भारत का संविधान, भाग 3, मौलिक
अधिकार, अनुच्छेद 19(1)- सभी नागरिकों को--
(क) वाक्-स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य का,
(ख) शांतिपूर्वक और निरायुध सम्मेलन का,
(ग) संगम या संघ बनाने का,
(घ) भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण का,
(ङ) भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भाग में निवास करने और बस जाने का,
[और]*
**
(छ) कोई वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार करने का अधिकार होगा।
[(2) खंड (1) के उपखंड (क) की कोई बात उक्त उपखंड द्वारा दिए गए अधिकार
के प्रयोग पर [भारत की प्रभुता और अखंडता]*, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ
मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार के हितों में अथवा न्यायालय-अवमान,
मानहानि या अपराध-उद्दीपन के संबंध में युक्तियुक्त निर्बंधन जहाँ तक कोई विद्यमान
विधि अधिरोपित करती है वहाँ तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बंधन
अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी ।]**
(3) उक्त खंड के उपखंड (ख) की कोई बात उक्त उपखंड द्वारा दिए गए अधिकार
के प्रयोग पर [भारत की प्रभुता और अखंडता]** याट लोक व्यवस्था के हितों में युक्तियुक्त
निर्बन्धन जहाँ तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहाँ तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव
नहीं डालेगी या वैसे निर्बन्धन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित
नहीं करेगी।
(4) उक्त खंड के उपखंड (ग) की कोई बात उक्त उपखंड द्वारा दिए गए अधिकार
के प्रयोग पर [भारत की प्रभुता और अखंडता]** याट लोक व्यवस्था या सदाचार के हितों में
युक्तियुक्त निर्बन्धन जहाँ तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहाँ तक उसके प्रवर्तन
पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बन्धन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य
को निवारित नहीं करेगी।
(5) उक्त खंड के [उपखंड (घ) और उपखंड (ङ)]*** की कोई बात उक्त उपखंडों
द्वारा दिए गए अधिकारों के प्रयोग पर साधारण जनता के हितों में या किसी अनुसूचित जनजाति
के हितों के संरक्षण के लिए युक्तियुक्त निर्बन्धन जहाँ तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित
करती है वहाँ तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं
डालेगी या वैसे निर्बन्धन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं
करेगी।
(6) उक्त खंड के उपखंड (छ) की कोई बात उक्त उपखंड द्वारा दिए गए अधिकार
के प्रयोग पर साधारण जनता के हितों में युक्तियुक्त निर्बन्धन जहाँ तक कोई विद्यमान
विधि अधिरोपित करती है वहाँ तक उसके प्रवर्तन
पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बन्धन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य
को निवारित नहीं करेगी और विशिष्टतया [उक्त उपखंड की कोई बात--
(i) कोई वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारबार करने के लिए आवश्यक वृत्तिक
या तकनीकी अर्हताओं से, या
(ii) राज्य द्वारा या राज्य के स्वामित्व या नियंत्रण में किसी निगम द्वारा
कोई व्यापार, कारबार, उद्योग या सेवा, नागरिकों का पूर्णतः या भागतः अपवर्जन करके या
अन्यथा, चलाए जाने से,
जहाँ तक कोई विद्यमान विधि संबंध रखती है वहाँ तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव
नहीं डालेगी या इस प्रकार संबंध रखने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं
करेगी।]**
संविधान (चवालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1978 की धारा 2 द्वारा
(20-6-1979 से) अंतःस्थापित।
* *संविधान (चवालीसवाँ संशोधन)
अधिनियम, 1978 की धारा 2 द्वारा (20-6-1979 से) उपखंड (च) का लोप किया गया।
* संविधान (पहला संशोधन) अधिनियम, 1951 की धारा 3 द्वारा (भूतलक्षी प्रभाव
से) खंड (2) के स्थान पर प्रतिस्थापित।
** संविधान (सोलहवाँ संशोधन) अधिनियम, 1963 की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित।
** *संविधान (चवालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1978 की धारा 2 द्वारा
(20-6-1979 से) ''उपखंड (घ), उपखंड (ङ) और उपखंड (च)'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।
** संविधान (पहला संशोधन) अधिनियम, 1951 की धारा 3 द्वारा कुछ शद्बों
के स्थान पर प्रतिस्थापित।
~ अनुच्छेद 19 - वाक्-स्वातंत्र्य आदि विषयक कुछ अधिकारों का संरक्षण
- भाग III – मूलभूत अधिकार (12 – 35)
19. Protection of certain rights regarding freedom of speech, etc.
(1) All citizens shall have the right
(a) to freedom of speech and expression;
(b) to assemble peaceably and without arms;
(c) to form associations or unions or [7]co-operative societies;
(d) to move freely throughout the territory of India;
(e) to reside and settle in any part of the territory of India;
[3]and[4]
(g) to practise any profession, or to carry on any occupation,
trade or business.
