शिशु तथा बाल पोषण पर राष्ट्रीय
दिशा-निर्देश
भूमिका
प्रथम छः माह के दौरान केवल स्तनपान
दसवीं पंचवर्षीय योजना के लक्ष्य
शिशु तथा बाल पोषण पर राष्ट्रीय
दिशा-निर्देशों के लक्ष्य
शिशुओं एवं छोटे बच्चों हेतु उपयुक्त
आहार पद्धतियां
स्तनपान
स्तनपान की शीघ्र शुरुआत
मां के आरम्भिक दूध (कॉलोस्टूम) का
महत्व
केवल स्तनपान
गर्भावस्था के दौरान स्तनपान हेतु
परामर्श
पूरक आहार पूरक आहार का महत्व
शिशु तथा बाल पोषण संबंधी सही मानक
शिशु का प्रारम्भिक आहार
शिशुओं हेतु पारम्परिक आहार
आशोधित पारिवारिक आहार
शिशुओं हेतु तत्काल आहार
संरक्षक आहार
शिशु आहारों का ऊर्जा घनत्व
आहार की आवृति
सतत स्तनपान
सक्रिय आहार
विकास अनुवीक्षण एवं संवर्धन
पूरक आहारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना
उपलब्ध पोषाहार एवं स्वास्थ्य सेवाओ का
उपयोग
बीमारी के दौरान तथा उसके बाद आहार
अत्यधिक कठिन परिस्थितियों में आहार
कुपोषित शिशु
गर्भावस्था पूरी होने से पहले जन्म
लेने वाले अथवा जन्म के समय कम वजनी शिशु
आपात परिस्थितियों के दौरान आहार
माँ के एच.आई.वी. संक्रमित होने की दशा
में शिशु आहार
शिशुओं एवं छोटे बच्चों हेतु उपयुक्त
आहार के संवर्धनार्थ परिचालन दिशा-निर्देश
संस्थागत संवर्धन
गर्भवती महिलाओं का पोषण(अनुलग्नक-I)
स्तनपान कराने वाली माताओं का पोषण
(अनुलग्नक-II)
भूमिका
शिशुओं एवं छोटे बच्चों का पोषण बहुत
लम्बे समय से वैज्ञानिकों एवंयोजनाकारों का ध्यान आकृष्ट कर रहा है। इसका सीधा सा
कारण यह है कि मानव जीवन के प्रथम वर्ष के दौरान मानव विकास दर सर्वाधिक होती है
और बच्चे की पौषणिक स्थिति निर्धारित करने में शिशु आहार पद्धति समें स्तनपान एवं
पूरक आहार शामिल हैं की प्रमुख भूमिका होती है। कुपोषण एवं शिशु आहार के बीच संबंध
को भली-भांति सिद्ध किया जा चुका है I हाल ही के वैज्ञानिक साक्ष्य यह
दर्शाते हैं कि प्रति वर्ष पांच से कम आयु में वाले बच्चों में से 60% बच्चों की मृत्यु का कारण कुपोषण होता
है। इनमें से दो तिहाई से भी अधिक बच्चों की मृत्यु का कारण अनुपयुक्त आहार
पद्धतियां हैं और इनकी मृत्यु 1 वर्ष से कम आयु में हो जाती है। विश्व भर में केवल 35% शिशुओं को जीवन के प्रथम चार माह के
दौरान माँ का दूध प्राप्त होता है और अधिकतर शिशुओं का पूरक आहार बहुत पहले या देर
से आरम्भ हो पाता है। यह पूरक आहार पोषाहारीय दृष्टि से अपर्याप्त एवं असुरक्षित
होता है। शिशु अवस्था एवं प्रारंभिक बाल्यावस्था में गलत आहार पद्धतियां सामाजिक
आर्थिक विकास के लिए एक बड़ा खतरा है क्योंकि क्षीण होता है, इस महत्वपूर्ण आयु वर्ग के दौरान
स्वस्थ विकास की प्राप्ति एवं इस बनाये रखने के मार्ग में ये पद्धतियां अत्यधिक
गम्भीर रुकावट हैं।
प्रथम छः माह के दौरान केवल स्तनपान
शिशु एवं छोटे बच्चे के लिए इस्टतम
आहार पद्धतियां विशेष रूप प्रथम छः माह के दौरान केवल स्तनपान- छोटे बच्चों के
जीवन की सम्भावित सर्वोत्तम शुरुआत सुनिश्चित करने में सहायता करती हैं। स्तनपान
बच्चे के पालन-पोषण तथा मां एवं बच्चों के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध बनाने का प्राकृतिक
तरीका है। स्तनपान शिशु के लिए विकास और सीखने के अवसर प्रदान करता है तथा बच्चे
