को हुई।

सात वर्ष की उम्र में, जब वे चौथी कक्षा में ही पढ़ रहे थे, उन्होंने कविता लिखना शुरु कर दिया था। १९१८ के आसपास तक वे हिंदी के नवीन धारा के प्रवर्तक कवि के रूप में पहचाने जाने लगे थे। इस दौर की उनकी कविताएं वीणा में संकलित हैं। १९२६-२७ में उनका प्रसिद्ध काव्य संकलनपल्लवप्रकाशित हुआ। कुछ समय पश्चात वे अपने भाई देवीदत्त के साथ अल्मोडा गये। इसी दौरान वे मार्क्स फ्रायड की विचारधारा के प्रभाव में आये। १९३८ में उन्होंनेरूपाभनामक प्रगतिशील मासिक पत्र निकाला। शमशेर, रघुपति सहाय आदि के साथ वे प्रगतिशील लेखक संघ से भी जुडे रहे। वे १९५५ से १९६२ तक आकाशवाणी से जुडे रहे और मुख्य-निर्माता के पद पर कार्य किया। उनकी विचारधारा योगी अरविन्द से प्रभावित भी हुई जो बाद की उनकी रचनाओं में देखी जा सकती है।वीणातथापल्लवमें संकलित उनके छोटे गीत विराट व्यापक सौंदर्य तथा पवित्रता से साक्षात्कार कराते हैं।युगांतकी रचनाओं के लेखन तक वे प्रगतिशील विचारधारा से जुडे प्रतीत होते हैं।युगांतसेग्राम्यातक उनकी काव्ययात्रा प्रगतिवाद के निश्चित प्रखरस्वरोंकी उदघोषणा करती है। उनकी साहित्यिक यात्रा के तीन प्रमुख पडाव हैंप्रथम में वे छायावादी हैं, दूसरे में समाजवादी आदर्शों से प्रेरित प्रगतिवादी तथा तीसरे में अरविन्द दर्शन से प्रभावित अध्यात्मवादी। १९०७ से १९१८ के काल को स्वयं उन्होंने अपने कवि-जीवन का प्रथम चरण माना है। इस काल की कविताएँ वीणा में संकलित हैं। सन् १९२२ में उच्छवास और १९२८ में पल्लव का प्रकाशन हुआ। सुमित्रानंदन पंत की कुछ अन्य काव्य कृतियाँ हैं - ग्रन्थि, गुंजन, ग्राम्या, युगांत, स्वर्णकिरण, स्वर्णधूलि, कला और बूढ़ा चाँद, लोकायतन, चिदंबरा, सत्यकाम आदि। उनके जीवनकाल में उनकी २८ पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जिनमें कविताएं, पद्य-नाटक और निबंध शामिल हैं। पंत अपने विस्तृत वाङमय में एक विचारक, दार्शनिक और मानवतावादी के रूप में सामने आते हैं किंतु उनकी सबसे कलात्मक कविताएं 'पल्लव' में संकलित हैं, जो १९१८ से १९२५ तक लिखी गई ३२ कविताओं का संग्रह है।[3]

विचारधारा

उनका संपूर्ण साहित्य 'सत्यम शिवम सुंदरम' के आदर्शों से प्रभावित होते हुए भी समय के साथ निरंतर बदलता रहा है। जहां प्रारंभिक कविताओं में प्रकृति और सौंदर्य के रमणीय चित्र मिलते हैं वहीं दूसरे चरण की कविताओं में छायावाद की सूक्ष्म कल्पनाओं कोमल भावनाओं के और अंतिम चरण की कविताओं में प्रगतिवाद और विचारशीलता के। उनकी सबसे बाद की कविताएं अरविंद दर्शन और मानव कल्याण की भावनाओं से ओतप्रोत हैं।[4] पंत परंपरावादी आलोचकों और प्रगतिवादी प्रयोगवादी आलोचकों के सामने कभी नहीं झुके। उन्होंने अपनी कविताओं में पूर्व मान्यताओं को नकारा नहीं। उन्होंने अपने ऊपर लगने वाले आरोपों को 'नम्र अवज्ञा' कविता के माध्यम से खारिज किया। वह कहते थे 'गा कोकिला संदेश सनातन, मानव का परिचय मानवपन।'

पुरस्कार सम्मान

हिंदी साहित्य सेवा के लिए उन्हें पद्मभूषण(1961), ज्ञानपीठ(1968)[5], साहित्य अकादमी[6], तथा सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार[7] जैसे उच्च श्रेणी के सम्मानों से अलंकृत किया गया। सुमित्रानंदन पंत के नाम पर कौशानी में उनके पुराने घर को जिसमें वे बचपन में रहा करते थे, सुमित्रानंदन पंत वीथिका के नाम से एक संग्रहालय के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है। इसमें उनके व्यक्तिगत प्रयोग की वस्तुओं जैसे कपड़ों, कविताओं की मूल पांडुलिपियों, छायाचित्रों, पत्रों और पुरस्कारों को प्रदर्शित किया गया है।[8] इसमें एक पुस्तकालय भी है, जिसमें उनकी व्यक्तिगत तथा उनसे संबंधित पुस्तकों का संग्रह है।उनका देहांत १९७७ में हुआ।

