शिशु तथा बाल पोषण संबंधी सही मानक
1. जन्म के तुरन्त बाद स्तनपान का आरम्भ, यदि हो सके तो 1 घंटे के भीतर
2. प्रथम छह माह के दौरान केवल स्तनपान
अर्थात शिशु को केवल माँ का दूध दिया जाए
तथा अन्य कोई दूध, खाद्य, पेय पदार्थ पानी जैसा कुछ नहीं।
3. छह माह की आयु से सतत् स्तनपान के
साथ साथ उपयुक्त एवं पर्याप्त पूरक आहार।
4. दो वर्ष की आयु तक अथवा उसके बाद भी
सतत स्तनपान।
शिशु का प्रारम्भिक आहार
शिशु हेतु प्रारम्भिक आहार तैयार करने
के लिए परिवार के मुख्य खाद्यान्न का प्रयोग किया जाना चाहिए। सूजी, गेंहूँ आटा (गेहूँ का आटा), चावल, रागा, बाजरा आदि से थोड़े से पानी अथवा दूध, यदि उपलब्ध हो, का प्रयोग करके दलिया बनाया जा सकता
है। शिशु हेतु प्रारम्भिक पूरक आहार तैयार करने हेतु किसी अनाज के भुने हुए आटे को
उबले हुए पानी, चीनी
तथा थोड़ी सी वसा के साथ करीब दो मिनट तक पकाकर बनाया जा सकता है तथा बच्चे को छः
माह की आयु हो जाने पर खिलाना शुरू किया सकता है। चीनी अथवा गुड़ तथा घी अथवा तेल
को मिलाना आवश्यक है क्योंकि यह ऊर्जा शक्ति को बढ़ाता है। प्रारम्भ में दलिया
पतला बनाया जा सकता है, परन्तु जैसे-जैसे बच्चा बढ़ता जाता है, होता है। गाढ़ा दलिया पतले दलिये की
अपेक्षा इसे गाढ़ा किया जाना चाहिए क्योंकि यह अधिक पौष्टिक होता है। यदि कोई
परिवार अलग से शिशु हेतु दलिया तैयार नहीं कर सकता, तो आधी चपाती के टुकड़ों कर आधे प्याले
दूध या उबले हुए पानी में भिगोया जा सकता है, अच्छी तरह मसल कर तथा चीनी एवं वसा
मिलाने के पश्चात् शिशु को खिलाया जाना चाहिए I भिगोयी हुई तथा मसली हुई चपाती को छलनी
से छाने ताकि शिशु हेतु नरम अर्ध ठोस आहार प्राप्त हो सके I केला, पपीता, चीकू, आम आदि जैसे फलों को मसल कर दिया जा
सकता है। शिशुओं को सत्तू जैसा तुरन्त तैयार किया शिशु आहार भी दिया जा सकता है।
शिशुओं हेतु पारम्परिक आहार
जो बच्चा अनाज का दलिया अच्छी तरह खा
रहा है, उस
बच्चे को पके हुए अनाज, दाल तथा सब्जियों सहित मिश्रित आहार दिया जा सकत है। देश के विभिन्न
भागों में शिशुओं को दिया जाने वाला सर्वाधिक पारम्परिक आहार, जैसे कि खिचड़ी, दलिया, सूजी, खीर, उपमा, इडली, ढोकला, भात-भाजी आदि मिश्रित आहारों के उदाहरण
हैं। कभी-कभी पारम्परिक आहार थोड़ा सा बदलाव करने के पश्चात् दिया जाता है, ताकि बच्चों हेतु और अधिक उपयुक्त भोजन
तैयार हो सके। उदाहरण के तौर पर थोड़े से तेल तथा चीनी के साथ मसली हुई इडली शिशु
हेतु अच्छा पूरक आहार होती है। इसी तरह, भात में भी कुछ पकी हुई दाल अथवा सब्जी
डालकर इसे और अधिक पोषक बनाया जा सकता है। खिचड़ी को पकाते समय उसमें एक अथवा दो
सब्जियाँ डालकर उसे और अधिक पोषक बनाया जा सकता है
आशोधित पारिवारिक आहार
अधिकांश परिवारों में रोटी अथवा चावल तथा
दाल अथवा सब्जी के रूप में खाद्यान्न पकाया जाता है। परिवार हेतु पकाए गए आहार से
शिशु हेतु पूरक आहार तैयार करने के लिए इसमें मसाले मिलाने से पूर्व थोड़ी सी
मात्रा में दाल अथवा सब्जी को अलग से निकाला जाना चाहिए। आधी कटोरी दाल तथा थोड़ी
सब्जी, यदि
उपलब्ध हो, में
चपाती के टुकड़ों को भिगोया जा सकता है। मिश्रित आहार को अच्छी तरह मसलकर तथा इसे
थोड़ा तेल मिलाने के बाद शिशु को खिलाएं। यदि आवश्यक हो तो इस मिश्रण को अर्ध-ठोस
पेस्ट बनाने के लिए छलनी से छाना जा सकता है। इस प्रकार, शिशु हेतु पोषक पूरक आहार तैयार करने के
लिए पकाए गए चावल अथवा गेहूँ को दाल तथा/अथवा सब्जी में मिलाया जा सकता है। परिवार
के भोजन में आशोधन करके बनाया गया आहार शिशुओं के पूरक आहार को सुनिश्चित करने के
तरीकों में से सर्वाधिक प्रभावशाली तरीका है।
शिशुओं हेतु तत्काल आहार
शिशु आहार मिश्रण को घर में उपलब्ध
खाद्यान्नों से घर पर बनाया जा सकता है। इन मिश्रण को का कम से कम एक माह तक
