गर्भावस्था की समस्याएं क्या क्या है जानिए इसके उपाय कैसे करे

गर्भावस्था की समस्याएं क्या क्या है जानिए इसके उपाय कैसे करे

गर्भावस्था की समस्याएं क्या क्या है जानिए इसके उपाय कैसे करे

 

 

  • गर्भावस्था की समस्याएं
  • अतिउल्वोदकता - उल्वद्रव की अधिकता
  • उल्वद्रवअल्पता - उल्वद्रव की बहुत कमी होना
  • अभिशप्त डिंब
  • गर्भाशयग्रीवा की अक्षमता
  • संक्रामक रोगों के साथ गर्भाधान
  • दवाइयां और गर्भावस्था
  • प्रसव-पश्चात् अवसाद
  • प्रसवोत्तरकाल
  • गर्भावस्था की समस्याएं

 

मोलर गर्भधारण

मोलर गर्भधारण, गर्भावस्था की एक दुर्लभ बीमारी है। यह समस्या गर्भाधान के दौरान निषेचन में किसी प्रकार की त्रुटि होने पर उत्पन्न होती है और नाल का निर्माण करने वाली कोशिकाओं में खराबी आ जाती है। मोलर गर्भाधान को कभी-कभी हाइडेटिडिफॉर्म मोल भी कहते हैं जो गेस्टेशनल ट्रोफोब्लास्टिक ट्यूमर्स नाम की कई स्थितियों के समूह का एक हिस्सा होता है। सामान्यतया वे हानि-रहित होते हैं। भले ही वे गर्भाशय से आगे भी फैल सकते हैं पर उनका इलाज संभव है।

 

सामान्य गर्भावस्था में निषेचित अंडे में पिता के 23 तथा माता के 23 क्रोमोजोम मौजूद होते हैं। परन्तु, एक संपूर्ण मोलर गर्भाधान की स्थिति में निषेचित अंडे में माता का कोई क्रोमोजोम मौजूद नहीं होता पर पिता के शुक्राणुओं की संख्या दुगुनी हो जाती है जिससे पिता के क्रोमोजोम की संख्या भी दुगुनी हो जाती है और इस तरह निषेचित अंडे में पिता के क्रोमोजोम के 2 सेट आ जाते हैं और माता का एक भी क्रोमोजोम नहीं होता। इस स्थिति में कोई अपरिपक्व भ्रूण, एम्नियोटिक सैक या कोई सामान्य प्लेसेंटल ऊतक नहीं बनता। बल्कि इसके बदले नाल पुटी के एक पिंड का निर्माण करता है जो अंगूर के गुच्छे की तरह दिखता है। ये पुटी अल्ट्रासाउंड स्कैन में दिखाई पड़ती हैं।

 

ज्यादातर आंशिक मोलर गर्भाधान में निषेचित अंडे में माता के सामान्य क्रोमोजोम होते हैं पर पिता के दुगुने क्रोमोजोम मौजूद रहते हैं इसलिए क्रोमोजोम की सामान्य संख्या अर्थात् 46 की बजाय 69 क्रोमोजोम मौजूद होते हैं (यह तभी होता है जब शुक्राणु वाले क्रोमोजोम की संख्या दुगुनी हो जाती है या दो शुक्राणु समान अंडे को निषेचित कर डालते हैं)। इस स्थिति में गुच्छेनुमा त्रुटिपूर्ण ऊतक के पिंड के बीच कुछ प्लेसेंटल ऊतक दिखते हैं। अल्प विकसित भ्रूण वृद्धि करना आरंभ करता है इसलिए अपेक्षाकृत विकसित भ्रूण, या भ्रूणीय ऊतक अथवा एम्नियॉटिक सैक मौजूद हो सकता है। पर भले ही भ्रूण हो पर यह समझना अहम है कि आनुवंशिक रूप से यह त्रुटिपूर्ण होता है तथा यह जीवित नहीं रह सकता, इससे शिशु का निर्माण भी नहीं हो सकता। इस तरह के गर्भ का गिरना काफी गंभीर तथा परेशानी भरा हो सकता है। यदि सही इलाज तथा देखभाल की जाए तो भविष्य में शरीर पर हानिकर प्रभाव पड़ने की संभावना कम हो जाती है।