[1](2) Nothing in sub-clause(a) of clause(1) shall affect the
operation of any existing law, or prevent the State from making any law, in so
far as such law imposes reasonable restrictions on the exercise of the right
conferred by the said sub-clause in the interests of the sovereignty and
integrity of India, the security of the State, friendly relations with foreign
States, public order, decency or morality, or in relation to contempt of court,
defamation or incitement to an offence.
(3) Nothing in sub-clause(b) of the said clause shall affect the
operation of any existing law in so far as it imposes, or prevent the State
from making any law imposing, in the interests of the sovereignty and integrity
of India or public order[5], reasonable restrictions on the exercise of the
right conferred by the said sub-clause.
(4) Nothing in sub-clause(c) of the said clause shall affect the
operation of any existing law in so far as it imposes, or prevent the State
from making any law imposing, in the interests of the sovereignty and integrity
of India or public order or morality, reasonable restrictions on the exercise
of the right conferred by the said sub-clause.
(5) Nothing in sub-clauses(d)and(e)[6] of the said clause shall
affect the operation of any existing law in so far as it imposes, or prevent
the State from making any law imposing, reasonable restrictions on the exercise
of any of the rights conferred by the said sub-clauses either in the interests
of the general public or for the protection of the interests of any Scheduled
Tribe.
[2](6) Nothing in sub-clause(g) of the said clause shall affect
the operation of any existing law in so far as it imposes, or prevent the State
from making any law imposing, in the interests of the general public,
reasonable restrictions on the exercise of the right conferred by the said sub-clause,
and, in particular, nothing in the said sub-clause shall affect the operation
of any existing law in so far as it relates to, or prevent the State from
making any law relating to,
(i) the professional or technical qualifications necessary for
practising any profession or carrying on any occupation, trade or business, or
(ii) the carrying on by the State, or by a corporation owned or
controlled by the State, of any trade, business, industry or service, whether
to the exclusion, complete or partial, of citizens or otherwise.
-----
1. Ame. by First Amendment Act, s.3 (w.e.f. 18-06-1951).
2. Added by First Amendment Act, s.3 (w.e.f. 18-06-1951).
3. Ins. by the Constitution (Forty-fourth Amendment) Act, 1978,
s.2 (w.e.f. 20-6-1979).
4. Sub-clause(f) omitted by s.2, ibid. (w.e.f. 20-6-1979).
5. Ins. by the Constitution (Sixteenth Amendment) Act, 1963, s.2.
6. Subs. by the Constitution (Forty-fourth Amendment) Act, 1978,
s.2, for "sub-clauses(d),(e)and(f)" (w.e.f. 20-6-1979).