भण्डारण किया जा सकता है तथा शिशुओं को बार-बार खिलाया जा सकता है। ये सतु जैसे
आहार हैं, जो
भारतीय समुदाय में बहुत प्रसिद्ध हैं। इसमें तीन भाग किसी अनाज (चावल/गेहूँ) अथवा
मिलेट (रागी/बाजरा/ज्वार) का, तथा तिल एक भाग किसी दाल (मूंग/चना/अरहर) तथा मूंगफली अथवा सफेद , का आधा भाग यदि उपलब्ध हों, को डालकर तैयार कर सकते हैं। खाद्य
पदार्थ पृथक रूप से भूना, पीसा तथा सही तरीके से मिश्रित होना चाहिए तथा वायुरूद्ध डिब्बों में
इसका भण्डारण किया जाए। आहार हेतु दो चम्मच शिशु खाद्य मिश्रण लें, उबले हुए गर्म पानी अथवा दूध, चीनी तथा तेल /घी को
डालकर मिश्रण को अच्छी तरह से मिलाएं। यदि उपलब्ध हो तो पकायी हुई तथा मसली
हुई गाजर, कददू
अथवा हरी पतेदार सब्जियों को दलिए में मिलाया जा सकता है। जब कभी परिवार में ताजा
पकाया हुआ भोजन उपलब्ध न हो, तो शिशु को यह आहार खिलाया जा सकता है। शिशु आहार मिश्रण से हलवा, बरफी, उपमा, दलिया भी बनाए जा सकते हैं I
संरक्षक आहार
आशोधित आहार तथा सकते हैं तथा बच्चे को
दिए जा सकते हैं Iशिशु आहार मिश्रणों के अतिरिक्त दूध,दही, लस्सी, अण्डा, मछली एवं फलों तथा सब्जियों जैसे
संरक्षक आहार शिशुओं के स्वस्थ विकास में सहायता हेतु भी महत्वपूर्ण हैं। बच्चे
में विटामिन ‘ए’ तथा लौह तत्व की अच्छी मात्रा
सुनिश्चित करने के लिए हरी पत्तीदार सब्जियाँ, गाजर, कददू मौसमी फल जैसे पपीता, आम, चीकू, केले आदि महत्वपूर्ण होते हैं। शिशु को
छह माह की आयु के पश्चात् स्तनपान के अतिरिक्त अनाजों, दालों, सब्जियों, विशेषकर हरी पतेदार सब्जियों, फलों, दूध तथा से बनी चीजों, यदि मांसाहारी हैं तो अण्डे, मॉस तथा मछली, तेल/घी, चीनी तथा आयोडीन-युक्त नमक आदि सभी
खाद्यों की आवश्यकता होती है। बच्चे में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी में स्तनपान
के साथ-साथ शिशु के नानारूपी आहारों से भी सुधार आएगा।
शिशु आहारों का ऊर्जा घनत्व
छोटे बच्चों को न्यून ऊर्जा सघनता वाले
पूरक आहार दिए जाने हैं तथा खाने की कम आवृत्ति से अपर्याप्त कैलोरी के परिणामस्वरूप
कुपोषण होता है। अधिकतर आहार भारी होते हैं तथा बच्चा इन्हें एक ही बार में अधिक
मात्रा में नहीं खा सकता। इस प्रकार बच्चे में पर्याप्त ऊर्जा सुनिश्चित करने के
उद्देश्य से बच्चों को बार-बार थोड़े–थोड़े अन्तराल पर थोड़ी ऊर्जा के घनत्व
वाले आहार देना आवश्यक है।
शिशुओं तथा छोटे बच्चों को दिए जाने
वाले आहारों की उर्जा सघनता को चार विभिन्न तरीकों से बढ़ाया जा सकता है :
(i)प्रत्येक शिशु आहार में एक छोटा चम्मच
तेल अथवा घी डालना। वसा ऊर्जा का संकेंद्रित स्रोत है तथा उसमे विद्यमान ऊर्जा में
भरपूर वृद्धि करता है I यह जानकारी प्रदान करके कि एक छोटा शिशु मां के दूध तथा अनाजों एवं
दालों जैसे सभी अन्य आहारों में विद्यमान वसा को पचा सकता है, इस मिथ्या भ्रम को तोड़ना होगा कि छोटा
बच्चा वसा को नहीं पचा सकता तथा यह मानने का कोई कारण नहीं कि बच्चा आहार में
मिलाई गयी वसा को नहीं पचा सकता ।
(ii) बच्चे के अहार में चीनी अथवा गुड़
मिलाना I बच्चों
को अधिक उर्जा की जरुरत होती है इसलिए बच्चे के आहार में पर्याप्त मात्रा में चीनी
अथवा गुड़ मिलाना चाहिये I
(iii) ‘माल्टिड' आहार देना I माल्टिंग आहार के गाढ़ेपन को घटाती है
तथा इस प्रकार बच्चा एक बार में अधिक खा सकता है I माल्टिंग साबुत अनाज अथवा अथवा दाल का
अकुरण करके इसको पीसने के पश्चात् सुखाना है I अनाज अथवा दाल के माल्टिंग से तैयार
शिशु आहार मिश्रण बच्चों को और अधिक ऊर्जा प्रदान करेगा I अन्य आहारो के साथ माल्टिंग आहार का
आटा बच्चे को और अधिक ऊर्जा प्रदान करेगा। अन्य आहारो के साथ माल्टिंग आहार का आटा
बच्चे को दिए जाने वाले भोजन के गाढ़ेपन को घटाने में मदद करता है। ए.आर.एफ.