 

मोलर गर्भधारण कितना सामान्य

 

एशियाई मूल की महिलाओं में मोलर गर्भधारण का होना एक आमबात है।

बी रक्त समूहवाली महिलाओं में मोलर गर्भधारण होने की संभावना ज्यादा होती है।

भारतीय/पाकिस्तानी महिलाओं में द्वितीय मोलर गर्भधारण होने की प्रवृत्ति बढ़ी है।

मोलर गर्भधारण पता करने की विधि

 

आरंभिक अवस्था में आपको गर्भवस्था के कुछ सामान्य लक्षण दिखाई दे सकता है परन्तु कुछ समय बाद थोड़ा-थोड़ा रक्तस्राव आरंभ हो जाता है। (गर्भावस्था में रक्तस्राव सदा किसी गंभीर रोग का लक्षण नहीं होता, पर कभी-कभी यह मोलर गर्भधारण का लक्षण हो सकता है। इसके बारे में अपने डॉक्टर से संपर्क करें।) रक्तस्राव का रंग हल्का लाल या गहरा भूरा हो सकता है, जो लगातार या रूक-रूक कर, हल्का अथवा भारी मात्रा में हो सकता है। रक्तस्राव आपकी गर्भावस्था के छ्ठे हफ्तों से लेकर 16वें हफ्तों के बीच आरंभ हो सकता है। आपको तीव्र उल्टी तथा उदरीय सूजन (सामान्य की तुलना में गर्भाशय की वृद्धि तेज होती है।) भी हो सकता है। गर्भावस्था में स्रावित होने वाले हॉर्मोन- ह्युमैन कॉरियोनिक गोनैडोट्रोपिन (एचसीजी) का स्तर सामान्य से काफी ऊंचा हो जाता है।

संपूर्ण मोलर गर्भधारण प्रायः अल्ट्रासाउंड स्कैन में दिखाई पड़ता है और रक्त जांच द्वारा एचसीजी के स्तर का निर्धारण कर इस मोलर गर्भधारण का पता लगाया जा सकता है। हालांकि आंशिक मोलर गर्भधारण का पता लगाया जाना कुछ कठिन हो सकता है।

यदि आपके संभावित मोलर गर्भधारण के परीक्षण से पहले ही गर्भपात हो जाता है तो गर्भपात हुए ऊतकों के जरिए कोई रोगविज्ञानी (पैथेलॉजिस्ट) इसकी जांच द्वारा पता लगा सकता है।

मोलर गर्भधारण की चिकित्सा

 

यदि मोलर गर्भधारण का पता चलता है तो त्रुटिपूर्ण ऊतकों को हटाने के लिए डी एंड सी (डायलेशन एंड क्युरेटेज) शल्य-चिकित्सा करने की जरूरत होती है या बिना शल्य-चिकित्सा के दवा से इसे दूर किया जा सकता है। कभी-कभी पूरी तरह से मोलर गर्भधारण को हटाने के लिए दूसरे डी एंड सी शल्य-चिकित्सा की जरूरत होती है।

शल्य-चिकित्सा के बाद डॉक्टर अगली जांच करेंगे तथा मूत्र या रक्त नमूनों के परीक्षण के लिए निर्देश देते हैं ताकि एचसीजी स्तर की निगरानी का जा सके। जब शरीर में किसी प्रकार का रोग नहीं रहता तो एचसीजी का स्तर प्रायः शून्य रहता है।

मोलर गर्भधारण के प्रभाव

 

इसका पता चलने के बाद विषेश परिस्थिति के अनुसार मोलर गर्भधारण की 6 महीने तक निगरानी जरूरी होता है। ऐसा इसलिए कि मोलर गर्भधारण की थोड़ी मात्रा भी तेजी से फैल सकती है और कई बार यह चिकित्सा के कई महीने बाद भी हो सकता है। यदि एचसीजी स्तर बढ़ना शुरू करता है या ऊंचा रहता है तो इसकी जानकारी दी जाती है।

