महाकवि संत- सूरदास की जीवनी

महाकवि संत- सूरदास की जीवनी

 

महाकवि संत- सूरदास की जीवनी

 

नाम: सूरदास

जन्म: 1478 ई० में

जन्म स्थान: आगरा के समीप रुनकता नामक ग्राम में

पिता: रामदास

गुरु: बल्लभाचार्य

भाषा: ब्रज भाषा

मृत्यु: 1583

मृत्यु स्थान: मथुरा के निकट पारसोली नामक ग्राम में

जीवन परिचय Kavi Surdas Ka Jeevan Parichay in Hindi Language

वात्सल्य एवं श्रंगार में महाकवि सूरदास हिन्दी साहित्य के श्रेष्ठ कवि हैं | सूरदास हिन्दी साहित्य के ऐसे सूर्य हैं जिन्होंने ब्रज भाषा को हिन्दी काव्य में साहित्यिक रूप प्रदान किया | सूरदास जी के लिए कहा गया है कि-

सूर सूर तुलसी ससी, उडगन केशवदास |

अब के कवि खाद्धोत सम, जहँ-तहँ करत प्रकाश ||” सूरदास जी ने हिन्दी भाषा को समृद्ध करने में जो योगदान दिया है वह अद्वितीय है | सूरदास जी हिन्दी साहित्य में भक्ति काल के सगुण भक्ति शाखा के प्रतिनिधि कवि हैं | सूरदास अष्टछाप के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं |

सूरदास जी का जन्म 1478 ई० में आगरा के निकट रुनकता नामक ग्राम में हुआ था | कुछ विद्वानों का मत है कि सूरदास का जन्मसीहीमें हुआ था | इनका जन्म एक निर्धन ब्राम्ह्ण परिवार में हुआ था | बाद में ये गऊघाट में आकर रहने लगे | इनके पिता रामदास एक गायक थे | सूरदास जब गऊघाट में रहते थे तो इसी पर इनकी मुलाकात बल्लभाचार्य से हुई और सूरदास उनके शिष्य बन गए | एक दिन सूरदास ने बल्लभाचार्य को स्वरचित एक पद सुनाया जिससे प्रसन्न होकर इनके गुरु में इन्हें श्री कृष्ण पर पद गाने के लिए कहा | फिर बल्लभाचार्य ने इन्हें गोबर्धन पर्वत पर स्थित श्रीनाथ जी के मंदिर में कीर्तन करने के लिए नियुक्त किया |

सूरदास के अन्धे होने के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद है | कुछ लोग इन्हें जन्मान्ध मानते हैं, परन्तु कुछ विद्वान कहते हैं कि इन्होंने जिस प्रकार श्री कृष्ण की बाललीलाओं का सूक्ष्म एवं सजीव वर्णन किया है, उससे तो इनका जन्मान्ध होना असंभव प्रतीत होता है |

सूरदास जी की मृत्यु 1583 ई० में मथुरा के निकट पारसोली नामक ग्राम में हुई |

रचनाएं-  सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरी

सूरदास के पदों का संकलनसूरसागरमें है |

सूरसागर में सवा लाख पद हैं | पर अभी तक केवल दस हजार पद ही प्राप्त हुए हैं | सूरसारावली में 1,107 छन्द है | ‘साहित्य लहरीसूरदास के 118 पदों का संग्रह है | सूरदास की रचनाओं के सम्बन्ध में इस प्रकार कहा जाता है |

साहित्य लहरी, सूरसागर, सूर की सारावली |

श्रीकृष्ण जी की बाल-छवि पर लेखनी अनुपम चली ||”

काव्यगत विशेषताएं-

भाव पक्ष- सूरदास हिन्दी के कृष्ण भक्ति शाखा के कवि हैं |

भाषा- इन्होंने अपनी रचनाओं में ब्रज भाषा का प्रयोग किया है | तथा कहीं-कहीं पर संस्कृत फारसी भाषा के शब्दों का प्रयोगों का प्रयोग किया है |

रस- इन्होंने अपनी रचनाओं में वात्सल्य, श्रृंगार और शान्त रस का प्रयोग विशेष रुप से किया है |

अलंकार- सूरदास जी ने अपने काव्य में अनुप्रास अलंकार, यमक अलंकार, श्लेष अलंकार, उपमा अलंकार, रूपक और उत्प्रेक्षा अलंकारों का प्रयोग किया है |

छन्द- सूरदास जी ने अपनी रचनाओं में मुक्तक गेय पदों का वर्णन किया है |

सूरदास

मुक्त ज्ञानकोश

सूरदास का नाम कृष्ण भक्ति की अजस्र धारा को प्रवाहित करने वाले भक्त कवियों में सर्वोपरि है। हिंन्दी साहित्य में भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य उपासक और ब्रजभाषा के श्रेष्ठ कवि महात्मा सूरदास हिंदी साहित्य के सूर्य माने जाते हैं। हिंदी कविता कामिनी के इस कमनीय कांत ने हिंदी भाषा को समृद्ध करने में जो योगदान दिया है, वह अद्वितीय है। सूरदास हिंन्दी साहित्य में भक्ति काल के सगुण भक्ति शाखा के कृष्ण-भक्ति उपशाखा के महान कवि हैं।

  1जीवन परिचय

          2जन्मतिथि एवं जन्मस्थान के विषय में मतभेद

o          2.1क्या सूरदास जन्मान्ध थे ?

          3रचनाएँ

          4सूर-काव्य की विशेषताएँ

          5सन्दर्भ

          6इन्हें भी देखें

          7बाहरी कड़ियाँ

जीवन परिचय

सूरदास का जन्म १४७८ ईस्वी में रुनकता नामक गाँव में हुआ। यह गाँव मथुरा-आगरा मार्ग के किनारे स्थित है। कुछ विद्वानों का मत है कि सूर का जन्म सीही [1] नामक ग्राम में एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बाद में ये आगरा और मथुरा के बीच गऊघाट पर आकर रहने लगे थे। सूरदास के पिता रामदास गायक थे। सूरदास के जन्मांध होने के विषय में [2] मतभेद है। प्रारंभ में सूरदास आगरा के समीप गऊघाट पर रहते थे। वहीं उनकी भेंट श्री वल्लभाचार्य से हुई और वे उनके शिष्य बन गए। वल्लभाचार्य ने उनको पुष्टिमार्ग में दीक्षित कर के कृष्णलीला के पद गाने का आदेश दिया। सूरदास की मृत्यु गोवर्धन के निकट पारसौली ग्राम में १५८० ईस्वी में हुई।

जन्मतिथि एवं जन्मस्थान के विषय में मतभेद

सूरदास की जन्मतिथि एवं जन्मस्थान के विषय में विद्वानों में मतभेद है। "साहित्य लहरी' सूर की लिखी रचना मानी जाती है। इसमें साहित्य लहरी के रचना-काल के सम्बन्ध में निम्न पद मिलता है -

मुनि पुनि के रस लेख।

दसन गौरीनन्द को लिखि सुवल संवत् पेख॥

इसका अर्थ संवत् १६०७ ईस्वी में माना गया है, अतएव "साहित्य लहरी' का रचना काल संवत् १६०७ वि० है। इस ग्रन्थ से यह भी प्रमाण मिलता है कि सूर के गुरु श्री बल्लभाचार्य थे।

सूरदास का जन्म सं० १५३५ ईस्वी के लगभग ठहरता है, क्योंकि बल्लभ सम्प्रदाय में ऐसी मान्यता है कि बल्लभाचार्य सूरदास से दस दिन बड़े थे और बल्लभाचार्य का जन्म उक्त संवत् की वैशाख् कृष्ण एकादशी को हुआ था। इसलिए सूरदास की जन्म-तिथि वैशाख शुक्ला पंचमी, संवत् १५३५ वि० समीचीन जान पड़ती है। अनेक प्रमाणों के आधार पर उनका मृत्यु संवत् १६२० से १६४८ ईस्वी के मध्य स्वीकार किया जाता है। रामचन्द्र शुक्ल जी के मतानुसार सूरदास का जन्म संवत् १५४० वि० के सन्निकट और मृत्यु संवत् १६२० ईस्वी के आसपास माना जाता है।

श्री गुरु बल्लभ तत्त्व सुनायो लीला भेद बतायो।

सूरदास की आयु "सूरसारावली' के अनुसार उस समय ६७ वर्ष थी। 'चौरासी वैष्णवन की वार्ता' के आधार पर उनका जन्म रुनकता अथवा रेणु का क्षेत्र (वर्तमान जिला आगरान्तर्गत) में हुआ था। मथुरा और आगरा के बीच गऊघाट पर ये निवास करते थे। बल्लभाचार्य से इनकी भेंट वहीं पर हुई थी। "भावप्रकाश' में सूर का जन्म स्थान सीही नामक ग्राम बताया गया है। वे सारस्वत ब्राह्मण थे और जन्म के अंधे थे। "आइने अकबरी' में (संवत् १६५३ ईस्वी) तथा "मुतखबुत-तवारीख' के अनुसार सूरदास को अकबर के दरबारी संगीतज्ञों में माना है।

क्या सूरदास जन्मान्ध थे

सूरदास श्रीनाथ की "संस्कृतवार्ता मणिपाला', श्री हरिराय कृत "भाव-प्रकाश", श्री गोकुलनाथ की "निजवार्ता' आदि ग्रन्थों के आधार पर, जन्म के अन्धे माने गए हैं। लेकिन राधा-कृष्ण के रूप सौन्दर्य का सजीव चित्रण, नाना रंगों का वर्णन, सूक्ष्म पर्यवेक्षणशीलता आदि गुणों के कारण अधिकतर वर्तमान विद्वान सूर को जन्मान्ध स्वीकार नहीं करते।

श्यामसुन्दर दास ने इस सम्बन्ध में लिखा है - "सूर वास्तव में जन्मान्ध नहीं थे, क्योंकि शृंगार तथा रंग-रुपादि का जो वर्णन उन्होंने किया है वैसा कोई जन्मान्ध नहीं कर सकता।" डॉक्टर हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है - "सूरसागर के कुछ पदों से यह ध्वनि अवश्य निकलती है कि सूरदास अपने को जन्म का अन्धा और कर्म का अभागा कहते हैं, पर सब समय इसके अक्षरार्थ को ही प्रधान नहीं मानना चाहिए।"

रचनाएँ

सूरदास जी द्वारा लिखित पाँच ग्रन्थ बताए जाते हैं:

          () सूरसागर - जो सूरदास की प्रसिद्ध रचना है। जिसमें सवा लाख पद संग्रहित थे। किंतु अब सात-आठ हजार पद ही मिलते हैं।

          () सूरसारावली

          () साहित्य-लहरी - जिसमें उनके कूट पद संकलित हैं।

          () नल-दमयन्ती

          () ब्याहलो

उपरोक्त में अन्तिम दो अप्राप्य हैं।

नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हस्तलिखित पुस्तकों की विवरण तालिका में सूरदास के १६ ग्रन्थों का उल्लेख है। इनमें सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरी, नल-दमयन्ती, ब्याहलो के अतिरिक्त दशमस्कंध टीका, नागलीला, भागवत्, गोवर्धन लीला, सूरपचीसी, सूरसागर सार, प्राणप्यारी, आदि ग्रन्थ सम्मिलित हैं। इनमें प्रारम्भ के तीन ग्रंथ ही महत्त्वपूर्ण समझे जाते हैं, साहित्य लहरी की प्राप्त प्रति में बहुत प्रक्षिप्तांश जुड़े हुए हैं।

          सूरसागर का मुख्य वर्ण्य विषय श्री कृष्ण की लीलाओं का गान रहा है।

          सूरसारावली में कवि ने कृष्ण विषयक जिन कथात्मक और सेवा परक पदो का गान किया उन्ही के सार रूप मैं उन्होने सारावली की रचना की।

          सहित्यलहरी मैं सूर के दृष्टिकूट पद संकलित हैं।

सूर-काव्य की विशेषताएँ

          . सूर के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के अनुग्रह से मनुष्य को सद्गति मिल सकती है। अटल भक्ति कर्मभेद, जातिभेद, ज्ञान, योग से श्रेष्ठ है।

          . सूर ने वात्सल्य, श्रृंगार और शांत रसों को मुख्य रूप से अपनाया है। सूर ने अपनी कल्पना और प्रतिभा के सहारे कृष्ण के बाल्य-रूप का अति सुंदर, सरस, सजीव और मनोवैज्ञानिक वर्णन किया है। बालकों की चपलता, स्पर्धा, अभिलाषा, आकांक्षा का वर्णन करने में विश्व व्यापी बाल-स्वरूप का चित्रण किया है। बाल-कृष्ण की एक-एक चेष्टाओं के चित्रण में कवि कमाल की होशियारी एवं सूक्ष्म निरीक्षण का परिचय देते हैं-

मैया कबहिं बढैगी चौटी?