माल्टिड आहारों के आटे को दिया गया वैज्ञानिक नाम है तथा इसका शिशु अहारों में
अवश्य उपयोग किया जाना चाहिये I
(iv) गाढ़े मिश्रित आहार देना। पतला दलिया
पर्याप्त ऊर्जा प्रदान नहीं करता है। विशेषकर 6-9 माह के दौरान एक छोटे शिशु को
गाढ़े परन्तु सुपाच्य दलिए की आवश्यकता होती है, क्योंकि अर्ध-ठोस आहार के सख्त टुकड़ों
को निगलने में शिशु को कठिनाई हो सकती है। छोटे शिशुओं हेतु अर्ध-ठोस आहारों को
मूसल से कूटा व छलनी से छाना जा सकता है, ताकि मिश्रित आहार सुपाच्य तथा अथवा
पिण्डों रहित समरस हों।
आहार की आवृति
शिशुओं तथा छोटे बच्चों को स्तनपान के
अतिरिक्त दिन में 5-6 बार खाना खिलाये जाने की आवश्यकता होती है। यह भी याद रखना
चाहिए कि पहले दो वर्षों के दौरान शिशुओं तथा छोटे बच्चों का अपर्याप्त आहार
कुपोषण का मुख्य कारण हैI
सतत स्तनपान
स्तनपान दो या दो से अधिक वर्षों तक
अवश्य जारी रखना चाहिए। शिशु को स्तनपान जारी रखने के साथ-साथ दिया जा रहा
पर्याप्त पूरक आहार शिशु को स्तनपान के समग्र लाभ प्रदान करता है। दूसरे शब्दों
में, बच्चा
अपने अधिकाधिक विकास हेतु अत्यधिक अनिवार्य स्तनपान से भावनात्मक सन्तुष्टि
प्राप्त करने के अलावा ऊर्जा, उच्च गुणवत्ता युक्त टीन, विटामिन ‘ए’, संक्रमण रोधी तत्व तथा अन्य पोषक तत्व
प्राप्त करता है। विशेषकर रात का स्तनपान अनवरत दुग्ध स्रवण सुनिश्चित करता है।
प्रारम्भ में जब छह माह की आयु के
पश्चात् पूरक आहार दिये जाते हैं, तब शिशु को पूरक आहार भूख लगने पर खिलाया जाना चाहिए। जब बच्चा पूरक
आहारों को अच्छी तरह लेना शुरू कर देता है, तब बच्चे को पहले स्तनपान कराना चाहिए
तथा बाद में पूरक अहार देना चाहिए। इससे पर्याप्त दुग्ध स्रवण सुनिश्चित होगा।
सक्रिय आहार
बच्चे को खिलाते अथवा स्तनपान कराते
समय बच्चे के साथ बातचीत, बच्चे के साथ खेलने आदि जैसे तरीकों से दुलार जताने से बच्चे की भूख
तथा विकास को बढ़ावा मिलता है। एक या दो साल के बच्चे को अलग प्लेट में भोजन दिया
जाना चाहिए तथा उसे स्वयं खाने के लिए प्रेरित करना चाहिए। एक ही समय पर तथा एक
साथ खाना भूख को बढ़ाने तथा अन्यमनस्कता को दूर करने में भी मदद करता है।
विकास अनुवीक्षण एवं संवर्धन
नियमित रूप से बच्चे का वजन कराना तथा
स्वास्थ्य कार्ड पर वजन को दर्ज करना शिशु के विकास के प्रबोधन के महत्वपूर्ण साधन
हैं। शिशुओं तथा छोटे बच्चो का प्रत्येक माह उनकी मां की उपस्थिति में वजन किया
जाना चाहिए तथा मां को बच्चे के विकास की स्थिति समझाई जानी चाहिए। वृद्धि चार्ट
प्लास्टिक जैकेट में रखकर बच्चे की मां को दिया जाना चाहिए। यदि बच्चे में कुपोषण
की समस्या है, तो
प्रति दिन बच्चे को अतिरिक्त आहार प्रदान करने के लिए माताओं को कहा जाना चाहिए।
कुपोषित बच्चों की घर पर निगरानी की जानी चाहिए तथा माताओं को आने तथा बच्चों के
अहार तथा देखभाल से सम्बन्धित प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। ।
पूरक आहारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना
पूरक आहारों को सावधानी-पूर्वक तैयार
कर उनका भण्डारण करना संदूषण से बचाव हेतु महत्वपूर्ण है। व्यक्तिगत साफ-सफाई
शिशुओं के आहार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि स्वच्छता नहीं होती है, तो पूरक आहार बच्चे में संक्रमण फैलाकर
बच्चे की भलाई के बजाए उसे और अधिक नुकसान पहुँचा सकता है। अतः, यह महत्वपूर्ण है कि शिशुओं हेतु तैयार
सभी आहार इस तरह रखे जाएं कि वे कीटाणुओं से मुक्त रहें। शिशुओं हेतु आहारों को
तैयार करते समय ध्यान देने योग्य कुछ बातें इस प्रकार हैं –
आहार बनाने से पूर्व साबुन व पानी से
हाथ धोने चाहिएं, क्योंकि गन्दे हाथों में लगे कीटाणु दिखाई नहीं देते और आहार में
पहुँच जाते हैं।
प्रयोग में लाए जाने वाले बर्तनों को