7. Ame. by Ninety Seventh Amendment Act, s.2 (w.e.f. 12-01-2012).
धर्मतन्त्र V/s लोकतंत्र -26 जनवरी, 1950 लोकतंत्र दिवस विशेष
आज देश में धर्मतन्त्र और
लोकतंत्र दो प्रकार के मॉडल कार्य करते हैं। धर्मतंत्र लोगों का चरित्र बनकर प्रभावसाली
बना हुआ है तो लोकतंत्र उस चरित्र के विरोध को सहते हुए अपने आपको स्थापित करने की
कोशिश कर रहा है। यहाँ इन दोनों व्यवस्थाओं के अंतर्विरोधों को निम्न डायग्राम के माध्यम
से समझा जा सकता हैं :-
(A) (B)
विषमता का मॉडल समता का मॉडल
(धर्मतन्त्र) (लोकतंत्र)
। ।
भगवा तिरंगा
। ।
मनुस्मृति संविधान
। |
धार्मिक संस्थाऐं संवैधानिक
संस्थाऐं
(मठ,मन्दिर,आश्रम) (राष्टपति,संसद,
स.विभाग)
(A). विषमतावादी व्यवस्था या
धर्मतन्त्र का मॉडल-
धर्मतन्त्र का जो मॉडल है
उसका अपना 'भगवा' झण्डा है, 'मनुस्मृति' उसका संविधान है, 'मठ, मन्दिर, आश्रम' उसके
संविधान की प्रशासनिक संस्थाएं हैं।
'ईश्वर' इस मॉडल का खूँटा है
जिसके साथ 'आस्था' रूपी रस्सी से जनता को बांध दिया जाता है। 'असत्य' इसका 'दर्शन'
है। 'विषमता' इसकी 'विचारधारा' है। 'जन्म आधारित पितृसत्तात्मक चातुरवर्णीय' इसका
'प्रबंधन' है। 'भक्ति' इसका मार्ग है। इस तरह धर्मतंत्र के अनुसार '15% सवर्ण' (ब्राह्मण,
क्षत्रिय, वैश्य) मालिक हैं तो '85% शूद्र'(obc/sc/st/mino.) गुलाम।
हम धर्मतंत्र को इस तरह परिभाषित
कर सकते हैं कि, "विषमता परतंत्रता शत्रुता अन्याय के अनैतिक सिद्धांतों को अपना
कर ब्राह्मणों ने, ब्राह्मणों द्वारा, ब्राह्मणों के लिए बनाई गई यह जन्म आधारित पितृसत्तात्मक
चातुरवर्णीय विषमतावादी व्यवस्था है।" अर्थात ब्राह्मण के हाथ में धर्मतन्त्र
की कमान बाकि सबका शोषण और सबका अपमान !
ब्राह्मण अपने इस विषमता के
मॉडल को सनातन धर्म या हिन्दू धर्म के नाम से भी प्रचारित करता है तथा इसे ईश्वर द्वारा
रचित व्यवस्था बताकर और धार्मिक आस्था का वास्ता देकर अपने नेतृत्व में समाज को संगठित
रखता है, ऐसे में ईश्वरीय आस्था से बंधे हुए लोग धर्मतन्त्र की प्रशासनिक संस्थाऐं
मठ, मन्दिर, आश्रम की तरफ बिन बुलाए नाक रगड़ते हुए पहुँच जाते हैं, फिर वहाँ इन संस्थाओं
के मालिक ब्राह्मण के चरणों में जाकर गिर जाते हैं। ऐसे गिरे हुए लोगों को ब्राह्मण
हिन्दू कहता है और उन पर मनुस्मृति के नियमों को थोप देता हैं, अब यह कहने की जरूरत
नही है कि धर्मतन्त्र की व्यवस्था में ब्राह्मण श्रेष्ठ है और बाकी सारे नीच, यह एक
प्रशासनिक व्यवस्था है जो भी इस व्यवस्था की आस्था मान्यता परम्परा संस्कार त्योंहार
व्रत आदि से अपना सम्बन्ध रखेगा उसका वर्ण/जाति स्वभाविक तौर पर अपने आप तय हो जाता
है अब आप लाख कोशिश कर लीजिए, भलेही लोकतांत्रिक व्यवस्था का फायदा उठाकर CM, PM बन
जाइए लेकिन धर्मतन्त्र की व्यवस्था में आप नीच ही माने जायेंगे। भूतपूर्व मुख्यमंत्री
अखिलेश यादव के घर का शुद्धिकरण इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
धर्मतन्त्र का यह षड्यंत्र
इतना बारीक है जो आम तौर पर शूद्रों को समझ नही आता है यदि शूद्रों में से कुछ मुठ्ठीभर
शूद्रों को समझ भी आ जाता है तो ये धूर्त मनुवादी पंडा पुरोहित इन्हें नास्तिक, कम्युनिष्ट,