इंवेसिव मोल कभी-कभी मोलर गर्भधारण को हटाने के लिए किये डी एंड सी ऑपरेशन के बाद भी विकसित हो सकता है। इंवेसिव मोल गर्भधारण का अर्थ है कि मोलर ऊतक गर्भाशय की मांसपेशियों की तहों में फैल जाता है। इंवेसिव मोल का सबसे सामान्य लक्षण है शल्य-चिकित्सा के बाद अनियमित या लगातार रक्तस्राव होना।

एक बार जब तिल, गर्भाशय के मांसपेशी सतह पर उत्पन्न हो जाता है तब इंवेसिव मोल से समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। क्योंकि वृद्धि होने के बाद यह शरीर के दूसरे अंगों जैसे- फेफड़े, यकृत तथा मस्तिष्क में फैल सकता है। इंवेसिव मोलर गर्भधारण, आंशिक मोलर गर्भधारण के बाद विकसित हो सकता है पर संपूर्ण मोलर गर्भधारण के बाद इसके विकास की संभावना अधिक होती है।

कभी-कभी ऊतकों के हटाये जाने के बाद भी त्रुटिपूर्ण कोशिकाएं छूट जाती हैं। इसे पर्सिटेंट गेस्टेशनल ट्रोफोब्लास्टिक रोग कहते हैं। यह संपूर्ण मोलर गर्भधारण से ग्रस्त 15 प्रतिशत से कम महिलाओं में होता है तथा आंशिक मोलर गर्भधारण वाली महिलाओं में इसके होने का दर 1 प्रतिशत से भी कम देखा जाता है। यदि ऐसा होता है तो यह सुनिश्चित करने के लिए कि रोग गर्भाशय में न फैले रसायन चिकित्सा (कीमोथेरेपी) करवाये जाने की जरूरत होती है। यह चिकित्सा तब तक जारी रहती है जब तक एचसीजी स्तर सामान्य न हो जाए।

रोग की संपूर्ण चिकित्सा

 

यदि यह गर्भाशय से आगे नहीं पहुंचा हो तो त्वरित तथा समुचित चिकित्सा द्वारा इसके 100 प्रतिशत मामले ठीक किये जा सकते हैं। भले ही ऐसी दुर्लभ स्थिति में जब त्रुटिपूर्ण कोशिका दूसरे अंगों में फैल जाती हैं, तब भी करीब सभी मामले पूरी तरह से ठीक किये जा सकते हैं। आपको जीवनभर एचसीजी स्तर की जांच करवाते रहनी होगी।

बहुत कम मामलों में मोलर गर्भधारण से कोरिओकार्सिनोमा होने की संभावना होती है, जो काफी दुर्लभ मामला होता है परन्तु ऐसे कैंसर का इलाज संभव है जिसमें प्लेसेंटा की कोशिकाएं काफी उग्र हो जाती हैं। ऐसे मामले 30,000:1 (अर्थात् 30,000 गर्भवती महिलाओं में से 1) के अनुपात में होता है। यह मोलर गर्भधारण, सामान्य गर्भ या गर्भपात से उत्पन्न हो सकता है।

पुनः गर्भधारण का समय

 

अगर कीमोथेरेपी का प्रयोग नहीं किया गया है तो एचसीजी स्तर के शून्य पर पहुंचने के बाद पुनः गर्भधारण हेतु 6 महीनों तक इंतजार करने की जरूरत होती है।

अगर कीमोथेरपी का प्रयोग किया गया है तो पुनः गर्भधारण करने से पहले 12 महीनों तक इंतजार करने की सलाह दी जाती है। अगर इस अवधि से पहले ही गर्भाधान हो जाए तो एचसीजी स्तर में वृद्धि हो जाता है तथा डॉक्टर के लिए यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि त्रुटिपूर्ण ऊतक की वृद्धि फिर से हो रही है या नहीं।

दूसरे मोलर गर्भधारण होने की संभावना 1 से 2 प्रतिशत तक रहती है। इससे बचने के लिए आपको पहली तिमाही में अल्ट्रासाउड करवाना होगा।