रगड़कर धोया जाना चाहिए तथा सुखाकर एवं ढ़ककर रखा जाना चाहिए।
अधिकांश कीटाणु भोजन पकाते समय समाप्त
हो जाते हैं। बच्चों हेतु आहार को ठीक प्रकार से पकाया जाना चाहिए, ताकि यदि कोई हानिकारक जीवाणु हो तो
समाप्त हो जाए।
भोजन पकाने के पश्चात् उसे कम से कम
हाथ लगाएं तथा धूल एवं मक्खियों से बचाने हेतु ढककर रखें।
पके हुए खाद्य पदार्थों को एक या दो
घंटे से अधिक गर्म वातावरण में नहीं रखना चाहिए यदि उन्हें प्रशीतन तापमान पर रखने
की सुविधा न हो।
बच्चे को खिलाने से पहले मां एवं बच्चे
दोनों के हाथ धोने चाहिए।
उपलब्ध पोषाहार एवं स्वास्थ्य सेवाओ का
उपयोग
लगभग सभी स्थानों पर छोटे बच्चों के
लिए कई प्रकार की पोषाहार एवं स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हैं। समुदाय के लोगों को
प्रजनन एवं स्वास्थ्य कार्यक्रम, समेकित बाल विकास सेवा स्कीम आदि के अंतर्गत गांवों में, उप-केन्द्रों पर, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर
बच्चों के लिए उपलब्ध विभिन्न सेवाओं के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए।
सामुदायिक जाना चाहिए, ताकि बाल स्वास्थ्य को बढ़ावा दिया जा सके।
बीमारी के दौरान तथा उसके बाद आहार
छः माह से दो वर्ष की आयु तक, छोटे बच्चे अतिसार खसरा, सर्दी, खांसी, आदि संक्रमणों से अक्सर पीड़ित रहते
हैं। यदि उनका आहार उचित हो, तो इनके लक्षण अल्प-पोषित बच्चे की तुलना में सामान्य रूप से कम
तीव्र होते हैं। एक बीमार बच्चे को ज्यादा पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है, ताकि वह अपने शरीर के पोषक तत्वों के
सुरक्षित भण्डार का उपयोग किये बिना संक्रमण से लड़ सके। तथापि, बच्चे की भूख मिट सकती है और वह खाना
खाने से मना कर सकता है। किन्तु बच्चे को बीमारी से ठीक होने के लिए पर्याप्त पोषक
तत्वों की आवश्यकता होती है I
वजन कम होने तथा अन्य पोषक तत्वों की
कमी से बचने के लिए बीमारी के दौरान एवं बाद में उपयुक्त आहार जरूरी है। शिशुओं को
उपयुक्त आहार सुनिश्चित करके ही संक्रमण तथा कुपोषण के दुष्चक्र को तोड़ा जा सकता
है। स्तनपान करने वाले बच्चे कम बीमार होते हैं और पोषित होते हैं। छः माह से अधिक
आयु के शिशुओं के लिए बीमारी के दौरान स्तनपान एवं पूरक पोषण दोनों ही जारी रहने
चाहिए। आहार में आने वाली कमी को रोकना चाहिए। बीमार बच्चे द्वारा पर्याप्त भोजन
करने में सहायतार्थ समय एवं ध्यान देना चाहिए। शिशुओं को कम मात्रा में किन्तु
बार-बार भोजन करने के लिए प्रेरित करना चाहिए तथा उन्हें ऐसा भोजन देना चाहिए, जिसे बच्चा पसंद करता है। यह सुनिश्चित
करना चाहिए कि खसरा, अतिसार एवं श्वसन संक्रमण से प्रभावित बच्चे विटामिन ‘ए’ से भरपूर भोजन अधिक मात्रा में खाएं।
चिकित्सा अधिकारी की सलाह से ऐसे बच्चों को विटामिन ‘ए’ की बड़ी खुराक भी दी जा सकती है।
बीमारी के बाद जब बच्चे के स्वास्थ्य
में सुधार हो रहा हो, तो उसे पर्याप्त ऊर्जा, प्रोटीन एवं अन्य पोषक तत्वों की
उपयुक्त मात्रा वाले पोषक आहार की आवश्यकता होती है। यह आहार उसे तीव्र विकास एवं
पोषक तत्वों के संग्रहण के योग्य बनाएगा। बीमारी के बाद लगभग एक महीने के लिए
बच्चे के दैनिक आहार में एक या दो भोजन बढ़ा देने चाहिए।
अत्यधिक कठिन परिस्थितियों में आहार
कुपोषित शिशु
कुपोषित शिशु एवं छोटे बच्चे अक्सर उस
माहौल में पाये जाते हैं। जहां पर ग्राह्य भोजन की गुणवत्ता एवं मात्रा बढ़ाना एक
समस्या है। कुपोषण की पुनरावृति को रोकने एवं चिरकालिक कुपोषण के प्रभावों पर काबू
पाने के लिए ऐसे बच्चों पर प्रारम्भिक पुनर्वास चरण में एवं उसके बाद एक लम्बे समय
तक अतिरिक्त ध्यान देने की आवश्यकता होती है।लगातार बार-बार स्तनपान और जब
आवश्यकता हो, पुनः
स्तनपान मुख्य निवारक उपाय हैं, क्योंकि कुपोषण की उत्पत्ति अक्सर अपर्याप्त एवं बाधित स्तनपान से