अर्बन नक्सल, अम्बेडकरवादी, खालिस्तानी, पाकिस्तानी समर्थक, हिन्दू धर्म विरोधी आदि
आदि पहचान देकर अपने ही शूद्र भाइयों से अलग थलग कर देते हैं तथा अन्य धर्मों का डर
दिखाकर जाति में बंटे हुए ना समझ बहुसंख्यक शूद्रों को अपने धार्मिक आस्था के दायरे
में संघठित रखकर उनका निरन्तर नेतृत्व करते हैं।
(B). समतावादी व्यवस्था या लोकतंत्र का मॉडल-
लोकतंत्र का जो दूसरा मॉडल
है इसका भी अपना 'तिरंगा' झण्डा है, 'भारत का संविधान' इसका संविधान है, 'राष्ट्रपति,
संसद, सरकारी विभाग' इसके संविधान की प्रशासनिक संस्थाएं हैं।
'उत्तरदायित्व' लोकतंत्र का
खूँटा है जिस पर सवाल उठाना जनता का 'अधिकार' है। 'समता' इसकी 'विचारधारा' है, 'सत्य'
इसका 'दर्शन' है। 'ध्यान' इसका 'मार्ग' है।
'कर्म आधारित चतुवर्गीय 'प्रबंधन' है। अर्थात हम अपनी योग्यता का प्रदर्शन कर अपने
वर्ग को बदल सकते हैं। लोकतांत्रिक कानून की नजर में हम केवल भारतीय है तथा धर्म हमारी
निजी प्रेक्टिस है। जनता लोकतंत्र की ताकत है जो इसे अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण में
रखती है जनता के सारे हित इस लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ जुड़े हुए हैं, इसलिए इसकी
रक्षा करना जनता का नैतिक दायित्व है।
लोकतंत्र को इस तरह परिभाषित
किया जा सकता है कि, "समता स्वतंत्रता बन्धुता न्याय के नैतिक सिद्धान्तों को
अपना कर लोगों ने, लोगों द्वारा, लोगों के लिए बनाई गई यह कर्म आधारित समतावादी चतुरवर्गीय
व्यवस्था है।" अर्थात जनता के हाथ में लोकतंत्र की कमान सबको अवसर और सबको सम्मान।
परन्तु आज लोकतंत्र सत प्रतिशत
जन हितैषी होने के बावजूद हमारे देश में यह व्यवस्था जनता को उतना फायदा नही दे पाई
है जितना यह दे सकती थी, इसका एक मात्र कारण है, देश की जनता लोकतंत्र के प्रति जागरूक नही है। जिसका फायदा उठाते
हुए प्रस्थापित मनुवादी लोग जो लोकतंत्र विरोधी हैं, वे भोली भाली जनता को गुमराह करके
लोकतांत्रिक व्यवस्था पर कब्जा जमा लेते हैं, फिर वे संवैधानिक संस्थाओं को नीजि हाथों
में बेचकर लोकतंत्र को कमजोर करते हैं और धर्मतन्त्र को मजबूत करने के लिए मठ मन्दिर
आश्रम को बढ़ावा देते हैं। यही वजह है कि आज अतार्किक, अवैज्ञानिक और अनैतिक धर्मतन्त्र
की ब्राह्मणवादी व्यवस्था दिन प्रतिदिन मजबूत होती जा रही है तो इसके विपरीत तार्किक,
वैज्ञानिक और मानवतावादी लोकतांत्रिक व्यवस्था दिन प्रतिदिन कमजोर होती जा रही है।
निष्कर्ष- धर्मतन्त्र और लोकतंत्र
आज देश की जनता के पास दो मॉडल है, धर्मतन्त्र देश की जनता को मन्दिर की तरफ ले जाता
है तो लोकतंत्र स्कूल की तरफ। ये दोनों तंत्र एक दूसरे के दुश्मन है, इनमें से आज नही
तो कल एक की मौत निश्चित है ऐसे में यदि धर्मतन्त्र की मौत और लोकतंत्र की जीत हो जाती
है तो 85% बहुजन शूद्र को सम्मान और स्कूल का कलम मिलेगा, इसके विपरीत यदि लोकतन्त्र
की मौत और धर्मतन्त्र की जीत हो जाती है तो 85% बहुजन शूद्र को मिलेगा अपमान और मन्दिर
का घण्टा। अब निर्णय 85% बहुजन शूद्र (obc/sc/st) को करना है उन्हें सम्मान और स्कूल
की कलम चाहिए या अपमान और मन्दिर का घण्टा ?