अच्छी बात यह है कि मोलर गर्भधारण के ज्यादातर मामलों में, यहां तक कि कीमोथेरपी का प्रयोग करने के बाद भी सामान्य गर्भधारण की क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ता। जन्म, जन्म से जुड़ी समस्याएं, अपरिपक्व गर्भ-पीड़ा या अन्य जटिलताओं की संभावना अधिक नहीं होती।

इन परिस्थितियों में परामर्श

 

पुनः गर्भधारण करने से पहले कम से कम 6 महीनों तक नियमित रूप से जांच करवानी चाहिए। अगर आपमें रोग है तो कीमोथेरपी चिकित्सा काफी परेशानी भरी हो सकती है और आपके अगले गर्भाधान में ज्यादा विलंब हो सकता है।

अपने पति से बात करते रहें तथा अपनी परेशानियों को उनसे साझा करें। अगर दोनों को यह लगता हो कि वे एक-दूसरे की भावनाओं को नहीं समझ पा रहे हों तो अपने पारिवारिक चिकित्सक, परिवार, दोस्तों या योग्य परामर्शदाता से सलाह ले सकते हैं।

अतिउल्वोदकता - उल्वद्रव की अधिकता

अतिउल्वोदकता गर्भावस्था में होने वाला एक ऐसा रोग है जिसमें उल्वद्रव की अधिकता हो जाती है।इसे उल्वद्रव विकार या पॉलिहाइड्राम्नियास के नाम से भी जाना जाता है।

 

अतिउल्वोदकता में शिशु अत्यधिक उल्वद्रव से घिरा होता है

 

उल्व द्रव एक जीवाणुरहित घोल होता है जो गर्भावस्था में शिशु को घेरकर संभाले रखता है।यह तरल शिशु के गुर्दों से आता है – यह शिशुजन्य मूत्र है –और शिशु द्वारा पिये जाने से अवशोषित होता हैं।इस तरल की मात्रा गर्भावस्था के 36वें सप्ताह तक बढ़ती रहती है जिसके बाद धीरे-धीरे घटने लगती हैं।यदि शिशु अत्यधिक मूत्र का उत्पादन करता है या पर्याप्त मात्रा में इसे नहीं पीता हो तो तरल की अधिकता हो जाती है जिसके कारण अतिउल्वोदकता हो जाती हैं।

 

तीव्र अतिउल्वोदकता शिशु के किसी विकार का संकेत होती है जैसे केन्द्रीय नाड़ी तंत्र का रोग,उदरांत्र में रूकावट, या गुणसुत्र (क्रोमोसोम) समस्या.कुछ विरले मामलों में इसके कारण समयपूर्व प्रसव या शिशु की मृत्यु भी हो सकती हैं।हल्की अतिउल्वोदकता सामान्य है और किसी समस्या का संकेत नहीं होती,दरअसल द्वितीय त्रिमास में प्रकट होने वाला अतिरिक्त तरल बिना किसी इलाज के सामान्य स्तर को लौट सकता हैं।

 

मुझे कैसे मालूम होगा कि मुझे अतिउल्वोदकता रोग हो गया है ?

 

हल्की अतिउल्वोदकता के अकसर कोई लक्षण नहीं होते,लेकिन यदि आपको सांस लेने में कठिनाई,पेट दर्द,और पेट अपेक्षा से अधिक फूल जाए तो अपने चिकीत्सक को बताएं क्योंकि ये अधिक गंभीर अतिउलवोदकता के चिन्ह हो सकते हैं।

 

नियमित शिशुजन्मपूर्व की जांच के समय आपका चिकीत्सक टेप द्वारा आपकी ‘फंडल ऊंचाई’ – जघनास्थि और गर्भाशय के सबसे ऊपरी बिन्दु के बीच की दूरी – नापेगा।वह पेट के जरिये गर्भाशय को महसूस करके या अल्ट्रासाउंड से शिशु की वृद्धि की जांच भी करेगा।यदि उसे अतिउल्वोदकता का शक हुआ तो वह अल्ट्रासाउंड द्वारा शिशु के चारों ओर उपस्थित उल्वद्रव की मात्रा मापेगा।

 

इसका उपचार कैसे किया जाता है ?