होती है। पर्याप्त पोषणिक एवं सुरक्षित पूरक आहार प्राप्त करनसे कठिन हो सकता है
और ऐसे बच्चों के लिए विशेष रूप आहारीय पूरकों की आवश्यकता हो सकती है। कुपोषित
बच्चों की माताओं को शिविर में बुलाया जा सकता है और उन्हें निर्देशों के साथ 15
दिन का अनाज-दालों का भुना हुआ मिश्रण उपलब्ध कराया जा सकता है। बच्चों की
प्रत्येक 15 दिन के बाद विकास प्रबोधन, स्वास्थ्य जांच तथा 3 माह के लिए
तत्काल खाद्य रसद के लिए निगरानी की जानी चाहिए। जब उपयुक्त आहार से कुपोषित
बच्चों की स्थिति में सुधार हो जाएगा, तो वे स्वयं ही अन्य परिवारों के बच्चों
के लिए प्रेरक का कार्य करेंगे।
गर्भावस्था पूरी होने से पहले जन्म
लेने वाले अथवा जन्म के समय कम वजनी शिशु
मां का दूध समय से पूर्व जन्मे बच्चों
या अल्प वजनी जन्मे बच्चों के लिए विशेष रूप से आवश्यक होता है, क्योंकि उन्हें संक्रमण, लम्बे समय तक अस्वस्थता एवं मुत्यु का
जोखिम होता है। समय से पूर्व जन्मे बच्चों या अल्प वजनी जन्मे बच्चों को गर्म
रखें।कंगारू देखभाल पद्धति को अपनाएं। कंगारू देखभाल समय से पूर्व जन्मे बच्चों को
दी जाने वाली वह देखभाल है, जिसमें बच्चे को मां के दोनों स्तनों के बीच जब तक सम्भव हो, त्वचा से त्वचा के सम्पर्क के लिए रखा
जाता है, क्योंकि
इससे गर्भाशयी वातावरण बनाने और शिशु के विकास में सहायता मिलती है। यह बच्चे को
दो रूपों में मदद करता है (i) बच्चे को माँ के शरीर की गर्मी मिलती है और (ii) बच्चा मां के स्तनों से जब भी आवश्यक
हो, दूध
पी सकता है। ऐसे बच्चों को थोड़ी-थोड़ी देर बाद कई बार दूध पीने की आवश्यकता हो
सकती है।
समय से पूर्व प्रसव के फलस्वरूप आने
वाले दूध का सरक्षात्मक सम्मिश्रण अत्यधिक गाढ़ेपन के कारण समय से पूर्व जन्मे
बच्चे के लिए उपयुक्त होता है। समय से पूर्व जन्मे बच्चों को दिन और रात के दौरान
हर दो घन्टे बाद दूध पिलाना चाहिए।
आपात परिस्थितियों के दौरान आहार
शिशु एवं छोटे बच्चे प्राकृतिक या
मानव-जनित आपदाओं के सर्वाधिक शिकार होते हैं। बाधित स्तनपान एवं अनुपयुक्त पूरक
आहार कुपोषण, बीमारी
एवं मृत्यु के जोखिम को बढ़ाता है। मां के दूध के अनुकल्पों का अनियंत्रित वितरण, उदाहरणार्थ शरणार्थी शिविरों में, स्तनपान को जल्दी एवं अनावश्यक ही बन्द
करा देता है।
हालांकि नवजात शिशुओं के लिए मां का
दूध ही सबसे सुरक्षित और अक्सर एकमात्र विकल्प होता है, लेकिन आपात स्थितियों में तत्काल
आवश्यक राहत पहुंचाने के लिए कुछ बुनियादी बातों जैसे शिशुओं को स्तनपान कराने की
अनदेखी कर दी जाती है। नियमित रूप से उदारतापूर्वक दिया जाने वाला दूध पाउडर
पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं । बच्चों की उत्तरजीविता, उनके पोषक आहार और स्वास्थ्य को
सुनिश्चित करने के लिए खतरे वाले इलाकों में निम्निलिखित बातों को ध्यान में रखते
हुए स्तनपान के संरक्षण, संवर्धन और इसमें सहायत प्रदान करने का आवश्यकता है –
स्तनपान के संरक्षण, संवर्धन और इसमें सहयोग पर जोर दिया
जान चाहिए तथा उचित समय पर, सुरक्षित तथा उपयुक्त पूरक पोषक सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
गर्भवती महिलाओं और शिशु को स्तनपान
कराने वाली माताओं को भोजन परोसते समय प्राथमिकता दी जानी चाहिए और सामान्य से
अधिक खुराक दी जानी चाहिए।
छह महीने से दो साल तक के शिशुओं को
पूरक पोषाहार देने में प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
दान में मिलने वाला भोजन बच्चे की उम्र
के अनुसार होना चाहिए।
अनाथ और बेसहारा बच्चों की पोषक आहार
तथा देखभाल संबंधी तात्काTलक आवश्यकताओं का ध्यान रखा जाना चाहिए।
कृत्रिम पोषण के दुष्प्रभावों को कम
करने के प्रयास सुनिश्चित किये जाने चाहिए। इसके लिए मां के दूध के विकल्पों की