लोकतंत्र की स्थापना- यदि
आप लोकतन्त्र के समर्थक हैं और इसे स्थापित करना चाहते हैं तो आपको निम्न बातों पर
ध्यान देना होगा-
1. चित्र से चरित्र बनता है इसलिए घर की दीवार पर धर्मतांत्रिक काल्पनिक
चित्रों के बजाय लोकतांत्रिक महापुरुषों के चित्र लगाने होंगे।
2. 'भक्ति मार्ग' अर्थात अंधआस्था के भक्ति मार्ग को त्यागकर 'ध्यान मार्ग'
अर्थात अपने विवेक को जगाने वाला ध्यान मार्ग अपनाना होगा। या सरल भाषा में मूर्ति पूजा की बजाय ध्यान साधना को
अपनाना होगा।
3. जातीय भावना केवल फूट डालो राज करो नीति के तहत निर्माण की गई है इसलिए
हमें जातीय भावना को त्यागकर अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देना होगा।
4. जीवन के सभी संस्कारों पर ब्राह्मण के एकाधिकार को तोड़कर किसी भी जाति
के सुशिक्षित शील सदाचार युक्त व्यक्ति से संस्कार सम्पन्न कराना होगा।
5. ध्यान और संविधान को सामाजिक मान्यता दिलाने के लिए किसी भी सामाजिक
कार्य का सुभारम्भ पांच मिनट ध्यान साधना से और समापन संविधान की शपथ लेकर करना होगा।
उपरोक्त लोकतांत्रिक बिंदुओं
को जब लोकतन्त्र के समर्थक अपने सामाजिक जीवन में व्यवहारिक तौर पर अपनायेंगे तब समाज
का लोकतांत्रिक चरित्र निर्माण होगा। जब समाज का लोकतांत्रिक चरित्र निर्माण होगा तब
संविधान की किताब पर छपा हुआ लोकतांत्रिक चरित्र व्यवहारिक रूप लेकर सही मायने में
देश में लोकतन्त्र को स्थापित करेगा। अर्थात यदि हमें धर्मतन्त्र के बजाय लोकतन्त्र
को स्थापित करना है तो हमें अपना धार्मिक चरित्र बदलकर लोकतांत्रिक चरित्र बनाना होगा।
------------------------- बड़े भाई विशंभर सिंह भांकला जि की कलम से
साभार
संविधान ही जीवन है
जय संविधान
LIVE–संविधान पाठशाला, इंडिया
हम भारत के लोग इस चर्चा में संविधान के अनुच्छेदों की प्रारंभ से चर्चा
करते हुए आज निम्न अनुच्छेद पर पहुंचे हैं,।
---------------------
LIVE- संविधान पाठशाला, इंडिया का समय विस्तार:
शाम 7:25 से 8:00 तक
परिचय एवम् भारत का संविधान की "उद्देशिका" व नागरिकों के मूल
कर्तव्यों को पढ़ना एवम् समझना। और
8:00 से दिए गए विषय पर चर्चा
---------------------------------------------
[ भारत का संविधान, अनुसूचियां ]
दशवीं अनुसूची : अनुच्छेद 102 (2) और अनुच्छेद 191 (2); दल परिवर्तन के
आधार पर निरर्हता के बारे में उपबंध;
1) निर्वचन-
इस अनुसूची में जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
क) 'सदन' से, संसद का कोई सदन या किसी राज्य की, यथास्थिति, विधान सभा
या, विधान-मंडल का कोई सदन अभिप्रेत है;
ख) सदन के किसी ऐसे सदस्य के संबंध में जो, यथास्थिति, पैरा 2 या पैरा
3 या पैरा 4 के उपबंधों के अनुसार किसी राजनीतिक दल का सदस्य है, 'विधान-दल' से, उस
सदन के ऐसे सभी सदस्यों का समूह अभिप्रेत है जो उक्त उपबंधों के अनुसार तत्समय उस राजनीतिक
दल के सदस्य हैं;
ग) सदन के किसी सदस्य के संबंध में, 'मूल राजनीतिक दल' से ऐसा राजनीतिक
दल अभिप्रेत है जिसका वह पैरा 2 के उपपैरा (1) के प्रयोजनों के लिए सदस्य है;
घ) 'पैरा' से इस अनुसूची का पैरा अभिप्रेत है।
बिना पढ़े,बिना परीक्षा दिए
,बिना मेहनत के nhi 95 से100% तक आ सकते हैं तो सोचो-👌
क्या सरकार स्कूल खोलने के
विचार को प्राथमिकता देगी ?