के पांचों बोधों-देखना, सूंघना, सुनना, चखना, छूना-को उत्प्रेरित करता है। स्तनपान बच्चे के मनो-सामाजिक विकास पर
आजीवन प्रभाव के साथ-साथ उसमें सुरक्षा एवं अनुराग विकसित करता है। माँ के दूध में
मौजूद विशिष्ट फैटी एसिड बौद्धिक स्तर में वृद्धि तथा बेहतर दृष्टि तीक्ष्णता
प्रदान करते हैं। स्तनपान करने वाले बच्चे का बौद्धिक स्तर (आई0क्यू0) स्तनपान न करने वाले बच्चे की तुलना
में 8
अंक अधिक होता है।स्तनपान छोटे बच्चे की उत्तरजीविता, स्वास्थ्य, पोषण, बच्चे में विश्वास एवं सुरक्षा की
भावना के विकास को ही नहीं, अपितु मस्तिष्क विकास और सीखने की शक्ति में वृद्धि करता है।
शिशु दुग्ध पाउडर तथा शिशु आहार
उत्पादक बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के धूआधार प्रचार अभियान के कारण स्तनपान की उत्तम
पद्धति को काफी नुकसान पहुंचा। 70 के दशक के अंत में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्तनपान की प्रवृत्ति
में आ रही कमी की गम्भीरता को पहचाना और स्तनपान के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु
अंतर्राष्ट्रीय कोड 1981 में जारी किया। भारत सरकार ने 1983 में स्तनपान के संरक्षण एवं
संवर्धनार्थं राष्ट्रीय कोड अंगीकृत किया। वर्ष 1993 से महिला एवं बाल विकास द्वारा शिशु
दुग्ध अनुकल्प, दूध
पिलाने वाली बोतलें तथा शिशु आहार (उत्पादन, आपूर्ति एवं वितरण का विनियमन) अधिनियम, 1992 का कार्यान्वयन किया जा रहा है।
उस समय उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्य के
अनुसार शिशुओं के लिये केवल स्तनपान की अवधि तक अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय कोड
में शामिल की गयी थी। इस आयु वर्ग का बहु-राष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा दुरुपयोग
किया गया तथा उन्होंने तीन माह तथा अधिक आयु के बच्चों के लिए अपने उत्पादों का
संवर्धन करना आरम्भ कर दिया। पूरक आहार शीघ्र आरम्भ किये जाने के परिणाम-स्वरूप
बच्चों में संक्रमण तथा कुपोषण की समस्याएं उत्पन्न हो रही थीं I वर्ष 1993 में महिला एवं बाल विकास विभाग के
तत्वावधान में भारत सरकार द्वारा अंगीकृत राष्ट्रीय पोषाहार नीति में शिशुओं एवं
छोटे के आहार के संबंध में माताओं को पोषण और स्वास्थ्य शिक्षा देने में बल दिया
गया I
स्वास्थ्य विभाग के सक्रिय सहयोग से
महिला एवं बाल विकास विभाग के निरन्तर प्रयासों के परिणाम-स्वरूप मई 2001 में विश्व स्वास्थ्य सभा में एक
महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया तथा संकल्प सं0 54.2 में प्रथम छः माह के दौरान ‘केवल स्तनपान' को तद्नन्तर दो वर्ष या उससे अधिक आयु
तक सतत् स्तनपान सहित पूरक आहार देने की बढ़ावा देने, वैश्विक अनुशंसा की गई। इसके अतिरिक्त, मई, 2002 में 55वीं विश्व स्वास्थ्य सभा द्वारा शिशुओं
एवं छोटे बच्चों हेतु पोषाहार पर एक नया
संकल्प (डब्ल्यू.एच.ए. 55.25) अंगीकृत किया गया। इस संकल्प में शिशुओं एवं
छोटे बच्चों हेतु आहार संबंधी वैश्विक पुष्टि की गई है। यह भी कहा गय है कि
विशेषकर उपयुक्त आहार पद्धतियों के माध्यम से इष्टतम बाल वृद्धि एवं विकास
सुनिश्चित किए बिना, कोई भी सरकार दीर्घकालीन सन्दर्भों में आर्थिक विकास में गति लाने के
अपने प्रयासों में सफल नहीं हो पाएगी।
वैश्विक कार्यनीति में माँ तथा बच्चे