 

चिकीत्सक अतिउल्वोदकता के लक्षणों का उपचार तो कर सकते हैं पर उसके कारणों का नहीं।यदि आपको सांस लेने या चलने में कठिनाई हो तो आपको अस्पताल में भर्ती किया जा सकता है.और चूंकि इसके कारण समयपूर्व प्रसव हो सकता है इसलिये इसकी रोकथाम के लिये दवाईयां दी जाएंगी.।वह आपको आराम पहुंचाने के लिये सुई द्वारा अतिरिक्त उल्वद्रव निकलवाने (एमनियोसेंटेसिस) की सलाह भी दे सकता हैं।

 

आपको ऐसी परीक्षाओं की जरूरत पड़ सकती है जिससे यह पता लगाया जा सके कि आपकी उल्वद्रव की मात्रा क्यों बढ़ गई हैं।आपका चिकीत्सक अल्ट्रासाउंड द्वारा शिशु की समस्याएं मालूम करने का यत्न करेगा और सुई द्वारा उल्वद्रव निकाल कर गुणसूत्र (क्रोमोसोम)विकारों की जांच की जाएगी।वह मधुमेह और संक्रमणों के लिये आपकी रक्त-परीक्षाएं भी करवा सकता हैं।कई मामलों में द्रव की अधिकता की कोई वजह नहीं मालूम होती।

 

मैं इसकी रोकथाम कैसे कर सकती हूं ?

 

आप कुछ नहीं कर सकती हैं।किसी को यह पक्का पता नहीं है कि अतिउल्वोदकता क्यों होती है लेकिन कभी-कभी कतिपय जन्मजात विकारों के चलते शिशु की त्रुटिपूर्ण निगलने की क्रिया के कारण ऐसा हो सकता हैं।चूंकि अतिउल्वोदकता के कारकों की रोकथाम के लिये कुछ नहीं किया जा सकता है इसलिये इस रोग को भी होने से नहीं रोका जा सकता हैं।

 

आमतौर पर पूछे जाने वाले प्रश्न

 

मैने ‘उल्वद्रवअल्पता’के बारे में सुना है. क्या यह और अतिउल्वोदकता एक ही हैं ?

 

नहीं.उल्वद्रवअल्पता इसका बिल्कुल विलोम है – इस दशा में पर्याप्त उल्वद्रव नीं होता।यह रोग सामान्यतः तब होता है जब शिशु या अपरा में कोई समस्या हो या माता को उच्चरक्तचाप हो।उल्वद्रवअल्पता से सबसे बड़ा खतरा यह है कि तैरने के लिये पर्याप्त मात्रा में तरल न होने से शिशु का शरीर गर्भनाल को दबा सकता है जिससे उसे आक्सीजन और पोषकों का वहन बंद हो सकता हैं।यदि आपको उल्वद्रवअल्पता होने का निदान हो तो आपका चिकीत्सक आपके शिशु के स्वास्थ्य की सतर्कता से जांच करेगा जिससे ऐसा कुछ न हो।

 

क्या अतिउल्वोदकता मेरे शिशु को हानि पहुंचा सकती है ?

 

समयपूर्व प्रसव के खतरे के अलावा अतिउल्वोदकता से कोई स्वास्थ्य समस्याएं नहीं होती – यह केवल उनकी ओर ध्यान आकर्षित करती हैं।यदि आपको गंभीर अतिउल्वोदकता हो जाए तो आपका चिकीत्सक शिशु के उदरांत्र तंत्र,केन्द्रीय नाड़ी तंत्र और ह्रदय तथा गुणसूत्र विकारों जैसे डाउन्स सिंड्रोम जैसी समस्याओं के लिये देखेगा।

 

यदि मुझे अतिउल्वोदकता हो तो क्या मेरे शिशु में अवश्य कोई विकार होगा ?

