रक्त समूह, रक्त का अर्थ 2021

रक्त समूह, रक्त का अर्थ 2021

 

रक्त समूह, रक्त का अर्थ 2021




रक्त समूह या रक्त प्रकार, रक्त का एक वर्गीकरण है जो रक्त की लाल रक्त कोशिकाओं की सतह पर पर पाये जाने वाले पदार्थ मे वंशानुगत प्रतिजन की उपस्थिति या अनुपस्थिति पर आधारित होता है। रक्त प्रणाली के अनुसार यह प्रतिजन प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, ग्लाइकोप्रोटीन, या ग्लाइकोलिपिड हो सकते हैं और इनमे से कुछ प्रतिजन अन्य प्रकारों जैसे कि ऊतकों और कोशिकाओं की सतह पर भी उपस्थित हो सकते हैं। अनेक लाल रक्त कोशिका सतह प्रतिजन, जो कि एक ही एलील या बहुत नजदीकी रूप से जुड़े जीन से उत्पन्न हुए हैं, सामूहिक रूप से रक्त समूह प्रणाली की रचना करते हैं

     1रक्त का अर्थ

     2रक्त समूह जांच की प्रक्रिया

     3RH फैक्टर क्या है

     4रक्त वर्ग जांच का लाभ

     5सीरम विज्ञान

     6रक्त समूह प्रणाली

o     6.1ABO रक्त समूह प्रणाली

o     6.2Rhesus रक्त समूह प्रणाली

o     6.3देशों में ABO and Rh वितरण

o     6.4अन्य रक्त समूह प्रणालीयान

     7नैदानिक महत्व

o     7.1रक्ताधान

o     7.2नवजात शिशु का Hemolytic रोग (HDN)

     8संगतता

o     8.1रक्त उत्पाद

o     8.2लाल रक्त कोशिका अनुकूलता

o     8.3प्लाज्मा अनुकूलता

o     8.4सार्वभौमिक दाता और प्राप्तकर्ता

     9रूपांतरण

     10इतिहास

     11रक्त प्रकार सम्बंधित सांस्कृतिक मान्यताएं

     12सन्दर्भ

     13आगे पढ़ाई

     14बाहरी कड़ियाँ

रक्त का अर्थ

रक्त जैविक द्रव्य पढ़ार्थ है |लाल रक्त पेशी (आर.बी.सी अथवा एरिथ्रोसाइटस),सफ़ेद रक्त पेशी (ल्यूकोसाइट्स)और बिंबिका (प्लेटलेट्स अथवा थ्रोंबोसाइट्स)से निर्मित तथा जटिल रचना वाला द्रव पढ़ार्थ है|रक्त वर्ग की जांच करते समय जिस व्यक्ति के रक्त की जांच करनी है उस व्यक्ति को अपने उल्टी तरफ रखो|पहले से एक टेबल पर Anti A,Anti B तथा Anti D आदि तीनों लिक्विड एक सिध मे रखो और उनके सामने काँच की पट्टी पर रक्त की बुन्द गिराओ|

रक्त प्रकार वंशानुगत रूप से प्राप्त होते हैं और माता व पिता दोनों के योगदान का प्रतिनिधित्व करते हैं। अंतरराष्ट्रीय रक्ताधान संस्था(ISBT).[2] द्वारा, अब तक ३० मानव रक्त समूह प्रणालियों की पहचान हो चुकी है। अनेक गर्भवती महिलाओं के भ्रूण का रक्त प्रकार माता के रक्त प्रकार से भिन्न होता है और इस अवस्था मे माता, भ्रूण की लाल रक्त कोशिकाओं के विरुद्ध प्रतिपिंडों (एंटीबॉडी) का निर्माण कर सकती है। कभी कभी यह मातृ प्रतिपिंड इम्मयूनोग्लोबुलिन जी (IgG) होते हैं, यह लघु इम्मयूनोग्लोबुलिन आंवल (अपरा या प्लेसेंटा) को पार कर भ्रूण की लाल रक्त कोशिकाओं मे रक्त अपघटन (हीमोलाइसिस) कर सकते है जो नवजात शिशु मे हीमोलाइटिक रोग का कारण बन सकता है, इस रोग के कारण शिशु के रक्त मे लाल रक्त कोशिकाओं की कमी हो जाती है जो सामान्य से लेकर गंभीर हो सकती है।[3] सावधानी: 1)रक्त की जांच लेने से पहले हांथ मे हेन्द्ग्लोज का उपयोग करो|2)रक्त समूह जांच उपयोग हेतु स्लाइड ग्लास को कपास मे स्पिरिट लगाकर साफ रखो,प्रत्येक बार नए स्लाइड या अच्छे से साफ करके उपयोग करो|3)एक व्यक्ति के लिए एक ही लेनसेट का उपयोग करो|4)रक्त लेते समय नाखून के पास प्रिक मत करो |5)प्रिक करने के लिए बाएँ हांथ की छींगुनी(कनिष्ठिका) उंगली के बगल वाली उंगली मे प्रिक करो |6)प्रिक करते समय हांथ को नीचे के ओर रखो|