स्मृति विशेष

उत्तराखंड में कुमायुं की पहाड़ियों पर बसे कउसानी गांव में, जहाँ उनका बचपन बीता था, वहां का उनका घर आज 'सुमित्रा नंदन पंत साहित्यिक वीथिका' नामक संग्रहालय बन चुका है। इस में उनके कपड़े, चश्मा, कलम आदि व्यक्तिगत वस्तुएं सुरक्षित रखी गई हैं। संग्रहालय में उनको मिले ज्ञानपीठ पुरस्कार का प्रशस्तिपत्र, हिंदी साहित्य संस्थान द्वारा मिला साहित्य वाचस्पति का प्रशस्तिपत्र भी मौजूद है। साथ ही उनकी रचनाएं लोकायतन, आस्था, रूपम आदि कविता संग्रह की पांडुलिपियां भी सुरक्षित रखी हैं। कालाकांकर के कुंवर सुरेश सिंह और हरिवंश राय बच्चन से किये गये उनके पत्र व्यवहार की प्रतिलिपियां भी यहां मौजूद हैं।

संग्रहालय में उनकी स्मृति में प्रत्येक वर्ष पंत व्याख्यान माला का आयोजन होता है। यहाँ से 'सुमित्रानंदन पंत व्यक्तित्व और कृतित्व' नामक पुस्तक भी प्रकाशित की गई है। उनके नाम पर इलाहाबाद शहर में स्थित हाथी पार्क का नाम सुमित्रा नंदन पंत उद्यान कर दिया गया है।

सुमित्रानंदन पंत का जन्म अल्मोड़ा (उत्तर प्रदेश) के कैसोनी गाँव में 20 मई 1900 को हुआ था। इनके जन्म के कुछ घंटों पश्चात् ही इनकी माँ  चल बसी।  आपका पालन-पोषण आपकी दादी ने ही किया।

आपका वास्तविक नाम गुसाई दत्त रखा गया था। आपको अपना नाम पसंद नहीं था सो आपने अपना नाम सुमित्रानंदन पंत रख लिया।

प्रारंभिक शिक्षा: आपकी प्रारंभिक शिक्षा अल्मोड़ा में ही हुई। 1918 में वे अपने भाई के साथ काशी गए और वहां क्वींस कॉलेज में पढने लगे।  मेट्रिक उतीर्ण करने के बाद आप इलाहबाद गए। वहां इंटर तक अध्ययन किया।

1919 में महात्मा गाँधी के सत्याग्रह से प्रभावित होकर अपनी शिक्षा अधूरी छोड़ दी और स्वाधीनता आन्दोलन में सक्रिय हो गए। हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी और बंगला का स्वाध्याय किया।

आपका प्रकृति से असीम लगाव था। बचपन से ही सुन्दर रचनाएँ  लिखा करते थे। 

प्रमुख कृतियां : वीणा, उच्छावास, पल्लव, ग्रंथी, गुंजन, लोकायतन पल्लवणी, मधु ज्वाला, मानसी, वाणी, युग पथ, सत्यकाम।

पुरस्कार/सम्मान : "चिदम्बरा" के लिये भारतीय ज्ञानपीठ, लोकायतन के लिये सोवियत नेहरू शांति पुरस्कार और हिन्दी साहित्य की इस अनवरत सेवा के लिये उन्हें पद्मभूषण से अलंकृत किया गया।

निधन:  28 दिसम्बर 1977 को आपका निधन हो गया।

सुख-दुख | कविता

मैं नहीं चाहता चिर-सुख,

मैं नहीं चाहता चिर-दुख,

सुख दुख की खेल मिचौनी

खोले जीवन अपना मुख !

 

सुख-दुख के मधुर मिलन से

यह जीवन हो परिपूरन;

फिर घन में ओझल हो शशि,

फिर शशि से ओझल हो घन !

 

स्वप्न बंधन

बाँध लिया तुमने प्राणों को फूलों के बंधन में

एक मधुर जीवित आभा सी लिपट गई तुम मन में!

बाँध लिया तुमने मुझको स्वप्नों के आलिंगन में!

 

तन की सौ शोभाएँ सन्मुख चलती फिरती लगतीं

कौसानी के सुरम्य वातावरण में रविवार, 20 मई सन 1900 को सुमित्रानंदन पन्त ने एक संपन्न परिवार में गंगादत्त पन्त माता सरस्वती देवी की आठवी संतान के रूप में जन्म लिया. जन्म लेने के लगभग 6 घंटे बाद ही इनकी माता का देहांत हो गया. हर्ष और विषाद, प्रकाश और अंधकार के उस वातावरण मर गंगादत्त ने बालक को शिवभक्त हरगिरी नामक गोसाई बाबाजी को सौंप दिया.