के आहार को समुचित महत्व दिया गया है तथा इस तथ्य का भी समर्थन किया गया है कि माँ
के सम्पूर्ण जीवन के दौरान उसकी स्वास्थ्य एवं पोषाहारीय
स्थिति सुनिश्चित करके,जो कि उसका अधिकार भी है शिशुओं एवं
छोटे बच्चों के आहार में सुधार किया जा सकता है। महिला एवं बाल विकास विभाग के
सतत् प्रयास डिब्बा दूध, दूध पिलाने वाली बोतलों और डिब्बा बन्द शिशु आहार संशोधित अधिनियम 2003 को लाने में सफल रहे। यह संशोधित
अधिनियम 1
जनवरी, 2004 से
लागू है। इस कानून के तहत अनन्य स्तनपान कराने की अवधि 4-6 मास से बढ़ाकर 6 मास कर दी गयी है और डिब्बा बन्द शिशु
आहार पर भी पाउडर दूध की भांति विज्ञापित बिक्री पर रोक लगा दी गयी है। इस समय
भारत में स्तनपान को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मजबूत कानून उपलब्ध है।
दसवीं पंचवर्षीय योजना के लक्ष्य
दसवीं पंचवर्षीय योजना के लक्ष्य योजना
आयोग ने शिशुओं एवं छोटे बच्चों की उपयुक्त आहार पद्धतियों के महत्व को स्वीकारते
हुए पहली बार दसवी पंचवर्षीय योजना के राष्ट्रीय पोषण लक्ष्यों में स्तनपान तथा
पूरक आहार के लक्ष्यों को शामिल किया है। दसवीं योजना में वर्ष 2007 तक प्राप्त किये जाने वाले विशिष्ट
पोषण लक्ष्य निर्धारित किये गये हैं। इनमें से प्रमुख लक्ष्य इस प्रकार के थे-
शिशुओं एवं बच्चों हेतु आहार पद्धतियों
तथा उनकी देखभाल में सुधार के लिए पोषण एवं स्वास्थ्य शिक्षा को बढ़ावा देना, ताकि -
तीन वर्ष से कम आयु के अल्पवज़नी
बच्चों की दर को वर्तमान 47% से घटाकर 40% किया जा सके;छ वर्ष तक की आयु के बच्चों में गम्भीर कुपोषण के मामलों में 50% तक की कमी की जा सके;
आरम्भ से स्तनपान (माँ का आरम्भिक दूध
पिलाने) के मामलों की दर को वर्तमान 15.8% से बढ़ाकर 50% करना;
प्रथम छः माह के दौरान ‘केवल स्तनपान' के मामलों को वर्तमान 55.2%
(0-3 माह हेतु) से
बढ़ाकर 80%
करना; और
छः माह की आयु से पूरक आहार देने के
मामलों को वर्तमान 33.5% से बढ़ाकर 75% करना।
शिशु तथा बाल पोषण पर राष्ट्रीय
दिशा-निर्देशों के लक्ष्य
शिशु तथा बाल पोषण के नये मानकों
अर्थात् छः माह की आयु तक केवल स्तनपान (पिछले दिशा-निर्देशों में निर्धारित 4-6 माह की आयु के स्थान पर), छः माह की आयु से पूरक आहार के साथ दो
वर्ष अथवा अधिक आयु तक सतत् स्तनपान के विषय में सभी व्यवसायिओं, प्रशिक्षण संस्थाओं के अनुदेशकों तथा
देश के विभिन्न भागों के क्षेत्रीय कर्मियों को जानकारी नहीं है। इस महत्वपूर्ण
जानकारी के अभाव उपरोक्त व्यक्ति अब भी पुराने मानकों का समर्थन कर रहे हैं। अतः, यह निर्णय लिया गया है कि खाद्य एवं
पोषण बोर्ड, महिला
एवं बाल विकास विभाग, भारत सरकार द्वारा और दूसरे संस्थान द्वारा समय-समय पर जारी किये गये
दिशा-निर्देशों के स्थान पर शिशु तथा बाल पोषण संबंधी राष्ट्रीय दिशा निर्देश जारी
किये जायें Iइसलिए, शिशु तथा बाल पोषण संबंधी राष्ट्रीय
दिशा-निर्देशों के उद्देश्य इस प्रकार हैं :
• शिशु तथा बाल पोषण का समर्थन करना तथा
राष्ट्र-व्यापी इष्टतम आहार पद्धतियों के माध्यम से इसमें सुधार करना,
• नीति-निर्माण स्तर से देश के विभिन्न
भागों के जन-सामान्य तक क्षेत्रीय भाषाओं में स्तनपान एवं पूरक आहार के सही मानकों
का प्रचार-प्रसार करना,
• शिशुओं तथा छोटे बच्चों हेतु आहार