उत्तर :कतई नहीं।👍
आज जो जश्न मना रहे हैं वे अबोध हैं उन्हें नहीं पता कि जिस प्रकार शिकारी
दाने डालकर जाल बिछाता है उसी प्रकार ये अंको का जाल बिछाया गया है। ये अंक आपके भविष्य का निर्माण कम विनाश ज्यादा
कर सकते हैं अगर आपने मेहनत का आश्रय नहीं लिया तो।👉
शास्त्र और इतिहास कहता है जहां घोड़े और गधे एक ही कीमत पर बिकते हो वहाँ
ज्यादा समय रुकना ठीक नहीं।आज के रिजल्ट में गधे और घोड़े ऐसे ही बिके हैं।
👉आज के रिजल्ट को देखकर भारतेंदु हरिश्चंद्र का नाटक "अंधेर
नगरी" याद आ रहा है।
👉याद रखो :सरकार अब ये ही चाहेंगी कि आपको ऐसे लुभावने रिजल्ट
मिले।सरकार पैनी निगाह से देख रही है कि हमारी ये चाल कामयाब हो गई।लोगों में खुशी
की लहर हैं।आपको मानसिक रूप से इसका आदी बना दिया जायेगा।उसके बाद सभ्य समाज की कल्पना
करना बेमानी होगा।
👉पिछले कुछ वर्षों से शिक्षा बिक रही थी अब शिक्षा बिना बिक्री
के फोकट में बांटी जा रही है।फोकट की चीज कितनी अच्छी होती है ये बताने की जरूरत नहीं।
अंत मे एक साधारण👉 उदाहरण से समझाता हुं।
जिस खेत की फसल की निराई गुड़ाई नहीं होती है उस खेत की फसल कटाई के साथ
खरपतवार अपने आप कटता है।अब उस अनाज में खरपतवार के बीज साथ आयेंगे।मतलब वह अनाज गुणवत्ता
की दृष्टि से अच्छा नहीं माना जाता।ये भी ऐसा ही रिजल्ट है इसमें👍 खरपतवार
(अनुत्तीर्ण) और अनाज (मेरिट ) मिक्स है।अब आप अच्छे स्वास्थ्य (सभ्य समाज व देश) की
कल्पना कैसे कर सकते हैं।
जिस दिन आपको कागजी शिक्षा व व्यावहारिक शिक्षा में अंतर पता चलेगा तब तक हो सकता है काफी देरी हो जाये अतः झूठे जश्न
मनाने वालों सत्य को जानो।बच्चों को स्कूलों से जुड़वाओ।उन्हें विद्या के मंदिरों में
भेजो।सरकार की बेतुकी बातों, बेतुके परिणामों से बाहर निकलो और तर्क के साथ आगे बढ़ो।👌
समाज व देश का पतन अयोग्य व्यक्तियों से उतना नहीं होता जितना योग्य व्यक्तियों
की उदासीनता से होता है।आज पढ़ा लिखा वर्ग सबसे ज्यादा उदासीन है इसका खामियाजा आगे
की पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा।👌नमो बुद्धाय 🌹वन्देमातरम ❤सुख शांति
आदिवासियों के विरुद्ध हो रहे सडयंत्रों का पर्दाफाश !!
09 अगस्त विश्व मूलनिवासी
(आदिवासी) दिवस के अवसर पर ।।
👌 #राष्ट्रीयआदिवासीएकता_परिषद के द्वारा 09 अगस्त 2021 को तहसील
स्तर पर /जिला स्तर पर / राज्य स्तर पर एवम राष्ट्रीय स्तर पर बड़े पैमाने पर 9-अगस्त
विश्व मूलनिवासी (आदिवासी ) दिवस मनाने का निर्णय लिया गया है ।
#09-अगस्त विश्व मूलनिवासी ( आदिवासी ) दिवस के लिए निम्नलिखित विषयों
पर पत्रक तैयार करके आदिवासी एवम गैर-आदिवासी एरिया में एक निश्चित स्थान तय करके कार्यक्रम
आयोजित किया जाना है एवम संबंधित विषयों पर जानकारी देना है !! ताकि आदिवासियों एवम
अन्य मूलनिवासी जातियों के विरुद्ध किये जा रहे सडयंत्रों का पर्दाफाश करके, समस्त
मूलनिवासी जातियों को विश्व मूलनिवासी ( आदिवासी ) दिवस के बारे में एवम मूलनिवासी
दिवस के महत्व के बारे में जानकारी दे कर समस्त मूलनिवासी जातियों में आपस मे भाईचारा
का निर्माण करके उनका ध्रुवीकरण किया जा सके ।
1)9-अगस्त को राष्ट्रीय स्तर का कार्यक्रम मा वामन मेश्राम साहब, राष्ट्रीय
अध्यक्ष, बामसेफ, नई दिल्ली की अध्यक्षता में शाम 6.30 PM से राष्ट्रीय आदिवासी एकता
परिषद के फेसबुक पेज-#RAEP1992 पर वर्चुअल लाईव होगा ।
2) तहसील एवम जिला स्तर कार्यक्रम का आयोजन एक निश्चित स्थान पर फिजिकल
आयोजित किये जायेंगे ! कोरोना की गाईड लाईन का पालन करते हुए उपस्थिति सुनिश्चित करके
!!*
3) 8 अगस्त 2021 को शाम 7 PM से राज्य स्तर पर अपने अपने राज्य की स्थानीय
भाषा में Mntv पर 9-अगस्त विश्व मूलनिवासी ( आदिवासी ) दिवस क्या है, इसे क्यों मनाना
चाहिए आदि विषय पर चर्चा करने के लिए वर्चुअल लाईव कार्यक्रम आयोजित किया जाना है
!!