पर्याप्त और लगातार आपूर्ति, सह तरीके कृत्रिम पोषाहार तैयार करने, स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति, समुचित साफ-सफाई, खाना पकाने के उपयुक्त बरतनों और ईंधन
का इंतजाम सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
माँ के एच.आई.वी. संक्रमित होने की दशा
में शिशु आहार
एच.आई.वी. एवं स्तनपान के माध्यम से
प्रभावित परिवारों में मां से बच्चे को भी स्तनपान संवर्धन के मार्ग में चुनौती
खड़ी करता हैI एक
वर्ष से अधिक समय तक स्तनपान के कारण एच.आई.वी. के जोखिम –विश्व स्तर पर 10 एवं 20 प्रतिशत के
बीच शिशुओं को स्तनपान ना कराना की दशा में मृत्यु एवं रुग्णता के बढ़ते देख
संतुलन की आवश्यकता हुई I एच.आई.वी. पाजिटिव माताओं द्वारा कृत्रिम पोषण अपनाना सुरक्षित नहीं
होगा I इसलिये
स्तनपान व संक्रमण माता को परामर्श हेतु बल दिया गया I
एक परामर्शी द्वारा एच.आई.वी. से
प्रभावित माताओं को शिशुओं के मिश्रित आहारों के जोखिम के बारे में बताया जाना
चाहिए। कुछ माताएं बच्चों को कृत्रिम आहार देना चाहती हैं, लेकिन कुछ सामाजिक दबावों के कारण वे
भी बच्चों को स्तनपान कराती हैं । कृत्रिम आहार से पोषित बच्चे को मिश्रित आहारों
अर्थात् स्तनपान एवं कृत्रिम आहारों से पोषित बच्चे की तुलना में कम जोखिम होता
है। इसलिए, एच.आई.वी.
प्रभावित माताओं को शिशुओं पोषण हेतु परामर्श का उद्देश्य मिश्रित पोषण से बचाव
होना चाहिए। सभी स्तनपान कराने वाली माताओं को छः माह तक केवल स्तनपान कराने के
लिए समर्थन देना चाहिए। यदि महिला स्तनपान नहीं कराना चाहती है, उसे कृत्रिम आहारों के लिए सहायता
उपलब्ध करायी जानी चाहिए, ताकि पोषण सुरक्षित हो।
एच.आई.वी. पाजिटिव माताओं द्वारा शिशु
को स्तनपान कराने के लिए डॉक्टरों और नर्सों
सहित परामर्शदाताओं और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की क्षमता सृजित करना आवश्यक
है। तभी माता इच्छानुसार "केवल स्तनपान" या "केवल कृत्रिम
पोषण" से किसी एक विकल्प का चयन कर सकेंगी ।
शिशुओं एवं छोटे बच्चों हेतु उपयुक्त
आहार के संवर्धनार्थ परिचालन दिशा-निर्देश
दायित्व
शिशुओं एवं छोटे बच्चों के आहार में
सुधार हेतु केन्द्र एवं राज्य सरकारें राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय संगठन और
अन्य सम्बन्धित पक्ष हिस्सेदारी निभाते हैं ताकि बच्चों में कुपोषण की व्यापकता को
कम किया जा सके और अपेक्षित संसाधनों जैसे मानवीय, वित्तीय एवं संगठनात्मक इत्यादि का
संघटन किया जा सके। सरकारों का प्रथम दायित्व नीति निर्माण के सर्वोच्च स्तर पर
शिशुओं एवं छोटे बच्चों के आहार में सुधार की महत्ता को मान्यता देना तथा मौजूदा
नीतियों एवं कार्यक्रमों में शिशुओं एवं छोटे बच्चों के आहार से सम्बन्धित सभी
समस्याओं को एकीकृत करना है। सभी संबंधित सरकारी अभिकरणों, राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों
तथा अन्य संबंधित पक्षों के बीच पूर्ण सहयोग समन्वय अपेक्षित है। शिशुओं एवं छोटे
बच्चों के आहार पर राष्ट्रीय दिशा-निर्देशों के क्रियान्वयन में क्षेत्रीय स्थानीय
प्रशासन क्षेत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभा
सकते हैं।
महिला एवं बाल विकास तथा स्वास्थ्य एवं
परिवार कल्याण विभागों की विशेष शिशुओं एवं छोटे बच्चों के आहार में इष्टतम योगदान
की जिम्मेवारी है। शिशुओं एवं छोटे बच्चों के आहार पर राष्ट्रीय दिशा निर्देशों को
राष्ट्र-व्यापी समेकित बाल विकास सेवा तथा प्रजनन एवं बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम का
अभिन्न अंग होना चाहिए। इन दिशा-निर्देशों का जारी परियोजनाओं के कार्यक्रम
प्रबंधकों तथा क्षेत्र कार्यकर्ताओं के माध्यम से प्रभावी परिचालन किया जाना चाहिए
I इन
कार्यक्रमों के प्रबन्धकों एवं क्षेत्र कार्यकर्ताओं को शिशुओं एवं छोटे