रक्त समूह जांच की प्रक्रिया

रक्त वर्ग जांच हेतु आवश्यक सभी सामाग्री टेबल पर व्यवस्थित ढंग से निकालकर रखें|रक्त समूह की जांच हेतु समूह की जानकारी चार्ट मे बनाकर तैयार रेखे| मे जांच हेतु उपस्थित व्यक्ति के हांथ को स्पिरिट से जंतुरहित करें|काँच की तीन स्लाइड टेबल पर निकालें|लेनसेट की सहायता से जिस व्यक्ति के रक्त वर्ग की जांच कर्णी है उस व्यक्ति के बाएँ हाथ की चिंगुनी उंगली के बगल को उंगली को प्रिक करें|उंगली से निकाला हुआ रक्त काँच पर तीन जगह बूंदें लें|काँच की स्लाइड पर लिए गए रक्त की बुँदे में एंटीसिरा A,B,D की तीन बूंदें डालना|दूसरे साफ काँच से काँच की स्लाइड से रक्त और एंटीसिरा को मिलाना|एक साथ मिलाये गए क्या रक्त की गांठ तैयार होती हैउसे देखें और चार्ट का उपयोग करें ताकि सही रक् समूह बताया जा सकें|जिस व्यक्ति का जांच लिया गया है उसकी जानकारी कापी मे नोट करे |रक्त वर्ग जाँचें गए काँच की स्लाइड को स्वच्छ पानी से धोना चाहिए|जांच पूर्ण होने के बाद किस वर्ग का व्यक्ति अन्य किस वर्ग के व्यक्ति को रक्त दान कर सकता है उसके बारें मे अध्ययन |

RH फैक्टर क्या है

ह्रीसस जाती का बंदर के रक्त मे लाल पेशियों पर विशेष प्रकार का एक एंटीजेन होता है|वही एंटीजन कुछ लोगों के रक्त मे लाल पेशियों पर भी होते हैं|इस तरह के लोगों के रक्त को Rh+veकहा जाता है|जिनके लाल पेशियों में एंटीजन नहीं होता,इस तरह के लोगों के रक्त को RH-veकहा जाता है|RH-ve रक्त नही दिया जा सकता है|

रक्त वर्ग जांच का लाभ

किसी भी व्यक्ति को रक्त की आवश्यकता पड़ सकती है ,तब उसे उसी का रक्त वर्ग देना पड़ता है |रक्त वर्ग बताते समय रक्त वर्ग तथा Rh फेक्टर दोनों बताना आवश्यक है |उदा.A+ve रक्त वाले लोगों को Rh+ve रक्त नही दिया जा सकता |<

सीरम विज्ञान

यदि व्यक्ति का सामना ऐसे प्रतिजन से हो जिसे वेह स्वयं की मान्यता ना दे, तो प्रतिरक्षा प्रणाली (immune system) रोग-प्रतिकारक (antibodies) का उत्पादन करेगा जो विशेषतम उस रक्त समूह प्रतिजन के साथ चिपक सकता है और उस प्रतिजन के ख़िलाफ़ immunological स्मृति का गठन कर सकता है। व्यक्ति उस रक्त समूह प्रतिजन से सुग्राही हो चुका होगा यह रोग-प्रतिकारक लाल रक्त कोशिका (red blood cell)s (या अन्य ऊतक कोशिकाओं) की सतह से चिपक सकते हैं और अक्सर कोशिकाओं के विनाश के लिए अग्रणी हो सकते हैं जब IgM (IgM) रोग-प्रतिकारक चढाये गई कोशिकाओं से चिपकते हैं, चढाये गई कोशिकाएं दलों में परिवर्तित हो सकती हैं यह बहुत आवश्यक है की रक्ताधान और अंग प्रत्यारोपण (organ transplant) के लिए संगत रक्त और ऊतक का चयन किया जाए रक्ताधान प्रतिक्रियाएं (Transfusion reactions) जो मामूली या कमज़ोर रोग प्रतिकारक शामिल करती हैं, मामूली समस्याओं को जन्म दे सकती है हालाँकि और अधिक गंभीर असामंजस्य भारी RBC विनाश (RBC destruction) वाले ज़ोरदार प्रतिरक्षा (immune), निम्न रक्त चाप (low blood pressure) और मृत्यु का भी नेतृत्व कर सकता है