👍👍 9-अगस्त
2021 को निम्नलिखित विषय चर्चा के लिए रखे गए हैं ।।
1) युनिफॉर्म सिविल कोड / समान नागरिक संहिता का कानून लागू होने से क्या
आदिवासियों के संवैधानिक मौलिक अधिकार सुरक्षित रहेंगे ?--एक चिंतन
2) BHU का प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे द्वारा संथाल, मुंडा, गोंड, भिल एवम
अन्य आदिवासी जनजातियों को विदेशी कहना और ब्राह्मणों को भारत का मूलनिवासी कहना एक
भयानक षडयंत्र है--
(DNA के आधार पर पर्दाफाश)
एच एन रेकवाल
राष्ट्रीय अध्यक्ष
राष्ट्रीय आदिवासी एकता परिषद
नई दिल्ली
पूरा पढ़ना पढ़े लिखे हों तो.. 🙏 🙏
ब्राह्मण और आदिवासी का विवाद 🙅🏻♂🤷🏻♂
🙅🏻♂ ब्राह्मण- जय श्रीराम...
🤷🏻♂ आदीवासी- जय जोहार ...
🙅🏻♂ ब्राह्मण- अरे..तुम्हे एक दिन
जय श्रीराम बोलना ही होगा..तुम्हारा नारा नहीं चलेगा।
🤷🏻♂ आदीवासी- क्यो नहीं चलेगा..?
पिछले 70 सालसे हमारे बाबासाहब के संविधान से भारत देश चल रहा है तो हमारा
ही नारा चल रहा है और आगे भी चलेगा।
🙅🏻♂ ब्राह्मण- (हा..हा..हा) अरे!
अज्ञानी..
हमारे पूर्वज 5000 साल से पूरे
भारत पर राज कर रहे है, तुम सिर्फ 70 साल की
बात कर रहे हो।
1925 से हमने ब्राह्मण राष्ट्र को बनाने की शुरूआत की है जो ब्राह्मण
राष्ट्र 2025 को हम इस संविधान को तोड़ कर बनाऐंगे..। तुम देखते रह जाओगे...
🤷🏻♂ आदीवासी- (गुस्से में आकार) ऐसे कैसे हम चुप बैठेंगे..अगर भारत के संविधान
को कोई हाथ भी लगायगा तो हम उसका हाथ तोड देंगे..।।
🙅🏻♂ ब्राह्मण- अरे बावले.. अभी तो
संविधान हमारे ही हाथ मे है, तू हाथ लगाने की बात कर रहा है...।।
जिस दिन राज्यसभा पर कब्जा हो
जाएगा हम संविधान को पूरा बदलेंगे और "ब्राह्मण राष्ट्र" का निर्माण होगा..।।
🤷🏻♂ आदीवासी- लेकिन तुम तो "हिंदू राष्ट्र" बनाना चाहते हो ना..?