व्यावहारिक जानकारी दी जानी चाहिए। दिशा-निर्देश नर्सिंग एवं गैर-स्नातक चिकित्सा
पाठयक्रम का आवश्यक अंग होने चाहिए।
बाल चिकित्सा, प्रसूति विज्ञान, स्त्री-रोग विज्ञान तथा निवारक एवं
समाजिक औषधि विभागों के चिकित्सकीय तथा परा - चिकित्सकीय कार्मिकों द्वारा माताओं
एवं अन्य सम्बन्धित लोगों को शिशूओं और बच्चों के आहार के चयन के लिए शिक्षित एवं
प्रेरित किया जाना चाहिए I इसके अलावा इन दिशा -निर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए
सामुदायिक स्तर के अन्य कार्यकर्ताओं की सेवाओं एवं औपचारिक तथा अनौपचारिक शिक्षा, जन-प्रचार माध्यमों एवं स्वैच्छिक
संगठनों की सहभागिता का उपयोग संस्तुत किया जाता है
इस संदर्भ में, शिशु दुग्ध अनुकल्प, दूध पिलाने वाली बोतलें एवं शिशु आहार
(उत्पादन, आपूर्ति
एवं वितरण का विनियमन) अधिनियम, 1992 एवं इसमें बाद में किए गए संशोधनों के क्रियान्वयन के प्रबोधन
पर ध्यान दिया जाना भी आवश्यक है I
संस्थागत संवर्धन
पोषाहार एवं स्वास्थ्य व्यवसायी निकाय
पोषाहार एवं स्वास्थ्य व्यवसायी
निकायों, जिनमें
गृह विज्ञान (आहार एवं पोषाहार) एवं चिकित्सा संकाय, जन स्वास्थ्य विद्यालय, पोषाहार एवं स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं
(दाइयों, नसों, पोषाहार विशेषज्ञों एवं आहार
विशेषज्ञों सहित) को प्रशिक्षण प्रदान करने वाली सार्वजनिक एवं निजी संस्थाएं तथा
व्यावसायिक संघ शामिल हैं के अपने विद्यार्थियों एवं सदस्यों के प्रति निम्नलिखित
मुख्य दायित्व होने चाहिए –
यह सुनिश्चित करना कि बुनियादी शिक्षा
एवं प्रशिक्षण में दुग्ध स्तनन शरीरं विज्ञान, अनन्य एवं सतत् स्तनपान, पूरक आहार् विषम परिस्थितियो में आहार, शिशुओं, जिनका पोषण मां के दूध के अनुकल्पों से
हो, की
पोषाहारीय जरूरतों को पूरा करना तथा अपनाए गए कानूनी एवं अन्य उपाय शामिल हैं;
सभी नवजात, बाल चिकित्सा, प्रजनन स्वास्थ्य, पोषाहारीय एवं सामुदायिक सेवाओं में अनन्य
एवं सतत् स्तनपान तथा उपयुक्त पूरक आहार हेतु कुशल सहयोग उपलब्ध कराने में
प्रशिक्षण;
प्रसूति अस्पतालों, वाडौँ एवं चिकित्सालयों द्वारा सफल
स्तनपान के दस उपाय, तथा निःशुल्क एवं कम कीमत वाले मां के दूध के अनुकल्पों, आहार बोतलों एवं निप्पलों की आपूर्ति
को न स्वीकारने के सिद्धान्त के अनुसार ‘बच्चा अनुकूल' स्तर की प्राप्ति एवं रख-रखाव को
बढ़ावा देना।
गैर-सरकारी संगठन
स्थानीय, राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर
सक्रिय अनेक प्रकार के गैर-सरकारी संगठनों के उद्देश्यों एवं लक्ष्यों में छोटे
बच्चों एवं परिवारों की आहार तथा पोषाहार सम्बन्धी आवश्यकताओं को बढ़ावा देना
शामिल है। उदाहरणार्थ, धर्मार्थ एवं धार्मिक संगठनों, उपभोक्ता संघों, माताओं के सहायता समूहों, पारिवारिक क्लबों एवं बाल देखभाल
संगठनों के पास शिशुओं एवं छोटे बच्चों के आहार पर राष्ट्रीय दिशा-निर्देशों के
क्रियान्वयन में सहभागिता के बहुत अवसर हैं जैसे -
अपने सदस्यों को शिशुओं एवं छोटे
बच्चों के आहार के सम्बन्ध में सही एवं अद्यतन सूचना प्रदान करना I
समुदाय आधारित कार्यक्रमों में शिशुओं
एवं छोटे बच्चों के आहार के लिए कुशल सहायता और पोषाहार एवं स्वास्थ्य देखभाल
प्रणाली के साथ प्रभावी संपर्क सुनिश्चित करना I
मातृ एवं बल अनुकूल समुदायों एवं कार्य
स्थलों, जो
कि शिशुओं एवं छोटे बच्चों के उपयुक्त आहार में नियमित रूप से सहायता करते हैं के
सृजन में सहभगिता निभाना I
शिशु दुग्ध अनुकल्प के सिद्धांतों एवं
उद्देश्यों के पूर्ण क्रियान्वयन हेतु कार्य करना I
समुदाय आधारित सहायता जिसमें अन्य
माताओं, अभिजात
स्तनपान सलाहकारों एवं प्रमाणित स्तनपान सलाहकारों की सहायता शामिल है,महिलाओं को अपने बच्चों को उपयुक्त रूप
से पोषित करने योग्य बना सकती है I अधिकांश समुदायों में स्व सहायता की