किती बार मोहिं दूध पियत भई, यह अजहूँ है छोटी।

सूर के कृष्ण प्रेम और माधुर्य प्रतिमूर्ति है। जिसकी अभिव्यक्ति बड़ी ही स्वाभाविक और सजीव रूप में हुई है।

          . जो कोमलकांत पदावली, भावानुकूल शब्द-चयन, सार्थक अलंकार-योजना, धारावाही प्रवाह, संगीतात्मकता एवं सजीवता सूर की भाषा में है, उसे देखकर तो यही कहना पड़ता है कि सूर ने ही सर्व प्रथम ब्रजभाषा को साहित्यिक रूप दिया है।

          . सूर ने भक्ति के साथ श्रृंगार को जोड़कर उसके संयोग-वियोग पक्षों का जैसा वर्णन किया है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है।

          . सूर ने विनय के पद भी रचे हैं, जिसमें उनकी दास्य-भावना कहीं-कहीं तुलसीदास से आगे बढ़ जाती है-

हमारे प्रभु औगुन चित धरौ।

समदरसी है मान तुम्हारौ, सोई पार करौ।

          . सूर ने स्थान-स्थान पर कूट पद भी लिखे हैं।

          . प्रेम के स्वच्छ और मार्जित रूप का चित्रण भारतीय साहित्य में किसी और कवि ने नहीं किया है यह सूरदास की अपनी विशेषता है। वियोग के समय राधिका का जो चित्र सूरदास ने चित्रित किया है, वह इस प्रेम के योग्य है

          . सूर ने यशोदा आदि के शील, गुण आदि का सुंदर चित्रण किया है।

          . सूर का भ्रमरगीत वियोग-शृंगार का ही उत्कृष्ट ग्रंथ नहीं है, उसमें सगुण और निर्गुण का भी विवेचन हुआ है। इसमें विशेषकर उद्धव-गोपी संवादों में हास्य-व्यंग्य के अच्छे छींटें भी मिलते हैं।

          १०. सूर काव्य में प्रकृति-सौंदर्य का सूक्ष्म और सजीव वर्णन मिलता है।

          ११. सूर की कविता में पुराने आख्यानों और कथनों का उल्लेख बहुत स्थानों में मिलता है।

          १२. सूर के गेय पदों में ह्रृदयस्थ भावों की बड़ी सुंदर व्यजना हुई है। उनके कृष्ण-लीला संबंधी पदों में सूर के भक्त और कवि ह्रृदय की सुंदर झाँकी मिलती है।

          १३. सूर का काव्य भाव-पक्ष की दृष्टि से ही महान नहीं है, कला-पक्ष की दृष्टि से भी वह उतना ही महत्वपूर्ण है। सूर की भाषा सरल, स्वाभाविक तथा वाग्वैदिग्धपूर्ण है। अलंकार-योजना की दृष्टि से भी उनका कला-पक्ष सबल है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने सूर की कवित्व-शक्ति के बारे में लिखा है-

सूरदास जब अपने प्रिय विषय का वर्णन शुरू करते हैं तो मानो अलंकार-शास्त्र हाथ जोड़कर उनके पीछे-पीछे दौड़ा करता है। उपमाओं की बाढ़ जाती है, रूपकों की वर्षा होने लगती है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि सूरदास हिंदी साहित्य के महाकवि हैं, क्योंकि उन्होंने केवल भाव और भाषा की दृष्टि से साहित्य को सुसज्जित किया, वरन् कृष्ण-काव्य की विशिष्ट परंपरा को भी जन्म दिया है।

सूरदास जी वात्सल्य रस के सम्राट माने जाते हैं। उन्होंने श्रृंगार और शान्त रसों का भी बड़ा मर्मस्पर्शी वर्णन किया है।

सूरदास की जन्मतिथि एवं जन्मस्थान के विषय में विद्वानों में मतभेद है। "साहित्य लहरी' सूर की लिखी रचना मानी जाती है। इसमें साहित्य लहरी के रचना-काल के सम्बन्ध में

निम्न पद मिलता है -

मुनि पुनि के रस लेख

दसन गौरीनन्द को लिखि सुवल संवत् पेख ।।

इसका अर्थ संवत् १६०७ वि० माना जाता है, अतएवं "साहित्य लहरी' का रचना काल संवत् १६०७ वि० है। इस ग्रन्थ से यह भी प्रमाणित होता है कि सूर के गुरु श्री बल्लभाचार्य थे। इस आधार पर सूरदास का जन्म सं० १५३५ वि० के लगभग ठहरता है, क्योंकि बल्लभ सम्प्रदाय की मान्यता है कि बल्लभाचार्य सूरदास से दस दिन बड़े थे और बल्लभाचार्य का जन्म उक्त संवत् की वैशाख् कृष्ण एकादशी को हुआ था। इसलिए सूरदास की जन्म-तिथि वैशाख शुक्ला पंचमी, संवत् १५३५ वि० समीचीन मानी जाती है। उनकी मृत्यु संवत् १६२० से १६४८ वि० के मध्य मान्य है।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी के मतानुसार सूरदास का जन्म संवत् १५४० वि० के सन्निकट और मृत्यु संवत् १६२० वि० के आसपास मानी जाती है।

जन्म स्थल

'चौरासी वैष्णव की वार्ता' के आधार पर उनका जन्म रुनकता अथवा रेणु का क्षेत्र (वर्तमान जिला आगरान्तर्गत) में हुआ था। मथुरा और आगरा के बीच गऊघाट पर ये निवास करते थे। बल्लभाचार्य से इनकी भेंट वहीं पर हुई थी। "भावप्रकाश' में सूर का जन्म स्थान सीही नामक ग्राम बताया गया है। वे सारस्वत ब्राह्मण थे और जन्म के अंधे थे।

"आइने अकबरी' में (संवत् १६५३ वि०) तथा "मुतखबुत-तवारीख' के अनुसार सूरदास को अकबर के दरबारी संगीतज्ञों में माना है।

 

अधिकतर विद्वानों का मत है कि सूर का जन्म सीही नामक ग्राम में एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बाद में ये आगरा और मथुरा के बीच गऊघाट पर आकर रहने लगे थे।

खंजन नैन रुप मदमाते

अतिशय चारु चपल अनियारे,

पल पिंजरा समाते ।।

चलि - चलि जात निकट स्रवनन के,

उलट-पुलट ताटंक फँदाते

"सूरदास' अंजन गुन अटके,

नतरु अबहिं उड़ जाते ।।

 


क्या सूरदास अंधे थे ?

सूरदास श्रीनाथ की "संस्कृतवार्ता मणिपाला', श्री हरिराय कृत "भाव-प्रकाश", श्री गोकुलनाथ की "निजवार्ता' आदि ग्रन्थों के आधार पर, जन्म के अन्धे माने गए हैं। लेकिन राधा-कृष्ण के रुप सौन्दर्य का सजीव चित्रण, नाना रंगों का वर्णन, सूक्ष्म पर्यवेक्षणशीलता आदि गुणों के कारण अधिकतर वर्तमान विद्वान सूर को जन्मान्ध स्वीकार नहीं करते।"

श्यामसुन्दरदास ने इस सम्बन्ध में लिखा है - "सूर वास्तव में जन्मान्ध नहीं थे, क्योंकि श्रृंगार तथा रंग-रुपादि का जो वर्णन उन्होंने किया है वैसा कोई जन्मान्ध नहीं कर सकता।'' डॉक्टर हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है - "सूरसागर के कुछ पदों से यह ध्वनि अवश्य निकलती है कि सूरदास अपने को जन्म का अन्धा और कर्म का अभागा कहते हैं, पर सब समय इसके अक्षरार्थ को ही प्रधान नहीं मानना चाहिए।"

 

रचनाएं

सूरदास की रचनाओं में निम्नलिखित पाँच ग्रन्थ बताए जाते हैं -

 

सूरसागर

सूरसारावली

साहित्य-लहरी

नल-दमयन्ती

ब्याहलो

उपरोक्त में अन्तिम दो ग्रंथ अप्राप्य हैं।

नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हस्तलिखित पुस्तकों की विवरण तालिका में सूरदास के १६ ग्रन्थों का उल्लेख है। इनमें सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरी, नल-दमयन्ती, ब्याहलो के अतिरिक्त दशमस्कंध टीका, नागलीला, भागवत्, गोवर्धन लीला, सूरपचीसी, सूरसागर सार, प्राणप्यारी, आदि ग्रन्थ सम्मिलित हैं। इनमें प्रारम्भ के तीन ग्रंथ ही महत्त्वपूर्ण समझे जाते हैं।

 

सूर के पद | Sur Ke Pad

सूरदास के पदों का संकलन - इस पृष्ठ के अंतर्गत सूर के पदों का संकलन यहाँ उपलब्ध करवाया जा रहा है। यदि आपके पास सूरदास से संबंधित सामग्री हैं तो कृपया 'भारत-दर्शन' के साथ साझा करें।

 

मुख दधि लेप किए

 

मन भए दस-बीस - सूरदास के पद

मन भए दस-बीस

ऊधौ मन भए दस-बीस।

एक हुतो सो गयो स्याम संग को अवराधै ईस॥

इंद्री सिथिल भई केसव बिनु ज्यों देही बिनु सीस।

आसा लागि रहत तन स्वासा जीवहिं कोटि बरीस॥

हरि संग खेलति हैं सब फाग - सूरदास के पद

हरि संग खेलति हैं सब फाग।

इहिं मिस करति प्रगट गोपी: उर अंतर को अनुराग।।

सारी पहिरी सुरंग, कसि कंचुकी, काजर दे दे नैन।

बनि बनि निकसी निकसी भई ठाढी, सुनि माधो के बैन।।

डफ, बांसुरी, रुंज अरु महुआरि, बाजत ताल मृदंग।

 

1. सूरदास के गुरु कौन थे

 

 

 

कृष्ण भक्ति में सूरदास का नाम सर्वोपरि है। वह एक कवि, संत और एक महान संगीतकार थे। उन्होंने इन सभी रोल को अपने जीवन में बखूबी निभाया। उनके जीवनकाल से संबंधित कोई भी पुख्ता प्रमाण नहीं मिलते। महाकवि सूरदास के जन्म और मृत्यु दोनों को लेकर कई भ्रांतियां हैं। उनके पिता रामदास गायक थे। उनके गुरु का नाम श्री वल्लभाचार्य था। यह भी माना जाता है कि वह अपने गुरु से महज दस दिन छोटे थे।

2. रुनकता में हुआ था जन्म

 

 

सूरदास का जन्म 1478 ईस्वी में आगरा-मथुरा रोड पर स्थित रुनकता नामक गांव में हुआ था। वहीं कुछ विद्वानों का यह भी मत है कि उनका जन्म एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में दिल्ली के पास सीही नामक गांव में 1479 ईस्वी में हुआ था। इसी तरह उनकी मृत्यु के संबंध में भी दो मत हैं।

3. जन्म से अंधे थे सूरदास

सूरदास जन्म से ही अंधे थे, इस कारण उन्हें उनके परिवार ने छोड़ दिया था। उन्होंने महज छह साल की उम्र ही ही घर त्याग दिया था। जन्म से अंधे होने के बावजूद भी उनकी कविता में प्रकृति और दृश्य जगत की अन्य वस्तुओं का इतना सूक्ष्म और अनुभवपूर्ण चित्रण मिलता है कि उनके जन्म से अंधे होने पर सहज विश्वास नहीं होता। सूरदास की तथाकथित रचनासाहित्य लहरीके एक पद में तो उन्हें चंदबरदायी का वंशज माना गया है और उनका वास्तविक नाम सूरजचंद बताया गया है।

4. श्री वल्लभाचार्य से मुलाकात

 

18 साल की उम्र में सूरदास गऊघाट (यमुना नदी के तट पर पवित्र स्नान स्थल) गए। यहां पर ही वह महान संत श्री वल्लभाचार्य के संपर्क में आए और उनसे गुरु दीक्षा ली। वल्लभाचार्य ने ही उन्हेंभागवत लीलाका गुणगान करने की सलाह दी। इसके बाद उन्हें श्रीकृष्ण का गुणगान शुरू कर दिया और जीवन में कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। इससे पहले वह केवल दैन्य भाव से विनय के पद रचा करते थे। उनके पदों की संख्यासहस्राधिककही जाती है, जिनका संग्रहीत रूपसूरसागरके नाम से प्रसिद्ध है।

5. अकबर से भेंट

 

सूर की काव्य प्रतिभा ने तत्कालीन शासक अकबर को भी आकर्षित किया। उसने उनसे आग्रहपूर्वक भेंट की थी जिसका उल्लेख भी प्राचीन साहित्य में मिलता है। साहित्य में सूरदास और तुलसीदास की भेंट का वर्णन भी मिलता है।

6. सूरदास की रचनाएं

 

सूरदास जी द्वारा लिखित पांच ग्रन्थ बताएं जाते हैं। जिनमें से सूर सागर, सूर सारावली और साहित्य लहरी के प्रमाण मिलते हैं। जबकि नल-दमयन्ती और ब्याहलो का कोई प्रमाण नहीं मिलता। नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हस्तलिखित पुस्तकों की विवरण तालिका में सूरदास के 16 ग्रन्थों का उल्लेख किया गया है। सूरसागर में करीब एक लाख पद होने की बात कही जाती है। वर्तमान संस्करणों में करीब पांच हजार पद ही मिलते हैं। सूर सारावली में 1107 छन्द हैं। इसकी रचना संवत 1602 में होने का प्रमाण मिलता है। वहीं साहित्य लहरी 118 पदों की एक लघु रचना है। रस की दृष्टि से यह ग्रन्थ श्रृंगार की कोटि में आता है।

7. जीवन का अंतिम समय

 

सूरदास ने भक्ति के मार्ग को ही सर्वोपरि माना। सूरदास ने जीवन के अंतिम क्षण तक ब्रज में ही समय व्यतीत किया। सूर का निधन काल का कोई सटीक प्रमाण तो नहीं है। लेकिन करीब 100 वर्ष से अधिक की उम्र तक वह जिंदा रहे। कुछ विद्वानों के अनुसार 1581 ईस्वी में उन्होंने शरीर छोड़ दिया था। वहीं कुछ का कहना है कि सूर ने 1584 ईस्वी में शरीर पूरा किया था। उनकी मृत्यु पारसोली ग्राम में दिवंगत हुई थी।

सूरदास का जीवन

 

सूरदास की जन्मतिथि एवं जन्मस्थान के विषय में विद्वानों में मतभेद है।साहित्य लहरीसूर की लिखी रचना मानी जाती है। इसमें साहित्य लहरी के रचना-काल के सम्बन्ध में निम्न पद मिलता है -

मुनि पुनि के रस लेख

दसन गौरीनन्द को लिखि सुवल संवत् पेख ।।

इसका अर्थ विद्वानों ने संवत् १६०७ वि० माना है, अतएवसाहित्य लहरीका रचना काल संवत् १६०७ वि० है। इस ग्रन्थ से यह भी प्रमाण मिलता है कि सूर के गुरु श्री बल्लभाचार्य थे -

