बचपन में होने वाला तपेदिक

बचपन में होने वाला तपेदिक

बचपन में होने वाला तपेदिक

श्वसन तंत्र वाले अध्याय में आपको तपेदिक के बारे में और जानकारी मिलेगी। इसका भी जल्दी निदान किया जाना, चिकित्सीय मदद हासिल करना और बाद में देखभाल महत्वपूर्ण है।

 


* लक्षण

 

किसी बच्चे का वजन लगातार कम होता जाना (हफ्तों महीनों के अंतराल में), या वजन न बढ़ना या उसका ठीक से खाना न खाना।

बच्चे का लगातार बीमार रहना ।

खॉंसी और छाती में से आवाज़ आना।

सामान्य इलाज के बावजूद बुखार न जाना।

बच्चे का निमोनिया, काली खॉंसी या खसरे से न उबर पाना।

लसिका ग्रंथियों में दर्द रहित सूजन।

आँखों का चिरकारी रूप से लाल रहना (अजलीय नेत्रश्लेष्मा शोथ)

मस्तिष्क आवरण शोथ - गर्दन अकड़ना, बुखार, व्यवहार में बदलाव।

कूल्हे या पीठ में लगातार दर्द रहना। ध्यान रहे कि बच्चों में तपेदिक होना भी उतना हीे आम है जितना कि बड़ों में। सतर्क रहें और ऐसे कोई भी लक्षण दिखने पर बच्चे को स्वास्थ्य केन्द्र ले जाएं।

* खसरा

 

खसरा हवा में मौजूद वायरस से बचपन में होने वाला संक्रमण है। प्रमुख रूप से इससे श्वसन तंत्र पर असर पड़ता है पर त्वचा और श्लेष्मा झिल्ली पर भी चकत्ते उभर आते हैं। खसरे में आम जुकाम, खॉंसी, बुखार और साथ में चकत्ते होते हैं। स्वस्थ बच्चे खसरे से बिना किसी जटिलता के उबर जाते हैं। परन्तु कुपोषित बच्चों या फिर उन बच्चों में जिनकी प्रतिरक्षा क्षमता कमज़ोर है, खसरे से कई जरह की जटिलताएं होने की संभावना रहती है। कमज़ोर बच्चे खसरे से बीमार हो जाते हैं और कभी कभी मौत के शिकार भी। इसलिए टीका लगवाया जाना बहुत ही महत्वपूर्ण है।

 

* खसरे का मौसम

 

खसरा आमतौर पर महारोग की तरह हर 2 या 3 साल बाद होता है। परन्तु इसके अलावा बीच में भी खसरे के मामले देखने को मिल जाते हैं। आमतौर पर सर्दियों के अंत में और गर्मियॉं शुरु होने के बीच खसरा होने की संभावना ज़्यादा होती है। खसरे के टीके से इसकी बीमारी अब काफी कम दिखाई देती है|

 

* फैलना और विकृति विज्ञान

 

संक्रमण फेफड़ों और खून तक पहुँच जाता है। श्वसन तंत्र के ऊपरी भाग में हल्का संक्रमण होता है। यह वो समय होता है जब चकत्ते अभी उभरे नहीं होते, परन्तु इस समय में संक्रमण एक बच्चे से दूसरे में पहुँच सकता है।

 

* लक्षण

 

वायरस के शरीर में पहुँचने के करीब 8 से 10 दिनों के बाद ही चकत्ते उभरते हैं। चकत्ते खून की सूक्ष्म नलियों के आसपास में शोथ के कारण होते हैं। ये सारे असर कुपोषित बच्चों में ज़्यादा गंभीर होते हैं। कुछ बच्चों में मस्तिष्क शोथ हो जाने का खतरा भी होता है। चिकित्सीय रूप में खसरे का सबसे महत्वपूर्ण लक्षण है चकत्ते होना। परन्तु गालों के अंदर सरसों जैसे सफेद चिन्ह भी खसरा होने का विश्वसनीय सूचक हैं। इन्हें कोपलिक धब्बे कहते हैं। यह खसरे का एक खास लक्षण है। कोपलिक धब्बे 1 से 2 दिनों तक रहते हैं। आप मुँह के अंदर इनकी जांच कर सकते हैं।

 

* बुखार और चकत्ते

 

बुखार 3 से 4 दिनों तक चलता है। बच्चे की नाक बहती है और आँखों में से पानी आता रहता है। उसके बाद कान के पीछे, चेहरे पर और फिर गर्दन, पेट, हाथ पैर पर चकत्ते उभरने लगते हैं। खसरे के चकत्ते लाल रंग के होते हैं। चकत्ते एक दूसरे में मिल जाते हैं। इसके विपरीत छोटी माता में होने वाले चकत्तों में पीप और द्रव होता है। कभी कभी बीमारी चकत्ते होने के बाद ठीक हो जाती है। चकत्ते 3 - 4 दिनों तक रहते हैं और उसके बाद गायब हो जाते हैं और उनकी जगह पीले काले निशान रह जाते हैं। इन जगहों पर से त्वचा निकल जाती हैं और कुछ दिनों तक निशान बने रहते हैं।