 

कदापि नहीं.दरअसल यदि दूसरे त्रिमास में आपको यह रोग हो तो आपके शिशु के अच्छे रहने की संभावना अधिक होगी और अतिउल्वोदकता स्वतः ही अदृष्य हो जाएगी।अतिउल्वोदकता बिल्कुल स्वस्थ एकाधिक गर्भों में भी हो सकती है।फिर भी आप अपने चिकीत्सक से अल्ट्रासाउंड करते समय जन्मजात विकारों और अन्य समस्याओं के लिये देखने के लिये कह सकती हैं।

 

क्या अतिउल्वोदकता मेरे प्रसव में समस्याएं उत्पन्न करेगी ? शिशु के अधिक मात्रा में द्रव से घिरे होने पर वह प्रसव के समय तक उसमें उछल और पलट सकता है और उसके पैर नीचे की ओर हो जाने या ब्रीच की संभावना अधिक हो सकती है.ब्रीच शिशुओं को कभी- कभी वापस सिर नीचे की स्थिति में लाया जा सकता है लेकिन अक्सर उन्हें सी-सेक्शन द्वारा निकाला जाता हैं।

 

उल्वद्रवअल्पता - उल्वद्रव की बहुत कमी होना

जब किसी स्त्री को उल्वद्रवअल्पता होती है तब शिशु को घेर कर रखने वाले उल्वद्रव का स्तर बहुत कम हो जाता हैं।यह जानने के लिये कि इसका आपके और शिशु के स्वास्थ्य पर क्या असर हो सकता है,पहले स्वस्थ गर्भ बनाए रखने में उल्वद्रव की भूमिका को समझना उचित होगा।

 

उल्वद्रव क्या है ?

 

शिशु के चारों ओर मौजूद उल्वद्रव शिशु के विकास और वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हैं।यह साफ रंग का द्रव शिशु की रक्षा करता है और उसे द्रव उपलब्ध करता हैं।शिशु इस द्रव द्वारा सांस लेता है और पीता हैं।इससे शिशु के फुफ्फूस और पाचन-तंत्र मजबूत होते हैं।उल्वद्रव शिशु को घूमने भी देता है जिससे उसकी पेशियों और हड्डियों के विकास में मदद मिलती हैं।

 

उल्वथैली जिसमें शिशु निवास करता है गर्भाधान के लगभग 12 दिनों बाद बनने लगती हैं।उसी समय उल्वद्रव भी बनने लगता हैं।गर्भावसथा के प्रारंभिक हफ्तों में उल्वद्रव में माता से प्राप्त पानी होता हैं।करीब 12 हफ्तों बाद द्रव में बड़ी मात्रा शिशु के मूत्र की होती हैं।

 

उल्वद्रव की मात्रा गर्भावस्था के करीब 28-32 हफ्तों तक बढ़ती रहती हैं।उस समय तक लगभग 1 क्वार्टर द्रव होता हैं।इसके बाद 37-40 हफ्तों तक यही स्तर बना रहता है जब शिशु पूरी तरह से विकसित माना जाता है.इसके पश्चात द्रव का स्तर घटने लगता हैं।

 

उल्वद्रवअल्पता क्या होती है ?

 

करीब 100 में से 8 गर्भाधानों में उल्वद्रवअल्पता होती हैं।यह अधिकतर गर्भ के अंतिम त्रिमास में होती है लेकिन वैसे किसी भी समय हो सकती हैं।गर्भ के अपेक्षा से 2 सप्ताह अधिक हो जाने पर 8 में से 1 स्त्री को उल्वद्रवअल्पता हो जाती हैं।ऐसा उल्व द्रव स्तर के प्राकृतिक रूप से घट जाने से होता हैं।

 

उल्वद्रवअल्पता का निदान अल्ट्रासाउंड द्वारा किया जाता हैं।इस दशा के कारण पूरी तरह से मालूम नहीं हैं।दरअसल अधिकांश गर्भवती स्त्रियों में इसकी कोई वजह नहीं पाई जाती।

 

इसके मुख्य कारण क्या हैं ?