 

    Sumitranandan Pant

सुमित्रानंदन पन्त के जीवन पर निबंध

बाबाजी ने इनका नाम गोसाईदत्त रख दिया तथा गले में एक रुद्राक्ष बांध दिया. तभी से कौसानी में इनके सगे-सम्बन्धी इन्हें गुसै सै नाम से पुकारने लगे.

सन 1905 में घर के पुरोहित द्वारा विद्यारम्भ कराये जाने के पश्चात् सुमित्रानंदन को कौसानी के वर्नाक्युलर स्कूल में प्रवेश दिलाया गया. संस्कृत तथा पर्शियन भाषा का ज्ञान इन्हें इनके फूफाजी ने कराया तथा अंग्रेजी संगीत का ज्ञान भी इन्हें घर पर ही प्राप्त हुआ. इस प्रकार घर पर ही पन्त जी को अपने कवि व्यक्तित्व के प्रस्फुटन का अनुकूल वातावरण प्राप्त होता रहा.

अल्मोड़ा में इंटर फर्स्ट इयर की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात, सेकंड इयर की पढाई करने के लिए ये अपने बड़े भाई के साथ बनारस चले गये. सन 1919 में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए सुमित्रानंदन पन्त प्रयाग गये और 10 वर्ष तक प्रयाग में ही रहे. अपनेवीणातथापल्लवकाव्य संग्रह की अधिकांश कविताओ की रचना उन्होंने प्रयाग में ही की.

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सन 1931 में पंतजी अपने बड़े भाई हरीदत्त पन्त के पास लखनऊ चले गये. जहाँ उनकी मुलाकात महाकविनिराला कालाकांकर स्टेट के कुंवर सुरेश सिंह उनकी धर्मपत्नी से हुई. कुंवर सुरेश सिंह को उनका सानिध्य इतना भाया की कुछ ही समय में वह प्रगाढ़ मैत्री में बदल गया. इसी मैत्री के फलस्वरूप उनके जीवन का अधिकांश समय कालाकांकर में बीता. कुंवर सुरेश सिंह के आग्रह पर ही उन्होंने वर्ष 1938 में रूपाभ नामक प्रगतिशील मासिक पत्रिका का संपादन किया.

सन 1942 के भारत छोडो आन्दोलन, 1947 के भारत विभाजन, 1962 के चीन का आक्रमण तथा 1965 के पाकिस्तान के युद्ध की विभीषिका ने उनकी सोच को अत्यधिक प्रभावित किया, जिसके दिग्दर्शन उनकी कविताओ में होते है.

सुमित्रानंदन पन्त का काव्य-विकास अंतर्मुखता से निरंतर बहिर्मुख होने का इतिहास है. पन्त को प्रकृति ने वैचारिक सुकुमारता तथा सौन्दर्य दृष्टि दी. इसका प्रभाव उनकी सांस्कृतिक अभिरुचियो, रहन-सहन, भाषा-शैली आदि पर पड़ा. काव्य क्षेत्र में उनका प्रवेश 18 वर्ष की आयु में हो गया था.

वीणाकाव्य संग्रह की भूमिका में अपने काव्यात्मक व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने लिखा, ” अपने काव्य जीवन पर दृष्टिपात करने पर मेरे भीतर यह बात स्पष्ट हो जाती है की मेरे किशोर प्राण मूक कवि को बाहर लाने का सर्वाधिक श्रेय मेरी जन्मभूमि के उस नैसर्गिक सौन्दर्य को है, जिसकी गोद में पलकर मैं बड़ा हुआ हूँ. मेरे भीतर ऐसे संस्कार अवश्य रहे होंगे जिन्होंने मुझे कवि कर्म की प्रेरणा दी थी. ” उन्हें सन 1961 में पद्मभूषण और सन 1968 में प्रथम ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

ऐसे महान कवि को हमारा शतशत नमन.

जन पर्व मकर संक्रांति आज

उमड़ा नहान को जन समाज

गंगा तट पर सब छोड़ काज।

 

नारी नर कई कोस पैदल

आरहे चले लो, दल के दल,

गंगा दर्शन को पुण्योज्वल!

 

लड़के, बच्चे, बूढ़े, जवान,

रोगी, भोगी, छोटे, महान,

क्षेत्रपति, महाजन किसान।

 

दादा, नानी, चाचा, ताई,

मौसा, फूफी, मामा, माई,

मिल ससुर, बहू, भावज, भाई।

 

गा रहीं स्त्रियाँ मंगल कीर्तन,

भर रहे तान नव युवक मगन,

हँसते, बतलाते बालक गण।

 

अतलस, सिंगी, केला सन

गोटे गोखुरू टँगे,--स्त्री जन

पहनीं, छींटें, फुलवर, साटन।

 

बहु काले, लाल, हरे, नीले,

बैगनीं, गुलाबी, पट पीले,

रँग रँग के हलके, चटकीले।

 

सिर पर है चँदवा शीशफूल,

कानों में झुमके रहे झूल,

बिरिया, गलचुमनी, कर्णफूल।

 

माँथे के टीके पर जन मन,

नासा में नथिया, फुलिया, कन,

बेसर, बुलाक, झुलनी, लटकन।

 

गल में कटवा, कंठा, हँसली,

उर में हुमेल, कल चंपकली।

जुगनी, चौकी, मूँगे नक़ली।

 

बाँहों में बहु बहुँटे, जोशन,

बाजूबँद, पट्टी, बाँक सुषम,

गहने ही गँवारिनों के धन!