 

भूख न लगना खसरे का एक आम लक्षण है। भूख न लगने से कुपोषण हो जाने का खतरा हो जाता है। कभी कभी हमें लसिका ग्रंथियों में सूजन (गिल्टियॉं) दिखाई देती है। ठीक उसी तरह से जैसे कि कई और वायरस से होने वाली बीमारियों में होती है। अगर खसरे से कोई जटिलता न हो तो यह करीब एक हफ्ते में ठीक हो जाता है।

 

* जटिलताएं

 

खसरे से निमोनिया, कान का संक्रमण, तपेदिक, मस्तिष्क शोथ और कभी कभी दिल का शोथ हो जाने की संभावना होती है। कुपोषित बच्चों में खसरे से होने वाली जटिलताओं की संभावना ज़्यादा होती है। दूसरी ओर कुपोषण अपने आप में बहुत ही आम समस्या है और इससे भी बच्चे को खसरा होने का खतरा होता है। खसरे से होने वाली मौतें असल में खसरे से हुए निमोनिया से होती हैं।

 

* इलाज और बचाव

 

खसरे के वायरस से बचाव का कोई रास्ता नहीं है। पैरासिटेमॉल से बुखार कम किया जा सकता है। खसरे के कारण हो जाने वाला निमोनिया काफी खतरनाक होता है। जल्दी से जल्दी ऍमोक्सीसीलीन से इलाज शुरु कर दें। अन्य संक्रमणों से बचाव के लिए विटामिन ए भी दें। कुपोषण से बचाव के लिए आहार देते रहना ज़रूरी है। खसरे से बचाव का सबसे सही तरीका है बच्चे को खसरे को टीका लगवाना। संक्रमण से बचाव के लिए बच्चे को भीड़ वाली जगहों में ले जाने से बचें।

 

 

खसरे जैसी अन्य बीमारियॉं

कुछ और वायरस से होने वाली बीमारियॉं खसरे के हल्के हमले जैसी होती हैं। खसरे के टीके से इन बीमारियों से बचाव नहीं होता। इसलिए अगर बच्चे को ऐसी कोई बीमारी हो जाए तो खसरे के टीके के असरकारी होने के बारे में शक नहीं करिए। इन बीमारियों में कोई जटिलताएं नहीं होतीं। पैरासिटेमॉल से बुखार का इलाज किया जा सकता है।

 

* होम्योपैथिक और टिशु रेमेडी

 

होम्योपैथिक उपचार भी अपनाया जा सकता है। आरसेनिकम, बैलाडोना, ब्रायोनिआ, फैरम फॉस, कामोमिला, ड्रोसेरा, मरकरी सोल, पल्सेटिला, रूस टॉक्स, सिलीसिआ, स्ट्रेमोनिअम, सल्फर आदि में से दवा चुनें। टिशु रेमेडी के लिए काल फॉस, फैरम फॉस, काली मूर, काली सुल्फ या सिलिका में से दवा चुन सकते हैं।

 

* रूबैला (जर्मन मीज़ल)

 

यह एक हल्की बीमारी है। इसमें भी बुुखार और चकत्ते होते हैं और इस तरह से यह खसरे से मिलती जुलती है। यह भी वायरस सेे होने वाला संक्रमण है। यह संक्रमण 5 से 9 साल के बीच के बच्चों को होता है। चकत्ते होने के पहले और बाद के हफ्तों में यह बीमारी संक्रामक होती है। एक बार छूत होने से ज़िदगी भर के लिए प्रतिरक्षा पैदा हो जाती है।

 

 

* लक्षण

 

संक्रमण के 2 से 3 हफ्तों बाद ही लक्षण दिखाई देने शुरु होते हैं। सबसे पहले आम जुकाम होता है। कभी कभी चकत्ते ठीक से नहीं उभरते। कभी कभी ये केवल 1 से 2 दिनों तक ही रहते हैं। रूबैला के चकत्ते चेहरे, छाती और पेट पर होते हैं। एक आम लक्षण है गर्दन पर गांठें होना, ये गांठें चकत्ते होने के एक हफ्ते के अंदर होती हैं। ये गाठें चकत्ते ठीक होने के बाद 2 से 3 हफ्तों तक रह सकती हैं। गर्दन और कानोंं के पीछे की लसिका ग्रंथियॉं भी इनसे प्रभावित हो सकती हैं। कभी कभी हड्डियों और तंत्रिकाओं में दर्द भी होता है।

 