 

प्रारंभिक गर्भावस्था में उल्वद्रवअल्पता के मुख्य कारण निम्न हैं -

 

शिशु के कतिपय जन्मजात विकार

फटी हुई उल्व कलाएं (उल्वथैली में दरारें या फटन)

गुर्दों और मूत्रमार्ग के विकार इस समस्या के संभावित मुख्य कारण हैं।ऐसा इसलिये माना जाता है क्योंकि ऐसे विकारों से ग्रस्त शिशु मूत्र का उत्पादन कम करते हैं जो उल्वद्रव का मुख्य भाग होता हैं।माता की कुछ स्वास्थ्य समस्याएं का संबंध भी उल्वद्रवअल्पता से जोड़ा गया हैं।इन समस्याओं में उच्चरक्तचाप,मधुमेह,लूपस और अपरा के विकार शामिल हैं।

 

इसका क्या प्रभाव होता है ?

 

उल्वद्रवअल्पता स्त्री और शिशु तथा प्रसवक्रिया को विभिन्न तरह से प्रभावित कर सकती हैं।ये प्रभाव इसके कारणों,होने के समय और द्रव की कमी की मात्रा पर निर्भर करते हैं।

 

गर्भावस्था के प्रथमार्ध में उल्वद्रव की कमी फुफ्फूस और हाथ-पैरों में विकार उत्पन्न कर सकती हैं।इस काल में गरभपात,समयपूर्व जन्म और मृतशिशु-जन्म का खतरा बढ़ जाता हैं।

गर्भावस्था के द्वितीयार्ध में होने पर इसके कारण शिशु का विकास कुंठित हो सकता हैं।

प्रसव के पहले होने पर शिशुजन्म और प्रसव में जटिलताओं का खतरा बढ़ सकता हैं।

मुझे क्या करना चाहिये ?

 

हाल में किये गए अध्ययनों से समझा जा रहा है कि सामान्य रूप से गर्भवती स्त्रियों में उल्वद्रवअल्पता होने पर कदाचित किसी उपयार की जरूरत नहीं हैं।उनके शिशुओं के स्वस्थ रहने की संभावना हैं।

 

जब इलाज की जरूरत हो तो प्रसव शुरू होने पर कृत्रिम उल्व द्रव देना चाहिये। .

चिकीत्सक द्वारा गर्भाशय के आकार व कोख में स्थित उल्वद्रव की मात्रा की निगरानी की जानी चाहिये ताकि जटिलताओं से निपटने के लिये कदम उठाए जा सकें।

उच्चरक्तचाप,मधुमेह,लूपस और अपरा के विकारों से ग्रस्त स्त्रियों को उल्वद्रवअल्पता का अधिक खतरा होता हैं।उच्चरक्तचाप होने पर गर्भाधान के पहले चिकीत्सक से सलाह लेनी चाहिये।गर्भावस्था में हर दवा चिकीत्सक की निगरानी में लेनी याहिये।यह सुनिश्चित कर लें कि आपका रक्तचाप अचछी तरह से नियंत्रण में हो।

उल्वद्रवअल्पता का निदान होने पर स्वस्थ और पोषक भोजन खाएं,बहुत सारा द्रव पियें(पानी सर्वश्रेष्ठ है),खूब आराम करें और समयपूर्व प्रसव के लक्षण होने पर चिकीत्सक को सूचित करें।

अभिशप्त डिंब

अभिशप्त डिंब क्या है ?

 

जब कोई अंडा गर्भाधान के बाद गर्भाशय की भित्ति से जुड़ तो जाता हो लेकिन उससे भ्रूण का विकास न हो तो उसे अभिशप्त डिंब(भ्रूणहीन गर्भ) कहते हैं।ऐसे में कोशिकाएं भ्रूण में विकसित होने के बजाय केवल गर्भ-थैली के रूप में विकसित होती हैं।अभिशप्त डिंब सामान्यतः प्रथम त्रिमास में उत्पन्न होता है जब स्त्री को पता भी नहीं होता है कि वह गर्भवती है।सामान्यतः अधिक मात्रा में गुणसूत्र (क्रोमोसोम) विकृतियां होने पर उस स्त्री के शरीर में प्राकृतिक गर्भपात हो जाता है।

 

 

मुझे कैसे पता चले मैं अभिशप्त डिंब से ग्रस्त हूं ?