 

कँगने, पहुँची, मृदु पहुँचों पर

पिछला, मँझुवा, अगला क्रमतर,

चूड़ियाँ, फूल की मठियाँ वर।

 

हथफूल पीठ पर कर के धर,

उँगलियाँ मुँदरियों से सब भर,

आरसी अँगूठे में देकर

 

वे कटि में चल करधनी पहन,

पाँवों में पायज़ेब, झाँझन,

बहु छड़े, कड़े, बिछिया शोभन,--

 

यों सोने चाँदी से झंकृत,

जातीं वे पीतल गिलट खचित,

बहु भाँति गोदना से चित्रित।

 

ये शत, सहस्र नर नारी जन

लगते प्रहृष्ट सब, मुक्त, प्रमन,

हैं आज नित्य कर्म बंधन!

 

विश्वास मूढ़, निःसंशय मन,

करने आये ये पुण्यार्जन,

युग युग से मार्ग भ्रष्ट जनगण।

 

इनमें विश्वास अगाध, अटल,

इनको चाहिए प्रकाश नवल,

भर सके नया जो इनमें बल!

 

ये छोटी बस्ती में कुछ क्षण

भर गये आज जीवन स्पंदन,—

प्रिय लगता जनगण सम्मेलन।

 

रचनाकाल: फ़रवरी४०

 

सुमित्रानंदन पंतबीसवीं सदी का पूर्वार्द्ध छायावादी कवियों का उत्थान काल था। उसी समय अल्मोड़ा निवासी सुमित्रानंदन पंत उस नये युग के प्रवर्तक के रूप में हिन्दी साहित्य में अभिहित हुये। इस युग को जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' और रामकुमार वर्मा जैसे छायावादी प्रकृति उपासक-सौन्दर्य पूजक कवियों का युग कहा जाता है। सुमित्रानंदन पंत का प्रकृति चित्रण इन सबमें श्रेष्ठ था। उनका जन्म ही बर्फ़ से आच्छादित पर्वतों की अत्यंत आकर्षक घाटी अल्मोड़ा में हुआ था, जिसका प्राकृतिक सौन्दर्य उनकी आत्मा में आत्मसात हो चुका था। झरना, बर्फ, पुष्प, लता, भंवरा गुंजन, उषा किरण, शीतल पवन, तारों की चुनरी ओढ़े गगन से उतरती संध्या ये सब तो सहज रूप से काव्य का उपादान बने। निसर्ग के उपादानों का प्रतीक बिम्ब के रूप में प्रयोग उनके काव्य की विशेषता रही। उनका व्यक्तित्व भी आकर्षण का केंद्र बिंदु था, गौर वर्ण, सुंदर सौम्य मुखाकृति, लंबे घुंघराले बाल, उंची नाजुक कवि का प्रतीक समा शारीरिक सौष्ठव उन्हें सभी से अलग मुखरित करता था। []

 

 

 

 

जन्म और परिवार

सुमित्रानंदन पंत (मई 20 1900 - 1977) हिंदी में छायावाद युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उनका जन्म अल्मोड़ा ज़िले के कौसानी नामक ग्राम में मई 20 1900 को हुआ। जन्म के छह घंटे बाद ही माँ को क्रूर मृत्यु ने छीन लिया। शिशु को उसकी दादी ने पाला पोसा। शिशु का नाम रखा गया गुसाई दत्त।[]वे सात भाई बहनों में सबसे छोटे थे।

गुसाई दत्त की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा अल्मोड़ा में हुई। सन् १९१८ में वे अपने मँझले भाई के साथ काशी गए और क्वींस कॉलेज में पढ़ने लगे। वहाँ से मैट्रिक उत्तीर्ण करने के बाद वे इलाहाबाद चले गए। उन्हें अपना नाम पसंद नहीं था, इसलिए उन्होंने अपना नाम रख लिया - सुमित्रानंदन पंत। यहाँ म्योर कॉलेज में उन्होंने इंटर में प्रवेश लिया। महात्मा गांधी के आह्मवान पर अगले वर्ष उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया और घर पर ही हिन्दी, संस्कृत, बँगला और अंग्रेजी का अध्ययन करने लगे।