सूरदास का जन्म सं० १५३५ वि० के लगभग ठहरता है, क्योंकि बल्लभ सम्प्रदाय में ऐसी मान्यता है कि बल्लभाचार्य सूरदास से दस दिन बड़े थे और बल्लभाचार्य का जन्म उक्त संवत् की वैशाख् कृष्ण एकादशी को हुआ था। इसलिए सूरदास की जन्म-तिथि वैशाख शुक्ला पंचमी, संवत् १५३५ वि० समीचीन जान पड़ती है। अनेक प्रमाणों के आधार पर उनका मृत्यु संवत् १६२० से १६४८ वि० के मध्य स्वीकार किया जाता है।

 

रामचन्द्र शुक्ल जी के मतानुसार सूरदास का जन्म संवत् १५४० वि० के सन्निकट और मृत्यु संवत् १६२० वि० के आसपास माना जाता है।

 

श्री गुरु बल्लभ तत्त्व सुनायो लीला भेद बतायो।

सूरदास की आयुसूरसारावलीके अनुसार उस समय ६७ वर्ष थी।चौरासी वैष्णव की वार्ताके आधार पर उनका जन्म रुनकता अथवा रेणु का क्षेत्र (वर्तमान जिला आगरान्तर्गत) में हुआ था। मथुरा और आगरा के बीच गऊघाट पर ये निवास करते थे। बल्लभाचार्य से इनकी भेंट वहीं पर हुई थी।भावप्रकाशमें सूर का जन्म स्थान सीही नामक ग्राम बताया गया है। वे सारस्वत ब्राह्मण थे और जन्म के अंधे थे।आइने अकबरीमें (संवत् १६५३ वि०) तथामुतखबुत-तवारीखके अनुसार सूरदास को अकबर के दरबारी संगीतज्ञों में माना है।

जन्म स्थान

अधिक विद्वानों का मत है कि सूर का जन्म सीही नामक ग्राम में एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बाद में ये आगरा और मथुरा के बीच गऊघाट पर आकर रहने लगे थे।

खंजन नैन रुप मदमाते

अतिशय चारु चपल अनियारे,

पल पिंजरा समाते ।।

चलिचलि जात निकट स्रवनन के,

उलट-पुलट ताटंक फँदाते

सूरदासअंजन गुन अटके,

नतरु अबहिं उड़ जाते ।।

क्या सूरदास अंधे थे ?

सूरदास श्रीनाथ कीसंस्कृतवार्ता मणिपाला’, श्री हरिराय कृतभाव-प्रकाश”, श्री गोकुलनाथ कीनिजवार्ताआदि ग्रन्थों के आधार पर, जन्म के अन्धे माने गए हैं। लेकिन राधा-कृष्ण के रुप सौन्दर्य का सजीव चित्रण, नाना रंगों का वर्णन, सूक्ष्म पर्यवेक्षणशीलता आदि गुणों के कारण अधिकतर वर्तमान विद्वान सूर को जन्मान्ध स्वीकार नहीं करते।

 

श्यामसुन्दरदास ने इस सम्बन्ध में लिखा है – “”सूर वास्तव में जन्मान्ध नहीं थे, क्योंकि श्रृंगार तथा रंग-रुपादि का जो वर्णन उन्होंने किया है वैसा कोई जन्मान्ध नहीं कर सकता।डॉक्टर हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है – “”सूरसागर के कुछ पदों से यह ध्वनि अवश्य निकलती है कि सूरदास अपने को जन्म का अन्धा और कर्म का अभागा कहते हैं, पर सब समय इसके अक्षरार्थ को ही प्रधान नहीं मानना चाहिए।

 

 

 

सूरदास जी द्वारा लिखित पाँच ग्रन्थ बताए जाते हैं -

सूरसागर

सूरसारावली

साहित्य-लहरी

नल-दमयन्ती और

ब्याहलो।

उपरोक्त में अन्तिम दो अप्राप्य हैं।

नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हस्तलिखित पुस्तकों की विवरण तालिका में सूरदास के १६ ग्रन्थों का उल्लेख है। इनमें सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरी, नल-दमयन्ती, ब्याहलो के अतिरिक्त दशमस्कंध टीका, नागलीला, भागवत्, गोवर्धन लीला, सूरपचीसी, सूरसागर सार, प्राणप्यारी, आदि ग्रन्थ सम्मिलित हैं। इनमें प्रारम्भ के तीन ग्रंथ ही महत्त्वपूर्ण समझे जाते हैं, साहित्य लहरी की प्राप्त प्रति में बहुत प्रक्षिप्तांश जुड़े हुए हैं।

सूरसागर

सूरसागर में लगभग एक लाख पद होने की बात कही जाती है। किन्तु वर्तमान संस्करणों में लगभग पाँच हजार पद ही मिलते हैं। विभिन्न स्थानों पर इसकी सौ से भी अधिक प्रतिलिपियाँ प्राप्त हुई हैं, जिनका प्रतिलिपि काल संवत् १६५८ वि० से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी तक है इनमें प्राचीनतम प्रतिलिपि नाथद्वारा (मेवाड़) केसरस्वती भण्डारमें सुरक्षित पायी गई हैं।

सूरसागर सूरदासजी का प्रधान एवं महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसमें प्रथ्#ंम नौ अध्याय संक्षिप्त है, पर दशम स्कन्ध का बहुत विस्तार हो गया है। इसमें भक्ति की प्रधानता है। इसके दो प्रसंगकृष्ण की बाल-लीलाऔरभ्रमर-गीतसारअत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं।

सूरसागर की सराहना करते हुए डॉक्टर हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है – “”काव्य गुणें की इस विशाल वनस्थली में एक अपना सहज सौन्दर्य है। वह उस रमणीय उद्यान के समान नहीं जिसका सौन्दर्य पद-पद पर माली के कृतित्व की याद दिलाता है, बल्कि उस अकृत्रिम वन-भूमि की भाँति है जिसका रचयिता रचना में घुलमिल गया है।दार्शनिक विचारों की दृष्टि सेभागवतऔरसूरसागरमें पर्याप्त अन्तर है।

 सूर सारावली

इसमें ११०७ छन्द हैं। यह सम्पूर्ण ग्रन्थ एकवृहद् होलीगीत के रुप में रचित हैं। इसकी टेक है – “”खेलत यह विधि हरि होरी हो, हरि होरी हो वेद विदित यह बात।इसका रचना-काल संवत् १६०२ वि० निश्चित किया गया है, क्योंकि इसकी रचना सूर के ६७वें वर्ष में हुई थी।

 साहित्य लहरी

यह ११८ पदों की एक लघु रचना है। इसके अन्तिम पद में सूरदास का वंशवृक्ष दिया है, जिसके अनुसार सूरदास का नाम सूरजदास है और वे चन्दबरदायी के वंशज सिद्ध होते हैं। अब इसे प्रक्षिप्त अंश माना गया है ओर शेष रचना पूर्ण प्रामाणिक मानी गई है। इसमें रस, अलंकार और नायिका-भेद का प्रतिपादन किया गया है। इस कृति का रचना-काल स्वयं कवि ने दे दिया है जिससे यह संवत् विक्रमी में रचित सिद्ध होती है। रस की दृष्टि से यह ग्रन्थ विशुद्ध श्रृंगार की कोटि में आता है।

सूरदास का काव्य सौष्ठव

महाकवि सूरदास हिंदी के श्रेष्ठ भक्त कवि हैं। उनका संपूर्ण काव्य ब्रजभाषा का श्रृंगार है, जिसमें विभिन्न राग-रागनियों के माध्यम से एक भक्त ह्रदय के भावपूर्ण उद्गार व्यक्त हुए हैं। कृष्ण, गाय, वृंदावन, गोकुल, मथुरा, यमुना, मधुवन, मुरली, गोप, गोपी, आदि के साथ-साथ संपूर्ण ब्रज-जीवन, संस्कृति एवं सभ्यता के संदर्भ में उनकी वीणा ने जो कुछ गाया, उसके स्वर और शब्द, शताब्दियां बीत जाने पर भी भारतीय काव्य की संगीत के रूप में व्याप्त हैं। उनके काव्य का अंतरंग एवं बहिरंग पक्ष अत्यंत सुदृढ़ और प्रौढ़ है तथा अतुलित माधुर्य, अनुपम सौंदर्य और अपरिमित सौष्ठव से भरा पड़ा है।

काव्य के मुख्य रूप से दो पक्ष होते हैं - भावपक्ष और कलापक्ष। भावपक्ष काव्य का आंतरिक गुण है। इसका संबंध कवि की सहृदयता और भावुकता से होता है। काव्य के शरीर तत्व को कलापक्ष कहते हैं। इसका संबंध कवि की चतुरता और रचनाकौशल से होता है। भावपक्ष एवं कलापक्ष से समन्वित काव्य ही श्रेष्ठ काव्य का उदाहरण माना जाता है।

भावपक्ष

महाकवि सूरदास का सूरसागर वास्तव में रस का महासागर है। इसमें भावों की विविधता और अनेक रूपता के सहज दर्शन होते हैं। मानव ह्रदय की गहराइयों में डूबने वाले कवि से यही आशा और अपेक्षा भी होती है। अपने सीमित क्षेत्र में भी नवीन उद्भावनाओं, कोमल कल्पनाओं आदि के कारण ही सूरदास हिंदी साहित्य के सवश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। सूरदास की कविता के भावपक्ष को निम्नलिखित शीर्षकों के माध्यम से देखा जा सकता है -

वस्तु-वर्णन

वर्ण्य-विषय की दृष्टि से सूरदास के संपूर्ण काव्य को प्रमुखतः छः भागों में बांटकर देखा जा सकता है – (1) विनय के पद, (2) बालक कृष्ण से संबंधित पद, (3) कृष्ण के रूप-सौंदर्य संबंधी पद, (4) कृष्ण और राधा के रति भाव संबंधी पद, (5) मुरली संबंधी पद, और (6) वियोग श्रृंगार के भ्रमरगीत के पद।

विनय के पदों में सूरदास ने विनय की संपूर्ण भूमिकाओं एवं वैष्णव भक्ति संबंधी समस्त नियमों के अनुकूल विनम्रता, निरभिमानता, निष्कपटता, इष्टदेव की महत्ता, भक्त की लघुता आदि का निरूपण बड़ी सजीवता के साथ किया है। कृष्ण के बाल-जीवन संबंधी पदों में सूरदास की अद्भुत कला के दर्शन होते हैं। सूरदास ने बाल-जीवन का ऐसा जीता-जागता चित्र अंकित किया है, जिसमें मनोवैज्ञानिकता, सरसता और चित्ताकर्षकता, सभी विद्यमान हैं। कृष्ण के रूप-माधुर्य संबंधी पदों में सूरदास ने अपने इष्टदेव कृष्ण के अनंत सौंदर्य की ऐसी झांकी प्रस्तुत की है, जिसे देखकर सभी का ह्रदय अनायास ही उस सौंदर्य पर न्यौछावर हो जाता है। कृष्ण और राधा के रति संबंधी पदों में सूरदास कृष्ण के साथ राधा को महत्वपूर्ण स्थान देते हुए उन्हें आराध्य देवी के पद पर प्रतिष्ठित करते हैं। मुरली संबंधी पदों में सूरदास मुरली को एक साधारण मनोमुग्धकारी यंत्र से अधिक व्यापक अर्थ प्रदान करते हैं। और आखिर में वियोग संबंधी भ्रमरगीत के पदों में सूरदास की कला के सर्वोत्कृष्ट रूप का दर्शन होता है। इन पदों में सूरदास ने सरसता, वाग्वैदग्ध्य एवं माधुर्य के साथ-साथ उद्धव संदेश, गोपियों की झुंझुलाहट, प्रेमातिरेक, व्यंग्य-विनोद, हास-परिहास, उपालंभ, उदारता, सहज चपलता, विरहोंमाद, वचन-वक्रता आदि का अद्भुत वर्णन किया है। स्पष्ट है कि सूरदास ने कृष्ण के बाल-जीवन से लेकर किशोरावस्था तक की संपूर्ण क्रीड़ाओं, चेष्टाओं एवं व्यापारों आदि के मनोहारी चित्रण द्वारा सूरसागर के रूप में एक अद्भुत काव्य की सृष्टि की है, जिसमें वात्सल्य और विप्रलंभ संबंधी वर्णन सर्वोपरि हैं।

प्रकृति-चित्रण

सूरदास की कविता के केंद्र में ब्रज प्रदेश की रमणीय प्रकृति अपने पूरे वैभव के साथ उपस्थित है। ब्रज प्रदेश की प्रकृति का मनोहारी रूप और आनंदोल्लासपूर्ण मधुर कलरव सूरदास के प्रत्येक पदों में गुंजायमान है। प्रकृति-नटी के रमणीय झांकी अंकित करते हुए सूरदास उसके षड्ऋतुओं में परिवर्तित होने वाले दिव्य सौंदर्य का मनमोहक निरूपण करते हैं। बसंत-ऋतु के एक चित्र में कोकिल सदैव शोर मचाती रहती है, मन्मथ सदा चित्त चुराता रहता है, वृक्षों की डालियां विविध प्रकार के पुष्पों से भरी रहती हैं, जिन पर भ्रमर उन्मुक्त होकर विलास करते रहते हैं, और ऐसे में सर्वत्र हर्ष एवं उल्लास छाया रहता है और कोई भी उदास नहीं होता