गर्भवती महिलाओं में रूबैल काफी खतरनाक होता है। वायरस नाड़ के द्वारा शिशु को नुकसान पहुँचा सकता है। जन्मजात शिशु को मोतियाबिंद, दिल की बीमारियॉं, बहरापन, दृष्टिपटल की बीमारियॉं, खून बहने की प्रवृति, सबलवाय, मानसिक विकास में कम, हड्डियों में गड़बड़ियॉं औश्र तंत्रिका तंत्र में गड़बड़ियॉं आदि जटिलताएं संभव हैं। इसलिए गर्भवती महिलाओं को रूबैला से बचाना बहुत ज़रूरी होता है। अगर किसी गर्भवती महिला को यह संक्रमण हो जाए तो उसे गर्भपात की सलाह दी जानी चाहिए। लेकिन अच्छा होगा की हरेक बच्चे को एम.एम.आर. का टीका लगे|

 

* बचाव

 

एम. एम. आर. टीके से रूबैला से बचाव के लिए एक अव्यव भी डाला जाता है। पर यह मंहंगा होता है और अभी तक मॉं बच्चा स्वास्थ्य कार्यक्रम का हिस्सा नहीं बन पाया है।

 

* छोटी माता (चिकन पॉक्स)

 

छोटी माता भी एक वायरस से होने वाली बीमारी है जो आमतौर पर बच्चों को ही होती है। एक बार बीमारी होने से पैदा हुई प्रतिरक्षा जीवन भर रहती है। हाल में इसके लिए टीका भी बनने लगा है। बचपन में छोटी माता से कोई भी खराब असर नहीं होता और यह खसरे के मुकाबले कम परेशान करने वाला संक्रमण है।

 

अगर बचपन में छोटी माता न हो तो बड़ी उम्र में यह संक्रमण होने से काफी नुकसान हो सकता है। कभी कभी संक्रमण के बाद छोटी माता का वायरस तंत्रिकाओं की जड़ों में निष्क्रिय पड़ा रहता है। कभी कभी यह हर्पीज़ ज़ोस्टर के रूप में उभर आता है। यह त्वचा के ऊपर तंत्रिकाओं की जड़ों पर एक श्रंखला के रूप में उभरता है।

 

 

* लक्षण

 

छोटी माता का संक्रमण हवा में मौजूद एक वायरस से होता है। वायरस के शरीर में घुसने के दो हफ्तों बाद ही लक्षण उभरने शुरु होते हैं। बीमारी ठंड लगने और कंपकंपी आने से शुरु होती है जो कि 2 से 3 दिनों तक चलता है। बुखार के कम होने के बाद चकत्ते उभरते हैं। ये चकत्ते चेहरे या हाथ पैर की तुलना में छाती और पेट पर ज़्यादा होते हैं। ये दाने या चकत्ते 2 से 4 दिनों के अंदर अंदर झुंडों में निकलते हैं। शुरु में ये लाल रंग के होते हैं और फिर पीप से भर जाते हैं।

 

4 से 5 दिनों के अंदर अंदर निरोगण शुरु हो जाता है। दाने सूख जाते हैं उन पर पपड़ी जम जाती है और निशान भी पूरी तरह से मिट जाता है। पपड़ी जमने की स्थिति तक आते आते संक्रमण लगभग ठीक हो चुका होता है और इस स्थिति तक यह असंक्रामक भी होता है। बहुत ही कभी कभी छोटी माता से निमोनिया और मस्तिष्क शोथ हो जाते हैं। ऐसा उन बच्चों में होता है जिनका प्रतिरक्षा तंत्र कमज़ोर हो।

 

 

* इलाज

 

ज़्यादातर मामलों में पैरासिटेमॉल ही काफी होती है। परन्तु एसायक्लोवीर से छोटी माता और हर्पीज़ बहुत जल्दी ठीक हो जाते हैं। यह उन बच्चों में उपयोगी है जिनकी प्रतिरक्षा क्षमता कमज़ोर हो। 40 से 50 मिली ग्राम दवा दिन में 4 से 5 बार, पॉंच भागों में बांट कर 7 दिनों तक दी जानी चाहिए। इलाज काफी मंहंगा होता है। परन्तु इससे बहुत तेज़ी से फायदा होता है क्योंकि चकत्ते एकदम से ठीक हो जाते हैं। भारत में अब छोटी माता का टीका उपलब्ध है पर यह बहुत मंहंगा होता है।

 

* दोहद

 

पीका मिट्टी खाने की इच्छा को कहते हैं। दीवारों की सफेदी, राख, चूना और चॉक आदि खाने की इच्छा भी होती है। पीका लोहे की कमी, कैलशियम या ज़िंक की कमी, कुपोषण या कभी कभी मानसिक आभाव के कारण होता है। पेट में कीड़े होना भी पीका का एक कारण हो सकता है। पीका 6 से 7 महीनों की उम्र में होता है और दो साल तक चल सकता है। गर्भवती महिलाओं को भी ऐसी इच्छा हो सकती है। पीका खुद कीड़ों के संक्रमण का ज़रिया होता है।

 

* इलाज

 

इलाज में पोषण में सुधार, बाहर से कैल्शियम लोहा आदि देना शामिल होते हैं। अगर दो साल की उम्र के बाद भी पीका चलता रहे तो डॉक्टर को दिखाएं। तब यह इन्जैक्शनों से ठीक हो सकता है।

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