कार्यक्षेत्र

सुमित्रानंदन सात वर्ष की उम्र में ही जब वे चौथी कक्षा में पढ़ रहे थे, कविता लिखने लग गए थे। सन् १९०७ से १९१८ के काल को स्वयं कवि ने अपने कवि-जीवन का प्रथम चरण माना है। इस काल की कविताएँ वीणा में संकलित हैं। सन् १९२२ में उच्छवास और १९२८ में पल्लव का प्रकाशन हुआ। सुमित्रानंदन पंत की कुछ अन्य काव्य कृतियाँ हैं - ग्रंथि, गुंजन, ग्राम्या, युंगात, स्वर्ण-किरण, स्वर्णधूलि, कला और बूढ़ा चाँद, लोकायतन, निदेबरा, सत्यकाम आदि। उनके जीवनकाल में उनकी २८ पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जिनमें कविताएं, पद्य-नाटक और निबंध शामिल हैं। श्री सुमित्रानंदन पंत अपने विस्तृत वाङमय में एक विचारक, दार्शनिक और मानवतावादी के रूप में सामने आते हैं किंतु उनकी सबसे कलात्मक कविताएं 'पल्लव' में संकलित हैं, जो 1918 से 1925 तक लिखी गई ३२ कविताओं का संग्रह है। []

समालोचना

उनका रचा हुआ संपूर्ण साहित्य 'सत्यम शिवम सुंदरम' के संपूर्ण आदर्शों से प्रभावित होते हुए भी समय के साथ निरंतर बदलता रहा है। जहां प्रारंभिक कविताओं में प्रकृति और सौंदर्य के रमणीय चित्र मिलते हैं वहीं दूसरे चरण की कविताओं में छायावाद की सूक्ष्म कल्पनाओं कोमल भावनाओं के और अंतिम चरण की कविताओं में प्रगतिवाद और विचारशीलता के। उनकी सबसे बाद की कविताएं अरविंद दर्शन और मानव कल्याण की भावनाओं सो ओतप्रोत हैं। []

 

हिंदी साहित्य की इस अनवरत सेवा के लिए उन्हें पद्मभूषण(1961), ज्ञानपीठ(1968) [], साहित्य अकादमी [], तथा सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार

 

जैसे उच्च श्रेणी के सम्मानों से अलंकृत किया गया। सुमित्रानंदन पंत के नाम पर कौशानी में उनके पुराने घर को जिसमें वे बचपन में रहा करते थे, सुमित्रानंदन पंत वीथिका के नाम से एक संग्रहालय के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है। इसमें उनके व्यक्तिगत प्रयोग की वस्तुओं जैसे कपड़ों, कविताओं की मूल पांडुलिपियों, छायाचित्रों, पत्रों और पुरस्कारों को प्रदर्शित किया गया है। []इसमें एक पुस्तकालय भी है, जिसमें उनकी व्यक्तिगत तथा उनसे संबंधित पुस्तकों का संग्रह है। [] []

गुसाई दत्त की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा अल्मोड़ा में हुई। सन् १९१८ में वे अपने मँझले भाई के साथ काशी गए और क्वींस कॉलेज में पढ़ने लगे। वहाँ से मैट्रिक उत्तीर्ण करने के बाद वे इलाहाबाद चले गए। उन्हें अपना नाम पसंद नहीं था, इसलिए उन्होंने अपना नाम रख लिया - सुमित्रानंदन पंत। यहाँ म्योर कॉलेज में उन्होंने इंटर में प्रवेश लिया। महात्मा गांधी के आह्मवान पर अगले वर्ष उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया और घर पर ही हिन्दी, संस्कृत, बँगला और अंग्रेजी का अध्ययन करने लगे।

 Re: सुमित्रानंदन पंत - प्रसिद्ध कवि - कौसानी उत्तराखंड

कार्यक्षेत्र

सुमित्रानंदन सात वर्ष की उम्र में ही जब वे चौथी कक्षा में पढ़ रहे थे, कविता लिखने लग गए थे। सन् १९०७ से १९१८ के काल को स्वयं कवि ने अपने कवि-जीवन का प्रथम चरण माना है। इस काल की कविताएँ वीणा में संकलित हैं। सन् १९२२ में उच्छवास और १९२८ में पल्लव का प्रकाशन हुआ। सुमित्रानंदन पंत की कुछ अन्य काव्य कृतियाँ हैं - ग्रंथि, गुंजन, ग्राम्या, युंगात, स्वर्ण-किरण, स्वर्णधूलि, कला और बूढ़ा चाँद, लोकायतन, निदेबरा, सत्यकाम आदि। उनके जीवनकाल में उनकी २८ पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जिनमें कविताएं, पद्य-नाटक और निबंध शामिल हैं। श्री सुमित्रानंदन पंत अपने विस्तृत वाङमय में एक विचारक, दार्शनिक और मानवतावादी के रूप में सामने आते हैं किंतु उनकी सबसे कलात्मक कविताएं 'पल्लव' में संकलित हैं, जो 1918 से 1925 तक लिखी गई ३२ कविताओं का संग्रह है। []

उनका रचा हुआ संपूर्ण साहित्य 'सत्यम शिवम सुंदरम' के संपूर्ण आदर्शों से प्रभावित होते हुए भी समय के साथ निरंतर बदलता रहा है। जहां प्रारंभिक कविताओं में प्रकृति और सौंदर्य के रमणीय चित्र मिलते हैं वहीं दूसरे चरण की कविताओं में छायावाद की सूक्ष्म कल्पनाओं कोमल भावनाओं के और अंतिम चरण की कविताओं में प्रगतिवाद और विचारशीलता के। उनकी सबसे बाद की कविताएं अरविंद दर्शन और मानव कल्याण की भावनाओं सो ओतप्रोत हैं। []