सदा बसंत रहत जहं बास। सदा हर्ष जहं नहीं उदास।।

कोकिल कीर सदा तंह रोर। सदा रूप मन्मथ चित चोर।।

विविध सुमन बन फूले डार। उन्मत मधुकर भ्रमत अपार।।

इसी प्रकार, सूरदास शरद, वर्षा समेत अन्य ऋतुओं के अनुपम सौंदर्य को भी अपनी कविता में शामिल करते हैं। केवल ऋतुओं को बल्कि प्रभात, वन, द्रुम, लता, यमुना, चंद्रमा, उषा एवं संध्या आदि के भी सरस एवं मार्मिक चित्र उनकी कविता के भीतर मौजूद हैं। लेकिन यह भी सच है कि सूरदास हमेशा प्रकृति के रमणीय रूप को ही अपनी कविता की विषय-वस्तु नहीं बनाते हैं, बल्कि कुछ स्थानों पर प्रकृति के भयंकर रूप का भी उन्होंने चित्रण किया है। दावानल प्रसंग इसका एक महत्वपूर्ण उदहारण है, जिसमें दसों दिशाओं में भयंकर लपटें उठने लगती हैं, बांस फटने लगता है, कुश-कांस थरथराने लगते हैं, अंगार उलटने लगते हैं, कराल लपटें वनों का विनाश करने लगती हैं, धरा से अंबर तक धुंआ बादल-सा छाने लगता है और बीच-बीच में ज्वाला दामिनी-सी चमकने लगती है। ऐसी स्थिति में जंगली जीव-जंतु, वाराह, मोर, चातक आदि सभी बेचैन हो उठते हैं

झहरात, झहरात दावानल आयौ।

घेरि चहुं ओर करि सोर अंदोर बन, धरनि आकास चहुं पास छायौ।।

बरत बन बांस, थरहरत कुस कांस, जरि उड़त है भांस, अति प्रबल धायौ।।

झपटि झपटतिलपट फूल-फल चटचंटकि फटत लटलटकि द्रुम-दल नवयौ।।

सूरदास अपनी कविता में प्रकृति के सुरम्य एवं भयानक, दोनों रूपों की अमर झांकियां अंकित करने में सफल रहे हैं। सूरदास के प्रकृति वर्णन की विशेषता यह है कि उनके आराध्य देव निरंतर प्रकृति की गोद में ही विचरण करते हैं, गौएं चराते हैं, गोवर्धन धारण करते हैं और कुंजों में विहार करते हैं। सूरदास ने शास्त्रीय दृष्टि से प्रकृति के उद्दीपन और अलंकारिक रूप को अधिक अपनाया है। प्रकृति के संवेदनात्मक रूप की सजीव झांकी अंकित करने के कारण उनका प्रकृति वर्णन विविधता और सौंदर्यप्रियता से सराबोर है।

भाव एवं रस निरूपण

सूरदास के पदों में अनेक सुंदर भावों की सजीव व्यंजना हुई है। उनके पद सहृदयता, सरसता एवं भावुकता के भंडार हैं, जिनमें विविध भावों की योजना इतने व्यवस्थित ढंग से हुई है कि प्रत्येक पद मनोहारी बन पड़ा है। सूरदास के सूरसागर की इसी विशिष्टता की चर्चा करते हुए वरिष्ठ आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल लिखते हैं, “पहली साहित्य-रचना और इतनी प्रचुर, प्रगल्भ और काव्यांग पूर्ण कि अगले कवियों की श्रृंगार और वात्सल्य की उक्तियां इनकी जूठी जान पड़ती हैं। यह बात हिंदी-साहित्य का इतिहास लिखने वालों को उलझन में डालने वाली होगी। सूरसागर किसी पहले से चली आती हुई परंपरा काचाहे वह मौखिक ही रही होपूर्ण विकास-सा जान पड़ता है, चलने वाली परंपरा का मूल रूप नहीं।वस्तुतः सूरदास के पदों में विभिन्न भावों के साथ विविध रसों की सुंदर एवं सजीव झांकियां भी मिलती हैं, जिसे निम्नांकित रूप में देखा जा सकता है

वात्सल्य रस

सूरदास ने अपने काव्य में बालक कृष्ण के मोहक रूप और सौंदर्य का कलात्मक चित्र अंकित किया है। सूरदास की बंद आंखों के समक्ष कृष्ण के आहलाद्कारी रूप एवं चेष्टाएं अनेकानेक बार नृत्य कर उठी, जो हिंदी साहित्य के लिए बहुमूल्य निधि बन गयी। बाल मनोभावों और चेष्टाओं की सुंदर, स्वाभाविक व्यंजना सूरसागर के अनेक पदों में देखने को मिलती है। त्रिभुवन के मन को मुग्ध करने वाले कृष्ण को माता यशोदा सुलाती हैं। सुलाते समय वे गाती रहती हैं। किंतु यह जानकर कि कृष्ण सो गए हैं, यशोदा चुप हो जाती हैं। कृष्ण अपनी आंखें खोल देते हैं तो माता यशोदा पुनः गाने लगती हैं। सूरदास का यह स्वाभाविक और  मनोवैज्ञानिक चित्रण देखते ही बनता है -

जसोदा हरि पालने झुलावैं।

हलरावैं, दुलराई मल्हावैं, जोइसोइ कछु गावैं।।

*   *   *   *   *

इहि अंतर अकुलाई उठे हरि, जसुमति मधुरैं गावैं।।

कृष्ण के कुछ बड़े होकर घुटने के बल चलने के सौंदर्य अंकन में सूरदास अद्वितीय रहे हैं -

सोभित कर नवनीत लिए।

घुटुरूवनि चलत रेनुतन-मंडित, मुख दधि लेप किए।।

बाल-मनोभावों एवं चेष्टाओं का जितना सहज और स्वाभाविक वर्णन सूरदास ने किया है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। वात्सल्य रस के चित्रण में सूरदास विश्व साहित्य में बेजोड़ हैं। सूरदास के वात्सल्य चित्रण पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल लिखते हैं, “बाल सौंदर्य एवं स्वभाव के चित्रण में जितनी सफलता सूर को मिली, उतनी अन्य किसी को नहीं। अपनी बंद आंखों से वात्सल्य का कोनाकोना वे झांक आये।सूरदास के वात्सल्य चित्रण की उत्कृष्टता पर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की टिप्पणी भी महत्वपूर्ण है, “बालकृष्ण की चेष्टाओं के चित्रण में कवि कमाल की होशियारी और सूक्षम निरीक्षण का परिचय देता है। उसे शब्दों की कमी है, अलंकार की, भावों की और भाषा की।मणिमय आंगन में घुटनों के बल चलते हुए कृष्ण का अपने प्रतिबिंब को पकड़ने का दृश्य अद्भुत है

किलकत कान्ह घुटुरूवनि आवत।

मनिमय कनक नंद कै आंगन, बिंब पकरिबै धावत।।

कबहुं निरखि हरि आप छांह कौ, कर सौं पकरन चाहत।

*   *   *   *   *

अंचरा तर ले ढाँकिकर के प्रभु कौं दूध पियावति।।

वस्तुतः सूरदास का वात्सल्य वर्णन केवल एक बालक के बाल्यावस्था का चित्रण भर नहीं है, बल्कि वह अपने समाज से जुड़कर अनेक नए एवं गहरे अर्थ का भी निर्माण करता है। सूरदास के वात्सल्य वर्णन के विश्लेषण के क्रम में डॉ. नगेंद्र उसकी सामाजिक उपादेयता को रेखांकित करते हुए लिखते हैं कि, “सूर के भाव-चित्रण में वात्सल्य-भाव को श्रेष्ठतम कहा जा सकता है। बाल-भाव और वात्सल्य से सने मातृहृदय के प्रेम-भावों के चित्रण में सूर अपना सानी नहीं रखते। बालक की विभिन्न चेष्टाओं और विनोदों के क्रीड़ास्थल, मातृहृदय की अभिलाषाओं, उत्कंठाओं और भावनाओं के वर्णन में सूरदास हिंदी के सर्वश्रेष्ठ कवि ठहरते हैं। वात्सल्य-भाव के पदों की विशेषता यह है कि उनको पढ़कर पाठक जीवन की नीरस और जटिल समस्याओं को भूलकर उसमें मग्न हो जाता है।

श्रृंगार रस

सूरसागर में सर्वाधिक विशद एवं गंभीर भाव दांपत्य रति का है। इसलिए हिंदी में सूरदास  श्रृंगार के महानतम् कवि माने गए। उनके काव्य में श्रृंगार का विस्तार तीन स्थितियों में देखा जा सकता है -(1) पूर्व राग की स्थिति में, (2) प्रेम-प्राप्ति के उपरांत संयोगवियोग के चित्रों में, और (3) कृष्ण के मथुरा प्रस्थान के पश्चात चिर-वियोग की स्थिति में।

सूरदास के काव्य में श्रृंगार के दोनों पक्षों (संयोग एवं वियोग) के साथ ही विभिन्न स्थितियों का अत्यंत विस्तृत तथा मार्मिक वर्णन मिलता है। सूरदास का काव्य एक क्षणिक घटना नहीं है। अनुभावों और संचारियों का इतना बाहुल्य और कहां मिलेगा? संयोग-सुख के जितने प्रकार के क्रीड़ा विधान हो सकते हैं, वे सब सूरदास ने लाकर इकट्ठे कर दिए हैं। कृष्ण खेलने के लिए निकलते हैं, अचानक उनकी भेंट राधा से हो जाती है -

खेलत हरि निकसे ब्रजखोरी।

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औचक ही देखी तहं राधा, नैन बिसाल भाल दिए रोरी।।

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सूर स्याम देखत ही रीझे, नैन-नैन मिली परी ठगोरी।।

आकस्मिक परिचय धीरे-धीरे घनिष्ठता में बदलने लगता है। साथ-साथ खेलना, एक दूसरे के घर आना-जाना तथा परस्पर कार्य में हाथ बंटाना आदि क्रिया-कलाप उनके प्रणय तंतु को और सुदृढ़ बनाते हैं। ग्राम्य-जीवन के मुक्त वातावरण में साहचर्य के अनेक अवसर मिलते हैं। खेल के बहाने, गोदोहन के अवसर पर, पनघट पर, युमना-जल में विहार करते समय राधा-कृष्ण की भेंट हो जाती है। अनेक लीलाओं के माध्यम से परिपुष्ण होता हुआ यह राग, मंजिष्ठा राग की स्थित में पहुंच जाता है और अंततोगत्वा वह स्वच्छंद रमण के साम्राज्य  में जा उतरता है। राधा बारबार कृष्ण के घर पहुंचती हैं, तो माता यशोदा उसे आने से मना करती हैं। राधा उनकी बात का उत्तर देती हुई कहती है कि मैं क्या करूं, यही तो मुझे घर से बुलाकर लाते हैं। इस पूरे चित्र में सूरदास की कलात्मक प्रस्तुति देखते ही बनती है

बार-बार तू जानि ह्यां आवै।

मैं कहा करौ, सुतहिं नहिं बरजति, घर तें मोहि बुलावै।।

मोंसो कहत तोहिं बिनु देखे, रहत मेरौ प्रान।

छोह लगति मोकौं सुनि बानी, महरि तिहारी आन।।

मुंह पावति तबही लौं आवति, और लावति मोहिं।

सूर समुझि जसुमति उर लाई, हंसति कहत हौ तोहि।।

गोदोहन के अवसर पर,         तुम पै कौन दुहावै गैया?

इत चितवत उत धार चलावत, यहै सिखयौ मैया?

इसी प्रकार,                 धेनु दुहत आतहीं रति बाढ़ी।

एक धार दोहनि पहुंचावत, एक धार जहं प्यारी ठाढ़ी।।

रति का उन्मेष सूरदास ने रूप के आकर्षण एवं गुण-श्रावण से माना है। सूरदास के संयोग श्रृंगार की चरम अभिव्यक्ति रासलीला में देखी जा सकती है। कृष्ण इस मण्डलाकार नृत्य में ब्रजभामिनियों के साथ उसी प्रकार शोभित हैं, जिस प्रकार दामिनी के साथ घन आकृति अपने नैसर्गिक सौंदर्य के साथ अनंत लीला में पूर्ण सहयोग देती है। गोपियां आनंद विभोर हो उठती हैं। मिलन का यह चित्र भौतिक और आध्यात्मिक, दोनों धरातलों पर स्थिर है।

 

संयोग के समान ही वियोग श्रृंगार का भी सूरदास ने व्यापक वर्णन किया है। कृष्ण जब ब्रज से मथुरा के लिए प्रस्थान करते हैं, तो उनका प्रेम चिर-वियोग में परिणत हो जाता है। इस विरह का प्रारंभ अक्रूर के सहसा आगमन से होता है। सर्वत्र उदासी छा जाती है। गोपियों को वियोगजन्य जणता घेर लेती है। कृषण के मथुरा गमन से संबंधित एक पद दर्शनीय है -

बिछुरत ब्रजराज आजु, इन नैननि की परतति गई।

अडि गए हरि संग तबहिं तैं, ह्वेन गए सखि स्याम मई।।

रूप रसिक लालची कहावत, सो करनी कछुवै भई।।

सांचे क्रूर कुटिल ये लोचन, वृथामीन छवि छीन लई।।

अब काहें जलमोचन, सोचत, सभौ गए तैं सूल नई।

सूरदास याही तैं जड़ भए, पलकनि हूं हठी दगा दई।।

डॉ. नगेंद्र का मनना है, “भक्ति के साथ श्रृंगार को जोड़कर उसके संयोग और वियोग पक्षों का जैसा मार्मिक वर्णन सूर ने किया है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। प्रवास जनित वियोग के संदर्भ में भ्रमरगीत-प्रसंग तो सूर की काव्य-कला का उत्कृष्ट निदर्शन है।

महाकवि सूरदास ने सूरसागर में बड़ी रूचि और तन्मयता के साथ काव्यशास्त्र में वर्णित विरह की अनेक दशाओं, अभिलाषा, चिंता, गुण-कथन, स्मृति, उद्वेग, प्रलाप, उन्माद, व्याधि, मूर्छा एवं मरण आदि का मार्मिक एवं ह्रदयग्राही निरूपण किया है -

स्मृति -                  एहि बिरियां बन तें ब्रज आवंते।

दूरहिं तें वह बेनु अधर धरि बारंबार बजवाते।।

चिंता -                     संदेसो देवकी सों कहियो।

हौं तो धाय तिहारे सुत की, कृपा करति ही रहियो।।

 

सूरदास के वियोग वर्णन पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मत है, “वियोग की जितनी अंतर्दाशाएं हो सकती हैं, जितने ढंगों से उन दशाओं का साहित्य में वर्णन हुआ है और सामान्यतः हो सकता है, वे सब उसके भीतर मौजूद हैं।