पद्धतियों की इष्टतम सफलता के लिए सरकार के संबद्ध क्षेत्रों, राष्ट्रीय संगठनों तथा व्यावसायिक
समूहों प्रतिबद्धता एवं जागरूकता में वृद्धि के प्रयासों की आयोजना में सहायता
करना, तथा
• योजना आयोग द्वारा दसवी पंचवर्षीय
योजना हेतु निर्धारित शिशुओं एवं छोटे बच्चों के लिए आहार पद्धति संबंधी राष्ट्रीय
लक्ष्य प्राप्त करना, ताकि बच्चों में कुपोषण के स्तर में कमी लाई जा सके।
शिशुओं एवं छोटे बच्चों हेतु उपयुक्त
आहार पद्धतियां
विश्व स्वास्थ्य संगठन 2002 के अनुसार, स्तनपान शिशुओं को स्वस्थ विकास हेतु
उन्हें आदर्श आहार प्रदान करने का अनुपम साधन है। यह महिलाओं को स्वास्थ्य हेतु
महत्वपूर्ण निहितार्थों सहित प्रजनन प्रक्रिया का एक भाग भी है। यह एक वैश्विक
सार्वजनिक अनुशंसा है कि शिशुओं को उनको जीवन को प्रथम छः माह को दौरान केवल स्तनपान
कराया जाय ताकि उनकी इष्टतम वृद्धि विकास एवं स्वास्थ्य सुनिश्चित किया जा सको/
इसलिए शिशुओं की बढ़ती पोषाहारीय आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु उन्हें दो वर्ष या
उससे अधिक आयु तक सतत् स्तनपान को साथ पोषाहारीय दृष्टि से पर्याप्त एवं सुरक्षित
पूरक खाद्य पदार्थ प्राप्त होने चाहिंए I
स्तनपान
माँ के दूध की पोषाहारीय श्रेष्ठता
आधुनिक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी भी शिशुओं के लिए माँ के दूध से बेहतर उत्पाद
तैयार कर पाने में असमर्थ हैं। शिशु की पोषाहारीय एवं मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की
संतुष्टि हेतु स्तनपान सर्वोत्तम साधन है। प्राचीन समय से ही मानव दूध की अनुपम
पोषाहारीय गुणवत्ता को मान्यता दी जाती रही है। माँ का दूध सुपाच्य एवं परिपाच्य
होता है। माँ के दूध में विद्यमान प्रोटीन अधिक विलेय होता है, जिसे शिशु द्वारा आसानी से पचाया तथा
आत्मसात् किया जा सकता है। इसी प्रकार माँ के दूध में विद्यमान वसा और केल्शियम को
भी शिशु द्वारा आसानी से आत्मसात् किया जा सकता है। माँ के दूध में मौजूद
दुग्धशर्करा शिशु को तत्काल ऊर्जा प्रदान करती है। इसके अतिरिक्त, इस दुग्धशर्करा का एक भाग आँतों में
जाकर दुग्धाम्ल बनकर वहां मौजूद हानिकारक जीवाणुओं को समाप्त करता है तथा कैल्शियम
एवं अन्य खनिजों को आत्मसात् करने में शिशु की सहायता करता है। माँ के दूध में
पाये जाने वाले थायमीन, विटामिन ए और विटामिन सी जैसे विटामिनों की मात्रा मां के आहार पर
निर्भर करती है। सामान्य परिस्थितियों में ये सभी विटामिन मां के दूध में पर्याप्त
मात्रा में मौजूद होते हैं। मानव दूध में संक्रमण-रोधी गुण विद्यमान होते हैं जो
कि किसी अन्य दूध में नहीं होते। विकासशील देशों में मानव दूध का यह संरक्षक गुण
विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इन देशों में संक्रमण होने की संभावना अधिक है। स्तनपान के
कुछ महत्वपूर्ण लाभ इस प्रकार हैं -
शिशुओं के लिए मां का दूध सर्वोत्तम
प्राकृतिक आहार है।
मां का दूध सदैव स्वच्छ होता है।
मां का दूध बच्चे को बीमारियों से
बचाता है।
मां का दूध बच्चे को अधिक बुद्धिमान
बनाता है।
मां का दूध 24 घंटे उपलब्ध होता है और इसके लिए कोई
विशेष तैयारी नहीं करनी पड़ती।
मां का दूध बच्चे के लिए प्रकृति का
उपहार है और इसे खरीदने की आवश्यकता नहीं होती।