परम्परायें हैं जो परिवारों की इस सम्बन्ध में सहायता के लिए उपयुक्त सहायता
प्रणाली के निर्माण अथवा विस्तार के लिए आधार के रूप में काम कर सकती हैं ई
वाणिज्यिक उद्यम
शिशुओं एवं छोटे बच्चों के लिए
अभिप्रेत औद्योगिक रूप से संसाधित आहारों के निर्माताओं एवं वितरकों को भी इन
दिशा- निर्देशों के उद्देश्यों की प्राप्ति में रचनात्मक भूमिका हैं I ये शिशु दुग्ध अनुकल्प अधिनियम के
सिद्धांतों एवं उद्देश्यों तथा शिशुओं एवं छोटे बच्चों के आहार पर राष्ट्रीय
दिशा-निर्देशों के अनुसार अपनी विपणन प्रक्रियाओं के प्रबोधन के लिए उत्तरदायी है
अन्य समूह
अच्छी आहारीय प्रथाओं के संवर्धन में
समाज के कई अन्य घटकों की प्रभावी भूमिका है I इन घटकों/तत्वों में निम्नलिखित शामिल
है -
शिक्षा प्राधिकारी, जो शिशुओं एवं छोटे बच्चों के आहार के
सम्बन्ध में बच्चों एवं किशोरों के विचारों को आकार देने में सहायता करते हैं
-अधिक जागरूकता एवं सकारात्मक बोध को बढ़ावा देने के लिए स्कूलों एवं शिक्षा के
अन्य माध्यमों से सही सूचनाएं उपलब्ध करायी जानी चाहिए।
जन-संचार माध्यम, जो अभिभावकत्व, बाल देखभाल एवं शिशु आहार के प्रति
लोकप्रिय व्यवहार को प्रभावित करते हैं को शिशु एवं छोटे बच्चे के आहार पर
राष्ट्रीय दिशा-निर्देशों के अनुरूप इन्हें प्रस्तुत करना चाहिए। इन्हें आकाशवाणी
एवं दूरदर्शन पर शिशुओं तथा छोटे बच्चों के लिए पोषाहार विषय पर विशेष कार्यक्रम
शुरू करके देश में पोषाहारीय जागरूकता का वातावरण तैयार करने में मदद करनी चाहिए; और
बाल देखभाल सुविधाओं को, जो कामकाजी महिलाओं को अपने शिशुओं एवं
छोटे बच्चों की देखभाल करने की अनुमति देती हैं। सतत् स्तनपान एवं मां के दूध के
आहार का समर्थन एवं सहायता करनी चाहिए।
अन्तर्राष्ट्रीय संगठन
अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों तथा सार्वभौम
एवं क्षेत्रीय ऋण संस्थाओं को बच्चों एवं महिलाओं के अधिकारों को साकार करने के
लिए अपनी केन्द्रीय महत्ता को मान्यता प्रदान करते हुए शिशु एवं छोटे बच्चे के
आहार को सार्वभौमिक स्वास्थ्य कार्यसूची में प्रमुख स्थान देना चाहिए; उन्हें इन दिशा निर्देशों के व्यापक
क्रियान्वयन के लिए मानव, आर्थिक एवं संस्थागत संसाधनों में, जहां तक सम्भव हो, इस उद्देश्य के लिए अतिरिक्त संसाधन
मुहैया कराने चाहिए I
सरकार के काम में सहायता देने के लिए
अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के विशिष्ट सहयोग में निम्नलिखित शामिल हैं -
1.
मानक और स्तर निर्धारित करना।
2.
राष्टीय क्षमता निर्माण में सहायता ।
3.
नीति निर्माताओं को जानकारी देना तथा प्रशिक्षित करना I
शिशुओं एवं छोटे बच्चों के आहार में
इष्टतम समर्थन के लिए महिला एवं बाल विकास एवं स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के कौशलों
में सुधार I
डाक्टरों, नर्सों, दाइयों, पोषाहार विशेषज्ञों, आहार विशेषज्ञों, सहायक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं तथा अन्य
समूहों के लिए सेवा-पूर्व पाठ्यक्रम में आवश्यकतानुसार संशोधन I
शिशु अनुकूल अस्पताल प्रयासों की योजना
बनाना एवं प्रबोधन करना तथा इनका मातृत्व देखभाल पर्यावरण से परे विस्तार करना।
सामाजिक संघटन, क्रियाकलापों का संवर्धन, उदाहरणार्थ जन-संचार माध्यमों का शिशु
आहार की उपयुक्त पद्धतियों के संवर्धन के लिए उपयोग तथा जन-संचार माध्यमों के
प्रतिनिधियों को शिक्षित करना।
विपणन पद्धतियों एवं अन्तर्राष्ट्रीय
संहिता पर शोध को सहायता।
शिशु तथा बाल पोषण पर ये राष्ट्रीय
दिशा-निर्देश सरकार एवं सुरक्षित एवं पर्याप्त आहार के संरक्षण, संवर्धन व समर्थन के प्रति अपने स्तर
पर तथा सामुदायिक रूप से स्वयं को पुनः समर्पित करने का बहुमूल्य व्यावहारिक अवसर
प्रदान करेंगे।

0 Comments
Please do not enter any spam Link in the comment box