हिंदी साहित्य की इस अनवरत सेवा के लिए उन्हें पद्मभूषण(1961), ज्ञानपीठ(1968) [], साहित्य अकादमी [], तथा सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार

 

जैसे उच्च श्रेणी के सम्मानों से अलंकृत किया गया। सुमित्रानंदन पंत के नाम पर कौशानी में उनके पुराने घर को जिसमें वे बचपन में रहा करते थे, सुमित्रानंदन पंत वीथिका के नाम से एक संग्रहालय के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है। इसमें उनके व्यक्तिगत प्रयोग की वस्तुओं जैसे कपड़ों, कविताओं की मूल पांडुलिपियों, छायाचित्रों, पत्रों और पुरस्कारों को प्रदर्शित किया गया है। []इसमें एक पुस्तकालय भी है, जिसमें उनकी व्यक्तिगत तथा उनसे संबंधित पुस्तकों का संग्रह है। [] []

 

 

उनका देहांत 1977 में हुआ। आधी शताब्दी से भी अधिक लंबे उनके रचनाकर्म में आधुनिक हिंदी कविता का पूरा एक युग समाया हुआ है।

निसर्ग में वैश्विक चेतना की अनुभूति: सुमित्रानंदन पंत (पीएचपी) ताप्तिलोक। अभिगमन तिथि: 20 जुलाई, 2007

सुमित्रानंदन पंत (एचटीएम) उत्तरांचल। अभिगमन तिथि: 20 जुलाई, 2007

सुमित्रानंदन पंत (अंग्रेज़ी) (एचटीएमएल) कल्चरोपेडिया। अभिगमन तिथि: 20 जुलाई, 2007

हिंदी लिटरेचर (अंग्रेज़ी) (एचटीएम) सीज़ंस इंडिया। अभिगमन तिथि: 20 जुलाई, 2007

ज्ञानपीठ अवार्ड (अंग्रेज़ी) (एचटीएम) वेबइंडिया123.कॉम। अभिगमन तिथि: 20 जुलाई, 2007

साहित्य एकेडमी अवार्ड एंड फ़ेलोशिप्स (अंग्रेज़ी) (एचटीएम) साहित्य अकादमी। अभिगमन तिथि: 20 जुलाई, 2007

कौशानी (अंग्रेज़ी) (एएसपी) मेड इन इंडिया। अभिगमन तिथि: 20 जुलाई, 2007

सुमित्रानंदन पंत वीथिका (अंग्रेज़ी) (एचटीएम) इंडिया9.कॉम। अभिगमन तिथि: 20 जुलाई, 2007

सुमित्रानंदन पंत वीथिका (अंग्रेज़ी) (एएसपी) क्राफ़्ट रिवाइवल ट्रस्ट। अभिगमन तिथि: 20 जुलाई, 2007

सुमित्रानंदन पंत की रचनाएँ

कुछ प्रमुख

कृतियाँ चिदम्बरा, वीणा, पल्ल), गुंजन, ग्राम्याभ, युगांत, युगवाणी, लोकायतन, कला

उत्तरांचल प्रदेश के कुमाऊँ अंचल के कौसानी गाँव में प्रकृति के सुकुमार कवि सुमुत्रानंदन पंत का जन्म सन् १९०० में हुआ। जन्म के छह घंटे बाद ही माँ को क्रूर मृत्यु ने छीन लिया। शिशु को उसकी दादी ने पाला पोसा। शिशु का नाम रखा गया गुसाई दत्त।

 

गुसाई दत्त की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा अल्मोड़ा में हुई। सन् १९१८ में वे अपने मँझले भाई के साथ काशी गए और क्वींस कॉलेज में पढ़ने लगे। वहाँ से मैट्रिक उत्तीर्ण करने के बाद वे इलाहाबाद चले गए। उन्हें अपना पसंद नहीं था, इसलिए उन्होंने अपना नाम रख लिया - सुमित्रानंदन पंत। यहाँ म्योर कॉलेज में उन्होंने इंटर में प्रवेश लिया। महात्मा गांधी के आह्मवान पर अगले वर्ष उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया और घर पर ही हिन्दी, संस्कृत, बँगला और अंग्रेजी का अध्ययन करने लगे।

 

सुमित्रानंदन सात वर्ष की उम्र में ही जब वे चौथी कक्षा में पढ़ रहे थे, कविता लिखने लग गए थे। सन् १९०७ से १९१८ के काल को स्वयं कवि ने अपने कवि-जीवन का प्रथम चरण माना है। इस काल की कविताएँ वीणा में संकलित हैं। सन् १९२२ में उच्छवास और १९२८ में पल्लव का प्रकाशन हुआ। सुमित्रानंदन पंत की कुछ अन्य काव्य कृतियाँ हैं - ग्रंथि, गुंजन, ग्राम्या, युंगात, स्वर्ण-किरण, स्वर्णधूलि, कला और बूढ़ा चाँद, लोकायतन, निदेबरा, सत्यकाम आदि। सन् १९७७ में सुमित्रानंदन पंत का देहावसान हो गया।