स्तनपान से शिशु एवं मां के बीच विशेष
संबंध स्थापित होता है।
स्तनपान से माता-पिता को अपने बच्चों
के जन्म के बीच अंतर रखने में सहायता मिलती है।
स्तनपान से मां को गर्भावस्था के दौरान
बढ़ा अपना वजन कम करने में सहायता मिलती है।
स्तनपान की शीघ्र शुरुआत
स्तनपान की शीघ्र शुरुआत स्तनपान की
सफलता तथा शिशु को मां का आरम्भिक दूध कोलोस्टूम' प्रदान करने हेतु अत्यन्त आवश्यक है।
आदर्श रूप से शिशु को उसके जन्म के बाद यथाशीघ्र एवं यदि संभव हो सके तो एक घंटे
के भीतर पहली बार मां का दूध पिला दिया जाना चाहिए। नवजात शिशु अपने जीवन के इस
दौरान बहुत सक्रिय होता है और यदि शिशु को उसकी मां के साथ रखा जाय तथा उसे मां का
दूध पिलाने का प्रयास किया जाय तो वह स्तनपान करना शीघ्र ही सीख जाता है। शिशु
द्वारा शीघ्र ही स्तनपान आरम्भ करने से मां के शरीर में दूध बनने की प्रक्रिया
आरम्भ हो जाती है और इससे शीघ्र ही मां को दूध आने लगता है। ऑपरेशन द्वारा प्रसव
के मामले में नवजात शिशु को उसके जन्म के बाद 4-6 घंटे के भीतर मां का दूध पिलाना आरम्भ
किया जा सकता है। इस कार्य के लिए मां को सहारा देने की आवश्यकता होती है। नवजात
शिशुओं को उनकी माताओं के निकट रखा जाना चाहिए, ताकि उन्हें मां की गर्माहट मिले और
बार-बार मां का दूध उपलब्ध हो सके। इससे भी मां के स्तनों में शीघ्र दूध आता है।
यह आवश्यक है कि शिशु को मां का पहला दूध (कॉलोस्टूम) प्राप्त हो। यह दूध बाद में
आने वाले दूध से अधिक गाढ़ा व पीला होता है तथा यह दूध बहुत कम मात्रा में पहले
कुछेक दिन ही आता है। इस समय आवश्यक सम्पूर्ण आहार एवं पेय मां के पहले दूध में
मौजूद होते हैं। नहीं होती।
इस अवधि के दौरान तथा बाद में, शिशु को अन्य कोई पेय पदार्थ या शहद
घुट्टी, पशु
अथवा पाउडर का दूध, चाय, पानी या ग्लूकोज जल जैसे खाद्य पदार्थ नहीं दिये जाने चाहिएं, क्योंकि ये सभी शिशु के लिए काफी
हानिकारक होते हैं। पहली बार मां बनने वाली महिला को स्तनपान कराने हेतु उपयुक्त
मुद्रा की जानकारी दी जानी चाहिए। शिशु को उतनी बार तथा उतनी देर तक मां का दूध
पिलाया जाना चाहिए, जितना वह चाहे।
मां के आरम्भिक दूध (कॉलोस्टूम) का
महत्व
बच्चे के जन्म के उपरांत पहले कुछ
दिनों तक मां के दूध को कॉलोस्ट्रम कहा जाता है। यह दूध पीला और गाढ़ा होता है। यह
दूध अत्यधिक पोषक होता है और इसमें संक्रमण-रोधी तत्व विद्यमान होते हैं। इसमें
बड़ी मात्रा में विटामिन ए पाया जाता है। कॉलोस्ट्रम में अधिक प्रोटीन होता है, जो कि कई बार 10 प्रतिशत तक होता है। इसमें बाद में आने
वाले दूध से कम मात्रा में वसा, कार्बोहाइड्रेट तथा दुग्धशर्करा होते हैं। शिशु को मां का आरम्भिक
दूध पिलाने से उसके शरीर में पोषक तत्वों तथा संक्रमण-रोधी पदार्थों की मात्रा
बढ़ाने में सहायता मिलती है। संक्रमण-रोधी पदार्थ शिशु को अतिसार जैसे संक्रामक
रोगों से बचाते हैं, जो कि जन्म के बाद पहले कुछेक सप्ताहों के दौरान बच्चों को हो सकते
हैं। मां का आरम्भिक दूध मूलतः शिशु को मां से प्राप्त होने वाला पहला प्रतिरक्षक है।कुछ माताएं इस
प्रारम्भिक दूध को खराब तथा अपाच्य मानती हैं। दूध के रंग में अंतर तथा निरन्तरता
में कमी ऐसी मान्यता के संभावित कारण हो सकते हैं।

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