अन्य रसात्मक भाव

सूरदास मुख्यतया वात्सल्य तथा श्रृंगार के कवि हैं। परंतु उनकी रचनाओं में अन्य रसों एवं भावों से संबंधित वर्णन भी प्रचुर मात्रा में मिलते हैं

हास्य रस -           मैं जान्यौ यह मेरो घर है, तो धोखे में आयौ।

देखत हौं गोरस मैं चोटी, काढ़न कौ कर नायौ।।

वीर रस -                 आज जौं हरिहिं सस्त्र गहाऊं।

तौ लाजो गंगा जननी को, सांतनु-सुत कहाऊं।।

रौद्र रस - ब्रज पर इंद्र के कोप की अभिव्यक्ति में रौद्र रस की अभिव्यंजना हुई है -

जनमहिं देऊं गरिहि बहाई।

अदभुत रस - मिट्टी खाते हुए कृष्ण के मुख में ब्रह्मांड देखकर यशोदा के चकित होने

नन्दहिं कहत जसोदा रानी।

माटी कै मिस मुख दिखरायौ, तिहूं लोग रजधानी।।

शांत रस - विनय के पदों में शांत रस की प्रचुरता है -

थोरे जीवन भयौ तन भारौ।

कियौ ने संत समागम कबहुं लियो नाम तुम्हारौ।।

सूरदास की कविता में निहित रस भाव की गंभीरता और व्यापकता पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल की स्थापना है, “‘वात्सल्यऔरश्रृंगारके क्षेत्रों का जितना अधिक उद्घाटन सूर ने अपनी बंद आंखों से किया, उतना किसी और कवि ने नहीं। इन क्षेत्रों का कोना-कोना वे झांक आए। उक्त दोनों रसों के प्रवर्तक रतिभाव के भीतर की जितनी मानसिक वृत्तियों और दशाओं का अनुभव और प्रत्यक्षीकरण सूर कर सके, उतनी का और कोई नहीं। हिंदी-साहित्य में श्रृंगार का रसराजत्व यदि किसी ने पूर्ण रूप से दिखाया तो सूर ने।साथ ही वे यह भी लिखते हैं, “श्रृंगार एवं वात्सल्य के क्षेत्र में सूर की समता की ओर कोई कवि नहीं पहुंचा है। श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों पक्षों का इतना प्रचुर विस्तार और किसी कवि में नहीं मिलता। आगे होने वाले कवियों की श्रृंगार और वात्सल्य की उक्तियां सूर की जूठी सी जान पड़ती हैं।

दैन्यभाव

सूरदास मूलतः भक्त कवि थे। अतः उनकी कविता में भक्ति-भावना सूत्र के समान पिरोई हुई दृष्टिगत होती है। विनय के पदों में इस भाव को सर्वत्र देखा जा सकता है -

अब कै राखि लेहु भगवान।

सख्य भाव

सूरसागर में वर्णित कृष्ण की बाल-लीला, गोचारण लीला, सुदामा चरित्र आदि प्रसंग सख्य भाव से संबंधित हैं -

ऐसे मोहिं और कौन पहिचाने।

सुन सुंदरि दीनबंधु बिन कौन मिताई माने।।

सूरदास के काव्य में भाव एवं रस योजना अत्यंत व्यापक है। उन्होंने विविध मनोवैज्ञानिक चित्रों के साथ-साथ सुंदर भावों की सृष्टि करते हुए अपनी नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिभा द्वारा विविध रसों का ह्रदय-स्पर्शी वर्णन किया है। यद्यपि सूरदास ने सभी रसों का मर्मस्पर्शी वर्णन किया है, किंतु कोमल रसों की ओर वे विशेष आकृष्ट हुए। वात्सल्य और विप्रलंभ श्रृंगार के वर्णन में सूरदास सर्वोपरि रहे हैं। इसमें सूरदास की वृत्ति विशेष रूप से रमी है। इनकी योजना में सूरदास ने इतनी सूक्ष्मता, गहराई तथा मार्मिकता प्रदर्शित की है कि अन्य कवियों की उन तक पहुंच होने से उनका वर्णन सूरदास की तुलना में उच्छिष्टसा प्रतीत होता है। सूरदास ने अपनी वर्णन क्षमता द्वारा वात्सल्य भाव को रस की कोटि तक पहुंचाया। सूरदास के रस एवं भाव निरूपण की सबसे बड़ी विशेषता उक्ति वैचित्र्य एवं वाग्विग्धता की प्रचुरता रही है। तभी तो आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा, “सूर में जितनी सह्रदयता और भावुकता है, प्रायः उतनी ही चतुरता और वाग्विग्धता भी है।निस्संदेह सूरदास भावों के सम्राट, हृदयगत मनोभावों के परखी और विविध रसों के मर्मज्ञ कवि हैं।

 

 

 

 

 कलापक्ष

कलापक्ष काव्य का वाह्य अंग होता है, जिसके अंतर्गत प्रमुखतः काव्य-शैली, भाषा, अलंकार आदि का समावेश होता है। ये तीनों भावों के वाहक हैं, जिनके माध्यम से भावों को संप्रेषित किया जाता है। सूरदास की कविता के कलापक्ष को निम्नांकित रूप में देख सकते हैं -

काव्य-शैली

जीवन की कोमलतम अनुभूतियां गीत-शैली में उत्तम ढंग से व्यक्त हो सकती हैं। इसीलिए सूरदास ने गीत-शैली का आधार ग्रहण किया। कृष्ण का ब्रज रूप समस्त गीति-काव्य की सुंदरतम भावभूमि है। सूरसागर में एक ओर जहां कथा की क्षीण धारा प्रवाहित होती होती है, वहीं दूसरी ओर वर्णात्मक प्रसंग भी हैं। किंतु इनमें कवि का मन ज्यादा रमा नहीं है।

प्रत्येक समर्थ साहित्यकार की अपनी विशिष्ट शैली होती है, जिसमें उसका संपूर्ण व्यक्तित्व प्रतिबिंबित होता है। कुछ विद्वानों ने सूरसागर को प्रबंध-मुक्तक काव्य की संज्ञा से विभूषित किया है। डॉ. सत्येंद्र इसेकीर्तन काव्यकहते हैं जबकि डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा ने विविधता की दृष्टि से सूरसागर के पदों का वर्गीकरण निम्नांकित रूप में किया है – (1) श्रीमद्भागवत के कथा प्रसंग तथा कथापूर्ति हेतु वर्णात्मक अंश। (2) दृश्य और वर्णन विस्तार। (3) वर्णात्मक कथानक। (4) गीतात्मक कथानक। (5) सामान्य चरित संबंधी गेय पद। (6) विशिष्ट क्रीड़ा संबंधी गेय पद। (7) रूप चित्रण और मुरली-वादन संबंधी गेय पद। (8) प्रभाव-वर्णन संबंधी गेय पद। (9) भाव-चित्रण संबंधी गेय पद। (10) फुटकल गेय पद।

सूरदास के पदों में गीतिकाव्य के सभी प्रधान तत्व देखें जाते हैं। सूरदास के पदों की आत्मा संगीत है, जिसकी रचना अनुभूति की सघनता के क्षणों में हुई है। इनमें भाषाओं की वंश वर्तनी है एवं कवि के अंतर्वेग को छंद ने लय की एकरूपता में बांध दिया है। इनमें अभिप्रेत अर्थ भावों तक पहुंचाने का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये सब ही विशेषताएं गीतिकाव्य के अंतर्गत आती हैं। निर्विवादित रूप से सूरसागर गीति-शैली का एक अद्वितीय काव्य-ग्रंथ है।

दृष्टिकूटिशैली

सूरसागर में दृष्टिकूटिशैली भी देखने को मिलती है। सूरदास की काव्य-कला का एक नमूना वह है जिसमें शब्दक्रीड़ा का चमत्कार प्रस्तुत किया गया है। इसमें तो लोकगीतों की सहजता है और ही आंतरिक संगीतात्मकता। दृष्टिकूटि पद-रचना हिंदी में सूरदास की अपनी निजी कलात्मक विशेषता है। उनमें शब्द-क्रीड़ा एवं चमत्कार की सर्वत्र प्रमुखता है।

भाषा

भाषा के संबंध में प्रधान वस्तु उसकी अभिव्यक्ति क्षमता है। सूरदास की यह शक्ति किस सीमा तक है, उसे समझने के लिए उसके अंतः संगठन, भावानुरूपता, ध्वन्यात्मकता, चित्रमयता, सजीवता आदि पर विचार करना होगा।

सूरदास की भाषा ब्रज प्रदेश की प्रसिद्ध बोलीब्रजभाषाहै, जिसका संगठन व्यापक आधार पर हुआ है। सूरदास के शब्द-भंडार के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने अपने पूर्व एवं समकालीन भाषाओं के अनेक शब्दों को अपनाए हैं। सूरदास की भाषा में संस्कृति (तत्सम-तद्भव), पाली, पुरानी हिंदी (अपभ्रंश) के अतिरिक्त गुजराती, राजस्थानी एवं पंजाबी भाषा के साथ ही खड़ीबोली, अवधी, बुंदेलखंडी आदि बोलियों एवं विदेशी भाषा, अरबी, फारसी एवं तुर्की के अनेक प्रचलित शब्द मिलते हैं, जिनका कवि ने स्वतंत्र ढंग से प्रयोग किया है।

नाटकीयता

सूरदास की भाषा का एक प्रमुख अभिलक्षण उसकी नाटकीयता भी है। किसी अपरिचित से भेंट होने पर सूरदास की भाषा मानों आगे बढ़कर रोकने-टोकने लगती है -

कहां रहति? काकी तू बेटी? देखि नाहिं कबहुं ब्रजखोरी।

ऐसे प्रसंगो में सूरदास की भाषा में नाटकीयता का समावेश स्वतः हो गया है। रास के चित्रों में भाषा, माधुर्य और प्रसाद गुण पूर्ण हो गयी है। यद्यपि सूरदास की भाषा को पुरुष रूप से हीन समझना चाहिए, फिर भी दावानल प्रसंग में उसका पुरुष रूप प्रकट हो गया है -

बरत बन बांस थरहरत कुस कांस।

जरि उड़त बहु जांस अति प्रबल धायो।।

 

ध्वन्यात्मकता

सूरदास की भाषा की एक प्रमुख विशेषता है कि वह ध्वनि के माध्यम से रूप, गति, स्थित आदि को व्यक्त करने में पूर्ण सक्षम दिखाई पड़ती है -

मानो माई घन-घन अंतर दामिनि।

घन दामिनि दामिनि घन अंतर सोभित हरि ब्रज भामिनि।।

उपर्युक्त पंक्तियों से मुखरित ध्वनि और लय रास-नृत्य का स्वरूप खड़ा कर देती है। सूरदास की भाषा की बड़ी विशेषता बताते हुए डॉ. धीरेंद्र वर्मा लिखते हैं, “सूरदास में जितनी क्षमता भावों को व्यक्त करने में थी, उतनी ही रूप चित्रण में भी।डॉ. नगेंद्र भी कहते हैं, “ब्रजभाषा के अग्रदूत सूरदास ने इस भाषा को जो गौरव-गरिमा प्रदान की, उसके परिणाम स्वरूप ब्रजभाषा अपने युग में काव्य-भाषा के राजसिंहासन पर आसीन हो सकी। सूर की ब्रजभाषा में चित्रात्मकता, अलंकारिकता, भावात्मकता, सजीवता, प्रतीकात्मकता, बिंबात्मकता पूर्ण रूप से विद्यमान है। ब्रजभाषा को ग्रामीण जनपद से हटाकर उन्होंने नगर और ग्राम के संधिस्थल पर ला बिठाया था। भाषा में प्रवाह बनाए रखने के लिए लय और संगीत पर कवि का सतत ध्यान रहा है। राग-रागनियों के स्वर-ताल में बंधी हुई शब्दावली जैसी सरस भाव-व्यंजना करती है, वैसी सामान्य पदावली नहीं कर सकती। वर्ण-मैत्री और संगीतात्मकता सूर की ब्रजभाषा के अलंकरण हैं।

 

 

अलंकार-योजना

सूरदास के अलंकार भावों के उत्कर्ष में सहायक हैं। उनके काव्य में शब्द और अर्थ संबंधी अलंकार शोभादायक होकर आये हैं, भार बनकर नहीं। उन्होंने अलंकारो का प्रयोग प्रायः सौंदर्य वृद्धि के लिए किया है। शब्दालंकारो में सूरदास ने यमक, श्लेष, अनुप्रास, विप्सा आदि का प्रयोग किया है। यमक और श्लेष दृष्टिकूट पदों में प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। अनुप्रास का प्रयोग सूरदास के काव्य में अत्यंत स्वाभाविक ढंग से हुआ है। कुछ उदहारण इस प्रकार हैं -

यमक अलंकार

यमक का सर्वाधिक प्रयोग दृष्टिकूट शैली के पदों में हुआ है, जिसका प्रसिद्ध उदाहरण है -

सारंग-सारंग धरहिं मिलावहु।

सारंग विनय करत सारंग सो, सारंग दुःख बिसरावहु।।

(सारंग - सखी, वंशी, आकाश, विष्णु एवं कामदेव)

श्लेष अलंकार

यमक की भांति श्लेष अलंकार का प्रयोग भी सूरदास ने मात्र चमत्कार प्रदर्शन के लिए नहीं किया है। उनके द्वारा नियोजित श्लेष अलंकार प्रायः अर्थगौरव के अनिवार्य अंग हैं। निम्नांकित पद में गुण का दुरूह प्रयोग द्रष्टव्य है -

उधौ हरिगुन हम चकोर।

गुण सौं ज्यौं भावै, त्यों पेरों यहै बात कौ और।।

 

