संसार की उत्पत्ति- कैसे हुई और भूमिका 2024 Origin and role of the world

संसार की उत्पत्ति- कैसे हुई और भूमिका 2024 Origin and role of the world

संसार की उत्पत्ति- और  भूमिका Origin and role of the world



उत्पत्ति नाम का अर्थ है आरंभ जगत की सृष्टि मानव जाति की उत्पत्ति इस संसार में पाप और दुख का आरंभ और परमेश्वर का मानव जाति के साथ व्यवहार वर्णन इस पुस्तक में मिलता है उत्पत्ति को दो प्रमुख भागों में विभाजित किया जा सकता है

1. अध्याय 1-11 जगत की सृष्टि और मानव जाति का प्रारंभिक इतिहास इसमें आदम और हव केन और हील नूह और जल प्रलय तथा बेबीलोन के घुमत का वर्णन मिलता है

2.अध्याय 12 से 50 इसराइलियों के आरंभिक पूर्वजों का इतिहास इसमें पहले आरंभ है जो परमेश्वर पर अपने विश्वास और उसकी प्रति अपनी आज्ञाकारिता के कारणप्रसिद्ध था इसके बाद उसके पुत्र इश्क और होते या खूब जो इसराइल भी कहलाता था का वर्णन है तब याकूब के 12 पुत्रों का वर्णन है जो इजरायल की 12 गोत्रों की संस्थापक हुएइसमें उसके एक पुत्र युसूफ और उन घटनाओं पर विशेष ध्यान दिया गया जिसके द्वारा याकूब और उसके अन्य पुत्र अपने परिवार सहितमिस्र में रहने के लिए आ गए थे या यह विषय फिर मुख्यतःमुख्यतः यह के इसकी और अंत इस लोगों पुस्तक लोगों के विषय में बताती है फिर भी मुख्यतः यह परमेश्वर के कार्यों का वर्णन करती है इसका आरंभ इस स्वीकृति से होता है कि परमेश्वर ने जगत की सृष्टि की और अंत इस प्रतिज्ञा से होता है कि परमेश्वर निरंतर अपने लोगों की चिंता करता रहेगा पुस्तक के आरंभ से अंत तक मुख्य पत्र परमेश्वर है तथा जो बुराई करने वालों को दोषी ठहरता है तथा उन्हें दंड देता है वह अपने लोगों की अगुवाई और सहायता करता है तथा उनके इतिहास को व्यवस्थित करता है यह प्राचीन पुस्तक एक जाति एक जाति के विश्वास को बनाए रखने और उसके विश्वास का वर्णन करने के लिए लिखी गई है उसे विश्वास को बनाए रखने में सहायता के लिए लिखी गई थी

रूपरेखा Jesus framework

जगत और मानव जाति की सृष्टि 1-1----2.25

पाप और दुख का आरंभ 3.1--24

आदम से नूह तक 4.1 ---5.32

नूह और जल प्रलय 6.1     ---10.32

बेबीलोन का गम्मत 11.1 --9

सेम अब्राहम तक 11.10.32

कुलपति अब्राहम इस हाफ याकूब 12.1---35.29

ऐसाव की वंशावली 36.1--43

युसूफ और उसके भाई 37.1--45.28

मिश्रा देश में इजरायली 46.1--50.26

 

सृष्टि का वर्णनआदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की पृथ्वी बेडौल और सुनसान पड़ी थी और गहरे जल के ऊपर अंधेरा था तथा परमेश्वर का आत्मा जल के ऊपर मंडराता था जब परमेश्वर का आत्मा जल के ऊपर मंडराता था तब परमेश्वर ने कहा उजाला हो तो उजियाला हो गया और परमेश्वर ने उजाले को देखा कि अच्छा है और परमेश्वर ने उजाले को अंधियारी से अलग किया और परमेश्वर ने उजयालय को दिन और अंधेरे को रात कहा तथा सेंड हुई फिर भर हुआ इस प्रकार पहला दिन हो गयाफिर परमेश्वर ने कहा जल की बीच एक ऐसा अंतर हो कि जल दो भाग हो जाएतब परमेश्वर ने एक अंतर बनाकर उसकी नीचे के जल फिर आकाश का जल एक और वैसा ही हो गया और परमेश्वर नेउसे अंतर को आकाश कहा तथा सांझ हुई फिर भर हुआ किस प्रकार दूसरा दिन हो गया 


फिर परमेश्वर ने कहा आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई देऔर वैसा ही हो गया परमेश्वर ने सूखी भूमि को पृथ्वी कहा तथा जो जल इकट्ठा हुआ उसको उसने समुद्र कहाऔर परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है फिर परमेश्वर ने कहा पृथ्वी से हरी घास तथा बी वाले छोटे-छोटे पेड़और फलदाई वृक्ष भी जिनकी बी उन्हें में होएक-एक की जाति के अनुसार है पृथ्वी पर उगे और वैसा ही हो गया इस प्रकार पृथ्वी से हरी घास और छोटे-छोटे पेड़ जिम अपनी अपनी जाति के अनुसार बीज होता है और फलदाई वृक्ष जिनके बीच एक-एक की जाति के अनुसार उन्हें में होते हैं ज और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है तथा सांस सांस हुई फिर भी भर हुआ इस प्रकार तीसरा दिन हो गयाफिर परमेश्वर ने कहा दिन को रात से अलग करने के लिए आकाश के अंतर में ज्योतिया हो और वैसाचिन्ह और नियत समय और दोनों और वर्षों के कारण हो और ज्योतिया आकाश के अंतर में पृथ्वी पर प्रकाश देने वाली भी ठहरे और वैसा ही हो गया 

अमीन जय एशु की,अमीन जय एशु की,अमीन जय एशु की

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