🙅🏻♂ ब्राह्मण- यही तो हमारी चाल
है,हिंदू समाज हमारा गुलाम था, गुलाम है और गुलाम रहेगा
तुम आदिवासी बनकर छूट गये लेकिन जब धर्म पर आधारित ब्राह्मण राष्ट्र बनेगा
तब हम तुम्हे फिर से हिंदू जैसा ही गुलाम बनाएगे..।।
🤷🏻♂ आदीवासी- हम यह होने नहीं देंगे..।।
🙅🏻♂ ब्राह्मण- क्या कर लोगे..?
तुम लोग आपस में लड़कर एक-दुसरे से झगड रहे हो,तुम मे कभी भी एकता नहीं
हो सकती,तुम लोग समाज और देश के बारे में कभी नहीं सोचते, सिर्फ अपने स्वार्थ के बारे
में सोचते हो, हमारे हजारो-लाखो लोग सबसे पहले ब्राह्मण समाज के बारे में ही सोचते
है, हम आपस में कभी नहीं लड़ते बल्कि तुम जैसो को आपस मे लड़ाने का प्रबंध करते है।
🤷🏻♂ आदिवासी - कितने दिन हमें लड़वाओगे
हमारे नेता तुम्हे ठीक कर देगे...
🙅🏻♂ ब्राह्मण - (जोरो से हँसता है) तुम्हारे नेता...? कौन है तुम्हारे नेता..?
तुम्हारा एक ही नेता था..जो हम पर बहुत भारी पडा,जिसने 5000 साल से चलने वाली हमारी व्यवस्था को जला दिया। बाकी
तुम्हारे नेता हमें उनका बंदोबस्त करना आता है.जाओ उनमें से बहुत सारे नेता हमारे
"घरजमाई" है
और घरजमाई ससुराल वालों से झगडा किया तो भी हमें फर्क नहीं पडता,तुम्हारे
नेताओं के घर में एक "भक्त प्रहलाद" हम पैदा करते है।सिर्फ तुम्हारे बाबासाहब
का बंदोबस्त करने मे हमे बहुत देर हो गई,वरना तुम आज मुझसे बात भी नहीं कर पाते..।
🤷🏻♂ आदिवासी *- बाबासाहब के विचारों
से ही हम तुम्हे रोकेंगे।
🙅🏻♂ ब्राह्मण- अरे हटो..तुम्हे बाबासाहब
पढने के लिए फुरसत कहाँ है।तुम तो अपनी बीवी,बच्चे,रिश्तेदार, गाडी,बंगला, बडी-बडी
प्रापर्टी बनाने में लगे हो..। बाबासाहब को हमने पढ़ा है..और सिर्फ पढ़ा ही नहीं बल्कि
अमल मे भी लाते है।
उन्होने कहा-शिक्षित बनो..आज भारत में सबसे ज्यादा शिक्षित हम है। उन्होने
कहा-संघटित रहो आज काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और पश्चिम बंगाल से लेकर गुजरात
तक ब्राह्मण संघटित है। बाबासाहब ने कहा-संघर्ष करो..हम तुम्हारे खिलाफ संघर्ष करते
है।तुम्हारे जैसे आपस मे संघर्ष नहीं करते समझे...।
🤷🏻♂ आदिवासी *- हम भी संघर्ष करते
है..मोर्चा-आंदोलन,रास्ता रोको
करते है।
🙅🏻♂ ब्राह्मण- और फिर जेल जाते हो...फिर मोर्चा निकालते हो.. यही करते रहो..हम
भारत पे राज करते है...।
🤷🏻♂ आदिवासी *- हम भी भारत पे राज
करेगे।
🙅🏻♂ ब्राह्मण- अरे..अकल के दुश्मन
गली में बैठकर राजा नहीं बनता,हमारी पार्टी- एक,हमारा झंडा-एक,हमारा नेता-एक. तुम्हारी
पार्टी अनेक, तुम्हारे झंडे-अनेक,तुम्हारे नेता अनेक. राज करना कोई बच्चों का खेल नहीं,जाओ
हमारी सेवामें मग्न रहो।
और हाँ...बाबासाहब को कभी भी पढना मत...क्योकि जिस दिन बाबासाहब को पढोगे
और अमल करोगे उस दिन हमे तुम्हारी सेवा में लगना पडेगा। मुझे पूरा भरोसा है, तुम बाबासाहब का नाम लेकर नाचते
रहो,उनके बडे-बडे पुतले बनाते रहो,अपने समाज की परेशानी पर कुछ मत करो...खाओ..पिओ..मजा
करो..।।।

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