[Jagdish] ABO System की खोज-लैण्डस्टीनर (1900) में की थी|इसके अनुसारRBC की सतह पर दो प्रकार के एन्टीजन पाये जाते हैं| जिनको Aतथा Bकहते है| == ABO और Rh रक्त समूहीकरण == Anti-A और एंटी-B RBC ABO रक्त समूह प्रणाली (ABO blood group system) के सतह के प्रतिजन आम IgM रोग-प्रतिकारक हैं जो कभी कभी "स्वाभाविक रूप से" होने के रूप में वर्णित किए जाते हैं, तथापि, यह एक मिथ्या है क्योंकि रोग प्रतिकारक अन्य रोग प्रतिकारिकों की भाँती बचपन में संवेदीकरण के द्वारा विकसित होते हैं जो सिद्धांत समझाता है की यह रोग प्रतिकारक कैसे विकसित होते हैं कहता है की A और B प्रतिजनों जैसे प्रतिजन भोजन, पौधों और जीवाणुओं सहित प्रकृति में पाये जाते हैं, जन्म पश्चात शिशु की अंतड़ीयान सामान्य वनस्पति से colonize हो जाती हैं जो A और B जैसे प्रतिकारकों को अभिव्यक्त करती हैं और परिणाम स्वरुप उन प्रतिजनों के ख़िलाफ़ रोग प्रतिकारक बनाती हैं जो लाल कोशिकाओं के पास नहीं होतीं तो, जिन लोगों का रक्त प्रकार A है, उन के पास Anti-बी होगा, रक्त प्रकार B के पास Anti-A होगा, रक्त प्रकार O के पास Anti-A और B दोनों होंगे और रक्त प्रकार AB के पास एक भी नहीं होगाइन तथा-कथित "स्वाभाविक रूप से" पाये जाने वाले प्रत्याशित रोग प्रतिकारक के कारण, रोगी का रक्त प्रकार रक्त के किसी भी भाग के आधान से पहले ठीक ठीक निर्धारित करना मेहेत्वपूर्ण हो जाता है यह स्वाभाविक रूप से पाये जाने वाले रोग प्रतिकारक जिन में संयुक्त होने (गठ्ठा बनने) की और रक्त के अन्दर लाल कोशिकाओं को हानि पहुंचाने की क्षमता है और शायद मौत की भी, वेह IgM श्रेणी के हैं किसी भी अन्य रक्त वर्गों का निर्धारण करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि लगभग सभी लाल कोशिका रोग प्रतिकारक केवल सक्रीय टीकाकरण द्वारा विकसित हो सकते हैं जो या तो पूर्वी रक्त आधान या फिर मातृत्व से हो सकता है जिन रोगीयों को लाल रक्त कोशिकाओं के आधान की आवश्यकता हो सकती है, उन पर रोग-प्रतिकारक जांच नामक परीक्षण किया जाता है और यह परीक्षण निदान की सबसे महत्वपूर्ण लाल कोशिका रोग प्रतिकारक का पता लगायेगा


RhD प्रतिजन किसी व्यक्ति का रक्त प्रकार पता लगाने में महत्वपूर्ण है। शब्द "सकारात्मक" या "" नकारात्मक" RhD प्रतिजन की मौजूदगी या कमी को संदर्भित करता है चाहे Rhesus प्रणाली के अन्य प्रतिजन हो या न हों रोग-प्रतिकारक RhD प्रतिजन की Cross-matching अति आवश्यक है, क्योंकि RhD प्रतिजन mmunogenic होता है, अर्थात जो व्यक्ति RhD नकारात्मक होता है, संभावना है की वेह RhD प्रतिजन का सामना होने पर Anti-RhD विकसित करे (आधान या फिर मातृत्व के माध्यम से) जब किसी व्यक्ति का RhD प्रतिजन के ख़िलाफ़ संवेदीकरण हो जाए, उन के रक्त में RhD IgG प्रतिजन होंगे जो RhD सकारात्मक लाल रक्त कोशिकाओं को बाँध देगा और शायद आंवल को लाँघ दे

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