अपशिष्ट पदार्थो का निपटान या प्रबंधन:-
चूंकि अपशिष्ट
पदार्थ कई प्रकार के होते है तथा ये अलग-अलग अवस्थाओं में पाए जाते है, इसलिए इनके प्रबंधन की
विधियों भी अलग-अलग है जो इस प्रकार है।
१- डंपिग:- कचरे को इकटठा कर गहरे गडडे में डालकर ढॅक देते है इस विधि
द्वारा अपशिष्ट पदार्थो से प्राप्त होनेवाली उर्जा से हम वंचित रह जाते है।
अवैध डंपिग:- निर्धारति स्थान के अतिरिक्त कंही पर भी डंपिग करना अवैध
डंपिग कहलाता है। अवैध तरीके से डंप किया गया अपशिष्ट पदार्थ वर्षा के जल तथा
घरेलू जल की गुणवत्ता को खराब कर सकता है तथा हमारे डेनेज तंत्र को भी अवरूद्ध कर
सकता है। अत: ऐसे हानिकारक अपशिष्ट जिनमें प्रदूषकों की सान्द्रता ज्यादा हो; को उचित विधि से ही डंप
करना चाहिए।
२- कम्पोस्टिंग :- यह कार्बनिक ठोस अपशिष्टों के प्रबंधन की
सबसे उपयुक्त तकनीक है। हमारे कचरे में ४०-६० प्रतिशत मात्रा जैविक कचरेकी होती
है। यदि कचरा जिसमें घासफूस; गोबर ;खराब भोजन कचरा सब्जियों के छिलके आदि हो को एक गडडे मे डालकर
इस कचरे को मिटटी ढंक दे तथा हर पंद्रह दिन में कचरे को पलटते रहे तो ३-४ माह में
कम्पोस्ट खाद तैयार हो जायेगीइस प्रकारहमारी कचरे की समस्या तो हल होगी ही हमें
अत्यंत उपयोगी जैविक खा भी प्राप्त होगी।
वर्मी कम्पोस्टिंग-:-
यह आधुनिक तकनीकहै िजसमें केंचुओं तथा सूक्ष्म
जीवाणुओं द्वारा कम्पोस्टिंग क्रिया कराई जाती है। यह तकनीक अत्यंत सरल है तथा
काफी लाभकारी एवं प्रचलित तकनीकहै। इस विधि से खाद तैयार करने में सिर्फ २५ से ३०
दिन का समय लगता है। इस विधि को नीचे चित्र के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है।
वर्मी कम्पोस्टिंग के लाभ:-
·
वर्मी कम्पोस्टिंग से जमीन की उर्वरा शक्ति में
वृद्धि होती है।
·
इससे भूमि की जलधारण या जलग्रहण क्षमता में
वृद्धि होती है।
·
पौधों की रोगरोधी क्षमता में वृद्धि होती है।
·
वर्मी कम्पोस्टिंग मिटटी को नरम एवं हवायुक्त्
बनाती है।
·
इसके द्वारा
प्राप्त खाद का प्रयोग फल फूल एवं सब्जियों के उत्पादन में किया गया है।
३
डेनेज:- डे्नेज:-सामान्यत: ऐसा माना जाता है कि मल मूत्र को बहा दिया जाए तो इनका
उपचार स्वयं ही हो है पंरतु ऐसा नहीं है। जब उनउपचारित मल नालियों तथा नदियों के
पानी बहा दिया जाता है, तो जलीय जतुंओं को श्वसन के लिए आक्सीजन नहीं
मिलती है िजससे उनकी मृत्यु हो जाती है।
अत:- मूल मूल उपचार क्रमबद्ध तरीके से किया जाना चाहिए ये क्रम निम्नलिखित
है:-
१
नालियों से निकला हुआ पानी पाखानों स्नानघर तथा रसोई घर से निकले अपशिष्टों को
एकत्रित कर निस्तारित करना।
२ मोटे
पदार्थो को अलग निस्तारित करना।
३ मल के
तरल व मोटे भाग को पृथक निस्तारित करना।
४
उपचारित वाहित मल का क्लोरीनेशन करके नदियों में छेड्ना।
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