वक्रोक्ति अलंकार

सूरदास के काव्य में भाव-प्रेरित कथन की वक्रता अधिकांश स्थलों से प्राप्त होती है। उन्होंने सीधे कथन को छोड़कर वक्रता का ही आधार लिया है। विनय के पद, माखन चोरी, राधा-कृष्ण का प्रथम मिलन, मुरली प्रसंग, पनघट लीला, दानी लीला आदि के संपूर्ण प्रसंग उक्ति वैचित्र्य के उदाहरण हैं। वक्रोक्ति चमत्कार की पराकाष्ठ भ्रमरगीत प्रसंग में देखने को मिलती है। उदाहरण के लिए निम्नांकित पंक्तियों को देखा जा सकता है -

आये जोग सिखावन पाड़े।

परमार्थी पुराननि लादे ज्यौं बनजोर टांड़े।।

 

अर्थालंकारो में सूरदास ने सादृश्यमूलक अलंकारों का विशेष प्रयोग किया है, जिनमें उत्प्रेक्षा, रूपक एवं उपमा उन्हें विशेष प्रिय है। उत्प्रेक्षा और रूपक का तो उन्हें सम्राट कहा जाता है -

उत्प्रेक्षा अलंकार

नयी-नयी उत्प्रेक्षाओं को प्रस्तुत करने में सूरदास की सानी नहीं -

नंद-नंदनमुख देखौ माई।

अंग-अंग छवि मनहुं उए रवि ससि अरु समर लजाई।।

 

रूपक अलंकार

रूपकों की योजना में सूरदास ने अपनी पटुता का परिचय दिया है। सूरदास के रूपकों की एक विशेषता है कि वे अधिक दूर तक सांगरूप में नहीं चल पाते क्योंकि जान-बूझकर मन में पूरी योजना करके उन्होंने रूपकों की चर्चा नहीं की है। पद के प्रवाह में जहां स्वत: आवश्यकता हुई है, रूपक गए हैं। गोपियों की विरहानुभूति को साकार रूप देने में रूपकों का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। भ्रमरगीत का तो समस्त आयोजन ही रूपक पर आधारित है -

देखियत कालिंदी अति कारी।

उपमा अलंकार

सूरदास ने उपमाओं की योजना द्वारा मानवसौंदर्य की वृद्धि में सफलता प्राप्त की है। उपमाओं की ताजगी और प्रभावोत्पादकता के लिए सूरदास प्रसिद्ध हैं -

पिया बिन नागिन कारी रात।

कबहुंक जामिनि होत जुन्हैया डसि उलटी ह्वै जात।।

इनके अतिरिक्त अप्रस्तुत व्यापार योजना में जितनी सफलता सूरदास को मिली है, उतनी हिंदी के किसी अन्य कवि को नहीं। पूरी एक परिस्थिति के लिए वैसे ही दूसरी परिस्थिति पैदा करने में बड़ी ही चतुरता का परिचय सूरदास ने दिया है -

हमको सपने हूं में सोच।

जा दिन तें बिछुरे नंद-नंदन ता दिन तें यह पोच।।

मनौ गोपाल आये मेरे घर हँस करि भुजा गही।

कहा कहौं बैरिन भइ निदियां निमिष और रही।।

ज्यों चकई प्रतिबिंब देखि के आनंदी पिय जानि।

सूर पवन मिल निठुर विधाता चपल कियो जल आनि।।

इसके अतिरिक्त सूरदास ने अपने काव्य में संभावना, प्रतीप, व्यतिरेक, अतिश्योक्ति, उल्लेख आदि अलंकारों का भी खूब प्रयोग किया है। सूरदास की इस वृहद अलंकार-योजना की प्रशंसा में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी लिखते हैं, “सूरदास जब अपने प्रिय विषय का वर्णन शुरू करते हैं तो मानों अलंकारशास्त्र हाथ जोड़कर उनके पीछे-पीछे दौड़ा करता है। उपमाओं की बाढ़ जाती है, रूपकों की वर्षा होने लगती है। संगीत के प्रवाह में कवि स्वयं बह जाता है। वह अपने को भूल जाता है। काव्य में इस तन्मयता के साथ शास्त्रीय पद्धति का निर्वाह विरल है। पद-पद पर मिलाने वाले अलंकारों को देखकर भी कोई अनुमान नहीं कर सकता, कि कवि जान-बूझकर अलंकारों का उपयोग कर रहा है। पन्ने-पर-पन्ने पढ़ते जाइए : केवल उपमाओं और रूपकों की घटा, अन्योक्तियों का ठाठ, लक्षण और व्यंजना का चमत्कारयहां तक कि एक ही चीज दो-दो, चार-चार, दस-दस बार तक दुहराई जा रही है, फिर भी स्वाभाविक और सहज प्रवाह कहीं भी आहत नहीं हुआ।

छंद-विधान

सूरदास ने केवल गीतों में पदरचना नहीं की, अपितु अनेक वर्ण एवं यात्रा वृत्तों का भी प्रयोग किया है। सूरदास के पूर्व तक हिंदी काव्य में चार छंद पद्धतियां मिलती हैं - दोहा पद्धति, वीरगाथा कालीन छप्पय पद्धति, चारणों की कवित्त-सवैया पद्धति एवं अपभ्रंश कवियों की कड़क (चौपाई-दोहा) पद्धति। सूरदास के यहां इन सभी छंदपद्धतियों के प्रयोग मिलते हैं।

मुख्य छंद

चौपाई, चौबेला, दोहा, रोला, पादाकुलक आदि।

गौण छंद

चंद्र, चंद्रायण, भानु कुंडल, सुखदा, राधिका, उपमान, हरि, तोमर, शोभन, रूपमाला, गीतिका, विष्णुपद, सरसी, हरिपद, सार, लावनी, वीर, समान, सवैया, हरिप्रिया मनहरण आदि।

काव्य दोष

काव्य दोष पांच प्रकार के माने गये हैं - पदगत, पदांशगत, वाक्यगत, अर्थगत और रसगत। दोषों को रस का अपकर्ष माना गया है। सूरदास में ग्राम्यत्व, अप्रतीत्व, क्लिष्टत्व, च्युत, संरकारत्व, अश्लीलत्व, पुनरुक्ति आदि पदगत और वाक्यगति दोष मिलते हैं। इनमें सबसे बड़ा दोष पुनरुक्ति का है। वस्तुतः काव्यगत गुण-दोषों को दृष्टि में रखकर सूरदास ने पद रचना नहीं की थी। उन्हें अपने हृदय की भावना गाकर व्यक्त करनी थी। ऐसी स्थिति में सहस्त्रों पदों की विस्तृत रचना में कुछ दोषों के पाए जाने पर भी सूरदास का गौरव कम करके नहीं आंकना चाहिए।

प्रस्तुत विवेचन-विश्लेषण के आधार पर निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि सूरदास के काव्य में भावपक्ष एवं कलापक्ष का अद्भुत सामंजस्य है। ब्रजभाषा के भावमयी प्रयोग द्वारा सूरदास सरस काव्य की सृष्टि करते हैं, जिनमें अनेक भावों एवं रसों का वर्णन मिलता है। मूलतः भक्त कवि होने के कारण उनकी कविता में प्रमुख रूप से प्रयुक्त वात्सल्य एवं श्रृंगार भाव भक्ति-रस के अंग बनकर उभरे हैं, जिससे उनका समस्त काव्य संसार भक्ति-रस का भंडार बन पड़ा है, जिसमें सख्य, दांपत्य, वात्सल्य आदि भावों द्वारा अनन्य प्रेममयी भक्ति का प्रतिपादन हुआ है और विविध सुरों एवं तालों द्वारा विलक्षण संगीत की भी सृष्टि हुई है। सूरदास के समस्त पद विभिन्न अलंकारों, गुणों, छंदों, शब्द-भंडारों से सुसज्जित होकर उन्नत एवं उच्च कोटि की रचना बन पड़े हैं। सूरदास की उत्कट काव्य-प्रतिभा के कारण ही उनकी कविता में मर्मस्पर्शी तीव्रता, जीवनदायिनी संजीवनी-शक्ति, हृदयाकर्षक संगीतात्मकता, अंतःकरण को प्रभावित करने वाली उत्कृष्ट काव्य-कला तथा विलक्षण उद्भावना-शक्ति के दर्शन होते हैं। कुल मिलाकर सूरदास की काव्यात्मा की अभिव्यक्ति में उसके बहिरंग विधान सहायक बनकर उभरे हैं।

सूरदास (अंग्रेज़ी:Surdas) हिन्दी साहित्य में भक्तिकाल में कृष्ण भक्ति के भक्त कवियों में अग्रणी है। महाकवि सूरदास जी वात्सल्य रस के सम्राट माने जाते हैं। उन्होंने शृंगार और शान्त रसों का भी बड़ा मर्मस्पर्शी वर्णन किया है। उनका जन्म मथुरा-आगरा मार्ग पर स्थित रुनकता नामक गांव में हुआ था। कुछ लोगों का कहना है कि सूरदास जी का जन्म सीही नामक ग्राम में एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बाद में वह आगरा और मथुरा के बीच गऊघाट पर आकर रहने लगे थे। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी के मतानुसार सूरदास का जन्म संवत् 1540 विक्रमी के सन्निकट और मृत्यु संवत् 1620 विक्रमी के आसपास मानी जाती है।[1]सूरदास जी के पिता रामदास गायक थे। सूरदास जी के जन्मांध होने के विषय में भी मतभेद हैं। आगरा के समीप गऊघाट पर उनकी भेंट वल्लभाचार्य से हुई और वे उनके शिष्य बन गए। वल्लभाचार्य ने उनको पुष्टिमार्ग में दीक्षा दे कर कृष्णलीला के पद गाने का आदेश दिया। सूरदास जी अष्टछाप कवियों में एक थे। सूरदास जी की मृत्यु गोवर्धन के पास पारसौली ग्राम में 1563 ईस्वी में हुई।

ऐतिहासिक उल्लेख

  मुख्य लेख : सूरदास का ऐतिहासिक उल्लेख

सूरदास के बारे में 'भक्तमाल' और 'चौरासी वैष्णवन की वार्ता' में थोड़ी-बहुत जानकारी मिल जाती है। 'आईना--अकबरी' और 'मुंशियात अब्बुल फ़ज़ल' में भी किसी संत सूरदास का उल्लेख है, किन्तु वे काशी (वर्तमान बनारस) के कोई और सूरदास प्रतीत होते हैं। जनुश्रुति यह अवश्य है कि अकबर बादशाह सूरदास का यश सुनकर उनसे मिलने आए थे। 'भक्तमाल' में सूरदास की भक्ति, कविता एवं गुणों की प्रशंसा है तथा उनकी अंधता का उल्लेख है। 'चौरासी वैष्णवन की वार्ता' के अनुसार सूरदास आगरा और मथुरा के बीच साधु के रूप में रहते थे। वे वल्लभाचार्य के दर्शन को गए और उनसे लीला गान का उपदेश पाकर कृष्ण के चरित विषयक पदों की रचना करने लगे। कालांतर में श्रीनाथ जी के मंदिर का निर्माण होने पर महाप्रभु वल्लभाचार्य ने उन्हें यहाँ कीर्तन का कार्य सौंपा।

जन्म

  मुख्य लेख : सूरदास का जन्म

सूरदास का जन्म कब हुआ, इस विषय में पहले उनकी तथाकथित रचनाओं, 'साहित्य लहरी' और 'सूरसारावली' के आधार पर अनुमान लगाया गया था और अनेक वर्षों तक यह दोहराया जाता रहा कि उनका जन्म संवत 1540 विक्रमी (सन 1483 .) में हुआ था, परन्तु विद्वानों ने इस अनुमान के आधार को पूर्ण रूप में अप्रमाणिक सिद्ध कर दिया तथा पुष्टिमार्ग में प्रचलित इस अनुश्रुति के आधार पर कि सूरदास श्री मद्वल्लभाचार्य से 10 दिन छोटे थे, यह निश्चित किया कि सूरदास का जन्म वैशाख शुक्ल पक्ष पंचमी, संवत 1535 वि. (सन 1478 .) को हुआ था। इस साम्प्रदायिक जनुश्रुति को प्रकाश में लाने तथा उसे अन्य प्रमाणों में पुष्ट करने का श्रेय डॉ. दीनदयाल गुप्त को है। जब तक इस विषय में कोई अन्यथा प्रमाण मिले, हम सूरदास की जन्म-तिथि को यही मान सकते हैं।

जाति

  मुख्य लेख : सूरदास की जाति

सूरदास की जाति के सम्बन्ध में भी बहुत वाद-विवाद हुआ है। 'साहित्य लहरी' के उपर्युक्त पद के अनुसार कुछ समय तक सूरदास को 'भट्ट' या 'ब्रह्मभट्ट' माना जाता रहा। भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र ने इस विषय में प्रसन्नता प्रकट की थी कि सूरदास महाकवि चन्दबरदाई के वंशज थे; किन्तु बाद में अधिकतर पुष्टिमार्गीय स्रोतों के आधार पर यह प्रसिद्ध हुआ कि वे सारस्वत ब्राह्मण थे। बहुत कुछ इसी आधार पर 'साहित्य लहरी' का वंशावली वाला पद अप्रामाणिक माना गया। 'चौरासी वैष्णवन की वार्ता' में मूलत: सूरदास की जाति के विषय में कोई उल्लेख नहीं था, परन्तु गोसाई हरिराय द्वारा बढ़ाये गये 'वार्ता' के अंश में उन्हें सारस्वत ब्राह्मण कहा गया है। उनके सारस्वत ब्राह्मण होने के प्रमाण पुष्टिमार्ग के अन्य वार्ता साहित्य से भी दिये गये है।