 

अपने कृतित्व के लिए पंत जी को विविध पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। कला और बूढ़ा चाँद के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, लोकायतन पर सोवियत लैंड नेहरु पुरस्कार एवं चिदंबार पर इन्हें भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ।

 

पंत जी की प्रारंभिक कविताओं में प्रकृति-प्रेम और सौंदर्य की छटा मिलती है, जिसका उत्कर्ष उनकी छायावादी रचनाओं पल्लव और गुंजन में देखने को मिलता है। सन् १९३६ के आस-पास वे माक्र्सवाद से प्रभावित हुए। युगांत और ग्राम्या की अनेक रचनाओं पर माक्र्स का प्रभाव स्पष्ट रुप से देख जा सकता है। कवि की उत्तरकालीन रचनाओं पर अरविंद की विचारधारा की छाप है।

 

पंत जी सूक्ष्म भावों की अभिव्यक्ति और सचल दृश्यों के चित्रण में अन्यतम हैं। इनकी भाषा बड़ी सशक्त एवं समृध है। मधुर भावों और कोमलकांत गीतों के लिए सिधहस्त हैं।

 

: धरती कितना देती है, कविता में कवि अपने बचपन की एक भूल को याद करते हुए धरती को रत्न प्रसविनी रुप का चित्रण कर रहा है। 'हम जैसा बोएँगे वैसा ही पाएँगे' का संदेश देते हुए कवि ने मानवता की फसल उगाने के लिए समता, ममता और क्षमता के बीज बोने पर बल दिया है।

 

सुमित्रानंदन पंतजीवन एवं रचना संसार [पुण्यतिथि पर विशेष] – राजीव रंजन प्रसाद

 

छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में एक, सुमित्रानंदन पंत का साहित्य को योगदान अविस्मरणीय है। आपका जन्म 20 मई 1900 को अल्मोड़ा ज़िले के कौसानी ग्राम में हुआ। आप स्वीकार करते हैं कि जन्म-भूमि के नैसर्गिक सौन्दर्य नें ही आपके भीतर के कवि को बाहर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। यही कारण है कि छायावाद की वृहत्रयी में सम्मिलित रह आपनें हिन्दी कविता को इतने सुन्दर प्रकृति चित्र प्रदान किये हैं कि आपको हिन्दी कावर्डस्वर्थकहा जाता है। रवीन्द्रनाथ टैगोर के अलावा शैली, कीट्स, टेनिसन आदि अंग्रेजी कवियों की कृतियों नें भी आपको प्रभावित किया है।

 

संघर्षपूर्ण जीवन की परिणति होता है एक भावुक मन और शायद इसी तरह अंजान कविता बही आती है। जन्म के केवल : घंटे बाद ही आपकी माता का देहावसान हो गया। आप सात भाई-बहने में सबसे छोटे थे तथा आपका नाम गुसाई दत्त रखा गया था आपको यह नाम प्रिय नहीं था अत: आपने बाद में अपना नाम सुमित्रानंदन पंत रख लिया। आपका आरंभिक लालन-पालन आपकी दादी नें किया। 1918 में आप काशी गये तथा क्वींस कॉलेज में अध्ययन करने लगे। 1921 में गाँधी जी के असहयोग आंदोलन के आह्वाहन पर आपने कॉलेज छोड दिया और घर पर रह कर ही हिन्दी, संस्कृत, बंगला और अंग्रेजी का अध्ययन करने लगे। सन 1926-27 में आपकी पहली पुस्तकपल्लवनाम से प्रकाशित हुई। कुछ समय पश्चात आप अपने भाई देवीदत्त के साथ अल्मोडा गये और इसी दौरान वे मार्क्स फ्रायड तथा उनकी विचारधारा के प्रभाव में आये। 1938 में आपनेंरूपाभनामक प्रगतिशील मासिक पत्र निकाला। शमशेर, रघुपति सहाय आदि के सान्निध्य में आप प्रगतिशील लेखक संघ से भी जुडे रहे। आप 1955 से 1962 तक आकाशवाणी से जुडे रहे मुख्य-प्रोड्यूसर के पद पर कार्य किया। आपकी विचारधारा योगी अरविन्द से प्रभावित भी हुई जो बाद की आपकी रचनाओं में दृष्टिगोचर होता है। 28 दिसंबर 1977 को आपका देहावसान हिन्दी जगत को साहित्य को अपूर्णीय क्षति था।

 

वीणातथापल्लवमें संकलित आपके छोटे गीत हमें विराट व्यापक सौंदर्य तथा तप:पूत पवित्रता से साक्षात्कार कराते हैं।युगांतकी रचनाओं के लेखन तक आप प्रगतिशील विचारधारा से जुडते प्रतीत होते हैं।युगांतसेग्राम्यातक आपकी काव्ययात्रा निस्संदेह प्रगतिवाद के निश्चित प्रखरस्वरोंकी उदघोषणा करती है।