 

अभिशप्त डिंब गर्भावस्था की अत्यन्त प्रारंभिक दशा में होता है जब स्त्री को अपने गर्भवती की जानकारी भी नहीं होती।आपको गर्भाधान होने के लक्षण महसूस हो सकते हैं जैसे - मासिक स्राव का न होना या देर से होना –और गर्भाधान की परीक्षा भी पाज़िटिव हो सकती है.संभव है कि आपके पेट में हल्का दर्द हो या योनि से हल्का रक्तस्राव हो.सामान्य माहवारी की तरह गर्भाशय की पर्त निष्कासित हो सकती है पर रक्तस्राव सामान्य से अधिक हो सकता है.

 

अधिकतर महिलाएं समझती हैं कि चूंकि उनके अंतःस्राव का स्तर बढ़ रहा हो तो उनका गर्भ भी सही मार्ग पर होगा।अपरा(गर्भनाल) का कुछ समय तक विकास होता रहता है और इसीलिये गर्भावस्था के अंतःस्राव भी बढ़ते रहते हैं जिससे महिला को लगता है कि वह गर्भवती है।इसका निदान तभी हो पाता है जब अल्ट्रासाउंड परीक्षा में रिक्क गर्भाशय या गर्भथैली दिखाई देती है।

 

अभिशप्त डिंब कैसे होता है ?

 

अभिशप्त डिंब का कारण प्रथम त्रिमासो में होने वाले 50% गर्भपात हैं जो अधिकतर गुणसूत्र समस्याओं के कारण होता है।स्त्री का शरीर भ्रूण के विकृत गुणसूत्र को पहचानता है और स्वाभावीक रुप से गर्भधारणा जारी नही करना चाहती है क्यौंकि ऐसा भ्रूण सामान्य,स्वस्थ शिशु में विकसित नहीं हो सकता।ऐसा असामान्य कोशिका-विभाजन या खराब गुणवत्ता के शुक्राणु या अंडे के कारण हो सकता हैं।

 

क्या मुझे विस्फारण व खुरचन करवानी चाहिये या प्राकृतिक गर्भपात की प्रतीक्षा करनी चाहिये ?

 

यह निर्णय आप स्वयं ही अपने लिये ले सकती हैं।अधिकांश चिकीत्सक प्रारंभिक अवस्था की गर्भक्षति के लिये विस्फारण व खुरचन की सिफारिश नहीं करते हैं।ऐसी धारणा है कि स्त्री का शरीर अवांछित ऊतकों का निकास करने में सक्षम होता है और इसके लिये किसी आक्रामक शल्यक्रिया की जरूरत नहीं होती है जिससे जटिलताओं का जोखिम हो सकता हैं हां,यदि आप किसी पैथालाजिस्ट से ऊतकों की जांच करवाकर गर्भक्षति के कारण का पता करना चाहती हों तो डी एंड सी उपयोगी हो सकता है।कुछ महिलाओं को डी एंड सी की प्रक्रिया से मानसिक व शारीरिक संतुष्टि मिलती है।

 

अभिशप्त डिंब की रोकथाम कैसे करें ?

 

दुर्भाग्यवश,अधिकतर मामलों में अभिशप्त डिंब को होने से नहीं रोका जा सकता है।यदि बारबार प्रारंभिक अवस्था में गर्भक्षति हो रही हो तो कुछ दंपति आनुवंशिक परीक्षा करवाते हैं।अभिशप्त डिंब अकसर एक बार ही होता है और बहुत कम स्त्रियों में यह एक बार से अधिक होता है।अधिकांश चिकीत्सक दंपतियों को किसी भी तरह के गर्भपात के बाद पुनः गर्भाधान की कोशिश के पहले कम से कम 1 से 3 बार नियमित मासिक स्राव होने तक रूकने की सलाह देते हैं।

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