काल-निर्णय

  मुख्य लेख : सूरदास का काल-निर्णय

सूरदास के पिता रामदास गायक थे। सूरदास के जन्मांध होने के विषय में भी मतभेद हैं। आगरा के समीप गऊघाट पर उनकी भेंट वल्लभाचार्य से हुई और वे उनके शिष्य बन गए। वल्लभाचार्य ने उनको पुष्टिमार्ग में दीक्षा देकर कृष्णलीला के पद गाने का आदेश दिया। सूरदास 'अष्टछाप' के कवियों में से एक थे। सूरदास की मृत्यु गोवर्धन के पास पारसौली ग्राम में 1563 ईस्वी में हुई। उनकी जन्म-तिथि तथा उनके जीवन की कुछ अन्य मुख्य घटनाओं के काल-निर्णय का भी प्रयत्न किया गया है। इस आधार पर कि गऊघाट पर भेंट होने के समय वल्लभाचार्य गद्दी पर विराजमान थे, यह अनुमान किया गया है कि उनका विवाह हो चुका था, क्योंकि ब्रह्मचारी का गद्दी पर बैठना वर्जित है। वल्लभाचार्य का विवाह संवत 1560-61 (सन 1503-1504 .) में हुआ था, अत: यह घटना इसके बाद की है। 'वल्लभ दिग्विजय' के अनुसार यह घटना संवत 1567 विक्रमी के (सन 1510 .) आसपास की है। इस प्रकार सूरदास 30-32 वर्ष की अवस्था में पुष्टिमार्ग में दीक्षित हुए होंगे।

कठुला कंठ वज्र केहरि नख राजत रुचिर हिए।

धन्य सूर एकौ पल इहिं सुख का सत कल्प जिए॥

अर्थ: राग बिलावल पर आधारित इस पद में श्रीकृष्ण की बाल लीला का अद्भुत वर्णन किया है भक्त शिरोमणि सूरदास जी ने। श्रीकृष्ण अभी बहुत छोटे हैं और यशोदा के आंगन में घुटनों के बल ही चल पाते हैं। एक दिन उन्होंने ताजा निकला माखन एक हाथ में लिया और लीला करने लगे। सूरदास कहते हैं कि श्रीकृष्ण के छोटे-से एक हाथ में ताजा माखन शोभायमान है और वह उस माखन को लेकर घुटनों के बल चल रहे हैं। उनके शरीर पर रेनु (मिट्टी का रज) लगी है। मुख पर दही लिपटा है, उनके कपोल (गाल) सुंदर तथा नेत्र चपल हैं। ललाट पर गोरोचन का तिलक लगा है। बालकृष्ण के बाल घुंघराले हैं। जब वह घुटनों के बल माखन लिए हुए चलते हैं तब घुंघराले बालों की लटें उनके कपोल पर झूमने लगती है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है मानो भ्रमर मधुर रस का पान कर मतवाले हो गए हैं। उनके इस सौंदर्य की अभिवृद्धि उनके गले में पड़े कठुले (कंठहार) सिंह नख से और बढ़ जाती है। सूरदास कहते हैं कि श्रीकृष्ण के इस बालरूप का दर्शन यदि एक पल के लिए भी हो जाता तो जीवन सार्थक हो जाए। अन्यथा सौ कल्पों तक भी यदि जीवन हो तो निरर्थक ही है।

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कबहुं बढ़ैगी चोटी

मैया कबहुं बढ़ैगी चोटी।

किती बेर मोहि दूध पियत भइ यह अजहूं है छोटी॥

तू जो कहति बल की बेनी ज्यों ह्वै है लांबी मोटी।

काढ़त गुहत न्हवावत जैहै नागिन-सी भुई लोटी॥

काचो दूध पियावति पचि पचि देति माखन रोटी।

सूरदास त्रिभुवन मनमोहन हरि हलधर की जोटी॥

अर्थ: रामकली राग में बद्ध यह पद बहुत सरस है। बाल स्वभाववश प्राय: श्रीकृष्ण दूध पीने में आनाकानी किया करते थे। तब एक दिन माता यशोदा ने प्रलोभन दिया कि कान्हा! तू नित्य कच्चा दूध पिया कर, इससे तेरी चोटी दाऊ (बलराम) जैसी मोटी लंबी हो जाएगी। मैया के कहने पर कान्हा दूध पीने लगे। अधिक समय बीतने पर एक दिन कन्हैया बोले.. अरी मैया! मेरी यह चोटी कब बढ़ेगी? दूध पीते हुए मुझे कितना समय हो गया। लेकिन अब तक भी यह वैसी ही छोटी है। तू तो कहती थी कि दूध पीने से मेरी यह चोटी दाऊ की चोटी जैसी लंबी मोटी हो जाएगी। संभवत: इसीलिए तू मुझे नित्य नहलाकर बालों को कंघी से संवारती है, चोटी गूंथती है, जिससे चोटी बढ़कर नागिन जैसी लंबी हो जाए। कच्चा दूध भी इसीलिए पिलाती है। इस चोटी के ही कारण तू मुझे माखन रोटी भी नहीं देती। इतना कहकर श्रीकृष्ण रूठ जाते हैं। सूरदास कहते हैं कि तीनों लोकों में श्रीकृष्ण-बलराम की जोड़ी मन को सुख पहुंचाने वाली है।

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दाऊ बहुत खिझायो

मैया मोहिं दाऊ बहुत खिझायो।

मो सों कहत मोल को लीन्हों तू जसुमति कब जायो॥

कहा करौं इहि रिस के मारें खेलन हौं नहिं जात।

पुनि पुनि कहत कौन है माता को है तेरो तात॥

गोरे नंद जसोदा गोरी तू कत स्यामल गात।

चुटकी दै दै ग्वाल नचावत हंसत सबै मुसुकात॥

तू मोहीं को मारन सीखी दाउहिं कबहुं खीझै।

मोहन मुख रिस की ये बातैं जसुमति सुनि सुनि रीझै॥

सुनहु कान बलभद्र चबाई जनमत ही को धूत।

सूर स्याम मोहिं गोधन की सौं हौं माता तू पूत॥

अर्थ: सूरदास जी की यह रचना राग गौरी पर आधारित है। यह पद भगवान् श्रीकृष्ण की बाल लीला से संबंधित पहलू का सजीव चित्रण है। बलराम श्रीकृष्ण के बड़े भाई थे। गौरवर्ण बलराम श्रीकृष्ण के श्याम रंग पर यदा-कदा उन्हें चिढ़ाया करते थे। एक दिन कन्हैया ने मैया से बलराम की शिकायत की। वह कहने लगे कि मैया री, दाऊ मुझे ग्वाल-बालों के सामने बहुत चिढ़ाता है। वह मुझसे कहता है कि यशोदा मैया ने तुझे मोल लिया है। क्या करूं मैया! इसी कारण मैं खेलने भी नहीं जाता। वह मुझसे बार-बार कहता है कि तेरी माता कौन है और तेरे पिता कौन हैं? क्योंकि नंदबाबा तो गोरे हैं और मैया यशोदा भी गौरवर्णा हैं। लेकिन तू सांवले रंग का कैसे है? यदि तू उनका पुत्र होता तो तुझे भी गोरा होना चाहिए। जब दाऊ ऐसा कहता है तो ग्वाल-बाल चुटकी बजाकर मेरा उपहास करते हैं, मुझे नचाते हैं और मुस्कराते हैं। इस पर भी तू मुझे ही मारने को दौड़ती है। दाऊ को कभी कुछ नहीं कहती। श्रीकृष्ण की रोष भरी बातें सुनकर मैया यशोदा रीझने लगी हैं। फिर कन्हैया को समझाकर कहती हैं कि कन्हैया! वह बलराम तो बचपन से ही चुगलखोर और धूर्त है। सूरदास कहते हैं कि जब श्रीकृष्ण मैया की बातें सुनकर भी नहीं माने तब यशोदा बोलीं कि कन्हैया मैं गउओं की सौगंध खाकर कहती हूँ कि तू मेरा ही पुत्र है और मैं तेरी मैया हूँ।

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मैं नहिं माखन खायो

मैया! मैं नहिं माखन खायो।

ख्याल परै ये सखा सबै मिलि मेरैं मुख लपटायो॥

देखि तुही छींके पर भाजन ऊंचे धरि लटकायो।

हौं जु कहत नान्हें कर अपने मैं कैसें करि पायो॥

मुख दधि पोंछि बुद्धि इक कीन्हीं दोना पीठि दुरायो।

डारि सांटि मुसुकाइ जशोदा स्यामहिं कंठ लगायो॥

बाल बिनोद मोद मन मोह्यो भक्ति प्राप दिखायो।

सूरदास जसुमति को यह सुख सिव बिरंचि नहिं पायो॥

अर्थ: राग रामकली में बद्ध यह सूरदास का अत्यंत प्रचलित पद है। श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं में माखन चोरी की लीला सुप्रसिद्ध है। वैसे तो कन्हैया ग्वालिनों के घरों में जा-जाकर माखन चुराकर खाया करते थे। लेकिन आज उन्होंने अपने ही घर में माखन चोरी की और यशोदा ने उन्हें देख भी लिया। इस पद में सूरदास ने श्रीकृष्ण के वाक्चातुर्य का जिस प्रकार वर्णन किया है वैसा अन्यत्र नहीं मिलता।

जब यशोदा ने देख लिया कि कान्हा ने माखन खाया है तो पूछ ही लिया कि क्यों रे कान्हा! तूने माखन खाया है क्या? तब श्रीकृष्ण अपना पक्ष किस तरह मैया के समक्ष प्रस्तुत करते हैं, यही इस पद की विशिष्टता है। कन्हैया बोले.. मैया! मैंने माखन नहीं खाया है। मुझे तो ऐसा लगता है कि इन ग्वाल-बालों ने ही बलात् मेरे मुख पर माखन लगा दिया है। फिर बोले कि मैया तू ही सोच, तूने यह छींका किना ऊंचा लटका रखा है और मेरे हाथ कितने छोटे-छोटे हैं। इन छोटे हाथों से मैं कैसे छींके को उतार सकता हूँ। कन्हैया ने मुख से लिपटा माखन पोंछा और एक दोना जिसमें माखन बचा रह गया था उसे पीछे छिपा लिया। कन्हैया की इस चतुराई को देखकर यशोदा मन ही मन मुस्कराने लगीं और छड़ी फेंककर कन्हैया को गले से लगा लिया। सूरदास कहते हैं कि यशोदा को जिस सुख की प्राप्ति हुई वह सुख शिव ब्रह्मा को भी दुर्लभ है। श्रीकृष्ण (भगवान् विष्णु) ने बाल लीलाओं के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि भक्ति का प्रभाव कितना महत्त्‍‌वपूर्ण है।

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हरष आनंद बढ़ावत

हरि अपनैं आंगन कछु गावत।

तनक तनक चरनन सों नाच मन हीं मनहिं रिझावत॥

बांह उठाइ कारी धौरी गैयनि टेरि बुलावत।

कबहुंक बाबा नंद पुकारत कबहुंक घर में आवत॥

माखन तनक आपनैं कर लै तनक बदन में नावत।

कबहुं चितै प्रतिबिंब खंभ मैं लोनी लिए खवावत॥

दुरि देखति जसुमति यह लीला हरष आनंद बढ़ावत।

सूर स्याम के बाल चरित नित नितही देखत भावत॥

अर्थ: राग रामकली में आबद्ध इस पद में सूरदास ने कृष्ण की बालसुलभ चेष्टा का वर्णन किया है। श्रीकृष्ण अपने ही घर के आंगन में जो मन में आता है गाते हैं। वह छोटे-छोटे पैरों से थिरकते हैं तथा मन ही मन स्वयं को रिझाते भी हैं। कभी वह भुजाओं को उठाकर काली-श्वेत गायों को बुलाते हैं, तो कभी नंदबाबा को पुकारते हैं और कभी घर में जाते हैं। अपने हाथों में थोड़ा-सा माखन लेकर कभी अपने ही शरीर पर लगाने लगते हैं, तो कभी खंभे में अपना ही प्रतिबिंब देखकर उसे माखन खिलाने लगते हैं। श्रीकृष्ण की इन सभी लीलाओं को माता यशोदा छुप-छुपकर देखती हैं और मन ही मन प्रसन्न होती हैं। सूरदास कहते हैं कि इस प्रकार यशोदा श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं को देखकर नित्य ही हर्षाती हैं।

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भई सहज मत भोरी

जो तुम सुनहु जसोदा गोरी।

नंदनंदन मेरे मंदिर में आजु करन गए चोरी॥

हौं भइ जाइ अचानक ठाढ़ी कह्यो भवन में कोरी।

रहे छपाइ सकुचि रंचक ह्वै भई सहज मति भोरी॥

मोहि भयो माखन पछितावो रीती देखि कमोरी।

जब गहि बांह कुलाहल कीनी तब गहि चरन निहोरी॥

लागे लेन नैन जल भरि भरि तब मैं कानि तोरी।

सूरदास प्रभु देत दिनहिं दिन ऐसियै लरिक सलोरी॥

अर्थ: सूरदास जी का यह पद राग गौरी पर आधारित है। भगवान् की बाल लीला का रोचक वर्णन है। एक ग्वालिन यशोदा के पास कन्हैया की शिकायत लेकर आई। वह बोली कि हे नंदभामिनी यशोदा! सुनो तो, नंदनंदन कन्हैया आज मेरे घर में चोरी करने गए। पीछे से मैं भी अपने भवन के निकट ही छुपकर खड़ी हो गई। मैंने अपने शरीर को सिकोड़ लिया और भोलेपन से उन्हें देखती रही। जब मैंने देखा कि माखन भरी वह मटकी बिल्कुल ही खाली हो गई है तो मुझे बहुत पछतावा हुआ। जब मैंने आगे बढ़कर कन्हैया की बांह पकड़ ली और शोर मचाने लगी, तब कन्हैया मेरे चरणों को पकड़कर मेरी मनुहार करने लगे। इतना ही नहीं उनके नयनों में अश्रु भी भर आए। ऐसे में मुझे दया गई और मैंने उन्हें छोड़ दिया। सूरदास कहते हैं कि इस प्रकार नित्य ही विभिन्न लीलाएं कर कन्हैया ने ग्वालिनों को सुख पहुँचाया।