आपकी साहित्यिक यात्रा के तीन प्रमुखपडाव हैंप्रथम में आप छायावादी हैं, दूसरे में समाजवादी आदर्शों से चलित प्रगतिवादी तथा तीसरे में अरविन्द दर्शन से प्रभावित अध्यात्मवादी।

 

आपकी रचनाओं की कुछ बानगी प्रस्तुत है। प्रकृति की गूढता को आप सहजता से कह जाते हैं:-

शशिकिरणों से उतर उतर कर भू पर कामरूप नभचर

 

चूम नवल कलियों का मृदुमुख सिखा रहे थे मुस्काना

 

 

प्रकृति के माध्यम से मानव के उन्नत भविष्य की कामना करते हुए पंत लिखते हैं:-

धरती का आँगन इठलाता

 

शस्य श्यामला भू का यौवन

 

अंतरिक्ष का हृदय लुभाता!

 

 

 

जौ गेहूँ की स्वर्णिम बाली

भू का अंचल वैभवशाली

इस अंचल से चिर अनादि से

अंतरंग मानव का नाता..

 

 

किसानों की दशा परवे आँखेंकविता की कुछ पंक्तियाँ

अंधकार की गुहा सरीखी, उन आँखों से डरता है मन,

भरा दूर तक उनमें दारुण, दैन्य दु: का नीरव रोदन

 

 

भौतिक बंधनों से पहले आध्यात्मिक बंधनों को तोडने की बात करते हुए आप लिखते हैं

आओ, अपने मन को टोवें!

व्यर्थ देह के सँग मन की भी

निर्धनता का बोझ ढोवें

 

आपका भाषा पर पूर्णाधिकार था। उपमाओं की लडी प्रस्तुत करने में आपका कोई सानी नहीं। आपने हिन्दी काव्य को एक सशक्त भाषा प्रदान की, छंदों का परिष्कार किया तथा खडी बोली की काव्यशक्ति को संवर्धित, पुष्ट तथा परिष्कृत किया। आपका संपूर्ण कृतीत्व हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि है। आपकी महत्वपूर्ण कृतियाँ हैंवीणा, ग्रंथी, पल्लव, गुंजन, युगांत, युगवाणी, ग्राम्या, स्वर्ण किरण, उत्तरा, कला और बूढा चाँद, चिदंबरा तथा लोकायतन। काव्य के अलावा आपनें आलोचना, कहानी, आत्मकथा आदि गद्य विधाओं में भी रचनायें कीं। आपको पद्मभूषण(1961), ज्ञानपीठ(1968), साहित्य अकादमी , सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार जैसे सम्मानों से अलंकृत किया गया है। आज आपकी पुण्यतिथि पर आपको कोटिश: नमन।

 

सुनता हूँ, मैंने भी देखा,

काले बादल में रहती चाँदी की रेखा!

 

काले बादल जाति द्वेष के,

काले बादल विश्वद क्लेखश के,

काले बादल उठते पथ पर

नव स्वातंत्रता के प्रवेश के!

सुनता आया हूँ, है देखा,

काले बादल में हँसती चाँदी की रेखा!

 

आज दिशा हैं घोर अँधेरी

नभ में गरज रही रण भेरी,

चमक रही चपला क्षण-क्षण पर

झनक रही झिल्ली् झन-झन कर!

नाच-नाच आँगन में गाते केकी-केका

काले बादल में लहरी चाँदी की रेखा।

 

काले बादल, काले बादल,

मन भय से हो उठता चंचल!

कौन हृदय में कहता पलपल

मृत्युद रही साजे दलबल!

आग लग रही, घात चल रहे, विधि का लेखा!

काले बादल में छिपती चाँदी की रेखा!

 

मुझे मृत्युे की भीति नहीं है,

पर अनीति से प्रीति नहीं है,

यह मनुजोचित रीति नहीं है,

जन में प्रीति प्रतीति नहीं है!

 

देश जातियों का कब होगा,

नव मानवता में रे एका,

काले बादल में कल की,

सोने की रेखा!

 

 

 

 

 

निष्कर्ष 

यह निष्कर्ष निकाला जा सका कि जिस ... इसी प्रकार सुमित्रानंदन पंत ने "पल्लव'' की भूमिका में जिस वायवीय काव्यादर्श का संकेत किया, वह भी शुक्ल जो के ...

इतनी सी बात ध्यान में रखने से ऐसे-ऐसे यहीं में पड़ने की आवश्यकता बहुत कुछ दूर हो जाती है कि कला में सत्-असत् धर्माधर्म ... रूप से छायावादी कवियों ने और छायावादी कविता के समीक्षक आचार्य नंददुलारे वाजपेयी ने इस विवेकवाद का विरोध किया है है इस ... है है उन्होंने रस की आम दक अनुभूति के साथ रहस्यवादी अनुभूति का संयोग कराया जिससे अम यह निष्कर्ष निकाला जा सका कि जिस ... इसी प्रकार सुमित्रानंदन पंत ने "पल्लव'' की भूमिका में जिस वायवीय काव्यादर्श का संकेत किया, वह भी शुक्ल जो के ...

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