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अरु हलधर सों भैया

कहन लागे मोहन मैया मैया।

नंद महर सों बाबा बाबा अरु हलधर सों भैया॥

ऊंच चढि़ चढि़ कहति जशोदा लै लै नाम कन्हैया।

दूरि खेलन जनि जाहु लाला रे! मारैगी काहू की गैया॥

गोपी ग्वाल करत कौतूहल घर घर बजति बधैया।

सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस कों चरननि की बलि जैया॥

अर्थ: सूरदास जी का यह पद राग देव गंधार में आबद्ध है। भगवान् बालकृष्ण मैया, बाबा और भैया कहने लगे हैं। सूरदास कहते हैं कि अब श्रीकृष्ण मुख से यशोदा को मैया-मैया नंदबाबा को बाबा-बाबा बलराम को भैया कहकर पुकारने लगे हैं। इना ही नहीं अब वह नटखट भी हो गए हैं, तभी तो यशोदा ऊंची होकर अर्थात् कन्हैया जब दूर चले जाते हैं तब उचक-उचककर कन्हैया को नाम लेकर पुकारती हैं और कहती हैं कि लल्ला गाय तुझे मारेगी। सूरदास कहते हैं कि गोपियों ग्वालों को श्रीकृष्ण की लीलाएं देखकर अचरज होता है। श्रीकृष्ण अभी छोटे ही हैं और लीलाएं भी उनकी अनोखी हैं। इन लीलाओं को देखकर ही सब लोग बधाइयां दे रहे हैं। सूरदास कहते हैं कि हे प्रभु! आपके इस रूप के चरणों की मैं बलिहारी जाता हूँ।

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कबहुं बोलत तात

खीझत जात माखन खात।

अरुन लोचन भौंह टेढ़ी बार बार जंभात॥

कबहुं रुनझुन चलत घुटुरुनि धूरि धूसर गात।

कबहुं झुकि कै अलक खैंच नैन जल भरि जात॥

कबहुं तोतर बोल बोलत कबहुं बोलत तात।

सूर हरि की निरखि सोभा निमिष तजत मात॥

अर्थ: यह पद राग रामकली में बद्ध है। एक बार श्रीकृष्ण माखन खाते-खाते रूठ गए और रूठे भी ऐसे कि रोते-रोते नेत्र लाल हो गए। भौंहें वक्र हो गई और बार-बार जंभाई लेने लगे। कभी वह घुटनों के बल चलते थे जिससे उनके पैरों में पड़ी पैंजनिया में से रुनझुन स्वर निकलते थे। घुटनों के बल चलकर ही उन्होंने सारे शरीर को धूल-धूसरित कर लिया। कभी श्रीकृष्ण अपने ही बालों को खींचते और नैनों में आंसू भर लाते। कभी तोतली बोली बोलते तो कभी तात ही बोलते। सूरदास कहते हैं कि श्रीकृष्ण की ऐसी शोभा को देखकर यशोदा उन्हें एक पल भी छोड़ने को हुई अर्थात् श्रीकृष्ण की इन छोटी-छोटी लीलाओं में उन्हें अद्भुत रस आने लगा।

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चोरि माखन खात

चली ब्रज घर घरनि यह बात।

नंद सुत संग सखा लीन्हें चोरि माखन खात॥

कोउ कहति मेरे भवन भीतर अबहिं पैठे धाइ।

कोउ कहति मोहिं देखि द्वारें उतहिं गए पराइ॥

कोउ कहति किहि भांति हरि कों देखौं अपने धाम।

हेरि माखन देउं आछो खाइ जितनो स्याम॥

कोउ कहति मैं देखि पाऊं भरि धरौं अंकवारि।

कोउ कहति मैं बांधि राखों को सकैं निरवारि॥

सूर प्रभु के मिलन कारन करति बुद्धि विचार।

जोरि कर बिधि को मनावतिं पुरुष नंदकुमार॥

अर्थ: भगवान् श्रीकृष्ण की बाललीला से संबंधित सूरदास जी का यह पद राग कान्हड़ा पर आधारित है। ब्रज के घर-घर में इस बात की चर्चा हो गई कि नंदपुत्र श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ चोरी करके माखन खाते हैं। एक स्थान पर कुछ ग्वालिनें ऐसी ही चर्चा कर रही थीं। उनमें से कोई ग्वालिन बोली कि अभी कुछ देर पूर्व तो वह मेरे ही घर में आए थे। कोई बोली कि मुझे दरवाजे पर खड़ी देखकर वह भाग गए। एक ग्वालिन बोली कि किस प्रकार कन्हैया को अपने घर में देखूं। मैं तो उन्हें इतना अधिक और उत्तम माखन दूं जितना वह खा सकें। लेकिन किसी भांति वह मेरे घर तो आएं। तभी दूसरी ग्वालिन बोली कि यदि कन्हैया मुझे दिखाई पड़ जाएं तो मैं गोद में भर लूं। एक अन्य ग्वालिन बोली कि यदि मुझे वह मिल जाएं तो मैं उन्हें ऐसा बांधकर रखूं कि कोई छुड़ा ही सके। सूरदास कहते हैं कि इस प्रकार ग्वालिनें प्रभु मिलन की जुगत बिठा रही थीं। कुछ ग्वालिनें यह भी विचार कर रही थीं कि यदि नंदपुत्र उन्हें मिल जाएं तो वह हाथ जोड़कर उन्हें मना लें और पतिरूप में स्वीकार कर लें।

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गाइ चरावन जैहौं

आजु मैं गाइ चरावन जैहौं।

बृन्दावन के भांति भांति फल अपने कर मैं खेहौं॥

ऐसी बात कहौ जनि बारे देखौ अपनी भांति।

तनक तनक पग चलिहौ कैसें आवत ह्वै है राति॥

प्रात जात गैया लै चारन घर आवत हैं सांझ।

तुम्हारे कमल बदन कुम्हिलैहे रेंगत घामहि मांझ॥

तेरी सौं मोहि घाम लागत भूख नहीं कछु नेक।

सूरदास प्रभु कह्यो मानत पर्यो अपनी टेक॥

अर्थ: यह पद राग रामकली में बद्ध है। एक बार बालकृष्ण ने हठ पकड़ लिया कि मैया आज तो मैं गौएं चराने जाऊंगा। साथ ही वृन्दावन के वन में उगने वाले नाना भांति के फलों को भी अपने हाथों से खाऊंगा। इस पर यशोदा ने कृष्ण को समझाया कि अभी तो तू बहुत छोटा है। इन छोटे-छोटे पैरों से तू कैसे चल पाएगा.. और फिर लौटते समय रात्रि भी हो जाती है। तुझसे अधिक आयु के लोग गायों को चराने के लिए प्रात: घर से निकलते हैं और संध्या होने पर लौटते हैं। सारे दिन धूप में वन-वन भटकना पड़ता है। फिर तेरा वदन पुष्प के समान कोमल है, यह धूप को कैसे सहन कर पाएगा। यशोदा के समझाने का कृष्ण पर कोई प्रभाव नहीं हुआ, बल्कि उलटकर बोले, मैया! मैं तेरी सौगंध खाकर कहता हूं कि मुझे धूप नहीं लगती और ही भूख सताती है। सूरदास कहते हैं कि परब्रह्म स्वरूप श्रीकृष्ण ने यशोदा की एक नहीं मानी और अपनी ही बात पर अटल रहे।

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धेनु चराए आवत

आजु हरि धेनु चराए आवत।

मोर मुकुट बनमाल बिराज पीतांबर फहरावत॥

जिहिं जिहिं भांति ग्वाल सब बोलत सुनि स्त्रवनन मन राखत।

आपुन टेर लेत ताही सुर हरषत पुनि पुनि भाषत॥

देखत नंद जसोदा रोहिनि अरु देखत ब्रज लोग।

सूर स्याम गाइन संग आए मैया लीन्हे रोग॥

अर्थ: भगवान् बालकृष्ण जब पहले दिन गाय चराने वन में जाते है, उसका अप्रतिम वर्णन किया है सूरदास जी ने अपने इस पद के माध्यम से। यह पद राग गौरी में बद्ध है। आज प्रथम दिवस श्रीहरि गौओं को चराकर आए हैं। उनके शीश पर मयूरपुच्छ का मुकुट शोभित है, तन पर पीतांबरी धारण किए हैं। गायों को चराते समय जिस प्रकार से अन्य ग्वाल-बाल शब्दोच्चारण करते हैं उनको श्रवण कर श्रीहरि ने हृदयंगम कर लिया है। वन में स्वयं भी वैसे ही शब्दों का उच्चारण कर प्रतिध्वनि सुनकर हर्षित होते हैं। नंद, यशोदा, रोहिणी ब्रज के अन्य लोग यह सब दूर ही से देख रहे हैं। सूरदास कहते हैं कि जब श्यामसुंदर गौओं को चराकर आए तो यशोदा ने उनकी बलैयां लीं।

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मुखहिं बजावत बेनु

धनि यह बृंदावन की रेनु।

नंदकिसोर चरावत गैयां मुखहिं बजावत बेनु॥

मनमोहन को ध्यान धरै जिय अति सुख पावत चैन।

चलत कहां मन बस पुरातन जहां कछु लेन देनु॥

इहां रहहु जहं जूठन पावहु ब्रज बासिनि के ऐनु।

सूरदास ह्यां की सरवरि नहिं कल्पबृच्छ सुरधेनु॥

अर्थ: राग सारंग पर आधारित इस पद में सूरदास कहते हैं कि वह ब्रजरज धन्य है जहां नंदपुत्र श्रीकृष्ण गायों को चराते हैं तथा अधरों पर रखकर बांसुरी बजाते हैं। उस भूमि पर श्यामसुंदर का ध्यान (स्मरण) करने से मन को परम शांति मिलती है। सूरदास मन को प्रबोधित करते हुए कहते हैं कि अरे मन! तू काहे इधर-उधर भटकता है। ब्रज में ही रह, जहां व्यावहारिकता से परे रहकर सुख प्राप्ति होती है। यहां किसी से लेना, किसी को देना। सब ध्यानमग्न हो रहे हैं। ब्रज में रहते हुए ब्रजवासियों के जूठे बासनों (बरतनों) से जो कुछ प्राप्त हो उसी को ग्रहण करने से ब्रह्मत्व की प्राप्ति होती है। सूरदास कहते हैं कि ब्रजभूमि की समानता कामधेनु भी नहीं कर सकती। इस पद में सूरदास ने ब्रज भूमि का महत्त्‍‌ प्रतिपादित किया है।

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कौन तू गोरी

बूझत स्याम कौन तू गोरी।

कहां रहति काकी है बेटी देखी नहीं कहूं ब्रज खोरी॥

काहे कों हम ब्रजतन आवतिं खेलति रहहिं आपनी पौरी।

सुनत रहति स्त्रवननि नंद ढोटा करत फिरत माखन दधि चोरी॥

तुम्हरो कहा चोरि हम लैहैं खेलन चलौ संग मिलि जोरी।

सूरदास प्रभु रसिक सिरोमनि बातनि भुरइ राधिका भोरी॥

अर्थ: सूरसागर से उद्धृत यह पद राग तोड़ी में बद्ध है। राधा के प्रथम मिलन का इस पद में वर्णन किया है सूरदास जी ने। श्रीकृष्ण ने पूछा कि हे गोरी! तुम कौन हो? कहां रहती हो? किसकी पुत्री हो? हमने पहले कभी ब्रज की इन गलियों में तुम्हें नहीं देखा। तुम हमारे इस ब्रज में क्यों चली आई? अपने ही घर के आंगन में खेलती रहतीं। इतना सुनकर राधा बोली, मैं सुना करती थी कि नंदजी का लड़का माखन की चोरी करता फिरता है। तब कृष्ण बोले, लेकिन तुम्हारा हम क्या चुरा लेंगे। अच्छा, हम मिलजुलकर खेलते हैं। सूरदास कहते हैं कि इस प्रकार रसिक कृष्ण ने बातों ही बातों में भोली-भाली राधा को भरमा दिया।

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मिटि गई अंतरबाधा

खेलौ जाइ स्याम संग राधा।

यह सुनि कुंवरि हरष मन कीन्हों मिटि गई अंतरबाधा॥

जननी निरखि चकित रहि ठाढ़ी दंपति रूप अगाधा॥

देखति भाव दुहुंनि को सोई जो चित करि अवराधा॥

संग खेलत दोउ झगरन लागे सोभा बढ़ी अगाधा॥

मनहुं तडि़त घन इंदु तरनि ह्वै बाल करत रस साधा॥

निरखत बिधि भ्रमि भूलि पर्यौ तब मन मन करत समाधा॥

सूरदास प्रभु और रच्यो बिधि सोच भयो तन दाधा॥

अर्थ: रास रासेश्वरी राधा और रसिक शिरोमणि श्रीकृष्ण एक ही अंश से अवतरित हुये थे। अपनी रास लीलाओं से ब्रज की भूमि को उन्होंने गौरवान्वित किया। वृषभानु कीर्ति (राधा के माँ-बाप) ने यह निश्चय किया कि राधा श्याम के संग खेलने जा सकती है। इस बात का राधा को पता लगा तब वह अति प्रसन्न हुई और उसके मन में जो बाधा थी वह समाप्त हो गई। (माता-पिता की स्वीकृति मिलने पर अब कोई रोक-टोक रही ही नहीं, इसी का लाभ उठाते हुए राधा श्यामसुंदर के संग खेलने लगी।) जब राधा-कृष्ण खेल रहे थे तब राधा की माता दूर खड़ी उन दोनों की जोड़ी को, जो अति सुंदर थी, देख रही थीं। दोनों की चेष्टाओं को देखकर कीर्तिदेवी मन ही मन प्रसन्न हो रही थीं। तभी राधा और कृष्ण खेलते-खेलते झगड़ पड़े। उनका झगड़ना भी सौंदर्य की पराकाष्ठा ही थी। ऐसा लगता था मानो दामिनी मेघ और चंद्र सूर्य बालरूप में आनंद रस की अभिवृद्धि कर रहे हों। यह देखकर ब्रह्म भी भ्रमित हो गए और मन ही मन विचार करने लगे। सूरदास कहते हैं कि ब्रह्म को यह भ्रम हो गया कि कहीं जगत्पति ने अन्य सृष्टि तो नहीं रच डाली। ऐसा सोचकर उनमें ईष्र्याभाव उत्पन्न हो गया।

 

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